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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

भाषा संस्कृति संगम


भारत डिग्री कॉलेज फॉर वोमेन, काचीगुडा,हैदराबाद में २९ दिसंबर २०११  को ''भाषा-संस्कृति संगमम'' का आयोजन किया गया. वयोवृद्ध प्रो. ए.सुब्बा राव ने अंग्रेजी और उसमें बुनी संस्कृति पर समाज भाषा वैज्ञानिक नज़रिए से प्रकाश डाला , तो कवि और भाषातत्ववेत्ता प्रो. एम. सूर्यनारायण मूर्ति ने विस्तार से समझाया कि किस तरह तेलुगु भाषा और तेलुगु संस्कृति आज खतरे में हैं.

अपुन के जिम्मे तो भारतीय संस्कृति पर बोलना आया था. सो पंडित-द्वय अर्थात प.हजारी प्रसाद द्विवेदी और प.विद्या निवास मिश्र का सहारा लेकर अविरोधी धर्म, पुरुषार्थ चतुष्टय, आश्रम व्यवस्था, तीन ऋण तथा  तीन द [दमन-दान-दया] की व्याख्या कर दी और मुक्तिबोध का सहारा लेकर '' जो भी है उससे बेहतर चाहिए'' का नारा बुलंद कर डाला. [अरे हाँ, मुक्तिबोध से याद आया - उन पर केंद्रित फिल्म ''सतह से उठता  आदमी'' लाया है बेटा मुझे दिखाने के लिए. कल उसे दिल्ली लौटना है. चलूँ, वह फिल्म देख डालूँ. वरना बालक का दिल टूट जाएगा.]

विदा २०११

यह लो, एक बरस बीत गया

हम प्रेम की प्रतीक्षा में
बस लड़ते ही रह गए
साल भर

इसी तरह गँवा दिए
साल दर साल
लड़ते लड़ते
प्रेम की प्रतीक्षा में

बहुत खरोंचें दीं हम दोनों ने
एक दूसरे को

बहुत अपराध किए
बहुत सताया एक दूजे को
एक दूजे का प्यार जानते हुए भी

समय तेज़ी से दौड़ने लगा है
पिछले हर बरस से तेज

इस तीव्र काल प्रवाह में
कल हो न हो
फिर समय मिले न मिले

क्षमा माँग लूँ तुमसे
तुम जो धरती हो
तुम जो आकाश हो
तुम जो जल हो, वायु हो
तुम जो अग्नि हो, प्राण हो ,प्रेम हो
मैंने तुम्हें बहुत सताया , बहुत बहुत सताया
मेरे अपराधों को क्षमा करना

नए वर्ष में
फिर मिलेंगे हम
नए हर्ष से

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

आज कमल जी आए थे

काफी वक्त गुजर गया जब डॉ. राम कुमार तिवारी जी [निर्दोष] ने उप्पुगुडा [हैदराबाद] में मेधावी छात्रों कों सम्मानित और पुरस्कृत करने के लिए कार्यक्रम रखा था. पर आज वह प्रसंग ताज़ा हो आया. हुआ यों कि वयोवृद्ध कवि सत्यनारायण शर्मा 'कमल' जी उनके यहाँ होते हुए मेरे पास आए संस्थान में, तो तिवारी जी ने उनके हाथ उस आयोजन के कुछ फोटो भी भिजवा दिए.



शर्मा जी आयु के नवें दशक में हैं. अपने सुपुत्र के साथ आए थे. बहुत अशक्त हो गए हैं. ऊंचा तो वे सुनते ही हैं. पर आज पहली बार उन्हें बेंत के सहारे झुककर चलते देखा तो मैं धक्क रह गया. पता चला कि दोनों घुटने जवाब दे चुके हैं और आपरेशन करने से डॉक्टरों ने मना कर दिया है क्योंकि हृदय झेल नहीं पाएगा. अभी पिछले वर्ष जब मिले तो शर्मा जी इतने थके और पराजित से न थे. पर आज... उनकी आवाज में ...खा ...ली ....प ....न.....सा था.बोले  - साल छः महीने का जीवन है अब क्या आपरेशन करावें? सब परिचितों का हालचाल पूछते रहे .१५ मिनट रुके होंगे मेरे पास. मैं भी निकल रहा था. वे भी निकल गए. पर मन भारी हो गया. परमात्मा उन्हें स्वस्थ रखे....वे दीर्घायु हों...!

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

कलंब की संगोष्ठी के चित्र

कलंब [महाराष्ट्र] में २३/२४ दिसंबर २०११  को संपन्न ''पत्रकारिता के बदलते स्वरूप'' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन और समापन समारोह के कुछ चित्र  [जिनमें हमारा भी थोबड़ा दिखाई दे रहा है] संयोजक डॉ. साकोले दत्ता ने भेजे हैं. स्लाइड-शो प्रस्तुत है :

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

तेलुगु समाज का दर्पण बनती लघुकथाएँ


लघुकथा उपन्यास और कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत नई विधा है, और कम चर्चित भी. सत्तरोत्तर काल में हिंदी में इस विधा की रचना ने आंदोलन का रूप ग्रहण किया. तब से वहाँ यह विधा खूब फल फूल रही है. यह जानना विस्मयकारी हो सकता है कि तेलुगु में अब भी लघुकथा आरंभिक अवस्था में ही है. विभिन्न भारतीय भाषाओं की लघुकथाओं के अध्येता बलराम अग्रवाल बताते हैं कि समकालीन तेलुगु कथा साहित्य में लघुकथा लेखन की स्थिति हिंदी, यहाँ तक कि मलयालम लघुकथा लेखन से भी नितांत भिन्न एवं कमजोर प्रतीत होती है. उनके अनुसार तेलुगु में लघुकथा की भाषा एवं कथ्य अभी भी कहानी से ही प्रभावित हैं. इसी कारण जब हम उनके द्वारा संपादित सोलह कथाकारों की 106 ‘तेलुगु की मानक लघुकथाएं’ (2010) देखते हैं जिनका अनुवाद पारनंदि निर्मला ने किया है तो साफ लगता है कि तेलुगु लघुकथा का कहानी के संस्कार से मुक्त होना अभी बाकी है – तभी उसमें झकझोरने और विचलित करने की व्यंजना शक्ति का विस्तार होगा.
यहाँ लघुकथा के संबंध में भूमिका (लघुकथा : आकार का अनुशासन) में व्यक्त बलराम अग्रवाल के ये विचार देखे जा सकते हैं – “मात्र आकार का ही छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर सकता. लेकिन वही मूल्यवान-महत्वपूर्ण माना जाता रहा है जो अपने युगीन जनजीवन की परतें उघाड़, पाठकों को उसके नग्न यथार्थ से परिचित करवा सके; जो शोषक और शोषित – दोनों के मध्य पुल बन. उन्हें उनके उत्थान व पतन पर लगे प्रश्न चिह्नों से अवगत करा, ‘सही’ करने के प्रति उनमें चेतना जागृत करा सके; जो हर ‘गलत’ के विरुद्ध संघर्ष कर सकने वाली जुझारू भूमिका निभा सके तथा जो सामान्यजन के दुःख-दर्द को वहन कर उन्हें यथावत पाठकों तक संप्रेषित कर उन्हें कुछ सोचने पर बाध्य कर सके. चूंकि लघुकथा में इन क्षमताओं का अभाव नहीं है, इसीलिए वह मूल्यवान बनी है, मात्र आकार की लघुता के कारण ही नहीं. फिर भी, आकारीय लघुता इसकी एक विशेषता मानी गई है.” लघुकथा कों उन्होंने फ्लैश फिक्शन का समानार्थी मानते हुए कौंध कथा भी कहा है. 

इसमें संदेह नहीं कि कथ्य की जिन विशेषताओं की ओर ऊपर इशारा किया गया है तेलुगु की ये मानक लघुकथाएं उनसे संपन्न हैं. इनके सरोकारों में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण जीवन की परेशानियां, पुलिस और उग्रवादियों के दोहरे आतंक को झेलने की विवशता, धार्मिक कृत्यों के नाम पर पाखंड और अंधविश्वास की व्याप्ति, भारतीय लोकतंत्र की असफलता, लैंगिक भेदभाव झेलती लड़की की वेदना, गरीबी, भ्रष्टाचार, मूल्यह्रास, संबंधों का छीजते जाना और मध्य वर्ग के जीवन की यांत्रिकता आदि तमाम तरह की समकालीन चिंताएं शामिल हैं. शिल्प की दृष्टि से चुटीलापन कुछ कम देखने में आया है जो लघुकथा को वैचारिक हलचल का आधार बनाता है. 

