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मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

अद्यतन जनसंचार माध्यम : साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य






द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : 18 तथा 19 अक्टूबर 2014 
श्री सिद्धरामेश्वर महाविद्यालय, कमलनगर, कर्नाटक 

बीज भाषण : डॉ. ऋषभदेव शर्मा 

अद्यतन जनसंचार माध्यम : साहित्यिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

1.

साहित्यिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में अद्यतन जनसंचार माध्यमों के स्वरूप, कार्यप्रणाली और प्रभाव पर विचार करने से सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि मीडिया हमारी भाषा को प्रभावित कर रहा है. यह प्रभाव दो प्रकार का है – 

(i)
विभिन्न जनसंचार माध्यम नई भाषा गढ़ रहे हैं. 

इस भाषा का मुख्य लक्षण है – भाषा मिश्रण. 

इसमें अंग्रेजी का हस्तक्षेप सबसे ज्यादा है और लगातार बढ़ रहा है. 

रोमन लिपि में और नागरी लिपि में अंग्रेजी शब्द, वाक्यांश, वाक्य, उक्तियाँ मीडिया की भाषा के अनिवार्य अंग बन गए हैं. 

बहुत बार तो हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखकर हम खुश हो लेते हैं कि हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है. 

(ii)
स्ट्रेटजी ऑफ लैंग्वेज शिफ्ट : प्रभु जोशी 

मीडिया पहले से चली आ रही हमारी भाषा परंपरा को विस्थापित करके इस गढ़ी गई भाषा को स्थापित करने की कोशिश करता दिखाई देता है = यूथ कल्चर की छलिया आनंद (मैनिपुलेटिड प्लेज़र) की भाषा 

इसमें संदेह नहीं कि भाषा का स्वभाव परिवर्तनशील होता है. परंतु इसके बावजूद उसकी एक सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा होती है. यह परंपरा उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और भाषिक व्यवहारों में निहित होती है जिन्हें कोई भाषा समाज सैकड़ों-हजारों वर्षों की यात्रा में विकसित, अर्जित और नई पीढ़ी को संक्रमित करता है. 

अतः जब हम कहते हैं कि कोई भाषा परंपरा विस्थापित की जा रही है तो इसका अर्थ होता है कि उस परंपरा में जुड़े ज्ञान को विस्थापित किया जा रहा है. 

सांस्कृतिक चेतना को विस्थापित किया जा रहा है. 

खतरा यह है कि परंपराहीन भाषा के तथाकथित बहुवचनीय रूप के स्थापित होने से विस्थापन से उत्पन्न सांस्कृतिक शून्य भरता दिखाई नहीं देता क्योंकि इस नई गढ़ी गई भाषा की अपनी कोई संस्कृति नहीं है. 

इसमें संदेह नहीं कि एक केंद्रापसारी और सार्वदेशिक जनभाषा होने के कारण हिंदी की प्रकृति विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की रही है जो इसकी बहुत बड़ी ताकत है. लेकिन जनसंचार माध्यमों ने जिस प्रकार हिंदी भाषा के अंग्रेजीकरण की मुहिम चला रखी है उसमें तो हिंदी की प्रकृति ही गायब है

सवाल यह है कि यह कौन तय करेगा कि मिश्रण कितने प्रतिशत होना चाहिए. यह निर्धारण न सहज है न संभव. 

जनसंचार माध्यम इस कृत्रिम भाषा के प्रति अपने उपभोक्ता की रुचि पैदा कर रहे हैं और उस रुचि का भरण पोषण भी कर रहे हैं. अर्थात माँग और आपूर्ति दोनों पर इन्हीं का कब्जा है. 

यह भ्रम पैदा किया जा रहा है कि इस गढ़ी गई भाषा का प्रयोग न करने वाले लोग पिछड़े हुए हैं, उनका ज्ञान सीमित है. 

स्ट्रेटजी ऑफ लैंग्वेज शिफ्ट – क्रियोलीकरण की प्रक्रिया 

(1) स्मूथ डिस्लोकेशन ऑफ वोक्यूब्लरि (मूल भाषा के शब्दों का धीरे धीरे अंग्रेजी के शब्दों से विस्थापन) – Students, Parents, Teachers, Exams, Opportunity, Entrance, Sunday, India, Ordinary 

(2) Final assault on a Language (अंतिम हमला : लिपि बदलना) .


2.

 दूसरी बात बाजार और उसकी रीति-नीति के आक्रमण से जुड़ी है. 

जनमाध्यमों का व्यापक प्रचार-प्रसार ज्ञान, मनोरंजन और लोक शिक्षा में सहायक होना चाहिए था. लेकिन विज्ञापन और प्रतिष्ठानी प्रायोजन पर निर्भर होने के कारण मीडिया लगभग पूरी तरह से बाजार का उपकरण बन गया है. 

एफ एम रेडियो/ ज्ञान और परिष्कार का बड़ा साधन/ स्तरहीन फूहड़ कार्यक्रमों की बाढ़ 

सांस्कृतिक विकास के रास्ते में आने वाले प्रश्नों से बचना आज के चतुर चालाक मीडिया की पहचान बन गया है. 

आज सांस्कृतिक विकास की भी इनकी गढ़ी हुई परिभाषा प्रौद्योगिकी केंद्रित परिभाषा है. अर्थात उन्नत प्रौद्योगिकी माने उन्नत संस्कृति! संस्कृति में निहित उन्नत मनुष्यता को इस उन्नत प्रौद्योगिकी ने विस्थापित कर दिया. 

प्रौद्योगिकी केंद्रित और मीडिया द्वारा प्रायोजित सांस्कृतिक विकास की संकल्पना प्रतिक्षण परिवर्तन की संकल्पना है. उपयोग करो और फेंको. स्थायित्व के लिए कोई जगह नहीं. न व्यापार-व्यवसाय में, न राजनीति-कूटनीति में और न ही रिश्ते-नाते और प्रेम संबंधों में. 

तमाम राजनेता बड़ी बेशर्मी से रोज यह दोहराते हैं – राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. सच तो यह है कि राजनीति में ही नहीं मीडिया और बाजार की संस्कृति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. विवाह और तलाक भी नहीं. 

इसी सबको समाचारों, बहसों, विज्ञापनों, नाटकों, यथार्थ प्रदर्शनों (रियालिटी शो) और फिल्मों के माध्यम से पुनः पुनः प्रचारित-प्रसारित किया जाता है. परिणामस्वरूप हमारे जीवन में यथार्थ के स्थान पर आभासी यथार्थ पहले स्थान पर आ गया है. 

मीडिया के सहारे बाजार ने हमारे जीवन और चिंतन को आक्रांत कर लिया है. 

आज उत्पादन और उत्पाद महत्वपूर्ण नहीं है. सर्विस महत्वपूर्ण है. आज का उपभोक्ता वस्तुओं को आफ्टर सेल सर्विस की सुविधा के आकर्षक विज्ञापन के आधार पर खरीदता है. अर्थात सर्विस सेक्टर हावी हो गया है. 

धमकी भरा आशावाद : सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी ! : बाजार में आगे!

सेवा प्रदाता आपके घर के दरवाजे पर डिलीवरी से लेकर सर्विस तक के लिए प्रस्तुत है. यानी एक नई तरह का बाजार अब हर घर के भीतर कई कई मोबाइल सेटों, टीवी चैनलों और इंटरनेट नमक नए जनसंचार माध्यम के रूप में 24 घंटे यही आवाज लगाता रहता है – बेचो, बेचो, बेचो ....... खरीदो, खरीदो, खरीदो... ऐसा नहीं लगता कि हम घर में रहते हैं और कभी कभी बाजार जाते हैं. अब तो हम बाजार में रहते हैं और घर कब पहुँचेंगे पता नहीं. 

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुंचा देता;
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे. (दुष्यंत कुमार) 

3.

सांस्कृतिक संकट : 

संस्कृति का काम है विकास को स्थायित्व प्रदान करना और उसे अपनी परंपरा से जोड़ना. 

बाजार आश्रित मीडिया जिस विकास को प्रचारित करता है उसमें इन दोनों चीजों (स्थायित्व और परंपरा) के लिए कोई जगह नहीं है. वह ‘पॉपुलर कल्चर’ के नाम पर एक ऐसी संस्कृति गढ़ रहा है जिसमें स्मृति के लिए भी कोई स्थान नहीं है. यही करण है कि 21वीं शताब्दी की तमाम नई फिल्में बिजनेस तो करोड़ों का करती हैं लेकिन अगली फिल्म के आते ही पुरानी और कालातीत हो जाती हैं. जिस तरह एक बार पढ़े जाने के बाद अखबार और उसकी ख़बरें बासी हो जाती हैं. विचार नहीं; वाचालता.

ब्राडकास्टिंग इन थर्ड वर्ल्ड (ई-काट्ज और जी. बेबल) : 

जनसंचार में घुसकर सूचना साम्राज्यवादियों ने अपनी धूर्त सांस्कृतिक राजनीति की कुटिलता द्वारा तीसरी दुनिया की ‘भाषा’ और ‘संस्कृति’ को तहस-नहस कर दिया है. 

वाचाल : डी जे/ आरजे/ एंकर : हर चीज को मस्ती, मजा, Fun बना दें, कामुकता से जोड़ दें. 

