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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मुनींद्र जी और उनकी हिंदीनिष्‍ठा



स्मृति  लेख

मुनींद्र जी को याद करना मेरे लिए हैदराबाद के हिंदी परिवार के किसी पुरखे को याद करने जैसा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर हिंदी आंदोलन तक उन्होंने जो भूमिका निभाई, उसके कारण वे राष्‍ट्रीयता और भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हमारी पीढ़ी के आदरणीय और मार्गदर्शक बन गए। इन दोनों आंदोलनों ने मुनींद्र जी को उदारता का जो पाठ पढ़ाया उससे उनके व्यक्‍तित्व में एक खास तरह का बड़प्पन आ गया था, जिसके समक्ष सहज ही सम्‍मान से नतमस्तक होने की इच्छा होती थी। इसमें शक नहीं कि किसी व्यक्‍ति की करनी और कथनी में औदात्य तभी आता है जब उसने अपने जीवन को इस तरह तपाया हो कि अंतश्‍चेतना में औदात्य का उजाला जाग उठे। हमारे मन में उदात्तता का संस्कार होगा तो हमारे कर्मों और लेखन में भी उसे प्रभावी अभिव्यक्‍ति मिलेगी। मुनींद्र जी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन के जमाने में अपनी किशोर अवस्था में इस औदात्य के संस्कार को तप तपकर अर्जित किया था।

मुनींद्र जी ने ‘कल्पना’ और ‘दक्षिण समाचार’ के माध्यम से, और अपने व्याख्यानों तथा वक्तव्यों के माध्यम से भी, हिंदी भाषा के मानकीकरण और पारिभाषिक शब्दावली की एकरूपता की जोरदार वकालत की। परिनिष्‍ठित भाषा का यह संस्कार उन्होंने ‘आज’ से पाया था। उल्लेखनीय है कि पूर्वी और पश्‍चिमी प्रभाव से मुक्‍त हिंदी अथवा खड़ीबोली को संस्कारित करनेवाले आंदोलन के इतिहास में हिंदी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्मरणीय है कि हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप कभी भी ठेठ हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसलिए भाषा वैविध्य के अप्राकृतिक रूपों को तो काटने छाँटने के प्रयत्‍न हुए, लेकिन समाज स्वीकृत शैलीय भेदों के प्रयोग को हमेशा पत्रकार की भाषाई और सर्जनात्मक शक्‍ति के रूप में देखा गया। मुनींद्र जी भी मानकीकरण और वैविध्य के इस समानांतर चलनेवाले दोहरे मार्ग के सतत यात्री थे। उन्होंने सदा इस बात पर बल दिया कि हिंदी के लिए प्रचार की अपेक्षा प्रयोग की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए उन्हें यह बात कतई नापसंद थी कि लोग हिंदी के नाम पर वैसे तो बड़े बड़े जलसे करें लेकिन चिट्ठियों पर पते अंग्रेज़ी में लिखे अथवा विवाह जैसे पारिवारिक और सांस्कृतिक आयोजन के निमंत्रण पत्र अंग्रेज़ी में छपवाएँ। वे चाहते थे कि हम अपने दैनिक जीवन में हर छोटॆ बड़े कार्य में हिंदी लिखने बोलने के आग्रही बनें - प्रचार से आगे प्रयोग का यही अर्थ है। हिंदी के साथ वे प्रांतीय भाषाओं का चोली दामन का साथ मानते थे और उन्हें तब बहुत बुरा लगता था जब कोई व्यक्‍ति हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी के रूप में पेश करता था। उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है कि "भाषा अभिलेखागार की वस्तु नहीं है वह तो प्रयोग पर जीती और विकसित होती है। प्रयोगच्युत भाषा को सिर्फ परीक्षाओं के द्वारा न तो बचा सकते हैं न बढ़ा सकते हैं।"

