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मंगलवार, 3 अक्टूबर 2023

(अभिनंदन आलेख) हिरनी-सी भटकती फिरूँ, नाभि में कस्तूरी!



भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज की सेवा में तन-मन-धन से समर्पित डॉ. अहिल्या मिश्र (ज. 1948) के अमृतोत्सव के अवसर पर यह हार्दिक शुभकामना कि वे शतायु हों; दिव्य आयु प्राप्त करें।

यों तो अहिल्या जी के लेखन से मैं काफ़ी पहले से परिचित था, लेकिन 1995 में जब मेरा स्थानांतरण चेन्नई से हैदराबाद हुआ तो उनसे प्रत्यक्ष परिचय का अवसर मिला। डॉ. रोहिताश्व, स्वाधीन और पुरुषोत्तम प्रशांत इस परिचय के माध्यम बने। इन त्रिदेवों ने ही मुझे कादंबिनी क्लब (हैदराबाद) के मासिक कार्यक्रमों में शिरकत के लिए प्रेरित किया। यह जानकर अच्छा लगा कि इस संस्था की गोष्ठी हर हाल में हर महीने तीसरे इतवार को एक ही स्थान पर एक ही समय हुआ करती थी। गोष्ठियों की विषयवस्तु से अधिक उनके पारिवारिक स्वरूप ने मुझे विशेष आकर्षित किया। शहर भर के हिंदी कवि-कवयित्री इन गोष्ठियों में जिस आत्मीय भाव से तब जुड़ते थे, उसी से आज भी जुड़ते हैं। सबका डॉ. अहिल्या मिश्र के साथ घरेलू रिश्ता है। मुझे भी साल, दो साल परखने के बाद उन्होंने भाई बना लिया। मैं भाग्यशाली हूँ कि अहिल्या जी जैसी बड़ी बहन हैदराबाद में मेरी अभिभावक हैं, संरक्षक हैं। जब वे स्नेह से ‘इन्हें’ भाभी कह कर पुकारती हैं और ममता से गले मिलती हैं, तो ‘ये’ भी गद्गद हो उठती हैं। ऐसा निश्छल और अहैतुक वात्सल्य आज की दुनिया में भला सबको कहाँ नसीब होता है? लेकिन कादंबिनी क्लब (हैदराबाद) परिवार के सब सदस्यों को अहिल्या जी से समभाव से यह वात्सल्य मिलता है। वे सहज वत्सलता का अवतार हैं।

मैंने देखा है, कई बार ऐसा हुआ कि किसी ने अहिल्या जी के इस वत्सल भाव पर आघात किया, तो वे छटपटा कर वेदना और आक्रोश से भर उठीं। उन्हें छली और प्रपंची लोग क़तई पसंद नहीं है। कुछ लोग ऐसी स्थितियों में चुपचाप किनारे हो जाते हैं, लेकिन अहिल्या जी ऐसे लोगों को तब तक खदेड़ती हैं जब तक वे अपने बिलों में न घुस जाएँ। एक ख़ास तरह की ज़मींदारना दबंगई भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है - लेकिन सकारात्मक। दरअसल, वे सहज प्रेम पर प्रहार उसी तरह बरदाश्त नहीं कर पातीं, जिस तरह आदिकवि वाल्मीकि क्रौंच पक्षी पर बहेलिये के हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे। इसीलिए वे जब कहीं कुछ अघटनीय घटित होते देखती हैं, तो उनके भीतर का यह आदिकवि विचलित हो उठता है। यही वजह है कि वे केवल काग़ज़ रंगते रहने वाले निष्क्रिय बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल नहीं हैं। बल्कि आज 75 वर्ष की अवस्था में भी, ख़ासतौर से स्त्रियों और बच्चों के लिए, कर्मरत रहने वाली सक्रिय कार्यकर्ता हैं। प्रश्न भाषा का हो या साहित्य का, स्त्रियों का हो या संस्कृति का, वे उससे सीधे टकराती हैं। उनके व्यक्तित्व के ये दोनों आयाम - वात्सल्य और जुझारूपन - उनके समग्र साहित्य की आधार भित्ति का निर्माण करते हैं।