मीडिया सनसनी और उत्तेजना की क्षणजीवी संस्कृति की रचना करता है. जबकि साहित्य का लक्ष्य कालजयी संस्कृति को रचना होता है. आज खतरा यह पैदा हो गया है कि साहित्य और संस्कृति का स्थान मीडिया के उत्पाद लेते जा रहे हैं. 

प्रभु जोशी : गालियों की नई पैकेजिंग – इडियट, बास्टर्ड, मदर .... फकर (YUPIES की भाषा) + तमीजदार हिंदी बोलने वाला = मसखरी + अभद्र व लंपट भाषा = युवा अभिव्यक्ति का आदर्श 

मीडिया द्वारा खड़े किए गए इस विभ्रम (इल्यूशन) को पहचानकर सत्वोद्रेक पर आधारित साहित्य तथा मनुष्य की चेतना को औदात्य प्रदान करने वाली संस्कृति का पोषण आज की जरूरत है. 



4.

आभासी दुनिया और कॉर्पोरेट सेक्टर

मीडिया चमक-दमक से भरी जिस तरह आभासी दुनिया की रचना कर रहा है वह वास्तव में कॉर्पोरेट जगत के हथियार के रूप में काम कर रहा है. कॉर्पोरेट कल्चर में संयम, सब्र, संतोष जैसी प्रवृत्तियों को पिछड़ापन माना जाता है. इसका बीज शब्द इच्छा, डिज़ायर या विल है. 

कॉर्पोरेट संस्कृति तृष्णाओं को बढ़ाने में विश्वास रखती है. भूख को बढ़ाने में विश्वास रखती है. (प्यास बढ़ाओ – Limca - करीना कपूर का विज्ञापन – Limca) 

यहाँ सब कुछ तड़क-भड़क से भरा हुआ, महँगा और ललचाने वाला है. कॉर्पोरेट जीवनशैली फिल्मों की तरह जीने में यकीन रखती है. विज्ञापन के बल पर तमाम खर्चीली चीजों का अंबार लगा लेना, किसी वस्तु के नए संस्करण के आते ही पुराने को फेंक देना, मोबाइल-टीवी-कार तक तो ठीक है पर यदि यही मानसिकता मित्रता, प्रेम, रिश्ते-नातों और परिवार के सदस्यों पर भी लागू की जाने लगे तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती है इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. 

नृत्य : रतिक्रिया के पेल्विक जेस्चर्स : फूहड़ भौतिकता : डांस इंडिया डांस/ कॉमेडी नइट्स विद कपिल. घूंसे और बल्ले के प्रहार के साथ ‘देश बदल रहा है, वेश कब बदलोगो 

क्षणिक रोमांच या सनसनी में विश्वास करने वाले, इंटरनेट के प्रयोक्ता को व्यापक सामाजिक संबद्धता के यथार्थ से काटकर मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर सिमटी हुई (मुठ्ठी में आई हुई). आभासी दुनिया के विभ्रम में फंसाने वाले इस अद्यतन जनसंचार माध्यम को जाने किसने ‘सोशल मीडिया’ नाम दे दिया? यह ‘सोशल’ शब्द का भ्रामक प्रयोग है. 

आधुनिकता के दौर में धर्म और संस्कृति को रिलीजन और कल्चर जैसे गलत पर्याय दिए गए. उत्तरआधुनिक दौर में न्यू मीडिया को ‘सोशल’ जैसा गलत विशेषण दिया जा रहा है. जबकि इसका चरित्र ही ‘एंटी सोशल’ है. व्यापक समाज से काटकर जो हमें माध्यम की हदों में बाँध दे वह सोशल कैसे हो सकता है? 

इसका समाजीकरण पाखंड भर है. मोबाइल और इंटरनेट के जरिए जंतरमंतर पर बाबा रामदेव या अन्ना हजारे भीड़ तो इकट्ठी कर सकते हैं लेकिन महात्मा गांधी जैसे जान पर खेल जाने वाले स्वयंसेवक तैयार नहीं कर सकते. 

दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए
लहू लुहान नज़ारोँ का ज़िक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे दूर जाके बैठ गए (दुष्यंत) 

5.

अंत में 

मैं तीन बातें अत्यंत संक्षेप में कहना चाहूँगा - 

(i)
बाजार और कॉर्पोरेट के हाथ में खेलता हुआ मीडिया हमारी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा है. अभद्र और अश्लील के प्रति समाज आश्चर्यजनक रूप से सहिष्णु होता जा रहा है जो बेहद खतरनाक संकेत है. 

(ii)
मीडिया की तात्कालिकता ने मनुष्य की संवेदनाओं को भी क्षणिक बना दिया है. हिंसा, क्रोध, घृणा, आक्रामकता और नग्नता के पल पल परिवर्तित रूपों ने एक खास तरह की पारस्परिक असहिष्णुता पैदा की है. लोकतंत्र के नारे तो हम लगाते हैं लेकिन प्रतिपक्ष की किसी भी आवाज का गला घोंटने के लिए हम किसी भी हद तक जा सकते हैं. यह असहिष्णुता बाजार संस्कृति की देन है. और इसकी परिणति तानाशाही और आतंकवादी प्रवृत्तियों में दिखाई दे रही है. सब व्यवस्थाएँ आज ऊपर ऊपर से लोकतांत्रिक लगती हैं लेकिन भीतर से सबका चरित्र अधिनायकवादी है. 

(iii)
संस्कृति का हाशियाकरण. 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू ? : सवाल पत्रकारिता से


२३/२४  दिसंबर,  २०११
कलंब, महाराष्ट्र; 
शिक्षण महर्षि ज्ञानदेव मोहेकर महाविद्यालय.
द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी : उद्घाटन सत्र समापन सत्र में  
शुभाशंसा भाषण : ऋषभ देव शर्मा

हिंदी और मराठी पत्रकारिता के बदलते स्वरूप
-         १८३२: मराठी का पहला अखबार : दर्पण: मुंबई से: संपादक बालशास्त्री जांभेकर : उद्देश्य वाक्य – ‘’लोक-स्थिति, धर्म-रीति में उपयोगी परिवर्तन घटित करना.’’

-          ‘ज्ञानप्रकाश’ [अखबार] :१८ अप्रैल १८७८ ; ‘’भारत का शासन सुन्दर परन्तु छिनाल स्त्री की भांति है.उसका सौंदर्य आकर्षक एवं मोहक है.लेकिन वह अत्यंत धूर्त, धोखा देने वाली और बेरहम है. एक बार वह प्रेम से देखेगी तो दूसरे ही क्षण किसी कों घायल करेगी.’’

-          कष्ट विलासिनी [पत्र] पुणे : ‘’अंग्रेजी राज्यकर्ता लुच्चे हैं.......लेकिन सब एकजुट हो जायं तो इन उचक्कों कों हकालना कुछ कठिन नहीं है.’’ [१८८०]

-          लोकमान्य तिलक –१८८० से १९२० तक  केसरी और मराठा – स्वतंत्रता चाहने वाली जनता की विजय गाथा. ‘’मेरे क्लेश से मेरे कार्य का उत्कर्ष होगा, संभवतः यही ईश्वर का संकेत है.’’

-          स्वातंत्र्योत्तर काल में दो बड़े परिवर्तन-

-          १.पत्रकारिता/समाज की सर्वांगीण उन्नति के उद्देश्य के स्थान पर/ व्यापार या व्यवसाय/ मिशन बनाम प्रोफेशन . २.संपादक की जनजीवन से प्रतिबद्धता महत्वहीन हो गई/ लाभ अर्जित करना/ संपादक का कद घटा, जनता कों प्रभावित करने की शक्ति भी घटी.

-          [स्रोत- भारतीय भाषा पत्रकारिता:एक अवलोकन में डॉ. चंद्रकांत बांदिवडेकर का निबंध]