तेलुगु की ये लघुकथाएं हिंदी पाठक को अपने सरोकारों के माध्यम से जहाँ उसकी पहले से परिचित कष्ट और वेदना से भरी हुई दुनिया का दर्शन कराती हैं वहीं उसके समक्ष तेलुगु लोक के अपेक्षाकृत अपरिचित जगत का झरोखा भी खोलती हैं. वह जान पाता है कि देवी माँ को तेलुगु प्रदेश में आदरपूर्वक 'अम्मावारू' कहा जाता है और किसी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक संबोधित करने के लिए हिंदी के ‘जी’ की भाँति ‘गारू’ का प्रयोग किया जाता है. देवी पूजा के अवसर पर पीले कपड़े पहन कर औरतें नीम की टहनियाँ हाथ में लेकर बाल बिखेर बिखेर कर उसी तरह तन्मय होकर नाचती हैं जिस तरह हिंदी प्रदेशों में देवी या भैरव के भक्त नाचते हैं. उन पर हल्दी मिले पानी के कलश उड़ेले जाते हैं. संक्रांति के तीसरे दिन ‘कनुमा’ के अवसर पर पुलिहोरा, बूरुलु, मीठे बडे, मीठे चीले और मुर्गी का मांस बनाया जाता है. लड़कियों को साड़ी ब्लाउज और दामादों को नए कपड़े दिए जाते हैं. किसी महिला के घर आने पर यहाँ उसे विदा करते समय साड़ी ब्लाउज, नारियल, केला, फूल, पान, हल्दी और कुमकुम देने की प्रथा है. लोक संबंधी इस प्रकार की अनेक जानकारियाँ हिंदी के पाठक को सांस्कृतिक स्तर पर संपन्नतर और समृद्धतर बनाती हैं. इस दृष्टि से यह चयन अत्यंत वैविध्यपूर्ण और उपादेय है तथा ये लघुकथाएं तेलुगु समाज का दर्पण कहे जाने की हक़दार हैं. 

इन लघुकथाओं का अनुवाद तेलुगु और हिंदी में एक समान गति रखनेवाली वरिष्ठ लेखिका पारनंदि निर्मला ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक इस प्रकार किया है कि पाठक को यह सामग्री अनूदित प्रतीत नहीं होती. भाषा शैली की यह प्रांजलता और प्रवाहशीलता अनुवादक के रूप में उनकी लंबी साधना का सुफल है, इसमें संदेह नहीं. 


चर्चित पुस्तक – तेलुगु की मानक लघुकथाएं 
अनुवादक – पारनंदि निर्मला  
संपादक – बलराम अग्रवाल
प्रकाशक- मित्तल एंड संस, विजय ब्लाक, लक्ष्मीनगर, दिल्ली – 110092  
संस्करण – प्रथम : 2010
पृष्ठ - 175
मूल्य – 300 रुपए

रविवार, 25 दिसंबर 2011

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू ? : सवाल पत्रकारिता से


२३/२४  दिसंबर,  २०११
कलंब, महाराष्ट्र; 
शिक्षण महर्षि ज्ञानदेव मोहेकर महाविद्यालय.
द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : उद्घाटन सत्र समापन सत्र में  
शुभाशंसा भाषण : ऋषभ देव शर्मा

हिंदी और मराठी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप
-         १८३२: मराठी का पहला अखबार : दर्पण: मुंबई से: संपादक बालशास्त्री जांभेकर : उद्देश्य वाक्य – ‘’लोक-स्थिति, धर्म-रीति में उपयोगी परिवर्तन घटित करना.’’

-          ‘ज्ञानप्रकाश’ [अखबार] :१८ अप्रैल १८७८ ; ‘’भारत का शासन सुन्दर परन्तु छिनाल स्त्री की भांति है.उसका सौंदर्य आकर्षक एवं मोहक है.लेकिन वह अत्यंत धूर्त, धोखा देने वाली और बेरहम है. एक बार वह प्रेम से देखेगी तो दूसरे ही क्षण किसी कों घायल करेगी.’’

-          कष्ट विलासिनी [पत्र] पुणे : ‘’अंग्रेजी राज्यकर्ता लुच्चे हैं.......लेकिन सब एकजुट हो जायं तो इन उचक्कों कों हकालना कुछ कठिन नहीं है.’’ [१८८०]

-          लोकमान्य तिलक –१८८० से १९२० तक  केसरी और मराठा – स्वतंत्रता चाहने वाली जनता की विजय गाथा. ‘’मेरे क्लेश से मेरे कार्य का उत्कर्ष होगा, संभवतः यही ईश्वर का संकेत है.’’

-          स्वातंत्र्योत्तर काल में दो बड़े परिवर्तन-

-          १.पत्रकारिता/समाज की सर्वांगीण उन्नति के उद्देश्य के स्थान पर/ व्यापार या व्यवसाय/ मिशन बनाम प्रोफेशन . २.संपादक की जनजीवन से प्रतिबद्धता महत्वहीन हो गई/ लाभ अर्जित करना/ संपादक का कद घटा, जनता कों प्रभावित करने की शक्ति भी घटी.

-          [स्रोत- भारतीय भाषा पत्रकारिता:एक अवलोकन में डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर का निबंध]

आज की पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के कुछ पहलू
[लिपि भारद्वाज से चर्चा के आधार पर]
१.       इतने सारे न्यूज़ चैनल / २४ घंटे न्यूज़ फॉर्मेट/ इसलिए न्यूज़ के साथ नॉन-न्यूज़ भी/ बाबागण.
२.      सब कुछ को सनसनीखेज कर दिया गया है/ पैकेजिंग ऐसी कि सबकी पुतलियाँ बड़ी हों / मर्डर स्टोरी में बैकग्राउंड म्यूजिक डाल देंगे/ रेप का नाट्य रूपांतर.
३.      विश्वसनीयता और प्रामाणिकता दांव पर/ गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा/ पीपली लाइव/ चार न्यूज़ चैनल – चार भिन्न विवरण/ हमारे सूत्र के अनुसार ४० – १००- २० मरे.
४.     कारण/ पाठक-दर्शक को यही चाहिए/ यही बिकता है./ डीडी न्यूज़ प्लेन और बोरिंग./ बरखा दत्त चिल्लाएगी – वी द पीपुल...इण्डिया क्वेश्चंस....सनसनी पैदा होती है.....भले ही वाहन इण्डिया के नाम पर १५ लोग हों.
५.     दो प्रकार के न्यूज़ फोर्मेट/ एक – ब्लाक. दो- इंटीग्रेटेड/ ब्लाक फोर्मेट – बीबीसी,डीडी- औपचारिक सेटिंग्स, औपचारिक भाषा , औपचारिक भूषा./ इंटीग्रेटेड फोर्मेट – अपेक्षाकृत इन्फोर्मल- प्रस्तुतीकरण की शैली, वेशभूषा, सेटिंग्स. मुख्य अंतर  कि ब्लोक फोर्मेट का स्वरूप स्थिर होता है – अलग अलग खण्डों के लिए संतुलित अवधि निर्धारित होती है/ इंटीग्रेटेड फॉर्मेट लचीला – मैच जीता तो वही प्रथम समाचार...साथ ही आक्रामक भाषा.
६.      प्रोक्सिमिटी - स्थानीयता महत्वपूर्ण/ अंतरराष्ट्रीय समाचार तभी लीड जब उसमें कुछ इण्डिया-कनेक्शन हो./ क्षेत्रीय और लोक भाषाओँ और लोक संस्कृति को केंद्रीय स्थान/ कल तक हाशिए पर थे.
७.     मुखपृष्ठ सम्पूर्णतः विज्ञापन कों समर्पित.....आगे देखिये!.
८.      पेड न्यूज़/ भारतीय पत्रकारिता जगत में नया संकट...न्यू क्राइसिस इन इण्डिया/ जर्नलिस्म फॉर सेल/ चार तरह के पॅकेज – १. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी; २. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी प्लस एड; ३. प्लस प्रोफाइल; ४. प्लस निगेटिव कैंपेन./ मनी फॉर स्पेस/ अनैतिक/ लिफ़ाफ़े देना पुरानी  बात हो गई./ इलेक्शन प्रीमियम का प्रकाशन/ महाराष्ट्र के चुनावों में वोटिंग से तीन दिन पहले अशोक चह्वाण का स्तुतिगान समाचार के रूप में/ लोकमत – पुढारी pudhari- महाराष्ट्र टाइम्स / प्रतिष्ठित परस्पर प्रतिद्वंद्वी मराठी दैनिक / करोड़ों का विज्ञापन – हमारे संवाददाता की बाईलाइन के साथ/ घोषित खर्च रु. ११,३७९/- मात्र/ अशोक पर्व...विकास पर्व.
९.       संपादक नामक संस्था कमज़ोर / एम जे अकबर को उनके अपने अखबार से निकाल बाहर किया गया.
१०.   भाषा पक्ष... सरलीकरण की प्रवृत्ति...भाषा मिश्रण-खतरनाक स्तर तक......सरकार की सब्जी में ज़हर नहीं...अलर्ट हो जाओ टीम इण्डिया....डी यू स्टूडेंट का दिन दहाड़े मर्डर....विवेक विहार में रिटायर्ड टीचर की हत्या...टेरर लिंक की जांच हो.../साथ ही  प्रगतिशील भाषा की छवि और नई नई प्रोक्तियों-प्रयुक्तियों का विकास/ उत्तर संस्कृति...फास्ट लाइफ ....संक्षेपण प्रवृत्ति.../ तल्ख़, धारदार, तिलमिला देने वाली भाषा.....पुलिस का तांडव, धोनी सेना ने धूल चटाई, दो शून्य से रौंदा,...आतंकवादी हमले में दहला पाक...फिर बरसीं लाठियां...मोदी कों फंसाने के लिए साज़िश रच रहा है केन्द्र.../ नजाकत नफासत के ज़माने लद गए./ देहभाषा और अनुतान का प्रयोग. ‘’जनपद सुख बोध्य’’ भाषारूप की तलाश की छटपटाहट.
११.   पत्रकारिता/मीडिया के मूल्य क्षरण को समाज में अन्यत्र-सर्वत्र व्याप्त मूल्य क्षरण की ही अभिव्यक्ति अथवा उत्तरजीविता[सर्वाइवल] की अपरिहार्य मजबूरी कहकर उचित सिद्ध करने के प्रयास हमारी दृष्टि में अनुचित/ व्यावसायिकता का निदर्शन भर नहीं मीडिया, बल्कि बाजारवाद मीडिया के पंखों पर चढ़कर आया है और अब मीडिया उपभोक्तावाद का प्रसारक बना हुआ है. व्यावसायिकता के बावजूद सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बोध अपेक्षित.
१२.  तेवरी अंश -
माना कि भारत वर्ष यह संयम की खान है
झंडे के बीच चक्र का लेकिन निशान है.