हिंदी के प्रति यह आग्रह मुनींद्र जी ने स्वतंत्रता आंदोलन से ही विरासत में पाया था। स्मरणीय है कि महात्मा गांधी की राष्‍ट्रीय चेतना जितनी प्रखर थी उनका भाषा संबंधी दृष्‍टिकोण भी उतना ही प्रबल था। यही बात डॉ.राम मनोहर लोहिया पर भी सटीक उतरती है। मुनींद्र जी इन दोनों विभूतियों से प्रभावित थे। इस कारण उनके व्यक्‍तित्व और लेखन में राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा के प्रति गहरा आग्रह दिखाई देता है। उनकी इस भाषा निष्‍ठा को कर्म रूप में परिणत करने में बद्रीविशाल पित्ती और डॉ.आर्येंद्र शर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। पहले के संपर्क ने उन्हें शिष्‍ट, विनम्र, किंतु स्वाभिमानी एवं संघर्षशील पत्रकार का व्यक्‍तित्व विकसित करने में मदद की तो दूसरे ने ‘कल्पना’ के प्रधान संपादक के रूप में भाषा की शुद्धता, शब्दों के उपयुक्‍त चयन और हिंदी भाषा के विन्यास के अनुपालन की ओर प्रवृत्त किया। डॉ.आर्येंद्र शर्मा के निर्देशन में काम करते हुए ही मुनींद्र जी ने पहली बार यह अहसास किया कि लेखक और पाठक के बीच में संपादक की एक विशेष भूमिका होती है।

मुनींद्र जी के मन में एक संपादक या पत्रकार की भूमिका की धारणा एकदम साफ थी। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के निर्माण और उसके छवि गठन में पत्रकारिता अहम सर्जनात्मक भूमिका निभाए। परंतु आजादी के बाद जिस तरह से पत्रकारिता के मान मूल्यों का पतन हुआ उससे वे बड़े दुःखी थे। यह तथ्य उन्हें बहुत चुभता था कि जिस तरह राजनीति में हमने सेवा के बदले उपभोग को प्राथमिकता दी, उसी तरह पत्रकारिता क्षेत्र में जन शिक्षण के बदले मनोरंजन को महत्व दिया। उन्हें इस बात पर बड़ा खेद था कि "स्वतंत्र देश के नागरिकों का क्या दायित्व बनता है, यह बताने के बजाय हमने यह देखा कि हमारे नागरिकों की क्या पसंद है, और क्या पढ़ना पसंद करेंगे, इस दृष्‍टि से पत्र - पत्रिकाओं की सामग्री का संयोजन होने लगा। जिस तरह स्वतंत्रता सेनानियों का ध्यान सेवा और त्याग से हट कर सत्ता के उपयोग की ओर चला गया, उसी तरह पत्रकारों का ध्यान पाठकों के मनोरंजन की ओर चला गया। पत्रकारिता अब व्यवसाय और उद्‍योग बन गई।" 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा मुनींद्र जी की पीढ़ी के लोगों के लिए राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा एक ही सिक्के के दो पहलू भर थे - स्वदेशी का सिक्का। उनकी स्वदेशी भावना को संपूर्ण पृथ्वी को कुटुंब मानने की उदारता प्रिय थी। लेकिन अपने जीवन के अंतिम समय में जब उन्होंने इस भावना पर संपूर्ण विश्‍व को बाजार मानने की धारणा को हावी होते देखा तो वे विचलित हो उठे। उन्हें लगता था कि भारत को वैश्‍वीकरण के नारे ने अपने आकर्षण में फांस लिया है। उनका यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है कि "अब ‘स्वदेशी’ जैसी कोई विचारधारा नहीं रह गई है। लेकिन हम लोग जो स्वतंत्रतापूर्व की पीढ़ी के हैं, उन्हें वैश्‍वीकरण का नारा एक छलावा लगता है, अंतरराष्‍ट्रीय आर्थिक शोषण का एक औज़ार लगता है। हमारी लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ वैश्‍वीकरण के मोहजाल में फँस गई हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक देश को अपने प्राकृतिक संसाधनों और श्रम-शक्‍ति के आधार पर अपने आर्थिक ढ़ाँचे का निर्माण करना चाहिए। दूसरे देशों के साथ विनिमय अथवा लेनदेन के आधार पर संबंध बनाने चाहिए। यह जितना भारत के लिए लाभदायी है, उतना ही अमेरिका के लिए भी। अन्यथा हम अंतरराष्‍ट्रीय शोषण के शिकार हो जाएँगे।"

कहना न होगा कि मुनींद्र जी की यह राष्‍ट्रनिष्ठा उनकी हिंदीनिष्‍ठा को भी अधिक प्रशस्त और उन्मुक्त बनाती है। उनकी हिंदीनिष्‍ठा किसी एक भाषिक समाज का सपना नहीं देखती। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुनींद्र जी की हिंदीनिष्‍ठा सही अर्थ में राष्‍ट्रीय निष्‍ठा है जिसमें बहुभाषी भारतीय समाज की समस्त भाषाओं का परस्पर सह अस्तित्व वांछनीय है। वे चाहते थे कि हिंदी भारत की सामासिकता को व्यक्‍त करनेवाली भाषा बने। इस मामले में वे शुद्धतावाद के पक्के विरोधी थे। वे मेल जोल की एक ऐसी भाषा की कल्पना करते थे जिसका विकास एक ऐसे दफ़्तर में हो जहाँ देश की सभी भाषाओं के लोग अपने अपने ढ़ंग से हिंदी में काम करते हैं। उनका खयाल था कि ऐसे दफ्तर में जो हिंदी बनेगी वही देश की साझा भाषा बनेगी, हिंदी बनेगी। हाँ, इतना जरूर है कि लिपि और वर्तनी की शुद्धता और मानकता का खयाल तो रखना ही होगा, नहीं तो अराजकता फैल जाएगी।