आज की पत्रकारिता के बदलते स्वरूप के कुछ पहलू
[लिपि भारद्वाज से चर्चा के आधार पर]
१.       इतने सारे न्यूज़ चैनल / २४ घंटे न्यूज़ फॉर्मेट/ इसलिए न्यूज़ के साथ नॉन-न्यूज़ भी/ बाबागण.
२.      सब कुछ को सनसनीखेज कर दिया गया है/ पैकेजिंग ऐसी कि सबकी पुतलियाँ बड़ी हों / मर्डर स्टोरी में बैकग्राउंड म्यूजिक डाल देंगे/ रेप का नाट्य रूपांतर.
३.      विश्वसनीयता और प्रामाणिकता दांव पर/ गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा/ पीपली लाइव/ चार न्यूज़ चैनल – चार भिन्न विवरण/ हमारे सूत्र के अनुसार ४० – १००- २० मरे.
४.     कारण/ पाठक-दर्शक को यही चाहिए/ यही बिकता है./ डीडी न्यूज़ प्लेन और बोरिंग./ बरखा दत्त चिल्लाएगी – वी द पीपुल...इण्डिया क्वेश्चंस....सनसनी पैदा होती है.....भले ही वाहन इण्डिया के नाम पर १५ लोग हों.
५.     दो प्रकार के न्यूज़ फोर्मेट/ एक – ब्लाक. दो- इंटीग्रेटेड/ ब्लाक फोर्मेट – बीबीसी,डीडी- औपचारिक सेटिंग्स, औपचारिक भाषा , औपचारिक भूषा./ इंटीग्रेटेड फोर्मेट – अपेक्षाकृत इन्फोर्मल- प्रस्तुतीकरण की शैली, वेशभूषा, सेटिंग्स. मुख्य अंतर  कि ब्लोक फोर्मेट का स्वरूप स्थिर होता है – अलग अलग खण्डों के लिए संतुलित अवधि निर्धारित होती है/ इंटीग्रेटेड फॉर्मेट लचीला – मैच जीता तो वही प्रथम समाचार...साथ ही आक्रामक भाषा.
६.      प्रोक्सिमिटी - स्थानीयता महत्वपूर्ण/ अंतरराष्ट्रीय समाचार तभी लीड जब उसमें कुछ इण्डिया-कनेक्शन हो./ क्षेत्रीय और लोक भाषाओँ और लोक संस्कृति को केंद्रीय स्थान/ कल तक हाशिए पर थे.
७.     मुखपृष्ठ सम्पूर्णतः विज्ञापन कों समर्पित.....आगे देखिये!.
८.      पेड न्यूज़/ भारतीय पत्रकारिता जगत में नया संकट...न्यू क्राइसिस इन इण्डिया/ जर्नलिस्म फॉर सेल/ चार तरह के पॅकेज – १. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी; २. अतिशयतापूर्ण न्यूज़ स्टोरी प्लस एड; ३. प्लस प्रोफाइल; ४. प्लस निगेटिव कैंपेन./ मनी फॉर स्पेस/ अनैतिक/ लिफ़ाफ़े देना पुरानी  बात हो गई./ इलेक्शन प्रीमियम का प्रकाशन/ महाराष्ट्र के चुनावों में वोटिंग से तीन दिन पहले अशोक चह्वाण का स्तुतिगान समाचार के रूप में/ लोकमत – पुढारी pudhari- महाराष्ट्र टाइम्स / प्रतिष्ठित परस्पर प्रतिद्वंद्वी मराठी दैनिक / करोड़ों का विज्ञापन – हमारे संवाददाता की बाईलाइन के साथ/ घोषित खर्च रु. ११,३७९/- मात्र/ अशोक पर्व...विकास पर्व.
९.       संपादक नामक संस्था कमज़ोर / एम जे अकबर को उनके अपने अखबार से निकाल बाहर किया गया.
१०.   भाषा पक्ष... सरलीकरण की प्रवृत्ति...भाषा मिश्रण-खतरनाक स्तर तक......सरकार की सब्जी में ज़हर नहीं...अलर्ट हो जाओ टीम इण्डिया....डी यू स्टूडेंट का दिन दहाड़े मर्डर....विवेक विहार में रिटायर्ड टीचर की हत्या...टेरर लिंक की जांच हो.../साथ ही  प्रगतिशील भाषा की छवि और नई नई प्रोक्तियों-प्रयुक्तियों का विकास/ उत्तर संस्कृति...फास्ट लाइफ ....संक्षेपण प्रवृत्ति.../ तल्ख़, धारदार, तिलमिला देने वाली भाषा.....पुलिस का तांडव, धोनी सेना ने धूल चटाई, दो शून्य से रौंदा,...आतंकवादी हमले में दहला पाक...फिर बरसीं लाठियां...मोदी कों फंसाने के लिए साज़िश रच रहा है केन्द्र.../ नजाकत नफासत के ज़माने लद गए./ देहभाषा और अनुतान का प्रयोग. ‘’जनपद सुख बोध्य’’ भाषारूप की तलाश की छटपटाहट.
११.   पत्रकारिता/मीडिया के मूल्य क्षरण को समाज में अन्यत्र-सर्वत्र व्याप्त मूल्य क्षरण की ही अभिव्यक्ति अथवा उत्तरजीविता[सर्वाइवल] की अपरिहार्य मजबूरी कहकर उचित सिद्ध करने के प्रयास हमारी दृष्टि में अनुचित/ व्यावसायिकता का निदर्शन भर नहीं मीडिया, बल्कि बाजारवाद मीडिया के पंखों पर चढ़कर आया है और अब मीडिया उपभोक्तावाद का प्रसारक बना हुआ है. व्यावसायिकता के बावजूद सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बोध अपेक्षित.
१२.  तेवरी अंश -
माना कि भारत वर्ष यह संयम की खान है
झंडे के बीच चक्र का लेकिन निशान है.

कुछ  लोग जेब में उसे धर घूम रहे हैं
सबसे विशाल विश्व में जो संविधान है.

गूँगा तमाशबीन बना क्यों खड़ा है तू
तेरी कलम कलम नहीं, युग की ज़ुबान है.

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

मीडिया और साहित्य


[फरवरी २०११ के अंतिम सप्ताह में केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद में डॉ.आलोक पांडेय ने ''मीडिया,साहित्य और संस्कृति'' पर तीन दिन की वृहत राष्ट्रीय संगोष्ठी की थी. उन्हीं तिथियों में दिल्ली एक कार्यशाला में जाना पड़ा, इसलिए मैं उस गोष्ठी में उपस्थित न हो सका, इसका मलाल मुझे है. लेकिन डॉ. आलोक ने बाद में जब यह बताया कि उसी विषय पर वे एक पुस्तक भी संपादित कर रहे हैं और आदेश दिया कि उनके सुझाए विषय ''मीडिया और साहित्य'' पर मुझे जो कुछ संगोष्ठी में कहना था, लिख कर दे दूँ, तो यह आलेख लिखा गया. अपने जयप्रकाश मानस जी ने इसे 'सृजनगाथा' पर प्रकाशित भी कर दिया है.]