अहिल्या जी ने खूब लिखा है, लगातार लिखा है और सार्थक लिखा है। कविता हो या कहानी, नाटक हो या निबंध, संस्मरण हो या आत्मकथा- वे वाग्जाल नहीं फैलातीं। वे अत्यंत प्रभावशाली वक्ता भी हैं, लेकिन वहाँ भी उतनी ही बे-लाग-लपेट दिखती हैं, जितनी अपने लेखन में हैं। उन्होंने अपने लेखन में व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सरोकारों को हमेशा सीमित व्यक्तिगत सरोकारों पर तरजीह दी है। उन्हें अपनी कविताओं में भारतवर्ष के सभी क्षेत्रों में बसने वालों की एकात्मता के लिए प्रार्थना करते, गौरवशाली इतिहास को बार-बार दोहराते और जागरण, बलिदान, परिवर्तन व नवनिर्माण के गीत गाते देखा जा सकता है। अहिल्या जी की पक्षधरता में किसी भ्रांति की गुंजाइश नहीं है। वे हमेशा बच्चों, स्त्रियों, दलितों, युवकों और वंचितों के पक्ष में तथा वर्चस्ववादियों और शोषकों के ख़िलाफ़ चुनौती की मुद्रा में खड़ी दिखाई देती हैं:

ज़ुल्म के मुखौटों से गीत तो न बना सकोगे,
किंतु फिर भी मेरे गीत तुम न छीन सकोगे।

इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि डॉ. अहिल्या मिश्र के साहित्य सरोकार में कोमल भावनाओं के लिए जगह नहीं है। इसके विपरीत सच तो यह है कि कर्मशिला से बनी हुई इस अडिग मूरत के भीतर मसृण भावुकता का मधुर स्रोत हिलोरें मारता है। ख़ुद मैंने कभी उनकी कविताओं में यह लक्षित किया था कि: "वे प्रिय से प्रिय शब्दों के स्पर्श द्वारा प्राण में गंगाजली भरने की मनुहार करती हैं, मन में सावन के घन जैसी आशा और शरच्चंद्रिका जैसे स्वच्छंद विश्वास की कामना करती हैं, संगदिल सनम की स्मृति में दिलों पर ख़ार की मेहरबानी और मादक प्याला पिलाने वाले साक़ी के कदमों के निशान को अंकित करती हैं और साथ ही अपने भावनात्मक अकेलेपन को रूपायित करते हुए कहती हैं - किससे करूँ गिला, कि कोई हमनशीं न मिला!"

अभिप्राय यह कि अहिल्या मिश्र का समग्र साहित्य उनके अफाट जीवनराग की निष्पत्ति है। यही वजह है कि बहुत बार हमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में कबीर और मीरा की अनुगूँजे एक साथ सुनाई पड़ती हैं:

देहरी से अँगना की दूरी की मजबूरी
हिरनी-सी भटकती फिरूँ
नाभि में कस्तूरी!

इसी क्रम में अगर डॉ. अहिल्या मिश्र के कथाकार रूप का भी अवलोकन किया जाए, तो लगेगा कि जो चीज़ें उनकी कविताओं में बीज या संकेत के रूप में उपस्थित हैं, कहानी सहित अपने सारे गद्य लेखन में वे उन्हें बाक़ायदा पल्लवित, पोषित और संप्रेषित करने में पूर्ण सफल रही हैं। इस लिहाज़ से उनकी कहानियाँ अधिक प्रभावशाली बन पड़ी हैं। एक कहानीकार के रूप में वे हिंदी कहानी के समसामयिक परिदृश्य से बड़ी हद तक असंतुष्ट हैं और चाहती हैं कि कहानियाँ सामाजिक विघटन, राष्ट्रीय विखंडन, वर्ण, वर्ग, जाति, धर्म व संप्रदाय के नाम पर चलने वाले युद्धों तथा स्त्रियों और वंचितों के मानवाधिकार हनन जैसे सवालों पर खुल कर बोले, ताकि साहित्य के मूलधर्म की क्षति न हो। वे मानती हैं कि साहित्य को लोकमंगल का पक्ष लेते हुए मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित होना चाहिए। यही वजह है कि उनकी ज़्यादातर कहानियाँ यथार्थ पर आधारित होते हुए भी आदर्श की दिशा में इंगित करती हैं।

डॉ. अहिल्या मिश्र की जड़ें मिथिला में हैं और उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का कल्पवृक्ष हैदराबाद की आबोहवा में लहलहाया है। इसलिए उनकी कहानियों में बहुत बार शहरी मूल्यों के प्रति असंतोष और मैथिल संस्कृति के प्रति प्रेम झलकता-छलकता दिखाई देता है। बचपन की स्मृतियाँ प्रौढ़ावस्था के अनुभवों से टकराती हैं, तो लेखिका अनेक सामाजिक मान्यताओं और आचारों का निर्मम मूल्यांकन करने में व्यस्त हो जाती हैं। उन्होंने अपने आसपास के परिवेश को उसके सारे अमृत और विष के साथ इस तरह गटक रखा है कि कहानियों के देशकाल, विषयवस्तु और पात्रों में उसकी प्रामाणिकता सहज साकार हो उठती है।

… कहने को बहुत कुछ है। लेकिन फ़िलहाल इतना ही। ...