कुछ  लोग जेब में उसे धर घूम रहे हैं
सबसे विशाल विश्व में जो संविधान है.

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू
तेरी कलम कलम नहीं, युग की ज़ुबान है.

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए उन्मुखीकरण


मैसूर.बारह से पंद्रह दिसंबर,२०११. क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण  परिषद् [नई दिल्ली] के तत्वावधान में चार दिन का उन्मुखीकरण कार्यक्रम था. यानी जिसे अंग्रेजी में ओरिएंटेशन  प्रोग्राम कहते हैं. कर्नाटक और केरल के  केंद्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों के हिंदी अध्यापक आए थे - करीब चालीस - जिन्हें हिंदी शिक्षण में नवाचार की ओर उन्मुख करना था. 

विशेषज्ञ  अथवा संसाधक की हैसियत से एनसीईआरटी  से कार्यक्रम संयोजक नरेश कोहली और प्रो. संध्या सिंह  आए थे. दोनों ने बड़े विस्तार से पाठ्यचर्या से लेकर सतत और समग्र मूल्यांकन तक पर खुल कर चर्चा की. देखने में आया कि अध्यापकवृंद अभी मूल्यांकन की नई पद्धति [सीसीई] को हज़म नहीं कर पाया है - भला ऐसे में उसे अभिभावकों के गले कैसे उतारा जा सकता है. किसी को लगता है कि उसे अध्यापक से पटवारी बना दिया गया है तो किसी को लगता है कि इससे छात्रों में गैर-ज़िम्मेदारी बढ़ रही है. यह भी पता चला कि शिक्षा के विकेंद्रीकरण के ये प्रयास कुछ स्थलों पर अधिकारियों की तानाशाही का आधार बन रहे हैं. कुल मिला कर ढेर सारा कन्फ्यूज़न!!!

हिंदू कॉलेज, सोनीपत के एसोशिएट प्रोफ़ेसर और हास्य कवि डॉ. अशोक बत्रा परिषद् के बाहर से आए विशेषज्ञों में थे, मेरे अलावा.  डॉ. बत्रा वर्तनी और व्याकरण के अधिकारी विद्वान् हैं - हर स्तर के लिए उन्होंने व्याकरण की किताबें लिखी हैं. सम्मोहक वक्ता हैं. उन्होंने चारों दिन वर्तनी को समर्पित किए तथा एक सर्वेक्षण भी कर डाला कि प्रतिभागी अध्यापक भ्रमात्मक वर्तनियों में किन रूपों को सही मानते हैं. बत्रा जी जीवंत बन्दे हैं. खूब हँसाते हैं. व्याकरण को प्रतीक बनाकर कई  कविताएं  भी उन्होंने लिख रखी हैं - मेरे आग्रह पर सुनाई भी. और हाँ, हममें वही पहले थे जो पहली ही शाम बाज़ार जाकर खूब सारी खरीदारी कर आए - मैसूर सिल्क. बोले वरना श्रीमती जी घुसने नहीं देंगी.

इस कार्यक्रम का एक लाभ यह हुआ कि दो वरिष्ठ भाषावैज्ञानिक विद्वानों को सुनने का अवसर मिल गया - प्रो.जे सी शर्मा और प्रो राजेश सचदेवा. दोनों मैसूर के भारतीय भाषा संस्थान से सम्बद्ध रहे हैं. उन्होंने विस्तार से समझाया कि अन्य भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाते समय व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से किस तरह मदद ली जानी चाहिए.

अब बचे अपुन. पहले दिन नरेश जी ने कहा कि द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की पीठिका बनाते हुए अन्य भाषा की अवधारणा पर चर्चा करूँ - कर दी. दूसरे दिन कथेतर गद्य विधाओं के शिक्षण पर बात करते हुए कक्षा आठ में शामिल सोमदत्त के पत्र  ''चिट्ठियों में यूरोप'' के भाषिक शिक्षण बिंदु निकाल कर दिखाए तो अध्यापकों को अच्छा लगा. तीसरे-चौथे दिन कविता शिक्षण की चर्चा में सोहन लाल द्विवेदी की 'ओस' और त्रिलोचन की 'उठ किसान ओ' के विश्लेषण में उन्होंने भी आगे बढ़कर हिस्सा लिया और जो लोग यह मान रहे थे कि भाषा की चिंदी-चिंदी करने से कविता का आनंद खो सकता है उन्हें भी लगने लगा कि पाठ के भीतर से ही कविता के मर्म तक पहुँचने का रास्ता बनाया जा सकता है. कुल मिलकर यह कि मज़ा आया.

वापसी में तीन दिन बेंगलूरू रुका - भतीजी के घर. सारे समय बालाजी और मैं प्रोफ़ेसर दिलीप सिंह जी के अभिनंदन ग्रंथ  के प्रूफ देखने में जुटे रहे; फिर भी नातिन परी के साथ खेलने का मौका मिल गया. उस शैतान की खाला  ने मुझे सारे खेलों में पीट दिया - बेहद सुखकर लगता है अपनी तीसरी पीढी के हाथों हारना! पर उसे इतने से चैन नहीं पडा. अपनी गुडिया के सिंगार का पिटारा निकाल लाई और मेरे दाएँ हाथ के पाँचों नाखून अलग-अलग रंग की पॉलिश से रंग डाले. अभी भी वह रंग उतरा नहीं है.....और कल मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में शोधार्थियों को संबोधित करने जाना है. चलूँ, रंग-रिमूवर ढूँढ लूँ.

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है!


चित्र-परिचय :
1 . साहित्य मंथन की 'साहित्य-संध्या' के अवसर पर लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, डॉ. ऋषभ देव शर्मा और डॉ. पूर्णिमा शर्मा. 
2 . 'साहित्य-संध्या' के अवसर पर व्यंग्य-वाचन करते हुए भगवान दास जोपट. साथ में हैं गुरु दयाल अग्रवाल, डॉ.देवेन्द्र शर्मा, ज्योति नारायण, पुरवा और गीतिका कोम्मूरी.


असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है! 
हैदराबाद, 10  दिसंबर 2011 .

बुद्धिजीवी बुद्धि खाकर जीने वाले ऐसे जीवों को कहा जाता है जो दिन-रात दुनिया-जहान की चिंता में घुल-घुल कर दुबले होते रहते हैं. इन्हें औरों से अलग पहचाना जा सकता है क्योंकि ये दूसरों से अलग ही रहते हैं. आम तौर से चेहरे  पर विराजमान गंभीर  मनहूसियत और बढ़ी हुए फ्रेंच दाढी इन्हें सामान्य लोगों से अलग करती हैं. हर स्वयंसिद्ध सत्य भी इन्हें बिना बौद्धिक  कसरत के ग्राह्य नहीं होता इसलिए आप इन्हें कभी भी कहीं भी अंतहीन बहसों में उलझा पा सकते हैं. असहमति बुद्धिजीवियों का स्थायी भाव है. 