मीडिया और साहित्य के संबंध  और एक दूसरे पर प्रभाव को लेकर हमारे यहाँ तरह तरह की बहसें चल रहीं हैं जो बड़ी सीमा तक बैठे ठाले का बुद्धि विलास भर है| कहा जा रहा है कि मीडिया के कारण साहित्य संकट में पड़ गया अथवा मीडिया साहित्य की उपेक्षा करता है अथवा मीडिया की तुलना में साहित्य की गति इतनी धीमी है कि वह आज के समय के सत्य को पकड़ने में पिछड़ जाता है| यह भी कहा जा रहा है कि मीडिया भाषा को भ्रष्ट कर रहा है| इतना ही नहीं वर्ग संघर्ष के कुछ अलमबरदारों  को तो यहाँ भी थीसिस - एंटीथीसिस  दिखाई देने लगी है - मीडिया उन्हें साधनसंपन्न वर्ग के रूप में पूंजीपति दिखाई दे रहा है और साहित्य को वे सदा का साधनहीन वर्ग अर्थात सर्वहारा मान रहे हैं - इस वर्ग अंतराल का परिणाम संघर्ष तो होना ही चाहिए; असली न सही तो नकली ही सही| ऐसी बहसों के बहाने कभी कभार साहित्य और मीडिया की अपनी अपनी मजबूरियों और सीमाओं की भी चर्चा उठ खड़ी होती है| इन दोनों के व्यवस्था के साथ संबंधों पर भी कभी कभार टिप्पणी सुनने को मिल जाती है| जनता पर साहित्य के स्थान पर मीडिया का अधिक असर क्यों दिखाई देता है यह सवाल भी कइयों को व्यथित करता दिखाई देता है|  सनसनी और संवेदना से लेकर बाजार और घर तक के मुद्दे मीडिया और साहित्य की बहस के बहाने सामने आए हैं|
मेरे जैसे साधारण कलमघिस्सू की समझ में ये तमाम बड़ी बड़ी बातें नहीं आतीं| हमने काफी माथापच्ची की लेकिन यह बात हमारी तुच्छ बुद्धि में अभी तक नहीं घुसी कि बेसिकली मीडिया और साहित्य दो अलग चीजें हो कैसे सकती हैं| हमारी तो धारणा यही रही है कि साहित्य भी मीडिया ही है और दोनों ही बेसिकली संप्रेषण हैं | दोनों के अपने अपने प्रयोजन हैं, दोनों के संप्रेषक और ग्रहीता के अपने अपने संबंध  और समीकरण हैं  और दोनों के लक्ष्य समूह अपने अपने हैं| इसलिए दोनों की लक्ष्य सिद्धि  भी अपनी अपनी है| मीडिया अगर अपने प्रयोजन, अपनी संप्रेषण पद्धति और अपने लक्ष्य ग्रहीता को साहित्य के प्रयोजन, संप्रेषण पद्धति  और लक्ष्य ग्रहीता तक सीमित कर ले या साहित्य मीडिया को आदर्श बनाकर खुद को उसके जैसा  बना ले तो दोनों का भेद मिट जाएगा| ज़रुरत पड़ने पर ऐसा किया भी जा सकता है| मीडिया से अभिप्राय अगर फ़िल्म,टीवी, इन्टरनेट आदि इलेक्ट्रानिक मीडिया से है तो इस चर्चा को इस रूप में भी देखा जा सकता है कि यह माध्यम साहित्य के लिए किस प्रकार उपयागी हो सकता है - जैसे कि प्रिंट  मीडिया साहित्य के लिए सदा उपयोगी रहा है|
थोड़ी देर के लिए सिनेमा जैसे व्यापक मीडिया कि बात करें तो यह कहना उचित न होगा कि उसकी साहित्य से या लेखकों और कवियों से शत्रुता रही है| हम इस तरह क्यों नहीं सोचते कि फिल्मकार भी लेखक ही तो है - बस माध्यम बदला हुआ है | अगर आप पिछले वर्ष की दुनिया भर की विभिन्न भाषाओं की दस शिखर फिल्मों को देखें तो पाएँगे कि उनमें से आठ किसी न किसी साहित्यिक कृति पर या तो सीधे सीधे आधारित हैं  या उनका पुनर्पाठ प्रस्तुत करती हैं| अगर टीवी धारावाहिकों की बात करें तो यहाँ भी आप पाएँगे कि अगर रचना में और उसकी टीवी प्रस्तुति में मास अपील का दमखम है तो न तो सीरियल निर्माता उसे नकार सकते हैं और न जनता ही| प्रमाणस्वरूप  विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों और धारावाहिकों की  लंबी सूची को देखा जा सकता है - गोदान, चित्रलेखा, तीसरी कसम, शतरंज के खिलाड़ी,अंगूर, देवदास, किताब, मकबूल , ओमकारा, थ्री इडियट्स  वगैरह वगैरह से लेकर रामायण, महाभारत को छोड़ भी दें तो निर्मला, रागदरबारी, तमस, लापतागंज, पापडपोल, तारक मेहता का उलटा चश्मा वगैरह वगैरह तक|
जो लोग मीडिया और साहित्य की रफ्तार की तुलना करते हैं वे यह क्यों भूल जाते हैं कि मीडिया टेक्नोलाजी है और हर टेक्नोलाजी की  अपनी ख़ास पहचान होती है| उसके हिसाब से लिखने के लिए उसकी समझ होना पहली जरूरत है| अब फ़िल्म रूपी माध्यम को ही लें तो पता चलेगा कि माध्यम के रूप में उसकी तकनीकी विशेषताओं का सम्प्रेषण के लिए प्रभावी इस्तेमाल करने की समझ आने में हमें लगभग अस्सी साल लग गए| आज की फिल्में फ़िल्मभाषा की तकनीकी बारीकियों का बखूबी इस्तेमाल करती हैं जब कि आरंभ  में कई दशक तक फिल्में किसी किताब को पढने या नाटक को देखने का सा ही अनुभव देती थीं| यह सीखने मे ही  हमें आठ दशक लग गए कि फ़िल्म बनाना किताब लिखना या ड्रामा खेलना नहीं है, और तब जाकर वे फिल्में आ सकीं जिनमें साहित्य और  थियेटर के अनुकरण के स्थान पर पैरलल नैरेशन का गठन किया जा रहा है| इसी तरह इन्टरनेट की खिड़की लेखन के लिए खुले अभी महज पंद्रह साल हुए हैं और हम हैं कि उससे बड़ी बड़ी मांगें करने लगे हैं| थोड़ा और समय चाहिए अभी हमारे कलमकारों को इस माध्यम को, इसकी विशेषताओं को और ताकत को आत्मसात करने और उनका अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए इस्तेमाल करने के लिए| इसके बावजूद हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में तमाम तरह के अच्छे बुरे ब्लॉग लिखे जा रहे हैं तो हमें प्रसन्न ही होना चाहिए और इसे इस माध्यम के प्रसार के रूप में ग्रहण करना चाहिए, कालांतर में इस में घनत्व का भी  समावेश हो जाएगा|
इसी प्रकार मीडिया की भाषा और साहित्य की भाषा की तुलना करने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमारा भाषा प्रयोग  इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसे संबोधित कर रहें हैं| जब तक साहित्य और इलेक्ट्रानिक माडिया का लक्ष्य पाठक/दर्शक/ श्रोता अलग अलग रहेगा तब तक उनकी भाषा भी  अलग अलग रहेगी| साहित्य की अपेक्षा टीवी, सिनेमा और इन्टरनेट के लेखक के सामने अपेक्षाकृत अधिक बड़ा और वैविध्यपूर्ण प्रयोक्ता समाज होता है जिसके लिए इन माध्यमों को तदनुरूप भाषा रूपों का गठन करना पड़ता है| जब मीडिया ऐसा करता है तो शुद्धतावादियों को यह लगने लगता है कि उनकी भाषा को बिगाड़ा जा रहा है| भले आदमी, यह तो देखो कि किस माध्यम का लक्ष्य प्रयोक्ता  या उपभोक्ता कौन है| जैसे जैसे यह उपभोक्ता समाज बढता जाता है इसके संस्तर भी  बढते जाते हैं - अशिक्षित से लेकर उच्चशिक्षित तक और एकबोलीभाषी से लेकर बहुभाषाभाषी तक | इसीलिए तरह तरह के भाषा वैविध्य सामने आते हैं| इसके अलावा विषय और विधा के अनुरूप भी  मीडिया की भाषा में वैविध्य स्वाभाविक है - जैसे मनोरंजन प्रधान लाइव प्रसारणों की भाषा वही नहीं हो  सकती जो ज्ञान और सूचना प्रधान कार्यक्रमों की होगी| यह कहना कि मीडिया भाषा को खराब कर रहा है कतई गलत है क्योंकि जिसे आप खराब भाषा कह रहे हैं वह भी  किसी वर्ग विशेष को लक्षित करके ही इस्तेमाल की जा रही है तथा उस वर्ग के बीच सम्प्रेषण को संभव बना रही है| दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया साहित्य की तुलना में बहुत बड़ा मास मीडिया है, वह अपेक्षाकृत अधिक व्यापक जन माध्यम है जिसकी पहुँच उस लोक तक भी है जहां साहित्य के तथाकथित सूर्य की किरणें कभी नहीं पहुँच पातीं| इसलिए मेरी राय में तो भाषा की भ्रष्टता का मसला अपने अपने चयन का मसला है| कोई शुद्ध भाषा को चुनता है तो कोई भदेस को| हाँ, इस तथ्य को चिंतनीय माना जाना चाहिए कि कोई अखबार या चैनल षड्यंत्र पूर्वक आपकी भाषा को विदेशी शब्दों से अस्वाभाविक रूप से भर दे| यदि इस तरह अप्राकृतिक भाषा का प्रयोग किया जाएगा तो धीरे धीरे इसके पाठकों और दर्शकों की संख्या घटती जाएगी| आप जानते हैं न कि कोई भी  कार्यक्रम या चैनल अपनी टीआरपी घटाना नहीं चाहता - फिर भला वह ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों करने लगा जो उसके लक्ष्य दर्शक को अटपटी और अस्वीकार्य लगे| शुद्ध या तथाकथित साहित्यिक भाषा से परहेज का कारण भी यही है कि उससे इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाजार पर कुप्रभाव पड़ता है| बेशक फ़िल्म और टीवी का प्रथम उद्देश्य  बाजार है जबकि साहित्य का प्रथम उद्देश्य आत्माभिव्यक्ति है| इसलिए भी दोनों की भाषा में अंतर दिखाई देना स्वाभाविक है| इसे दो वर्गों की लड़ाई के रूप में देखना बुद्धिमत्ता  नहीं बल्कि राजनैतिक चालबाजी है|
नकली संघर्ष या संकट की दुहाई देने के बजाय यह इस बात पर विचार करना उपयोगी होगा कि साहित्य और मीडिया किस प्रकार एक दुसरे के सहयोगी हो  सकते हैं| सहयोगी हो भी रहें हैं| जैसे कि तमाम तरह की साहित्यिक कृतियाँ अब इन्टरनेट के माध्यम से उन तमाम लोगों को भी  उपलब्ध हो रही हैं जिन्हें वे कल तक उपलोब्ध नहीं थीं| अमेज़न के माध्यम से दुनिया भर में इन्टरनेट के जरिये सबसे अधिक किताबें बिक रही हैं तो यह मीडिया और साहित्य की दुश्मनी का नहीं, दोस्ती का प्रतीक हैं|  दरअसल आप जो भी  लिखते हैं, मीडिया का हर रूप उसके लिए माध्यम बनता है|  इन्टरनेट ने आपके लेखन को बरसोंबरस डायरी  में कैद रहने से मुक्त कर दिया है और  प्रकाशकों के शोषण से बचने का भी रास्ता निकाला है|  मैं तो कहूँगा  कि साहित्य सृजन और उसके प्रकाशन को अधिक जनतांत्रिक बनाने में इन्टरनेट बड़े काम की चीज़  है| लिखिए, प्रकाशित कीजिए, दुनिया के किसी भी  कोने में बैठे हुए अपने पाठक अथवा विशेषज्ञ  की  राय जानिए, अपने लेखन में संशोधन और परिवर्धन कीजिए, उसे मांजिए, निखारिए - यह सब पहले इतना सहज नहीं था| मीडिया को साहित्य का शत्रु बताने वाले विद्वान् ज़रा 'द टेलीग्राफ' में प्रकाशित इस समाचार पर गौर फरमाएँ कि इन्टरनेट के कारण कविता लेखन में भारी उछाल आया है| इस पोएट्री बूम का श्रेय इस तथ्य को जाता है कि इन्टरनेट लेखकों के लिए नए पाठक वर्ग के दरवाज़े खोलता है - ऑनलाइन सक्रिय अनेक ब्लॉग और चर्चा मंच इसके साक्षी हैं|
इसके अलावा इन्टरनेट ने लेखकों को हाइपर टेक्स्ट  की ऐसी सुविधा प्रदान की है जिसका इस्तेमाल करके एक ही पाठ में एक अथवा अनेक लेखकों के एकाधिक पाठों को सम्मिलित किया जा सकता है|  इसके लिए अलग अलग पाठों के हाइपर लिंक देना  काफी है| लेखक और पाठक को ऐसी सुविधा कागज़ पर लिखने के जमाने में उपलब्ध न थी| आभासी यथार्थ  के सृजन का यह सुख  साहित्य के रचनाकार  और पाठक को आधुनिक  मीडिया ही उपलब्ध करा  सकता है| इतना ही नहीं, कम्प्यूटर की सहायता से साहित्यिक पाठ निर्माण में मैट्रिक्स और ग्राफिक्स का रचनात्मक प्रयोग करके लेखिम के धरातल पर ही नहीं अर्थ के धरातल पर भी मौलिकता स्वायत्त की जा सकती है| धीरे धीरे ऐसी ई-पुस्तकों और फिल्मों का भी चलन होने लगा है जिनमें पाठक की भी भागीदारी किसी वीडियो गेम की तरह किसी नैरेशन के विकास में होगी| वस्तुतः मीडिया की बारीकियों को आत्मसात करके साहित्य स्वयं को और भी सम्प्रेषणीय तथा समयसापेक्ष बना सकता है अतः संकट और संघर्ष का बुद्धिविलास छोड़कर नए मीडिया का सहयोग करने और लेने की नीति साहित्य और मीडिया दोनों ही के लिए श्रेयस्कर होगी|
                          अंत में, इन्टरनेट टेक्नोलाजी के रचनात्मक उपयोग का एक उदाहरण द्रष्टव्य है जिसमें एक नक्षत्रमंडल के एक-एक सितारे के चिह्न को क्लिक करने से एक-एक कविता प्रकट होती है; यो काव्यपाठ किसी रोचक खेल जैसा प्रतीत होने लगता है. उसके एक पृष्ठ का स्क्रीन शाट निम्नवत है-
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति


बाज़ार और बाजारवाद से जुड़ी चर्चाओं में प्रायः यह मान लिया जाता है कि बाजारवाद और उपभोक्तावाद के वैश्विक प्रसार में उपभोक्ता या तो निष्क्रिय भोक्ता मात्र है या बाज़ार की शक्तियों का निरीह शिकार भर. हो सकता है, कुछ समय पूर्व यह धारणा बड़ी हद तक ठीक रही हो. लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है. आज उपभोक्ता केवल प्रभावित पक्ष नहीं रह गया है. वह अब न तो निष्क्रिय है और न केवल निरीह शिकार. वह उपभोक्ता संस्कृति का जागरूक भागीदार है - सक्रिय कार्यकर्ता. यहाँ यह प्रश्न सहज है कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ. ऐसा क्या हुआ कि उपभोक्ता कि स्थिति  मूक खरीददार  से उलट गई?

थोड़ा पीछे जाना होगा. विश्व युद्धों के बाद के समय में. यह वह समय था जब उपभोक्तावाद विश्व भर में उभर रहा था. समाज चिंतकों ने उपभोक्तावाद को हिकारत की नज़र से देखा. उसके प्रतिरोध की आवश्यकता भी तभी से महसूस की जाने लगी. परिणामस्वरुप ऐसे आंदोलन  सामने आए  जो मूलतः उपभोक्तावादविरोधी थे. इन्हीं की कोख  से उपभोक्ता संस्कृति उत्पन्न हुई. अभिप्राय यह है कि 'उपभोक्तावाद' और 'उपभोक्ता संस्कृति' दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं. इन्हें एक समझने की भ्रांति  के कारण प्रायः लोग उपभोक्ता संस्कृति को गरियाते देखे जाते हैं, जो उचित नहीं है. यहाँ समझने वाली बात यह है कि उपभोक्तावाद मूलतः 'उत्पादक' के हित में है, और वह उपभोक्ता को ललचाता है - अनावश्यक को खरीदने के लिए. इसके विपरीत उपभोक्ता संस्कृति 'उपभोक्ता' द्वारा विकसित है, और उपभोक्ता के ही हित में है. उपभोक्ता संस्कृति उपभोक्ता को 'एक' समाज बनाती है जो बाज़ार को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. इस प्रकार उपभोक्ता संस्कृति वस्तुतः उपभोक्तावाद को नियंत्रित करने वाली शक्ति है, न कि उसका पर्याय.

उपभोक्तावाद ने जब आम उपभोक्ता को लुभाना, ललचाना, फुसलाना शुरू किया तो आम लोगों की जेब पर इसका भारी असर हुआ. १९५० के बाद के समय में पैसों की तंगी के काल में घर चलाने  वाली महिलाओं के ऊपर ज़िम्मेदारी आई कि सुरसा  के समान लगातार मुँह फाड़ते जा रहे इस संकट का सामना कैसे किया जाए. महंगाई और अर्थसंकोच रूपी संकट की समानता   उन औरतों को एक दूसरे  के नजदीक लाने का कारण बनी जो बाजारों के आधुनिक संस्करण अर्थात शॉपिंग सेंटर और मॉल में खरीददारी के लिए जाती थीं. इस निकटता से उन साधारण घरेलू  महिलाओं को मिलने जुलने का अवसर मिला, समाजीकरण का अवकाश मिला; और सोचने-समझने का मौका भी. इस अवसर, अवकाश और मौके का परिणाम यह हुआ कि उपभोक्ता स्त्रियों  ने उपभोक्तावाद का एक समाधान खोज निकाला जिसमें  इन गृहिणियों की अपनी सक्रियता की बड़ी भूमिका थी. अर्थात इस तरह उपभोक्ता स्त्रियों ने निष्क्रियता का अतिक्रमण करके 'डू इट योरसेल्फ'(डी.आई.वाई.) का आंदोलन  खड़ा किया. यों भी कहा जा सकता है कि उपभोक्ता संस्कृति ने उपभोक्ता स्त्री की जागरूकता के माध्यम से उपभोक्तावाद का सामना करना शुरू किया. दरअसल डी.आई.वाई. मूलतः ऐसा आंदोलन  था जिसने घरेलू  महिलाओं को होम इम्प्रूवमेंट के लिए अपने हाथ से काम करने को उकसाया ताकि कम पैसों में काम चलाया जा सके. इसका एक पक्ष यह भी है कि होलसेल में चीज़ें खरीद कर उनसे मुनाफा कमाया जा सके. पश्चिम में यह आंदोलन १९५०-६० में उभरा; लेकिन भारत में उदारीकरण का दौर १९९० के बाद शुरू हुआ है इसलिए आज का एक उदाहरण  देखा जा सकता है. आज बिग बाज़ार या रिलायंस जैसे मॉल सब कुछ बेच रहे हैं - सब्जी तरकारी और नोन तेल तक. आरंभ  में ऐसा लगा कि इससे छोटे दूकानदार नष्ट हो जाएँगे . लेकिन एक रास्ता निकाला उन्होंने कि बिग बाज़ार/रिलायंस से खरीदो और दर-दर जाकर बेचो. इस कार्य में महिलाएँ बड़ी संख्या में सम्मिलित हैं. परंतु  उनका संगठित होना शेष है - तभी वे उपभोक्ता संस्कृति का गठन कर सकेंगी.

डी.आई.वाई. का विस्तार दुनिया में कई रूपों में सामने आया. उपभोक्ता संस्कृति के इस आंदोलन ने दिग्गज प्रतिष्ठानों को  चुनौती दी. इसी के तहत लघु-पत्रकारिता सामने आई. आज की वेब पत्रकारिता के रूप में इसके विस्तार को देखा जा सकता है.  कहना न होगा कि इस क्षेत्र में बड़ी तादाद में स्त्रियाँ  सक्रिय हैं. १९७० में कई ऐसे म्यूजिक बैंड सामने आए  जिन्होंने संगीत की एक समानांतर धारा  प्रवाहित की. समानांतर सिनेमा और नुक्कड़ नाटक भी डी.आई.वाई. की ही निष्पत्तियां हैं. इन सभी क्षेत्रों में स्त्रियों  ने भी परिवर्तनकारी भूमिका अदा की. विशेष बात यह रही कि  इस सबसे मध्यवर्गीय स्त्री को अपने हितों को पहचानने और उनके अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा मिली. बावजूद इसके कि हमारा फिल्म-उद्योग और मीडिया जगत स्त्री के संबंध में अभी तक घोर जड़तावादी शोषक दृष्टिकोण से ग्रस्त है, इसमें संदेह नहीं कि कई दूरदर्शन शृंखलाएं और विज्ञापन इस परिवर्तित उपभोक्ता स्त्री की छवि से संबंधित हैं.

अभिप्राय यह कि जैसे जैसे बाज़ार बढ़ा, प्रतिष्ठान बढे, उपभोग बढ़ा, उपभोक्ता बढे, वैसे-वैसे उपभोक्ता की सक्रियता भी बढ़ी. स्मरण रहे कि  स्त्री आधी दुनिया है. सारा बाज़ार उसी पर आक्रमण करता है. उसकी भी जागरूकता और सक्रियता बढ़ी. पिछली शताब्दी के अंतिम दशक से भारत में उपभोक्ता की जागरूकता (कंजूमर अवेयरनेस) में विशेष वृद्धि हुई. सामाँजिक-आर्थिक बदलाव के परिणामस्वरुप युवा स्त्रियाँ  बाज़ार में उतरीं. उपभोक्ता के रूप में भी. उत्पादक के रूप में भी. प्रबंधक के रूप में भी. बात साफ़ है कि आज की स्त्री मात्र उपभोग्य वस्तु नहीं है, वह उपभोक्ता भर नहीं है; वह बाज़ार को उत्पादक और प्रबंधक  के रूप में भी व्यापक तौर पर प्रभावित कर रही है. यहाँ वह पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के हाथ की गुड़िया नहीं, नियंता है, निर्णायक है. धीरे-धीरे वह ज़माना बीत रहा है जब राजनीति में स्त्रियों  को कठपुतली समझा जाता था. आज राजनीति में जहाँ स्त्री है - अपने बूते से है. ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ पुरुष नेता कठपुतली बने हुए हैं और स्त्री नेता सूत्रधार.