पुनश्च...
'देखें शत शरदों की शोभा,
जियें सुखी सौ वर्ष!'
000

शनिवार, 13 जुलाई 2019

दक्षिण के अग्रणी हिंदी साहित्यकार प्रो. आदेश्वर राव और उनकी कविता


आचार्य पी.आदेश्वर राव (ज. 20 दिसंबर, 1936) दक्षिण भारत में हिंदी के उन आचार्यों में अग्रणी हैं जिन्होंने अपनी मौलिक साहित्य सर्जना के बल पर देश भर में प्रभूत यश अर्जित किया है। वे ‘गुरूणाम् गुरु’ हैं। हिंदी भाषा और साहित्य उनकी रग-रग में रमे हैं। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भाषा, साहित्य और हिंदी की भाषिक संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करके उसे इस तरह आत्मसात कर लिया कि दक्षिण में अपने शिष्यों की कई-कई पीढ़ियों के लिए वे स्वयं हिंदी संस्कृति के पर्याय बन गए हैं। 

ॐ आदेश्वराय नमः 
(आचार्य पी.आदेश्वर राव जी का अभिनंदन ग्रंथ)
संपादक : आचार्य यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद
प्रकाशक : माया प्रकशन, कानपुर
                     
पुरुगुल्ला आदेश्वर राव ने दक्षिण भारत में हिंदी की सृजनात्मक परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने मौलिक लेखन भी किया, अनुवाद भी किया; और खूब किया। ‘अंतराल’, ‘धार के आर-पार’, ‘वातायन ये प्रेम सौध के’ – उनके तीन मौलिक काव्य संकलन हैं। उन्होंने अनेक कविताओं का अनुवाद तेलुगु से हिंदी में करके हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्य-सेतु का निर्माण किया। इस दृष्टि से तेलुगु उपन्यास ‘पंडित परमेश्वर शास्त्री की वसीयत’ और ‘मोहभंग’ के अनुवाद भी उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा उन्होंने समीक्षा के क्षेत्र में भी अनेक कृतियों की रचना की। उनके द्वारा संपादित ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य के विकास में दक्षिण का योगदान’ बार-बार संदर्भित ग्रंथ है। दक्षिण भारत के हिंदी साहित्य को समझने के लिए वह एक अनिवार्य संदर्भ सामग्री है। एक भाषाशास्त्री के रूप में भी उन्होंने हिंदी तथा द्रविड भाषाओं के समानरूपी भिन्नार्थी शब्दों पर जो अपना अध्ययन प्रस्तुत किया है, वह भी अपना सानी नहीं रखता। 

ऐसे आचार्य पी.आदेश्वर राव के नाम और काम से तो मैं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आने से बहुत पहले ही परिचित हो चुका था। लेकिन उनके दर्शन का सौभाग्य मुझे 1990 में चेन्नै आने पर प्रो. के. रामा नायुडु के सौजन्य से ही प्राप्त हुआ। प्रथम साक्षात्कार से ही उनकी जो छवि मेरे मन में बनी, वह आज भी ज्यों की त्यों है। इस छवि की सबसे पहली विशेषता है इसका उदात्त खुलापन। मैं प्रो. पी. आदेश्वर राव को एक ऐसे उदात्त चित्त व्यक्ति के रूप में जानता हूँ जिसके ठहाके अपने मन को भी निर्मल करते हैं और दूसरों को भी निष्कलुष बनाने की शक्ति रखते हैं। पहली ही मुलाक़ात से मेरी समझ में यह आ गया कि आदरणीय आदेश्वर राव जी साहित्यिक किस्सों और संस्मरणों की जीवित खान हैं। और जब वे कोई किस्सा सुनाते, किसी संस्मरण का डूबकर विवरण देते तो उनके शब्दों में भाषा का ऐसा अविरल प्रवाह फूट पड़ता कि लगता शायद इसे ही वर्ड्सवर्थ ने वह सुंदर कविता कहा है जो अत्यंत भावावेग के साथ कवि के मानस से अपनी प्रबलता के कारण अनायास ही फूट पड़ती है। कथन की यह शैली और भाषा का यह प्रवाह जो प्रो. पी. आदेश्वर राव के व्यक्तित्व का ऐसा हिस्सा है जो किसी को भी विस्मित कर सकता है। 