ये उद्गार वरिष्ठ व्यंग्यकार  भगवान दास जोपट ने यहाँ 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में संपन्न 'साहित्य-संध्या' में अपना ''बुद्धिजीवी'' शीर्षक व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए प्रकट किए.

साहित्य-संध्या में विनीता शर्मा, गीतिका कोम्मुरी, ज्योति नारायण, पुरवा, मनोरमा अग्रवाल, डॉ. पूर्णिमा शर्मा , डॉ. देवेन्द्र शर्मा, गुरुदयाल अग्रवाल, पी एस नारायण, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, भगवान दास जोपट , लक्ष्मी नारायण अग्रवाल तथा संयोजक डॉ. बी बालाजी ने समसामयिक विषयों पर विमर्श के साथ विविध रसों की कविताएँ पढ़ीं.
            



सोमवार, 28 नवंबर 2011

’हमारी कुटुंब संस्कति' पर ऋषभदेव शर्मा का व्याख्यान संपन्न

 'हमारी कुटुंब संस्कृति' पर प्रो.ऋषभदेव शर्मा का व्याख्यान संपन्न 

हैदराबाद, २८ नवंबर २०११. 

आज यहाँ भावसार विज़न इंडिया के तत्वावधान में रानीगंज स्थित होटल प्रिया रेसीडेंसी में 'हमारी कुटुंब संस्कृति' विषय पर प्रो.ऋषभ देव शर्मा के विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. इस अवसर पर बोलते हुए प्रो.शर्मा ने विस्तार से आज के सांस्कृतिक संकट की व्याख्या की और यह कहा कि आत्महीनता, प्रदर्शन प्रियता, नक्काल वृत्ति, नग्नता के प्रसार तथा आपसी संबंधों के छीजने का कारण भूमंडलीकृत बाजारवाद में निहित है और इसका सामना करने के लिए हमे अपनी कुटुंब संस्कृति के मूल्यों को पुनः पारिभाषित और चरितार्थ करना होगा. डॉ.ऋषभ देव शर्मा ने आज की दुनिया में चल रहे सभ्यता-संघर्ष को सर्वस्वीकार्य सामान्य मानव संस्कृति की खोज की प्रक्रिया का हिस्सा मानते हुए यह कहा कि युद्ध और आतंक का अंधेरा शाश्वत नहीं हो सकता  बल्कि मनुष्यता की वह ज्योति ही शाश्वत है जिसकी अंतिम जय में भारतीय मनीषा ने सदा विश्वास प्रकट किया है. उपभोक्‍तावादी समाज की अफरा-तफरी को संयमित करने के लिए उन्होंने भारतीय परंपरा में स्वीकृत पितृ ऋण, ऋषि ऋण और देव ऋण की संकलपना को बहुप्रचारित करने पर जोर दिया.

परिचर्चा के दौरान भारतीय परिवार और विवाह संस्था की प्रासंगिकता से संबंधित एक प्रश्‍न का उत्तर देते हुए प्रो.शर्मा ने सूर्यासावित्री के आख्यान के सहारे यह प्रतिपादित किया कि भारतीय विवाह संस्था लोकतांत्रिक पद्धति पर आधारित है और इसमें पति-पत्‍नी का संबंध मालिकाना न होकर मित्रवत्‌ समर्पणयुक्‍त संबंध माना गया है. उन्होंने सप्‍तपदी तथा स्त्री और पुरुष के वचनों में निहित दायित्व भावना की ओर भी इशारा किया. 

आरंभ में भावसार विज़न इंडिया के अध्यक्ष किशन राव गडाले ने अतिथि वक्‍ता का स्वागत किया. डॉ.शर्मा ने संस्था के सदस्यों को उनकी विविध उपलब्धियों के लिए पुरस्कार भी वितरित किए. इस अवसर पर डॉ.पूर्णिमा शर्मा, डॉ.अरुणा बांगरे, श्रीनिवास मलतकार, श्रीधर लेंडले, अरुण कुमार जवलकर, सुरेश कुमार गडाले, विनोद फुटाने आदि सहित आयोजक संस्था के लगभग पचास सदस्य उपस्थित रहे.  

शनिवार, 19 नवंबर 2011

केंद्रीय विद्यालय संगठन, हैदराबाद में दो दिवसीय हिंदी कार्यशाला संपन्न

हैदराबाद, 19  नवंबर, 2011 .

केंद्रीय विद्यालय संगठन, क्षेत्रीय कार्यालय, हैदराबाद  के तत्त्वावधान में इस कार्यालय  तथा इसके अधीनस्थ केंद्रीय  विद्यालयों में कार्यरत प्रवर श्रेणी लिपिकों के लिए दिनांक 18-19 नवंबर  2011 तक दो दिवसीय हिंदी कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसका उद्घाटन डॉ0 ऋषभ देव शर्मा, अध्यक्ष , उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी  प्रचार सभा, हैदराबाद द्वारा किया गया. उन्होंने अपने उद्बोधन में भौगोलिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के माध्यम से हिंदी  भाषा के उद्भव एवं विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कार्यालयीन हिंदी  पर अपना व्याख्यान दिया जिसके अन्तर्गत कार्यालयीन हिंदी में व्याकरणिक प्रयोग के विभिन्न चरणों के माध्यम से वाक्य को निर्मित करने के अनगिनत उदाहरण प्रस्तुत किए और प्रतिभागियों का उत्साह वर्धन किया एवं हिंदी  कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया. 

संगठन के सहायक आयुक्त श्री एस0 सांबन्ना ने हिंदी कार्यशाला के उद्देश्य एवं राजभाषा नीति पर प्रकाश डालते हुए कार्यशाला का पूर्वावलोकन प्रस्तुत किया और प्रतिभागियों को कार्यशाला में पूरी रुचि दिखाने का आग्रह किया. कार्यशाला में अन्य विषयों- प्रशिक्षण,पुरस्कार योजनाएं , सेवा-पुस्तिकाओं में प्रविष्टियॉ, विभिन्न प्रकार की छुट्टियॉ, अग्रिम, भत्ते, पदनाम आदि की जानकारी देने के साथ  कार्यक्रम का संचालन संगठन की हिंदी अनुवादक श्रीमती रेणुका सोनकर द्वारा किया गया. 

डॉ0 राजनारायण अवस्थी प्रभारी राजभाषा, रक्षा लेखा नियंत्रण, कंचनबाग ने हिंदी व्याकरण पर व्याख्यान दिया. श्री अरुण कुमार मंडल, वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी, दक्षिण मध्य रेलवे, सिकंदराबाद  ने राजभाषा कार्यान्वयन में प्रभावी यूनिकोड के बारे में अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए यूनिकोड का रूचिकर प्रयोगात्मक स्वरूप प्रस्तुत किया. 

कार्यशाला का समापन संगठन के उपायुक्त श्री एस0 एम0 सलीम की अध्यक्षता  में किया गया. उन्होंने सभी प्रतिभागियों को बधाई देते हुए प्रमाण-पत्र वितरित किए और सभी से कार्यशाला के दौरान बताये गये तथ्यों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय विद्यालयों में सभी मायनों में राजभाषा हिंदी  को शतप्रतिशत लागू करने की अपील की .


चित्र-परिचय : 
केंद्रीय विद्यालय संगठन, हैदराबाद में संपन्न द्विदिवसीय हिंदी कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो. ऋषभ देव शर्मा का अभिनंदन करते हुए संगठन के सहायक आयुक्त श्री एस0 सांबन्ना. 
[प्रस्तुति - रेणुका सोनकर)

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

हिंदी समाचारों की भाषा का प्रयोजनपरक वैशिष्ट्य


भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.

यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है, तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.


संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है, लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.


वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. यहाँ इसी दृष्टि से  हिंदी समाचारों की भाषा पर चर्चा की जा रही है.स्मरण रहे कि भाषा, समाचार-लेखन का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। कहा जाता है कि समाचार लेखक को खास तौर पर निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए -

(1) सरल-सुबोध भाषा-शैली; छोटे-छोटे वाक्य; प्रचलित शब्द-समूह।
(2) अनुवाद में  लक्ष्य भाषा की प्रकृति का ध्यान ;  दुरूहता से परहेज़।
(3)  सामासिकता अर्थात  कम-से-कम शब्दों में अधिक-से-अधिक की अभिव्यक्ति।
(4) एक जैसे शब्दों / वाक्य-खंडों के  बार-बार इस्तेमाल से परहेज। [जैसे किसी का कथन प्रस्तुत करते समय ‘कहा‘, ‘बताया‘, ‘मत व्यक्त किया‘, ‘उनका विचार था‘, ‘वे महसूस करते थे‘ आदि अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करणीय।]
(5)  एकदम सपाट भाषा के स्थान पर  लय और संगति का प्रयोग।
(6) व्याकरण, वाक्य-संरचना, विराम चिह्नों तथा वर्तनी के मानक रूपों का प्रयोग।
(7) ज्ञान-विज्ञान की शब्दावली/पारिभाषिक शब्दों का अत्यंत सावधानी से व्यवहार।

जनसंचार में भाषा के मुद्रित और श्रव्य दोनों रूपों का प्रयोग किया जाता है। मुद्रित भाषा प्रयोग के लिए पढ़ा-लिखा होना आवश्यक है जबकि श्रव्य भाषा के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं। मुद्रित भाषा का प्रयोग पुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं आदि में होता है। इसमें अर्थ को बदल देने की काफी गंुजाइश होती है इसलिए विराम चिह्नों का व्यापक प्रयोग किया जाता है। मुद्रित रूप एक सीमा तक श्रव्य-मौखिक भाषा के प्रयोग में भी आ सकता है। 

नई संचार क्रांति के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि हिंदी को जनसंचार की समर्थ भाषा के रूप में गठित किया गया है। टेक्नोलॉजी और विज्ञान ने एक नई संचार भाषा को जन्म दिया है। आज जनसंचार में प्रयुक्त हिंदी के बारे में हम यह कह सकते हैं कि पत्रकारिता की हिंदी केवल संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं है बल्कि यह हिंदी कई भाषाओं के प्रचलित शब्दों को ग्रहण करके व्यापक सर्वग्राह्यता प्राप्त कर चुकी है। आज की हिंदी प्राचीन रूप वाली पश्चिमी हिंदी या डिंगल-पिंगल वाली हिंदी नहीं और न ही मैथिल कोकिल विद्यापति वाली हिंदी है। वह केवल ब्रज एवं अवधी पर भी आश्रित नहीं है। बल्कि पत्रकारिता की हिंदी आज भारतीय भाषाओं के मेल तथा विदेशी भाषाओं के शब्दों से भी शक्ति प्राप्त करती है। इस आधार पर ही हिंदी के चार रूपों की परिकल्पना तत्सम, तद्भव, देशज एवं विदेशी के रूप में की गई है। समाचारों में प्रयुक्त हिंदी समृद्ध हिंदी है तथा इसमें हिंदी के साथ अन्य भाषाओं के भी शब्दों का निःसंकोच प्रयोग किया जाता है जिससे इन भाषाओं के अंतःसंबंध का भी पता चलता है।

ध्यान देने की बात है कि पत्रकारिता का क्षेत्र अत्यंत विराट है अतः अलग-अलग विषयों के समाचारों के लिए अलग-अलग प्रकार की भाषा की जरूरत पड़ती है। इन भिन्न-भिन्न संदर्भों में संप्रेषण-प्रक्रिया के दौरान भाषा के प्रकार/भेद को ‘प्रयुक्ति‘ कहा गया है जिसमें वक्ता या संप्रेषक  की भूमिका प्रतिबिंबित होती है। ग्रेगरी एवं कैरोल ने प्रयुक्ति को ऐसा सेतु कहा है जो भिन्न-भिन्न सामाजिक संदर्भों से भाषिक परिवर्तनों को जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण है। प्रयुक्ति को गतिशील सामाजिक पृष्ठभूमि पर भाषा-व्यवहार की अनुकूलित विशिष्टता कहा जा सकता है। विषयवस्तु, माध्यम तथा वक्ता-श्रोता संबंध के आधार पर प्रयुक्ति के स्वरूप का निर्धारण होता है। इन्हें वार्ता क्षेत्र, वार्ता-प्रकार एवं वार्ता-शैली के रूप में समझा जा सकता है।

हिंदी पत्रकारिता/समाचार की भाषा के विकास के संदर्भ में यह देखना रोचक होगा कि प्रारंभ में साहित्यिक एवं राजनीतिक पत्रकारिता एकाकार थी। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन‘, बाबूराव विष्णुराव पराडकर आदि के लिए पत्रकारिता एक मिशन थी। हिंदी पत्रकारिता और भाषा के विकास में आर्यसमाज ने बड़ा योगदान दिया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिंदी-उर्दू की पत्रकारिता की भाषा निखरी। भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, प्रेमचंद आदि ने पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया तथा हिंदी को गढ़ा।

स्वराज्य एवं स्वदेशी आंदोलन के क्रम में संचार माध्यमों में हिंदी-हिंदुस्तानी आयी। इसके लिए खड़ी बोली का आधार ग्रहण किया गया। स्वतंत्रतापूर्व राष्ट्रभाषा के क्षेत्र में हिंदी को ही सर्वाधिक महत्व प्राप्त था। दक्षिण और उत्तर-पूर्व भारत में अंग्रेज़ी के व्यापक वर्चस्व के बावजूद भारतीय भाषाएँ पत्रकारिता क्षेत्र में समर्थ होती गयीं। स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रत्येक राज्य अपनी राजभाषा चुनने को स्वतंत्र है तथा संघ की राजभाषा हिंदी है। हिंदी को पूर्ण राष्ट्रभाषा के रूप में प्रसारित करने के लिए मानक हिंदी के लिए तरह-तरह के कोश बनाए गए हैं। राष्ट्रभाषा के रूप को निखारने के लिए तकनीकी शब्दावली कोश अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारे विचार से भारत की बहुभाषिक वास्तविकता के संदर्भ में समाचार की हिंदी का आदर्श संविधान के अनुच्छेद-351 के अनुरूप रखा जा सकता है - ‘‘ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।‘‘

समाचारों की हिंदी के ऐसे  स्वरूप के विकास में अनुवाद ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। विभिन्न भाषाओं के हिंदी अनुवाद ने जनसंचार माध्यम को बहुत प्रभावित किया है, इसमें संदेह नहीं। तथापि  ध्यान रखने की बात है कि आधार रूप में जनसंचार में सामान्य भाषा का ही प्रयोग होता है। जनसंचार की भाषा शुद्ध अभिधा प्रधान, अलंकारादि से रहित, सीधी, सरल, स्पष्ट एवं एकार्थक होती है जबकि साहित्यिक, संवैधानिक, कार्यालयीन आदि क्षेत्रों की भाषा की विशेषताएँ इससे कुछ भिन्न होती हैं। 

जैसा कि आप जानते हैं, समाचार पत्रों में स्थानीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार होते हैं जिनके अंतर्गत अनेक प्रकार की सूचनाएँ होती हैं। भाषण, वक्तव्य, विज्ञप्ति, आततायियों के कुकर्म, छेड़छाड़, मारपीट, पॉकेटमारी, चोरी, ठगी, छुरेबाजी, जुआ, हत्या, अपहरण, बलात्कार, जमीन-जायदाद के लिए परिवार के सदस्यों या संबंधियों के बीच फौजदारी, मुकदमेंबाजी, जातिवादी कलह-विद्वेष, रंगभेद, वर्णभेदजन्य अशांति, क्षेत्रीय-प्रांतीय झगड़े, आत्महत्या, विभिन्न आंदोलन, व्यवसाय, राजनीति, अतिवर्षण, अपवर्षण, स्वागत-विदाई, स्थानीय निकायों के समाचार, कार्यालयों से संबद्ध अनेक समस्याएँ, विवाह, यात्रा, मेले, पर्व-त्योहार, खेलकूद, वाणिज्य आदि समाचार के विभिन्न रूपों से भी आप परिचित हैं | कहने का अर्थ है कि समाचार पत्रों का क्षेत्र अत्यंत व्यापक होता है। इसलिए समाचार के विविध शीर्षकों को ऐसी भाषा से सजाया जाता है कि पाठक का ध्यान सहसा उधर खिंच जाय। इस संदर्भ में विशेष बात यह है कि पत्रकारिता में हिंदी की सरलता ने सबको आकृष्ट किया है।

हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों का नयापन विविध प्रकार के समाचारों में देखने को मिलता है। इसके सार्वदेशिक प्रचार-प्रसार के लिए मानक हिंदी का प्रयोग आवश्यक है। मानक भाषा किसी देश अथवा राज्य की वह प्रतिनिधि अथवा आदर्श भाषा होती है जिसका प्रयोग वहाँ के शिक्षित वर्ग द्वारा अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यापारिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। इसे विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों की प्रयुक्ति के लिए सहज बनाने की खातिर ही पारिभाषिक शब्दावलियाँ हर एक विषय के लिए बनाई गई है जिनका उपयोग करके विभिन्न विषय क्षेत्रों से संबंधित रिपोर्टिंग की जा सकती है।