अंत में एक और बात याद आती है कि मुनींद्र जी सदा इस बात पर जोर देते थे कि हिंदीभाषियों को हिंदी के अतिरिक्‍त कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा अवश्‍य सीखनी चाहिए और उसमें इतनी महारत हासिल करनी चाहिए कि उस भाषा के साहित्य को मूल रूप में पढ़ सकें, आत्मसात कर सकें और हिंदी की प्रकृति के अनुसार हिंदी में अनुवाद कर सकें। मुनींद्र जी का यह सपना अभी अधूरा है, लेकिन इसमें आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनने की अपार शक्‍ति विद्‍यमान है। 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

उन्होंने अभी अखबार नहीं पढ़ा


प्रसिद्ध हिंदी-तेलुगु भाषाशास्त्री और अनुवादक डा.पोलि विजयराघव रॆड्डी के निधन पर जब हमलोग संवेदना प्रकट करने गए, तो साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत सुप्रसिद्ध तेलुगु कवि प्रो.एन गोपि द्वार पर ही एक छोटी सी कुर्सी पर बैठे दिखाई दिए. घर के बुज़ुर्ग की भूमिका निभाते वे सबको सांत्वना दे रहे थे और आने वालों के 'कैसे हुआ','कब हुआ' जैसे सवालों के उत्तर दे रहे थे. मुझे देखा तो खड़े होकर एक कोने में आ गए. हम दोनों डॉ. रेड्डी के जीवट और उनके जाने से पैदा होने वाले शून्य पर दबी आवाज़ में बात कर रहे थे. बातों बातों में उन्होंने अपनी जेब से एक मुड़ा तुड़ा कागज़ निकाला और पढ़कर सुनाया. उन्होंने वहाँ बैठे बैठे बड़े सबेरे एक कविता लिखी थी इस आकस्मिक घटना से उत्पन्न शून्य को व्यक्त करते हुए. अत्यंत मार्मिक उस तेलुगु कविता का श्रीमती आर शांता सुंदरी ने हिंदी में अनुवाद किया है -

उन्होंने अभी अखबार नहीं पढ़ा  
कुत्ते के पिल्ले की तरह सिकुडा पडा है
अखबार कुर्सी पर
जब भी हिलता है उस कमरे का परदा
चिहुंक उठते हैं अक्षर.
अक्षर चाहते हैं पढें वे उन्हें
अबतक बारहवें पृष्ठ तक पहुंच गए होते वे
पिछले पन्नों पर लगी गंदगी को
खेल के पन्ने से पोंछ लेते .
आए दिन
खेलों पर भी ज़रा सी कालिख लग ही जाती है
पर कोई बात नहीं.
अभी कमरे के अंदर से कोई आहट नहीं आ रही है.
अल्मारी में रखी किताबें
कुलबुला रही हैं बेचैन होकर
दोनों भाषाओं के पदकोशों में
बदलते जा रहे हैं अर्थ
उनके स्वरचित ग्रंथों के पन्नों से
आ रही है उनकी उंगलियों की गति की ध्वनि.
पंखा चलने को है तैयार
खिडकी से आती धूप का एक टुकडा
चाहता है बनना उनके माथे की सजावट.
धोकर रखा तौलिया
तरस रहा है बैठने को उनके कंधे पर.
ग्रहण किए सभी पुरस्कार उनके
उदास हैं उन गहनों की तरह
जिन्हें पहननेवाला कोई नहीं
तस्वीर में
उनका सत्कार करनेवाले राष्ट्रपति भी
झांक रहे हैं कमरे में
द्वार पर लगे वंदनवार के पत्ते
न जाने क्यों ताल से बेताल हो रहे हैं.
साथ के कमरे में
शोक की देवी के दिल में
उठते भंवर को अखबार नहीं जानता.
रोज़ मिलनेवाले परिचितों के चेहरों पर
पहले जैसी रौनक नहीं.
दूर देहात से आई संवेदना को
खुले आसमान के नीचे खडे पौधे
पहचान लेंगे ज़रूर
पर
फिलहाल वे खुदको भूले हैं
सूरज की रोशनी में.
कमरे में से एक चिडिया
उड गई पंख फडफडाती
सडक चलते लोगों में
एक महान परिवर्तन का आभास पाने की ताकत नहीं.
कुर्सी पर अखबार
छटपटा रहा है अभी तक
कल
उसके बगल में एक और आकर गिरेगा
उसे भी वे पढ नहीं पाएंगे
उन्हीं के बारे में चाहे उसमे खबर छपे
तो भी!
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(प्रसिद्ध हिंदी-तेलुगु भाषाशास्त्री और अनुवादक डा.पोलि विजयराघव रॆड्डी के निधन पर.)
९.२.२०११
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मूल तेलुगु कविता :डा.एन.गोपि
अनुवाद : आर.शांता सुंदरी