उसके बाद जाने कितनी बार ‘गुरु जी’ से मिलने का अवसर मिला। हाँ, मैं उन्हें आरंभ से ही ‘गुरु जी’ कहता रहा हूँ। बैठते ही कुछ ही देर में वे अतीत में खो जाते हैं। आप चाहें तो उन्हें अतीतप्रेमी और नॉस्टेल्जिक भी कह सकते हैं। शायद इसीलिए छायावाद उनका अत्यंत प्रिय काव्यक्षेत्र है। वे प्रो. के. रामा नायुडु, प्रो. चंद्रभान रावत, प्रो. रवींद्र कुमार जैन, प्रो. एस. टी. नरसिंहाचारी, कथाकार रमेश चौधरी आरिगपूडि और कवि आलूरि बैरागी चौधरी के जाने कितने संस्मरण धाराप्रवाह सुनाते चले जाते थे। सबसे अधिक प्रिय उन्हें आलूरि बैरागी के संस्मरणों में रहना है। एक बार यदि वे बैरागी की यादों में चले गए तो वहाँ से उन्हें वापस लाना आसान नहीं है। दिन बीत जाए, रात बीत जाए, लेकिन मजाल है कि आदेश्वर राव आलूरि के काव्यकुंज से बाहर आना चाहें। उन्होंने बैरागी के बारे में इतनी बार, इतनी घटनाएँ और इतनी काव्यपंक्तियाँ सुनाई हैं कि मेरे मन में कवि बैरागी का एक जीवित चित्र बन गया है। यह चित्र एक ऐसे फक्कड़ रचनाकार का है, जो अपने लेखकीय अहं में निराला से तुलनीय है। प्रो. राव ने अनेक शोधार्थियों को बैरागी पर शोध करने के लिए प्रेरित किया है। उनकी रचनाओं का संपादन और अनुवाद भी किया है। एक बार उन्होंने बताया कि उन्होंने विदेश में कभी अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाक़ात होने पर उन्हें घंटों बैरागी की रचनाएँ और अनुवाद सुनाए थे। आदेश्वर राव जी की स्मरण शक्ति से किसी को भी ईर्ष्या होनी चाहिए। उन्हें ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ शायद अक्षरशः याद हैं। प्रसाद के नाटकों के लंबे-लंबे संवाद भी उनकी जिह्वा पर नाचते रहते हैं। 

एक लेखक और रचनाकार के रूप में, आदेश्वर राव द्वंद्व में रहने वाले रचनाकार हैं। द्वंद्व अतीत प्रेम और यथार्थ बोध का। द्वंद्व छायावादी संस्कार और प्रगतिशील चेतना का। द्वंद्व तेलुगु और संस्कृत की काव्य परंपरा तथा अंग्रेजी और हिंदी की काव्य परंपरा का। इस द्वंद्व के ही कारण एक आलोचक के रूप में जहाँ पी.आदेश्वर राव लगातार मार्क्सवादी चिंतक के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर सृजनात्मक लेखन अर्थात काव्य में उनका मन छायावादी काव्यभाषा तक आकर ठहर गया है। वे चाहे बम्मेरा पोतना के ‘भागवत नवनीत’ का अनुवाद करें या अजंता की नई कविता का अनुवाद करें, भाषिक संस्कार उनका वही तत्सम प्रधान छायावादी रुझान वाला रहता है। यदि यह कहा जाए कि स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता और काव्यानुवाद के क्षेत्र में छायावादी काव्य संस्कार को जीवित रखने वाले कवियों और अनुवादकों में प्रो. पी.आदेश्वर राव का स्थान अग्रणी है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। 