‘हिंदी पत्रकारिता की भाषा‘ पर विचार करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने कहा है कि पत्रकारिता के उन विविध स्वरूपों को भी शैलीगत भेद तथा वस्तुनिष्ठता की दृष्टि से विवेचित करने की आवश्यकता है जो आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में उभर कर अपने अस्तित्व का बोध कराने लगे हैं जैसे, खेल पत्रकारिता, कृषि एवं ग्रामीण पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, राजनैतिक रिपोर्टिंग, संसदीय रिपोर्टिंग, सांस्कृतिक रिपोर्टिंग, अपराध रिपोर्टिंग, खोजी पत्रकारिता, पीत एवं सनसनी खेल पत्रकारिता आदि। इन सभी के भाषाई वैशिष्ट्य एवं भाषा भेद की पहचान ही हमें पत्रकारिता की हिंदी को संपूर्णता में आकलित, विवेचित एवं विश्लेषित करने की दृष्टि प्रदान कर सकती है। उन्होंने उदाहरणों सहित दिखाया है कि इन सभी प्रयोग-क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दावली की विविधता और प्रस्तुतीकरण का वैविध्य स्पष्ट झलकता है। इस प्रकार यदि पत्रकारिता की हिंदी को एक प्रयुक्ति (रजिस्टर) मानें तो उपर्युक्त विविध प्रकार की रिपोर्टिंग / समाचार लेखन में प्रयुक्त भाषा रूपों को उसकी उपप्रयुक्तियाँ (सब-रजिस्टर्स) माना जा सकता है। 

इस प्रयुक्ति अर्थात पत्रकारिता की हिंदी में अनेक पारिभाषिक शब्द अंग्रेज़ी से गृहीत हैं - गेम, टीम, सर्विस, रिटर्न, इनिंग, स्क्रीन टेस्ट, बैरंग, कोटा, कर्फ्यू आदि। अनेक शब्दों का हिंदीकरण भी किया गया है - एकल मुकाबला, स्वप्नदृश्य, स्पर्धा, खिताब आदि। हिंदी के अपने शब्द भी स्थान बना रहे हैं - कीर्तिमान, सलामी बल्लेबाज, खब्बू गेंदबाज, टिकट खिड़की आदि। हिंदी रूप-परिवर्तन के स्वीकृत नियम अपनाए जा रहे हैं - गेमों, अंपायरी, कप्तानी, हाईकमान, दंगाई आदि। संकर रचना को प्रोत्साहित किया जा रहा हैं - विश्व चैंपियन, त्रिआयामी श्रृंखला आदि। हिंदी के अपने मुहावरों का विकास हो रहा है - तूफानी मुकाबला, पकड़ मज़बूत होना। विशेष बात यह है कि अनेक देशज और उर्दू शब्द हिंदी पत्रकारिता की भाषा में अपना स्थान बना रहे हैं - बरामद,हथकंडे, वारदात, घपला, गिरोह, भिड़ंत , घोटाला, फरार, घुसपैठ आदि।स्मरणीय है कि  पत्रकारिता की भाषा मुख्यतः लिखित, सुविचारित और संपादित होती है। साथ ही, इसका तकनीकी या आधुनिक बनना भी विविध प्रयोजनमूलक वर्गों के लिए अपरिहार्य है। इतना ही नहीं, पत्रकारिता का सीधा संबंध ‘सर्जनात्मक साहित्य‘ के साथ भी है। इसलिए पत्रकारिता की भाषा एक साथ ‘पारिभाषिकता‘ और ‘सृजनात्मकता‘ दोनों को साधती चलती है। (प्रो. दिलीप सिंह, भारतीय भाषा पत्रकारिता, पृ.197-198)|

हमने पहले आपसे समाचारों की भाषा की सहजता और सुबोधता की चर्चा की है। इस संबंध में यह जान लें कि पत्रकारिता के प्रयोग-क्षेत्र की व्यापकता ही उसकी भाषा में विस्तार, प्रयोगधर्मिता, लचीलापन और बोधगम्यता ले आती है। यही कारण है कि पत्रकारिता/समाचार की भाषा एक विशिष्ट प्रयोग-क्षेत्र की भाषा सिद्ध होती है।

समाचार की भाषा को विषयानुकूल तो होना ही चाहिए, साथ ही अपने पाठक वर्ग की बौद्धिकता एवं ग्रहणशीलता की क्षमता के अनुरूप भी होना चाहिए। यही कारण है कि पत्रकारिता की हिंदी में शैली भेद को एक प्राकृतिक लक्षण की तरह अपनाया गया है तथा पाठक/श्रोता समुदाय के अनुरूप उच्च हिंदी, हिंदुस्तानी और मिश्रित हिंदी का प्रयोग समाचारों के भाषिक गठन में किया जाता है। हिंदी-उर्दू शैलियाँ आज के समाचारों की भाषा में एकाकार हो गई हैं। अनेक ऐसे शब्द हैं जो दोनों शैलियों के समाचारों में स्थान पा रहे हैं यथा - महज, जायज, फिलहाल, आखिरकार, बेशक, पुरजोर, मकसद, मसलन, लिहाजा, आतिशी। इसी प्रकार कुछ सहप्रयोग भी बहुप्रचलित हैं, यथा - सख्त उपाय, खर्च सीमा, मूल रकम, कानूनी समीकरण, मौजूदा अभियान, क्रिकेटिया खुमार, मेज़बान देश। इस क्रम में कुछ अभिव्यक्तियाँ भी समाचारों में ध्यान खींचती हैं - सख्ती से निबटा जाना चाहिए, यह कार्रवाई एक शानदार मिसाल बन सकती है, खास लोगों को अपना निशाना बनाया है, कमीशन के बतौर मिला धन, यही वहज है कि कानूनन चंदा जायज होने के बावजूद, रकम चेक के जरिए ही जमा की जानी चाहिए, सबका पर्दाफाश करने की ज़रूरत है, जायज खर्चों की सख्त जांच का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। - ये सभी शब्द, सहप्रयोग और अभिव्यक्तियाँ समाचारों की हिंदी को शैली वैविध्य प्रदान करते हैं।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि पत्रकारिता का संपर्क जनता से होता है। यह संपर्क उसकी सोच और भाषा से भी होता है। इसलिए इस भाषारूप का जनमानस के अनुरूप होना बेहद ज़रूरी है ।  प्रो. दिलीप सिंह के अनुसार ‘‘हिंदी, उर्दू, क्षेत्रीय बोलियों की समग्रताबद्ध ताकत की पहचान ही हिंदी पत्रकारिता की भाषाई चेतना का केंद्रबिंदु है। आमफहम भाषा के निकट आती, परंपरागत प्रयोगों को नए संदर्भ देती, नवीन रचनाएँ करती, पत्रकारिता की हिंदी लोक-मानस के अनुकूल बनी है। अगड़ा, पिछड़ा, जत्था, विदेशी, निवेशक, नैतिक जिम्मेदारी जैसे अनेक नए प्रयोग देखते-देखते पत्रकारिता की हिंदी में स्थान पाते हैं और पाठकों में लोकप्रिय भी हो जाते हैं। भाषा का विकास परिवर्तनों के बीच ही होता है। नई घटनाओं, नई खोजों, सामाजिक-राजनैतिक फेरबदल आदि से पत्रकारिता सीधे संबद्ध होती हैं और इन्हें व्यक्त करने के लिए वह भाषा के तमाम स्रोतों को खंगालती है, शब्दों-अभिव्यक्तियों को नए संदर्भ देती है।‘‘ इस संदर्भ में उनके द्वारा उद्धृत कुछ अन्य अभिव्यक्तियाँ और शीर्ष पंक्तियाँ भी द्रष्टव्य हैं - 

अभिव्यक्तियाँ : चुस्त क्षेत्ररक्षण, दमदार टीम, गेंदबाज़ी का विश्लेषण, सधा हुआ खेल, फिरकी गेंदबाज, शुरुआती ओवरों में, कमान संभाली है, टीम के सुर सध गए हैं, जीत का स्वाद चखना है, विकेट झटक सकते हैं, अंकुश लगाए रखते हैं धमाका कर दिया, पैसा डकार गए, लहर चल रही है, नकेल डाल दी, व्यवस्था की कलई खोलता है, सरकार ने रोड़ा लगा दिया, टीम बिखर चुकी है, अगली चाल को तौल रहे थे, सितारे बुलंद हैं। शीर्ष पंक्तियाँ : पते का पता, एक सीट का सवाल, समय से पहले चेते, आखिर ऊंट आया पहाड़ के नीचे खरी सुनाकर खोटे बने, रोजा गले पड़ा, डोर तनी पर टूटी नहीं, ओटन लगे कपास। (‘भारतीय भाषा पत्रकारिता‘, पृ.199)|