यहाँ इस तथ्य का उल्लेख आवश्यक है कि भारत में २००० के बाद इन्टरनेट का प्रसार बढ़ा तो भूमंडलीकरण , बाजारवाद और उपभोक्तावाद के प्रसार में और सुविधा हो गई. उत्पादकों को तो इससे लाभ हुआ ही लेकिन इससे उपभोक्ता जगत को भी भारी लाभ हुआ. इन्टरनेट आया तो उपभोक्ता की भावनाएं खुल कर सामने आईं . ये भावनाएं बाज़ार को प्रभावित करने लगीं. मोबिलाइज  करने लगीं - तेज़ी से. एक उदाहरण लें.  कंप्यूटर की एक बड़ी कंपनी 'डेल' ने अपना एक ऐसा विज्ञापन अभियान प्रस्तुत किया जिसमें  यह दर्शाया गया था कि स्त्रियाँ बौद्धिक कार्य करने में पीछे होती हैं और कि यह कंप्यूटर उन्हें  आगे ले आएगा. अर्थात स्त्री की एक गढ़ी-गढ़ाई छवि है कि वह टेक्नोलॉजी नहीं जानती और उसका कार्यक्षेत्र भोजन बनाने, डाइटिंग करने तथा सुंदर दिखने तक सीमित है. इस अभियान पर भारी प्रतिक्रिया हुई और उपभोक्ता के दबाव को स्वीकार कर कंपनी को यह विज्ञापन वापस लेना पड़ा. उपभोक्ता संस्कृति के गठन में स्त्री-शक्ति की भूमिका का यह दृष्टांत भारतीय संदर्भ  में भी अनुकरणीय हो सकता है क्योंकि हमारे यहाँ उपभोक्तावाद की सवारी बना हुआ मीडिया स्त्री की कामिनी और अबला छवियों को बनाने में कुछ ज्यादा ही रुचि  रखता है. यदि स्त्री उपभोक्ता संगठित होकर ऐसे प्रचार का बहिष्कार  कर सके तो बाज़ार के इस बिगडैल घोड़े की लगाम कसी जा सकती है. सवाल यह है कि हम जो बार बार ऐसे तमाम विज्ञापनों से आहत होते रहते हैं जिनमें  स्त्री का वस्तूकरण  किया जाता है, उसे उपभोग के माल की तरह पेश किया जाता है - यदि वास्तव में वे हमें  आहत करते हैं तो हम उनका विरोध क्यों नहीं करते? उपभोक्ता संस्कृति को अपने इस प्रतिरोधी चरित्र को पहचानना होगा वरना उपभोक्तावाद उसे निगल जाएगा. यह प्रतिरोधी चरित्र ही उसे वह शक्ति देता है जिसके आगे झुककर उत्पादक को अपने स्त्री-विरोधी प्रचार अभियान वापस लेने पड़ते हैं. यहाँ उस विज्ञापन को भी याद किया जा सकता है जिसमें  यह दर्शाया गया था कि कामकाजी महिलाएँ अच्छी मांएं नहीं बन सकतीं. उल्लेखनीय है कि महिला-उपभोक्ताओं के विरोध के कारण यह अभियान भी वापस करना पड़ा था. कहने का अर्थ यह है कि बाज़ार का नियंत्रण प्रत्यक्षतः  भले ही उत्पादक के हाथ में हो, अप्रत्यक्ष रूप से [लेकिन वास्तव में] उसकी डोर उपभोक्ता के हाथ में है . यह बड़े उपभोक्ता वर्ग के शाकाहारी होने का दबाव ही था कि फ्राइड चिकन के लिए मशहूर केएफसी  को कनाडा में शाकाहारी बकेट आरंभ करनी पड़ी. घुमा कर कान पकड़ने वाले कहेंगे कि यह उत्पादक की उपभोक्ता को ललचाने की चाल है लेकिन हमारी राय में यह उत्पादक पर उपभोक्ता के दबाव का परिणाम है.

वैसे इतनी दूर जाने की ज़रूरत  नहीं. हमारे यहाँ अनेक टीवी शृंखलाओं में पात्रों का आना-जाना, जीना-मरना तक आज उपभोक्ता तय कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि टीवी के तमाम पारिवारिक नाटक भारतीय स्त्री को संबोधित हैं. वही इनका मुख्य  दर्शक समाज है - लक्ष्य उपभोक्ता समूह है. अनजाने ही ये सीरियल स्त्रियों को परस्पर चर्चा और गपशप के लिए नित्य नई  कहानियाँ  परोसते हैं. सवाल उठता है कि क्या ये स्त्रियाँ - ये उपभोक्ता स्त्रियाँ - जड़ बनी रहती हैं. नहीं, वे जड़ नहीं हैं, सक्रिय हैं. उनकी सक्रियता कभी कभी तो सीरियल को बंद तक करा  देती है. 'बालिका वधू' में फरीदा जलाल आईं  भी और गईं  भी - स्त्री दर्शकों ने उनके भाग्य का फैसला किया. 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में दादी हर बार मरते-मरते अमर हो गई  - उपभोक्ता ने मरने नहीं दिया. अभिप्राय यह कि असंगठित स्त्री समाज टीवी और इन्टरनेट के जरिये आज संगठित उपभोक्ता समाज के रूप में उभर रहा है और आने वाले समय में बाज़ार की कोई भी ताकत उसकी इच्छा की उपेक्षा नहीं कर सकेगी. ढेर सारी टीवी प्रतियोगिताओं के परिणामों को प्रभावित करने वाली ताकत के रूप में हम रोज़ ही दर्शक (उपभोक्ता) समाज को देख रहे हैं. यही समाज उपभोक्ता संस्कृति का गठन कर सकता है.

यह तो बात हुई उपभोक्ता संस्कृति की. अब कुछ चर्चा सीधे-सीधे स्त्री के बारे में.  उपभोक्तावाद का लक्ष्य बाज़ार है. उसे हर वह वस्तु बेचने में कोई संकोच नहीं जिसके खरीददार  मौजूद हों. उसे मालूम है कि सदा से सेक्स बिकता है. उसे मालूम है कि सदा से देह बिकती है. उसे मालूम  है कि सदा से कामुकता बिकती है. स्त्रीवाद के प्रभाव में हम सदा यही कहते हैं कि यह बाज़ार पुरुषों द्वारा नियंत्रित है और स्त्री केवल बिकाऊ माल है. परंतु, इस प्रकार की धारणा को आज पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता. स्त्री अब इतनी भी बेचारी नहीं है. देह बेचने वाली स्त्री निश्चय ही पुरुष व्यवस्था की शिकार है. लेकिन देह की छवि बेचने वाली स्त्री वैसी लाचार नहीं है. आज वह वस्तु या माल नहीं है, अपनी छवि की उत्पादक विक्रेता है. उसकी हर अदा की कीमत है. और यह कीमत वह स्वयं तय करती है. मनोरंजन उद्योग हो, या विज्ञापन व्यवसाय  - यह समझना कि  वहाँ  स्त्री का केवल शोषण हो रहा है, उचित नहीं होगा. उस तंत्र में स्त्री स्वयं उत्पादक और नियंता की तरह शामिल है - अपने स्वयं के निर्णय से. इसे उपभोक्ता संस्कृति नहीं, उपभोक्तावाद के रूप में देखना होगा.

यहाँ थोड़ा  हटकर उन पत्रिकाओं और साइटों की बात करें जो नग्नता परोसती हैं. क्या उनके उपभोक्ता केवल पुरुष हैं? नहीं, सर्वेक्षण बताते हैं कि समलैंगिक संबंधों के बारे में लोकप्रिय फैन फिक्शन  'स्लैश फैनडम' की उपभोक्ता मुख्यतः स्त्रियाँ हैं. इसी प्रकार जापानी एनीमेशन 'मेन्गा' को स्त्रियाँ  बेहद पसंद करती हैं - खूब नग्नता है उसमें. इतना ही  नहीं,  महिलाओं की  पत्रिकाओं में छपने वाले तमाम विज्ञापन पुरुष उपभोक्ता को संबोधित  नहीं हैं  - लेकिन नग्नता उनमें भी है. अभिप्राय यह है कि नग्नता और कामुकता का उपभोक्ता आज केवल पुरुष समाज ही नहीं है. साथ ही यह भी कहना ज़रूरी है कि विज्ञापन हो या कलाकृति - यह अनिवार्य नहीं है कि देह दर्शन अश्लील ही हो. मनुष्यों की दुनिया में देह उत्सव है - इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता. उपभोक्ता संस्कृति को उपभोक्तावाद के उत्पादकों पर यह दबाव बनाना चाहिए कि  वे इस देह को, इस उत्सव को,  उत्सव की तरह प्रस्तुत करें - सौंदर्यबोध को उद्बुद्ध करें, विकृत न करें. इसी संदर्भ में यह भी जोड़ना होगा कि देह और काम के व्यावसायिक उपयोग के बावजूद 'देह व्यापार', 'बाल शोषण' और 'अप्राकृतिक संबंध' व्यभिचार तथा अपराध हैं. यदि बाज़ार इनका पोषण करता है तो उपभोक्ता संस्कृति को उसके खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए. ऐसे मामलों में स्त्रियों की जागरूकता कई बार देखने में आई है,जो प्रशंसनीय है.