1986 में प्रो. राव का कविता संग्रह ‘धार के आर-पार’(पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली-32/ 1986/ 104 पृष्ठ/ 35 रुपये) प्रकाशित हुआ जो उनकी अत्यंत समादृत और चर्चित कृति के रूप में मान्य है। ‘धार के आर-पार’ में उन्होंने अपनी काव्यधारा के दो तटों की चर्चा की है। एक तट प्रेम और सौंदर्यबोध का है, तो दूसरा तट समाज और लोकबोध का। इन दो तटों के द्वंद्व में ही आदेश्वर राव की काव्यप्रतिभा प्रवाहित होती है। फिर भी यदि यह कहा जाए कि प्रेम और सौंदर्य ही उनकी काव्यप्रतिभा के नैसर्गिक क्षेत्र हैं, तो ज्यादती नहीं होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज और लोक चेतना का तट उन्हें खूब भाया है, लेकिन उस तट पर वे उतना रमते नहीं। प्रेम और सौंदर्य के बोध वाला तट उन्हें बार-बार अपनी ओर खींचता रहता है। वहीं उनका मन सहज विश्राम का अनुभव करता है। इस तट पर कवि की कल्पना-सुंदरी है, प्रेमिका है। लेकिन छायावादी संस्कार के अनुरूप यह सुंदरी, यह प्रेमिका आलोकमयी अधिक है। सदेह होते हुए भी विदेह सी प्रतीत होती है। कवि प्रेयसी के सौंदर्य को जिन परंपरित उपमानों की सहायता से उकेरने की कोशिश करता है, वे क्रमशः सूक्ष्म और उदात्त होते जाते हैं तथा प्रेमिका का चित्र उभरते-उभरते परमतत्व का चित्र बन जाता है। आदेश्वर राव की इस काव्य नायिका के नयन नव नीलोत्पल सरीखे हैं, केश अलिदल की तरह चंचल हैं, चरण शतदल जैसे रक्तिम हैं और कुल मिलाकर उसका रूप मधुर मनोहर है। इससे अधिक मांसलता तो ‘मधुराष्टकम्’ के कृष्ण के चित्र में है। अभिप्राय यह कि आदेश्वर राव का सौंदर्यबोध उज्ज्वल, उदात और सूक्ष्म अप्रस्तुत विधानों से अभिव्यंजित होता है। वे प्रेयसी को पुरुष के नेत्रों से नहीं देखते, कवि के नेत्रों से देखते हैं। कवि के ये भाव-नयन जिस प्रेयसी को तन्मय होकर देख रहे हैं, उसका रूप विमल है और कवि के हृदय में उसने एक स्थायी आग्रह का स्थान बना लिया है- ‘पा चुका हृदय में अमर टेक।‘ अपनी इस अपरूप सुंदरी, काव्य-प्रेरणा रूपी प्रेयसी को पाने की चाह को ‘धार के आर-पार’ में कवि ने बार-बार अलग-अलग प्रकार से व्यंजित किया है। कवि की चाह है कि वह प्रेयसी की कुटिल अलकों में उलझ जाए। वह अपनी प्रेयसी को सारी प्रकृति में दीप्त देखता है। उषा की लालिमा में उसे अपनी प्रिया के दर्शन होते हैं; और यदि कहीं यह प्रेयसी तनिक मंद-मंद मुसका दे, तो कवि अपने अस्तित्व को ही भूल जाता है। प्रेम की आत्म-विस्मरण जैसी यह दशा तब और भी उदात्त भूमि का स्पर्श करती है, क्षितिज का स्पर्श करती है, जब इंद्रधनुष नील घन मंडल से सुशोभित होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ नील घन मंडल स्वयं कवि का व्यंजक है और इंद्रधनुष प्रेमिका का। यह प्रेमी कवि अंधेरे में सोती सजनी को देखते हुए गीत रचने भर की पावन चाह रखता है। जिस प्रेमिका के सौंदर्य और अपरूप स्वरूप को लेकर इतनी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ प्रेमी कवि ने पाल रखी हैं, वह कौन है? इस रहस्य पर से पर्दा कभी उठता ही नहीं। उठ भी नहीं सकता, क्योंकि कवि जिससे प्रेम कर रहा है वह उससे परिचित नहीं है। मिलने की इच्छा है, पर जान-पहचान तो हुई ही नहीं। बस एक अद्भुत सौंदर्य है, जिस पर कवि रीझता है और विस्मित होता है। मिलन भी होता है, लेकिन स्वप्न में; और तब भी यह पता नहीं चलता कि वह है कौन! विस्मित होकर कवि पूछ बैठता है – ‘तुम स्वप्न की अमराइयों में मुझे इस तरह अपने अंक में क्यों बाँध लेती हो? भला तुम स्वर्ग के मधुनंदनों में मुझे अपना प्रेम रूपी अधर मधु क्यों पिलाती हो? इस तरह अपनी लज्जा का अतिक्रमण करके मुझसे प्रेम करने वाली तुम कौन हो? अपना नाम तो बताओ।‘ लेकिन कवि की यह स्वप्नसुंदरी प्रेयसी सपनों के बाहर नहीं आती। वहीं मिलती है, आलिंगन में भरती है, चुंबन और परिरंभण करती है; और पहचान में आने से पहले ही रहस्य के पर्दे के पीछे चली जाती है। 