इस प्रकार आप  देख सकते हैं कि समाचारों की भाषा में अनेक  मुहावरेदार और काव्यात्मक प्रयोग आम-जीवन के सहज संदर्भों से जुडे़ हैं। इनसे पारिभाषिकता भी बोधगम्य बन जाती है। यह समाचार की हिंदी की बड़ी ताकत है। इसके अतिरिक्त आपने इस बात पर भी ध्यान दिया होगा कि समाचार-क्षेत्र में भाषा का आधुनिकीकरण किया गया है। संकरता, नए सहप्रयोग, लोक उन्मुखता और कोडमिश्रण के सहारे आधुनिक भाषारूप गढ़ा गया है। इस संदर्भ में कई बार लिप्यंतरण और दो पर्यायों के समानांतर प्रयोग की बात उठाई जाती है। यहाँ यह देखना चाहिए कि भंडारनायक-भंडारनायके, किसिंजर-किसिंगर, फर्नांडिस-फर्नेंडीस-फर्नाण्डीज़ अथवा गृह मंत्री-स्वराष्ट्र मंत्री, विदेश मंत्री-परराष्ट्र मंत्री, नागरिक उड्डयन मंत्री-नागर विमानन मंत्री के भेद से समाचार की संप्रेषणीयता में कोई बाधा नहीं आ रही है। इसलिए इन भेदों को राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय पत्रकारिता की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के संदर्भ में स्वीकार करना ही उचित है। दूसरी ओर भाषा की उन जटिलताओं और अस्पष्टताओं पर गहरी नजर रखने की जरूरत है जो अंग्रेजी अनुवाद के दुष्परिणामस्वरूप समाचारों की हिंदी की ‘आत्मीयता‘ को नुकसान पहुँचा रही हैं। भाषा का लक्ष्य-समुदाय के लिए ग्राह्य होना ही सफलता की कसौटी है। इस कसौटी पर हिंदी समाचारों की भाषा खरी उतरती है, इसमें दो राय नहीं।

[कलम्ब (उस्मानाबाद, महाराष्ट्र) में २३-२४ दिसंबर २०११ को होने वाली पत्रकारिता विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के निमित्त]

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

विश्व साहित्य एवं अनुवाद : हिंदी का संदर्भ

(२४ अक्टूबर २०११ को सेंट पायस क्रास वनिता महाविद्यालय , हैदराबाद में 
संपन्न अनुवाद विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत पत्र)






विश्व साहित्य की संकल्पना अनुवाद के बिना संभव नहीं है. मनुष्यता अपने मनोभावों को विभिन्न देशकालों में जिन विभिन्न भाषाओं में व्यक्त करती है, करती रही है अनुवाद उनके बीच संवाद को संभव बनाता है. यह संवाद ही वैश्विकता का आधार है. अतः हमें विश्व नागरिक बनाने में अनुवाद की अनिवार्यता स्वयंसिद्ध है. अनुवाद की परिभाषा करते हुए उसे किसी एक भाषा के कथन के तात्पर्य को सुरक्षित रखते हुए अन्य भाषा में अनुकथन या पाठ परिवर्तन (जॉनसन) कहा गया है. यह भी मानी हुई बात है कि अनुवाद में एक भाषा (स्रोत भाषा) की इकाइयों का दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा) की इकाइयों द्वारा प्रतिस्थापन किया जाता है (हाकेट). अनुवादक की परेशानी का मूल कारण यह होता है कि (१) जब वह यह तात्पर्य को सुरक्षित करने चलता है तो स्रोत भाषा और उसका सौंदर्य छूटता सा लगता है तथा (२) जब वह इकाई के लिए इकाई चुनने चलता है तो उसे कहीं तो इकाई प्राप्त ही नहीं होती, कहीं वह एकाधिक इकाइयों के रूप में प्राप्त होती है और कहीं इकाई के स्थान पर इकाई का प्रयोग अनुवाद को भी निर्जीव सा बनाता लगता है. (दिलीप सिंह, २०११, अनुवाद की व्यापक संकल्पना). कहने की जरूरत नहीं है कि यह परेशानी सजातीय भाषाओं और स्थानीय साहित्यों के अनुवाद की तुलना में विजातीय भाषाओं और विश्व साहित्य के अनुवाद के समय अधिक चुनौतीपूर्ण बनकर उपस्थित होती है. ऐसे में समतुल्यता की अवधारणा अनुवादक को धर्मसंकट से बचाती है. यह अवधारणा इस समझ पर आधारित है कि विश्व की विभिन्न भाषाओं के बीच अनेक स्तरों पर भिन्नता पाई जाती है जिसके कारण अनूदित पाठ का मूल पाठ के समरूप बनना संभव नहीं हो पाता, ऐसे में अनूदित पाठ का मूल पाठ के समतुल्य हो पाना भर काफी कहा जा सकता है. इसलिए विश्व साहित्य के अनुवादों में मुख्यतः अर्थ और गौणतः शैली के स्तर पर समतुल्यता की खोज महत्वपूर्ण दिखाई देती है.


समरूपता और समतुल्यता की खोज की इस समस्या से जूझते हुए ही अनुवाद शास्त्र विकसित होता है. विश्व साहित्य के संदर्भ में अनुवाद प्रक्रिया को शास्त्रबद्ध करने के आरंभिक संकेत सोलहवीं शताब्दी में बाइबिल के अनुवाद के संदर्भ में प्राप्त होते हैं. उस समय अनुवाद के चार चरण तय किए गए – १. शब्दक्रम का परिवर्तन, २. लक्ष्य भाषा में आवश्यकतानुसार संबंध वाचकों का प्रयोग, ३. मूल के एक शब्द के लिए लक्ष्य भाषा में पदबंध के प्रयोग की स्वतंत्रता तथा ४. पाठगत एकरूपता पर बल. (वही). अनुवाद की इस प्रक्रिया का लाभ यह हुआ कि विश्व की विभिन्न भाषाओं के मध्य वैचारिक आवाजाही संभव हो सकी.


जैसा कि पहले कहा जा चुका है विश्व साहित्य की कल्पना को साकार करने में अनुवाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपकरण है. यदि यह कहा जाए कि अनुवाद भिन्न भिन्न संस्कृतियों के लोगों के मन में आपसी समझ और प्रशंसा के भाव उत्पन्न करने के लिए सबसे जरूरी उपकरण है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. काफी पहले से ही विश्व साहित्य के अनुवाद के संबंध में दो बातें कही जाती रही हैं. एक तो यह कि विदेशी साहित्यकार को इस तरह लक्ष्य भाषा समाज के निकट लाया जाए कि उसके सदस्य उसे अपना समझकर अपना सकें. दूसरी बात उलटी दिशा की यात्रा से संबंधित है. अर्थात लक्ष्य भाषा का पाठक रचना के विदेशी परिवेश तक जाए और खुद को विदेशी लेखक की परिस्थिति और भाषिक संस्कृति में ढाल कर देखे.(गोयथे, १८१३). अगर ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि आधुनिक/उत्तरआधुनिक ग्लोबल दुनिया के निर्माण में इन दोनों बातों अर्थात अनुवाद का बड़ा योगदान है. साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अनुवाद के माध्यम से हम किसी देश के साहित्य या उस देश और वहाँ के लोगों को ही नहीं जानते बल्कि अनजाने ही उनके तुलनीय रखकर हम अपने आपको और अपने देश को भी बेहतर जान पाते हैं. अभिप्राय यह कि अनुवाद केवल भाषाओं और साहित्यों के बीच ही समझ पैदा नहीं करता संस्कृतियों के बीच भी समझ पैदा करता है और आत्मसाक्षात्कार के लिए भी अवसर मुहय्या कराता है. कहना न होगा कि इस प्रकार वह मानव संस्कृति की उस दशा को उपलब्ध करने का माध्यम बनता है जो अविरोधी होती है. संस्कृतियों का विरोध और संघर्ष तभी तक है जब तक उनके लिए गर्व करने वाली जातियों के बीच आपसी समझ विकसित नहीं है.


यदि दुनिया भर में विविध भाषाओं में रचे गए साहित्य को विश्व साहित्य कहा जाए तो एकमात्र अनुवाद ही उसकी सर्वत्र और सर्वदा उपलब्धता का आधार हो सकता है. यही कारण है कि अनुवाद को साहित्य के निरंतर जीवन तथा उत्तरजीवन के रूप में भी देखा जाता है.(वाल्टर बेंजामिन). विश्व साहित्य के अनुवाद के संदर्भ में यह बिंदु भी विचारणीय है कि जब किसी रचना का अनुवाद अलग अलग भाषाओं में किया जाता है तो एक ही रचना का प्रभाव भिन्न संस्कृतियों में भिन्न देखा जा सकता है. इसे यों भी कहा जा सकता है कि अनुवाद द्वारा किसी रचना की बहुस्वरता और अंतरपाठीयता का विकास होता है. इस तरह अनूदित पाठ अपने तईं लक्ष्य भाषा संस्कृति को सुवासित भी करता है.