यह भी प्रश्न किया जा सकता है कि क्या विज्ञापन में स्त्री का वस्तूकरण उचित है. पहली बात तो यह कि औचित्य यहाँ बाज़ार से तय होगा, या उपभोक्ता से,  या फिर स्त्री से? ये अलग अलग अवलोकन बिंदु हो सकते हैं. बाज़ार की दृष्टि से देखें तो विज्ञापन की मजबूरी है कि वह वस्तूकरण  का इस्तेमाल टेकनीक  की तरह करे. दरअसल विज्ञापन ऐसा तीव्र माध्यम है जिसे मिनट भर से भी कम समय में अपनी कहानी, स्टोरी, कहनी होती है. इतने कम समय में वह कोई चरित्र खड़ा नहीं कर सकता. इसलिए प्रायः प्रभावी संप्रेषण  के लिए वह स्टीरियोटाइप का निर्माण करता है - ब्रांड रचता है. पात्रों का वस्तूकरण  करता है. इस वस्तूकरण  का शिकार केवल स्त्री ही है, आज ऐसा नहीं रह गया है. 'एक्स' या अन्य डिओडरेंट उत्पादों के विज्ञापन देखें तो समझ में आता है कि किस प्रकार स्त्री का नहीं, पुरुष का वस्तूकरण  हो रहा है. साबुन से लेकर अंतर्वस्त्र तक के प्रचार अभियानों में अब स्त्री के साथ-साथ पुरुष मॉडल भी वस्तूकरण  के 'शिकार' हैं. दरअसल यह शिकार होना नहीं है - अपनी छवि बनाना और बेचना है. किसी साक्षात्कार में राखी सावंत ने गलत नहीं कहा कि आज दो ही चीज़ें  बिकती हैं - सेक्स और शाहरुख. उपभोक्ता छवि से प्रभावित होता है इसलिए उत्पादक छविनिर्माण करते हैं - यह छवि किसी एंग्री यंग  मैन की हो सकती है और किसी ड्रीम गर्ल की भी. शाहरुख खान और मल्लिका शेरावत हो की सकती है. बिपाशा बासु और जान अब्राहम    की हो सकती है. छवि कभी ओबामा की भी बनाई  जाती है और कभी सोनिया गांधी की भी.  नरेन्द्र मोदी हों  या मायावती - सब छवियाँ है. बाबा रामदेव एक छवि हैं  तो वृंदा करात दूसरी. अभिप्राय यह कि विज्ञापन में वस्तूकरण पुरुष और स्त्री दोनों का हो रहा है और इसके लिए किसी एक को दोषी मानना सर्वथा अलोकतांत्रिक है.

उपभोक्ता संस्कृति इस मामले में उपभोक्ता से चयन और त्याग के विवेक की अपेक्षा रखती है. उपभोक्ता को चाहिए कि वह बाज़ार और विज्ञापन को अथवा  फिल्मों तथा उनमें देह प्रदशन करने वाले स्त्री पुरुष मॉडलों को कोसने के बजाय अपने इस नैसर्गिक अधिकार का उपयोग करना सीखे. ग्रहण और त्याग के इस अधिकार के उपयोग की पूरी सुविधा आज का बाज़ार हमें  दे रहा है. अनेक सोशल नेटवर्क की साइटें हैं, जहां हमें अपनी कठोर से कठोर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की आज़ादी है. यूट्यूब पर अनेक दर्शक जो प्रतिक्रियां व्यक्त करते हैं वे निरर्थक नहीं जातीं. उनका प्रभाव पड़ता है. अगर शशि तरूर साहब की  कैटल-क्लास विषयक टिपण्णी को जनमत द्वारा ध्वस्त किया जा सकता है तो बाज़ार की  उस नग्नता को क्यों नहीं जो आपको असांस्कृतिक लगती है - शर्मसार करती है? लेकिन उसका ऐसा विरोध न होना इस बात का द्योतक है कि कहीं न कहीं वह उपभोक्ता की मांग के अनुरूप है, उसकी आपूर्ति है.साथ ही यह कहना भी ज़रूरी है कि बाज़ार भले ही सेक्स और शरीर  का इस्तेमाल करता हो लेकिन स्त्री केवल सेक्स या देह नहीं है. इसी प्रकार सेक्स या शरीर  केवल स्त्री नहीं है - यदि बिकता है तो पुरुष भी उतना ही या उससे भी महँगा  सेक्स और शरीर है. 

यहाँ फिर स्त्री की भूमिका आती है. आज इन्टरनेट पर सक्रिय  अनेक सोशल नेटवर्कों के अवलोकन से पता चलता है कि उनमें स्त्रियाँ अपेक्षाकृत अधिक संख्या में सम्मिलित हैं और विचारविमर्श तथा बहसमुबाहसों में बढ़चढ़कर भाग ले रही हैं. अनेक ऑनलाइन डिस्कशन फोरम भी इस बात के गवाह हैं. छवि निर्माण वाली उपभोक्ता संस्कृति का एक ही रूप है फैन-कल्चर. आपके चाहने वाले आपको क्या से क्या बना देते हैं - फैन क्लब इसके प्रमाण हैं. देशविदेश के अनेक चैनेल दर्शकों को शामिल करके जो कार्यक्रम चला रहे हैं, उनमें इन चाहने वालों के रूप में बड़ी संख्या में स्त्री उपभोक्ता भी  सक्रिय है. स्पष्ट है कि  आज स्त्री उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में बाज़ार को प्रभावित कर रही है. जैसा कि पहले कहा गया है, एक समय यह समझा जाता था कि स्त्री मूक-बधिर है लेकिन आज ऐसा नहीं है. आज वह विश्लेषण करके अपनी बात सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर रही है और सारे समाज को प्रभावित कर रही है. आज के बाज़ार के 'पाठ' का निर्माण निश्चय ही 'प्रशंसकों' द्वारा प्रभावित हो रहा है जिसमें स्त्रियाँ भी पूरी शिद्दत से सक्रिय हैं. फैन कल्चर के प्रभाव का एक प्रबल उदाहरण  हैरी-पॉटर  उपन्यास शृंखला है जो स्त्री-पुरुषों में समान रूप से लोकप्रिय है. इसमें एल्फ नाम की  एक काल्पनिक जाति का संदर्भ मिलता है. यह एक दास जाति है जिसमें  अत्यंत छोटे कद के  तथा घरेलू  काम करने वाले दास शामिल हैं. इसके विवरण से प्रभावित होकर हैरी पॉटर  के प्रशंसक समूहों (हैरी पॉटर  एलायंस) द्वारा अफ्रीका, अमेरिका और भारत सहित अनेक देशों में समाजसेवा के कार्य किए  जा रहे हैं. इस प्रकार की गतिविधियाँ उपभोक्ता संस्कृति की पहचान बन सकती हैं.

उल्लेखनीय है कि फैन कल्चर के तहत स्त्रियों का समूहबद्ध होना उपभोक्ता जगत में बदलाव का द्योतक है. उपभोक्ता संस्कृति बाज़ार का अपना 'पाठ' गठित करती है. तथ्यों को पुनः व्याख्यायित करना, 'पुनर्पाठ' निर्मित करना इसका एक रूप है. इसे रीमिक्स मीडिया के रूप में भी देखा जा सकता है - उपभोक्ता का उत्पादक बन जाना. प्राचीन साहित्य का पुनर्पाठ भी उपभोक्ता संस्कृति का एक अंग  है. शेक्सपीयर के आधुनिक संस्करण के रूप में 'अंगूर', 'मकबूल' और 'ओंकारा' जैसी फिल्मों का आना हो, या रामायण और महाभारत के टीवी संस्करण हों - सब ऐसे ही पुनर्पाठ के उदाहरण  हैं. कहना होगा कि  इस तरह उपभोक्ता संस्कृति समाज को अधिक भागीदारी पूर्ण लोकतंत्र की दिशा में जाने की प्रेरणा देती है.

उपभोक्ता संस्कृति और स्त्री के संदर्भ में अगर भारतीय लोकतंत्र को देखें तो पता चलता है कि स्त्री वोट की सारी  राजनीति का आधार 'लोकतंत्र के उपभोक्ता' समाज का दबाव है. भारत के वार्षिक बजट में रसोई की  चर्चा अनिवार्य रूप से होती है. यहाँ प्याज और गैस की कीमतों का सरकारों के बनने बिगड़ने पर गहरा असर कई बार देखा जा चुका है. इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अगर स्त्री उपभोक्ता समाज संगठित होकर अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायित्व पूर्ण सामाजिक  समूह का निर्माण कर सके तो इसे  उपभोक्ता संस्कृति के स्थान पर 'भागीदारी' की  संस्कृति के विकास का लक्षण माना जा सकता है जिसका अगला चरण होगा 'सहभागिता पूर्ण लोकतंत्र'.  इससे स्त्रियों का और सशक्तीकरण  हो सकेगा.