छायावादी भावबोध के ही विस्तार के रूप में मानव सौंदर्य से आगे बढ़कर प्रकृति सौंदर्य की चर्चा भी की जा सकती है। बादल, समुद्र और साँझ के जो मनोरम चित्र कवि आदेश्वर राव ने ‘धार के आर-पार’ की कई रचनाओं में खींचे हैं, वे छायावाद के समय के और बाद के भी कई रचनाकारों की याद दिलाते हैं। कहना न होगा कि इन दृश्यों को शब्दबद्ध करते समय कवि भारतीय प्रकृति-काव्य की संपूर्ण परंपरा से अनुप्राणित प्रतीत होते हैं। इसीलिए उन्होंने बादलों, समुद्रों और संध्या तीनों ही का जीवित मानवीकृत रूप वर्णित किया है। प्रकृति और मनुष्य के बीच बिंब-प्रतिबिंब भाव को भी इन रचनाओं में व्यंजित होते देखा जा सकता है। साथ ही प्रकृति में निरंतर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा की प्रेरणा को भी कवि ने शब्दबद्ध किया है। 

कवि आदेश्वर राव ने महान कवियों और लोकनायकों के उज्ज्वल चरित्र को उजागर करने वाली कविताओं की भी पूरी शृंखला की रचना की है। इनमें एक ओर सूर, तुलसी, जयशंकर प्रसाद, महाप्राण निराला, सुमित्रानंदन पंत और हरिवंशराय बच्चन सरीखे अनुपम शब्दशिल्पी शामिल हैं, तो दूसरी ओर लालबहादुर शास्त्री और लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर चौधरी चरणसिंह, नंदमूरि तारक रामाराव और संजय गांधी तक भारतीय राजनीति के विविध चेहरे भी विद्यमान हैं। कहना न होगा की इन सभी व्यक्तित्वों ने सतत संघर्ष द्वारा अपने-अपने क्षेत्र में सुनिश्चित उत्कर्ष प्राप्त किया। संभवतः इस संघर्ष-तत्व ने ही कवि को इन चरित्रों को अपना काव्य-नायक बनाने की प्रेरणा दी। 

अंततः, कवि आदेश्वर राव राजनीति और सामाजिक विसंगतियों पर केंद्रित अपनी कविताओं में अपने समकालीन रचनाकारों से किसी भी प्रकार पीछे नहीं हैं –भले ही वह उनका प्रकृत क्षेत्र नहीं है। उदाहरण के रूप में, लोकतंत्र के मूल्यों के क्षरण और सारे के सारे राजनैतिक परिवेश के प्रदूषण के यथार्थ को व्यक्त करने वाली डॉ. पी.आदेश्वर राव की इन काव्य-पंक्तियों को उद्धृत करते हुए मैं अपने इस कथन को विराम देना चाहूँगा – 

चुनाव के उस समरांगण में 
विज्ञापन के रंग ढंगसे 
प्रलोभनों के जाल बिछाकर 
मतदाताओं को उलझाकर 
नोटों से वोटों को भरकर 
सत्ता को हाथों में लेकर 
लागत को सौ बार बढ़ाकर 
लोकतंत्र व्यापार बन गया। 000 

- डॉ. ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा। 
आवास`: 208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर,
 हैदराबाद- 500013 (तेलंगाना)। 
मो. 8074742572. ईमेल rishabhadeosharma@yahoo.com

रविवार, 25 मार्च 2012

एलुरु में पुस्तक लोकार्पण और युगादि कवि सम्मलेन : चित्रावली

तेलुगु नाटक 'अक्षरम्' के हिंदी अनुवाद को लोकार्पित करते हुए  ऋषभ 

'अक्षरम्' के लोकार्पण के अवसर पर ऋषभ का अभिनंदन 

बीएसएनएल  के 'तेलुगु हिंदी कवि सम्मलेन' के अवसर पर अभिनंदन स्वीकारते हुए ऋषभ 

शनिवार, 24 मार्च 2012

एलुरु में पुस्तक लोकार्पण और युगादि कवि सम्मलेन

22 मार्च 2012 को पश्चिम गोदावरी [आंध्र प्रदेश] के जनपद मुख्यालय एलुरु जाना हुआ. ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्त्व का शहर. गाँधी जी के नमक आंदोलन  में यहाँ के नागरिकों ने इतना बढ़ चढ कर हिस्सा लिया था कि लोग इसे तमिलनाडु के वेलुरु से अलग पहचानने के लिए नमक-वेलुरु कहने लगे. वैसे एलुरु का एक अर्थ सप्त-सरिता निकलता है जो इस तथ्य का द्योतक है कि कभी यहाँ सात नदियाँ बहती थीं. अब भी गोदावरी और कृष्णा द्वारा सिंचित इस क्षेत्र को आंध्र के चावल का कटोरा कहकर मान दिया जाता है.