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

जाना एक समर्पित हिंदी-चिंतक का


शख्सियत   

जाना एक समर्पित हिंदी-चिंतक का 

अपने चिंतन और कर्म से निरंतर कई दशकों तक हिंदी-भाषा-विज्ञान के विभिन्न हलकों को समृद्ध करने वाले वरिष्ठ हिंदीसेवी डॉ पोलि विजय राघव रेड्डी इस ८/९ फरवरी की मध्यरात्रि में नश्वर जगत से अक्षर जगत की ओर प्रस्थान कर गए. उनकी भौतिक देह आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी यशःकाया उनकी अनेक मूल्यवान कृतियों के रूप में हमारे साथ है; रहेगी. वे लम्बे समय तक केन्द्रीय हिंदी संस्थान के विभिन्न केंद्रों में प्राध्यापक, रीडर और प्रोफ़ेसर प्रभारी / क्षेत्रीय निदेशक के रूप में कार्यरत रहे तथा   कुछ अवधि के लिए आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष भी ; लेकिन एक शब्द-साधक के रूप में उन्होंने हिंदी की जो अविस्मरणीय सेवा की, वह इन उपलब्धियों की तुलना में कहीं बहुत बड़ी है. यही कारण है कि हमारे बीच से उनका चले जाना हिंदी और अन्य  भारतीय भाषाओँ के मध्य से एक सांस्कृतिक सेतु के लुप्त हो जाने सरीखा है. 

२५ जून १९३८ को कोंड्लोपल्ली  [राजमपेट तहसील, आंध्र प्रदेश] में पोलि वेंकट सुब्बा रेड्डी और कासिरेड्डी  चंगम्मा दम्पति के घर जन्मे पोलि विजय राघव रेड्डी की गिनती उन बहुत ही थोड़े से हिन्दीतरभाषी भाषावैज्ञानिकों में होती है जिन्होंने हिन्दी भाषा के उन पक्षों पर कार्य किया है जिनकी आज के संदर्भ में हिन्दी भाषा और आधुनिक हिन्दी भाषाविज्ञान को बड़ी ज़रूरत है. उन्होंने द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण, राजभाषा हिंदी के प्रचलन एवं विस्तार तथा  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के व्यतिरेकी अध्ययन को अपने व्यापक और सतत लेखन द्वारा एक सुनिश्चित दिशा प्रदान की. स्मरणीय है कि रेड्डी जी मात्र २० वर्ष की आयु में हिंदी पंडित बनने के इरादे से प्रशिक्षण प्राप्त करने आगरा गए, तो ऐसे रमे कि २० साल तक वहीं रह गए. केन्द्रीय हिंदी संस्थान में उन्होंने इस दौर में अनेक उतार-चढ़ाव देखे. इसके बाद और  २० वर्ष उन्होंने हिंदीतरभाषी  क्षेत्रों  में हिन्दी सेवा करते गुज़ारे. ६० की  वय में अवकाश प्राप्त करने के बाद तो वे लेखन में और भी सक्रिय हो गए थे. यह कोई मुहावरा नहीं बल्कि यथार्थ है कि वे अपने अंतिम क्षणों तक हिंदी सेवा में रत थे - इन दिनों वे 'तेलंगाना जनांदोलन' पर हिंदी में एक प्रामाणिक पुस्तक तैयार करने में जुटे थे!