विश्व साहित्य के अलग अलग भाषाओं में अनुवाद के समय उन भाषा समाजों की सांस्कृतिक विशेषताओं को समझते हुए पाँच स्तरों पर सांस्कृतिक तथ्यों का रूपांतरण किया जा सकता है – १. मूल रचना के विदेशीपन को अनुवाद में पूर्णतः सुरक्षित रखा जाए.(एक्सोटिस्म), २. चुने हुए सांस्कृतिक तत्वों को अनुवाद में उपयोग में लाया जाए.(कल्चरल बोरोइंग), ३. मूल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत किया जाए.(काल्क), ४. समान सांस्कृतिक तत्वों की खोज करके अनुवाद किया जाए.(कम्युनिकेटिव ट्रांसलेशन) तथा ५. पूर्णतः सांस्कृतिक भावांतरण किया जाए.(कल्चरल ट्रांसप्लांटेशन). (प्रमीला के.पी., २००७, भाषांतरण भावांतरण). कहने की जरूरत नहीं है कि ये पाँच स्तर प्रकारांतर से पूर्व उल्लिखित गोयथे के ही दो बिंदुओं का विस्तार है.


इसमें संदेह नहीं कि विश्व साहित्य के अनुवाद का क्षेत्र व्यापकतम है और तमाम तरह की समस्याओं और आक्षेपों के बावजूद दुनिया में समस्त साहित्यिक भाषाओं के बीच अनुवाद की काफी पुष्ट परंपरा है. प्रस्तुत संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी सहित विदेशी भाषाओं के बीच प्रचुर मात्रा में अनुवाद हुआ है. साथ ही उपनिवेशी प्रभाव के कारण हमारे यहाँ अंग्रेजी से अनुवाद की प्रमुखता रही है. हिंदी में अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं से अनुवाद की परंपरा का विहंगम अवलोकन करें तो यह बात किसी नियम का तरह कही जा सकती है कि लंबे समय तक उपनिवेश रहने के कारण भारत की आधुनिक सभ्यता अनूदित सभ्यता है. यहाँ आधुनिकता और अनुवाद का विकास साथ साथ हुआ, यह नाभिनाल संबंध आज भी कायम है. वैश्वीकरण के आज के दौर में पनप रही समकालीन वैचारिकी में अनुवाद की अहम हिस्सेदारी है क्योंकि आज अनुवाद संस्कृतियों के सहमिलन और संघर्ष की रणनीति का पर्याय बन गया है. बाजार का गहन दबाव तो अपनी जगह है ही. वैश्वीकरण के संदर्भ में अनुवाद आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण, जातीय विविधता और बहुसांस्कृतिकता के पाठ का निर्माण करनेवाला मुख्य घटक बन गया है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संचार में उसकी महती भूमिका है. अभिप्राय यह है कि बहुत अधिक अनुवाद लक्ष्य भाषा समाज के भीतरी स्वरूप को भी प्रभावित करता है. भारत इसका जीवंत उदाहरण है कि किस प्रकार हम क्रमशः अनूदित सभ्यता और अनूदित संस्कृति बनते चले गए. इसराइल के अनुवादशास्त्री इतमार ईवेन जोहार ने कहा है कि अनुवाद किसी भी भाषा व साहित्य की आतंरिक बहुआयामी प्रणाली में ही बदलाव ला देता है जिससे उस भाषा का ढाँचा और मुहावरा तक बदल जाता है. मानना होगा कि पिछले डेढ़ सौ वर्ष में हिंदी के साथ भी ऐसा ही हुआ है.


१८५७ में जब भारतीय जनमानस ने करवट ली तो इस बदलाव और जागरण की चेतना की लहरें दूर तक गईं. हिंदी साहित्य के भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे पुरोधाओं ने प्रतिरोध और परिवर्तन की इस आवाज को पहचाना और इसे पत्रकारिता तथा अनुवाद के माध्यम से आत्मबोध और भारतीयता की पहचान का बाना पहनाया. दुनिया भर के वाङ्मय को अपनी भाषाओं में अवतरित करने की इस काल में होड सी लग गई. स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र ने शेक्सपीयर के नाटक ‘मर्चेंट आफ वेनिस’ का अनुवाद (दुर्लभ बंधु) किया और द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' में विभिन्न विषयों के अनुवाद छापकर हिंदी पाठक को दुनिया भर की जानकारी प्रदान करने का अभियान चलाया. रामचंद्र शुक्ल ने जोसफ एडिसन कृत ‘प्लेजर्स आफ इमेजिनेशन’, हेकेल कृत ‘दि रिडिल ऑफ द युनिवर्स’ एवं एडविन आर्नाल्ड कृत ‘लाइट ऑफ एशिया’ का क्रमशः ‘कल्पना का आनंद’, ‘विश्व प्रपंच’ और ‘बुद्ध चरित’ नाम से अनुवाद किया. श्रीधर पाठक ने ओलिवर गोल्डस्मिथ कृत ‘द हर्मिट' और 'डेसरटेड विलेज’ को ‘एकांतवासी योगी' एवं 'ऊजड ग्राम’ के रूप में अनूदित किया. प्रेमचंद ने भी लियो टालस्टाय की रचनाओं को हिंदी में लाने काम किया. इन बड़े और युगांतरकारी रचनाकारों के अनुवाद कार्य के प्रति रुझान का परिणाम यह हुआ कि धीरे धीरे हिंदी में विश्व साहित्य के अनुवाद की एक समृद्ध परंपरा बन गई जिसका समग्र सर्वेक्षण और मूल्यांकन होना अभी शेष है. परंतु इसमें संदेह नहीं कि इस प्रकार अनुवाद हमारे लिए विश्व साहित्य का वातायन बना गया.


आगे चलकर भीष्म साहनी ने पच्चीस रूसी पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया. नामवर सिंह के संपादन में भी अनूदित रूसी कविताओं का संकलन छपा है. हरिवंशराय बच्चन ने रूसी कविताओं के तो अनुवाद किए ही शेक्सपीयर के नाटकों के अनुवाद द्वारा भी बड़ी ख्याति प्राप्त की. रामधारी सिंह दिनकर ने डी.एच.लारेंस की भूली बिसरी कविताओं को हिंदी में उतारा तो रघुवीर सहाय ने 'बरनम वन' के रूप में शेक्सपीयर के मेकबेथ को नया जन्म दिया. रांगेय राघव, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, गंगा प्रसाद विमल, विष्णु खरे, अमृत मेहता, अभयकुमार दुबे, प्रभात नौटियाल, उदय प्रकाश, मुद्राराक्षस, सूरज प्रकाश, नीलाभ और कृष्ण कुमार जैसे अनेक साहित्यकारों-अनुवादकों ने दुनिया की सभी प्रमुख भाषाओं के साहित्य को अनुवाद के माध्यम से हिंदी जगत तक पहुंचाने का अभिनंदनीय कार्य किया है. अशोक वाजपेयी के संपादन में प्रकाशित विश्व कविता का चयन भी पर्याप्त व्यापक है. खास तौर से अमृत मेहता ने मध्य भाषा [फ़िल्टर लेंगुएज] अंग्रेजी के सहारे किए गए अनुवादों की प्रामाणिकता को बहुत जोर देकर प्रश्नांकित किया है. उन्होंने अनूदित विश्व साहित्य की अपनी पत्रिका ‘सार संसार’ के माध्यम से जर्मनी, आस्ट्रिया और स्वीडन सहित अनेक देशों के साहित्य का उनकी भाषाओं से हिंदी में सीधे अनुवाद करने का आंदोलन ही चला रखा है. 


अंततः यह कहना आवश्यक है कि इसमें संदेह नहीं कि विश्व साहित्य के अनुवादों से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं को नवीन दृष्टि प्राप्त हुई और हिंदी साहित्यकारों के रचना संस्कार को विस्तृत आयाम मिला. इतना ही नहीं, आधुनिक हिंदी साहित्य में संस्कार संक्रमण का महत्वपूर्ण कार्य संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी से अनुवादों के कारण ही संभव हुआ. इसके अलावा यह तो सर्वविदित ही है कि हिंदी आलोचना पर अनुवाद का बड़ा असर है. १८९७ में पोप के ‘एस्से आन क्रिटिसिस्म’ का जगन्नाथ दास रत्नाकर ने ‘समालोचानादर्श’ नाम से पद्यात्मक अनुवाद किया था, तब से आज तक हिंदी आलोचक और विमर्शकार अनुवाद का खुलकर इस्तेमाल करते आ रहे हैं. इसी प्रकार नाटक और फ़िल्म के क्षेत्र में भी अनुवाद का योगदान अप्रतिम है. अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों, रंगकर्मियों और फिल्मकारों ने विश्व साहित्य की कृतियों के हिंदी में अनुवाद, नाट्यरूपांतर और फिल्मांकन किए हैं. इससे श्रेष्ठ साहित्य के प्रति संस्कारवान पाठक और दर्शक भी तैयार किए जा सके हैं.