हिंदी प्रचार आंदोलन में भी एलुरु का स्थान महत्वपूर्ण है. गाँधी जी द्वारा दीक्षित हिंदी प्रचारकों ने उनकी चरणधूलि से पावन स्थल पर हिंदी विद्यालय की स्थापना की. पी सत्यनारायण, वेमूरि आंजनेय शर्मा और शीर्ल ब्रह्मय्या जैसे पुरोधा हिंदी प्रचारकों के इस कर्मक्षेत्र में जाने का अवसर मुझे बीएसएनएल के राजभाषा अधिकारी बी. विश्वनाथाचारी के आग्रहवश अनायास ही मिल गया. 

बी. विश्वनाथाचारी ने नंदिराजू सुब्बाराव कृत तेलुगु नाटक 'अक्षरम' का 'अक्षर' शीर्षक से हिंदी में अनुवाद किया है - प्रकाशित किया है. उनकी जिद थी कि लोकार्पण मेरे हाथों हो.  अपने युवा लेखक मित्र  पेरिसेट्टी श्रीनिवास राव ने यात्रा की जिम्मेदारी ले ली तो मैं साथ हो लिया. स्लीपर बस में खाली पेट खूब हिलना-डुलना हुआ; पर यात्रा दोनों ओर की ठीक-ठाक  ही रही. एलुरु में  पारंपरिक ढंग से स्वागत-सत्कार और अभिनंदन हुआ - दो दो बार. मैं तो बड़े संकोच में पड़ गया. दरअसल सवेरे तो पुस्तक-लोकार्पण का कार्यक्रम रहा ही; शाम को बीएसएनएल में तेलुगु-हिंदी कवि-सम्मलेन का भी आयोजन हुआ. युगादि पर्व की पूर्व वेला होने के कारण युगादि पर ही कविताएँ पढ़ी गईं. संयोगवश मैंने पिछले ही दिन इस स्थिति का पूर्वानुमान कर कुछ तुकबंदी कर डाली थी - उसने इज्ज़त बचा ली.  

आचार्य जी और राजा राव जी ने वापसी की बस पकड़ने से पहले दो मंदिरों में दर्शन भी करा दिए. दतात्रेय मंदिर और लघु तिरुपति मंदिर. बहुत अच्छा लगा. साहित्ययात्रा तीर्थयात्रा भी बन गई. दोनों ही मंदिर भव्य भी हैं और शांतिमय भी. और हाँ मंदिर के सामने पार्क में यों तो निर्जल उपवास करते मगरमच्छ महाशय व महाकच्छप महोदय ने भी ध्यान खींचा पर फोटो हमने भगवान बुद्ध की ही प्रतिमा के सामने खिंचवाई.

 मित्रों का यह  निश्छल आतिथ्य सदा याद रहेगा! 

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

द्वितीय 'आचार्य हस्ती सेवा-सम्मान' डॉ. राधेश्याम शुक्ल को दिया गया


15  जनवरी 2012  को हैदराबाद में जैनाचार्य हस्तीमल जी की स्मृति में स्थापित न्यास की ओर से इस वर्ष का आचार्य हस्ती सेवा-सम्मान 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल को प्रदान किया गया. अध्यक्षता जैन-रत्न सुरेंद्र लूणिया ने की और मुख्य अतिथि के रूप में चेन्नई की जैन संस्था के अधिकारी मंचासीन हुए. अपुन को विशेष अतिथि के रूप में बोलने को बुलाया गया.  





[चित्र :  हरिकृष्णा और  संपत देवी मुरारका]

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

कविता वाचक्नवी के वास्ते....