मेरा मानना तो यही है कि आज की स्त्री निरीह और अबला नहीं हैं, वह शक्तिमान है, बुद्धिमान है, पर्याप्त विवेकी  है - वह बाज़ार को नचाने का सामर्थ्य रखती है, भले ही यह लगता हो कि बाज़ार उसे नचा रहा है. रही बात उस स्त्री की जो अभी तक सामाजिक  विकास के हाशिये पर है तो उसका शोषण आज भी जारी है. वह आज भी भोग्य वस्तु है - पण्य सामग्री है. पर इसके लिए उपभोक्ता संस्कृति नहीं, बल्कि वे सामंती अवशेष जिम्मेदार हैं जो इस उत्तरआधुनिक समय में भी भारत को मध्यकाल में जीने के लिए विवश करते हैं. यहाँ हम उस स्त्री की चर्चा कर रहे हैं जो बाज़ार की शक्तियों को प्रभावित करती है  इसलिए जानबूझ कर इस शोषित दमित स्त्री का संदर्भ यहाँ उतना प्रासंगिक नहीं है. तथापि  बाज़ार के नियंत्रण की कुछ तो ताकत इस कम क्रयशक्ति वाली स्त्री के पास भी है. उत्पादक कंपनियों की  समझ में यह बात आ गई  है कि भारत अमेरिका नहीं है. अर्थात यहाँ हर कोई एक साथ बड़ी मात्र में वस्तु नहीं खरीद सकता. जनसंख्या रूपी पिरामिड के ऊपरी  भाग में संतृप्ति आने के कारण उन्हें उसके निचले भाग को लक्ष्य करना पड़ रहा है. इसी का परिणाम है कि अब भारत के बाज़ार में कपडे धोने से लेकर सिर धोने तक की सामग्री छोटे और सस्ते सैशे में उपलब्ध है जिनके मुख्य उपभोक्ता समूह का निर्माण निम्नमध्य और निम्न वर्ग की स्त्रियों द्वारा होता है.

आरंभ में कहा जा चुका है कि स्त्री आज उपभोक्ता भर नहीं, उत्पादक और प्रबंधक  भी है. वास्तव में राजनीति और प्रशासन से लेकर औद्योगिक घरानों तक का संचालन  आज अनेक स्त्रियाँ कर रही हैं. मीडिया के क्षेत्र में भारत में अनेक महिलाएँ  समाचार संकलन से लेकर कार्यक्रम निर्माण तक का काम संभाल रही हैं. राधिका रॉय एनडीटीवी की प्रबंध निदेशक रह चुकी हैं. एकता कपूर तो घर घर में अपने धारावाहिकों से घर कर चुकी हैं. इसी प्रकार एनडीटीवी की ही समूह संपादक  बरखा दत्त जनमत की अभिव्यक्ति का पर्याय बन चुकी हैं. आंकडे बताते हैं कि भारत में बैंकिंग और फाइनेंस  सेक्टर में ५४ प्रतिशित मुख्य कार्यकारी अधिकारी(सीईओ) स्त्रियाँ हैं. मीडिया में इनका प्रतिशत ११ है, तो तीव्रगामी उपभोक्ता वस्तूओं (ऍफ़.एम्.सी.जी) - सौंदर्य सामग्री और बिस्कुट आदि -  के क्षेत्र में आठ प्रतिशत है. फिल्म उत्पादन के क्षेत्र में आज कौन तनूजा चंद्रा, पूजा भट्ट और एकता कपूर से परिचित नहीं है? इतना ही नहीं, अखिला  श्रीनिवासन (एम.ड़ी, श्रीराम इन्वेस्टमेंट), चंदा कोचर(एम.ड़ी. और सीईओ, आइसीआईसीआई), इंदिरा नूई(अध्यक्ष और सीईओ, पेप्सी), ऋतू कुमार(फैशन डिजाइनर ) तथा भारत की सबसे अमीर महिला किरण मजुमदार शा (बायोकोन) जैसी स्त्रियों ने बाज़ार को नियंत्रित करने की भारतीय स्त्री की  शक्ति का बखूबी प्रमाण दिया है.

यहाँ यह भी कहना प्रासंगिक होगा कि दुनिया के बाज़ार में स्त्री शक्ति का यह हस्तक्षेप उपभोक्ता संस्कृति के गठन और विकास में और भी  प्रभावी भूमिका निभा सकता है बशर्ते कि इसका उपयोग समाज के वंचित वर्गों के कल्याण के लिए किया जाए. इस संबंध में 'वीमेन काइंड' का उदाहरण देखा जा सकता है. यह एक विज्ञापन एजेंसी है जिसे स्त्रियाँ ही संचालित करती हैं. देखा यह गया था कि ब्रांड खरीददारी करने वालों में ८५ प्रतिशत स्त्रियाँ  होने के बावजूद ज़्यादातर  ब्रांड मेसेज स्त्री दर्शक को आकर्षित करने में असमर्थ रहते थे . इसलिए इस एजेंसी ने प्रतिभाशाली फ्रीलांसर स्त्रियों को जोड़ा और मुख्यतः स्त्रियों को सम्बोधित  व्यापार मॉडल प्रस्तुत किया. उल्लेखनीय बात यह है कि यह एजेंसी अपने लाभ का ५ प्रतिशत अंश वंचित वर्ग की  स्त्रियों को दान में देती है. 

अंततः यह कहा जा सकता है कि उपभोक्ता संस्कृति के निर्माण में स्त्री समूह अत्यंत रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं तथा स्त्रियाँ आज के बाज़ार में केवल बिकाऊ माल की तरह निष्क्रिय रूप में उपस्थित नहीं हैं, बल्कि प्रबंधन और उत्पादन के क्षेत्र में भी उनका हस्तक्षेप और सक्रिय भागीदारी दृष्टिगोचर हो रही है. विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में यह शुभ संकेत है कि भारतीय स्त्री अपनी मध्यकालीन छवि (भोग्या) से बाहर आ रही है और नारी से नागरिक बनने की उसकी चाह फलीभूत हो रही है.

मूल्यांकित शोधपत्रिका 'समुच्चय' का प्रवेशांक लोकार्पित

हैदराबाद, ८ नवम्बर २०१०.

आज यहाँ अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग  (अंतरअनुशासनिक अध्ययन संकाय) की 'भाषा, साहित्य एवं संस्कृति की मूल्यांकित शोधपत्रिका' ''समुच्चय'' के प्रवेशांक का  लोकार्पण विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.अभय मौर्य के हाथों संपन्न हुआ. दरअसल यह शोधपत्रिका उन्हीं का मानसशिशु है. उन्होंने कहा भी कि  'समुच्चय' के रूप में विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने उनके एक स्वप्न को साकार किया है. शायद यही कारण रहा हो कि जब समारोह के अंत में प्रो.मौर्य के प्रति आभार व्यक्त किया जा रहा था तो वे भावुक हो आए थे. 

संकाय के अधिष्ठाता प्रो.एम. माधव प्रसाद की अध्यक्षता में संपन्न इस समारोह में 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने ''शोध पत्रकारिता'' पर विशेष व्याख्यान दिया. 'समुच्चय' के प्रवेशांक की समीक्षा  प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने अपुन को सौंपी थी; सो दी गई भूमिका निभाते हुए अपुन ने लोकार्पित अंक को १० में से ८ अंक दिए - २ अंक एक बेहद महत्वपूर्ण निबंध की अतिशयतापूर्ण वाक् स्फीति के काटने पड़े, अन्यथा सारी सामग्री संपादकीय में निर्धारित उद्देश्यों के पूर्णतः अनुरूप है.

 निश्चय ही इस महत्वाकांक्षी प्रकाशन के लिए विभाग के सभी सदस्य - डॉ . रसाल सिंह, डॉ.टी जे रेखारानी , डॉ. प्रोमिला, डॉ. अभिषेक रौशन, डॉ. प्रियदर्शिनी और डॉ. श्यामराव राठौड़ - भी धन्यवाद के पात्र हैं.

दूसरे सत्र में कवि सम्मलेन जमा - नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भट्टड़ , लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, भंवरलाल उपाध्याय,ऋषभदेव शर्मा और रामकृष्ण पांडेय के अलावा परिसर के छात्रकवियों ने भी काव्यपाठ किया . ऐसा समां बँधा  कि वेंकटेश्वर जी ने निकट भविष्य में रात भर का कवि सम्मलेन करवाने की घोषणा कर डाली. आमंत्रित कविगण उस क्षण गद्गद हो उठे जब उन सबके सम्मान में भरे सदन ने खड़े होकर तालियाँ बजाईं.

पुनश्च-

'समुच्चय' के प्रवेशांक में जगदीश्वर चतुर्वेदी, रमणिका गुप्ता, दिलीप सिंह, प्रज्ञा, शकुंतला मिश्र, शैलजा, अमिष वर्मा, दिविक रमेश, भूषण चंद्र पाठक और हीरालाल नागर के वैदुष्यपूर्ण और  विचारोत्तेजक निबंधों के साथ सौभाग्यवश अपना भी एक आलेख (स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति) प्रकाशित हुआ है. उसे यहाँ सहेजा  जा रहा है - शायद कभी काम आ जाए. 

हाँ, उम्मीद की जानी चाहिए कि 'समुच्चय' शीघ्र ही ब्लॉगपत्रिका के रूप में ऑनलाइन  भी उपलब्ध होगी.