'साहित्य मंथन' और 'विश्वम्भरा' के तत्वावधान में तेरह जनवरी [लोहड़ी] २०११  की साँझ को डॉ. कविता वाचक्नवी के हैदराबाद आगमन पर 'स्नेह मिलन और कविगोष्ठी' का आयोजन किया गया  जो कविता जी के सम्मान समारोह में बदल गया. मित्रों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों के आशीर्वाद और अपनेपन को समेटती हुईं कविता जी काफी प्रसन्न दिख रही थीं. उन्होंने विस्तार से इन्टरनेट के माध्यम से साहित्य, भाषा और संस्कृति की सेवा के कई गुर बताए और हमेशा की तरह उन लोगों को जी भर कर लताड़ा जो इस शक्तिशाली माध्यम का प्रयोग केवल अपनी छपास मिटाने के लिए करते हैं. खूब कविताएँ पढी-सुनी गईं. 'आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी', 'उच्च शिक्षा और शोध संस्थान' तथा  'अहल्या' पत्रिका की ओर से भी कवयित्री का सम्मान किया गया. अध्यक्षता आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के प्रो. बी. सत्यनारायण ने की. अनुवादिका शांता सुन्दरी  विशेष अतिथि रहीं. संचालन डॉ. बी. बालाजी ने किया. संयोजन संपत देवी मुरारका और उनके सुपुत्र राजेश मुरारका ने सँभाला.

चित्र : राजेश मुरारका. और गोपाल कुमार   

रविवार, 7 नवंबर 2010

भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ हेतु लेखकीय सहयोग का अनुरोध



भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ समिति

२०८ -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - ५०० ०१३ 


विषय: भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ हेतु लेखकीय सहयोग का अनुरोध।


महोदय,
सादर नमन।
हर्ष का विषय है कि प्रतिष्ठित हिंदी भाषाविज्ञानी प्रो. दिलीप सिंह (कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास) के शुभचिंतकों, मित्रों, प्रशंसकों  और शिष्यों ने उनके सम्मान में एक अभिनंदन ग्रंथ समर्पित करने का संकल्प लिया है। इस ग्रंथ को हिंदी जगत को  प्रो. दिलीप सिंह के प्रदेय के साथ-साथ मुख्य रूप से अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के विविध पक्षों पर केंद्रित करने की योजना है। इस योजना को, परामर्शदाता के रूप में, डॉ. नामवर सिंह,  डॉ. सुरेंद्र गंभीर, डॉ. निकोलस बलवीर, डॉ. सूरज भान सिंह, डॉ. वी.रा. जगन्नाथन, डॉ.सुरेश  कुमार, डॉ. परमानंद श्रीवास्तव और  डॉ. कमला प्रसाद जैसे साहित्य और भाषाविज्ञान के मर्मज्ञ विद्वानों का आशीर्वाद प्राप्त है|
  
प्रो. दिलीप सिंह के व्यक्तित्व और कार्यों से व्यक्तिगत रूप से परिचित / मित्र / शुभचिंतक  तथा भाषाविज्ञान/अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की अधुनातन प्रवृत्तियों के विशेषज्ञ विद्वान के रूप में आपसे अनुरोध है कि इस ग्रंथ के लिए -

१. कृपया प्रो.दिलीप सिंह से संबंधित अपने संस्मरण (अधिकतम 1000 शब्दों में) भेजकर अनुगृहीत करें। 

२. कृपया प्रो. दिलीप सिंह की किसी पुस्तक/पुस्तकों [व्यावसायिक हिंदी / पाठ विश्लेषण / हिंदी भाषा चिंतन / भाषा का संसार / अन्य भाषा शिक्षण के विविध सन्दर्भ /भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण] पर समीक्षात्मक आलेखभेजकर अनुगृहीत करें।

३. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अपनी रुचि के विषय (यथा - ‘‘समाज भाषाविज्ञान / अनुवाद चिंतन / भाषा शिक्षण / भाषा नियोजन / प्रयोजनमूलक भाषा / मीडिया की भाषा / मनोभाषाविज्ञान / शैलीविज्ञान / उत्तर आधुनिक भाषाविमर्श / स्त्रीभाषा / पाठ विश्लेषण / कम्प्यूटर और हिंदी / विश्वभाषा हिंदी’’) पर एक सारगर्भित निबंध भेजकर अनुगृहीत करें|

अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशनार्थ  यह सामग्री कृपया 15 दिसंबर, 2010 तक मेरे पते पर उपलब्ध कराने का कष्ट करें।
विश्वास  है कि इस सारस्वत यज्ञ में हमें आपका शुभकामनापूर्ण सहयोग अवश्य  प्राप्त होगा।
धन्यवाद सहित,
    
आपका
ऋषभ देव शर्मा           
http://bit.ly/d98iWc
संयोजक, भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ

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