डॉ रेड्डी के भाषावैज्ञानिक लेखन की मूलभूत खासियत  यह है कि उन्होंने लिखते समय हमेशा हिंदी को इतर भाषाभाषियों को सिखाने के उद्देश्य को अपने सामने रखा. १९८६ में प्रकाशित उनकी किताब ''व्यतिरेकी विश्लेषण'' इस दृष्टि से आज भी अपनी तरह की इकलौती किताब है. कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तेलुगुभाषी इस विद्वान् ने स्कूली स्तर पर दो ही भाषाएँ पढी थीं - अंग्रेज़ी और संस्कृत. तेलुगु इतरविषयों  की माध्यम भाषा भर थी. संस्कृत कहानी और तेलुगु छंद लिखकर उसी जमाने में बालक विजय राघव ने सृजन के क्षेत्र में पहला कदम रखा. आगे चलकर आगरा पहुँचने पर  प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा , बाल कृष्ण राव और रामकृष्ण नावडा जैसे गुरुओं ने उनकी रचनाधर्मिता को वह धार दी जिसने देशभर में अपना लोहा मनवाया. उन्होंने मौलिक ,अनूदित और सम्पादित लगभग ५० पुस्तकों के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध किया और भारतीय भाषा और साहित्य की अविस्मरणीय  सेवा की.  उनके इस विपुल कार्य और  योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए  विभिन्न संस्थाओं और सरकारों ने उन्हें समय-समय पर उपाधियों,पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ कर हिन्दीजगत की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित की.  २००६ में उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति के हाथों गंगाशरण सिंह पुरस्कार प्राप्त किया जो उनकी हिन्दी सेवा की सार्वदेशिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है.

प्रो रेड्डी ने विपुल अनुवाद कार्य किया. इसे वे हिंदी साहित्य को भारतीय साहित्य का प्रतिनिधि बनाने का रास्ता मानते थे. उनके द्वारा अनूदित पहली कहानी  १९६२ में धर्मयुग में छपी थी; और उसके बाद उन्होंने  पीछे फिर कर नहीं देखा. वे मानते थे कि भारतीयता की भावना हमारी प्रत्येक भाषा के साहित्य में है. साहित्य  के अनुवाद के माध्यम से एक भाषाभाषी दूसरी भाषा के साहित्य को जान सकेगा, उससे निकटता स्थापित कर सकेगा. भावनात्मक एकता को सुदृढ़ करने के लिए वे सभी मित्रों को भी श्रेष्ठ कृतियों के अनुवाद की प्रेरणा देते थे.  उनका मानना था कि अनुवाद कार्य को भारतीय साहित्य की रूपरेखा को ध्यान में रखते हुए सुनियोजित ढंग से किए जाने की ज़रूरत है. उल्लेखनीय है कि उन्होंने तेलुगु कहानियों का जो योजनाबद्ध ढंग से अनुवाद प्रस्तुत किया है, वह अनूठा है. इसके साथ ही वे लोकसाहित्य के भी प्रबल पक्षधर थे तथा लोकभाषाओं और लोकसाहित्यों के संरक्षण के बारे में हमेशा सोचते रहते थे. यहाँ यह याद करना समीचीन होगा कि डॉ रेड्डी ने पूर्वोत्तर भारत की भाषाओँ , विशेषकर बोडो जनजाति की भाषाओँ, पर जो कार्य किया, वह महत्वपूर्ण तो है ही, हिंदी में अपनी किस्म का पायोनियर कार्य भी है. स्मरण रहे कि वे स्वयं अपनी जिस कृति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते थे ,उसका सम्बन्ध भी पूर्वोत्तर से है - 'संस्कृति संगम उत्तर पूर्वांचल'.

अभी डॉ. विजय राघव रेड्डी कई और किताबें दक्षिण भारत में हिंदी का अध्ययन, केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत का भाषिक यथार्थ  तथा उत्तर-पूर्वांचल का भाषा-साहित्य जैसे विषयों पर लिखना चाहते थे. लेकिन काल को यह स्वीकार नहीं था! शायद इन विषयों पर उनके नोट्स उनकी फाइलों में मिल जाएँ. उनकी अर्धांगिनी प्रो. शकुंतला रेड्डी भी प्रतिष्ठित भाषाविद हैं, वे भविष्य में प्रो विजय राघव रेड्डी के इन पुस्तकों के स्वप्न को साकार कर सकती हैं - ईश्वर उन्हें यह शक्ति दे!

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

श्रद्धांजलि : विजयराघव रेड्डी नहीं रहे

डॉ. विजयराघव रेड्डी इज नो मोर।’ प्रो.एन. गोपि का फोन था। अविश्वास नहीं किया जा सकता था। श्रीनिवासपुरम (रामांतपुर, हैदराबाद) में एक ही गली में आमने सामने हैं दोनों के घर। पर मन न माना। डॉ.रामनिवास साहू का फोन मिलाया। केंद्रीय हिंदी संस्थान परिवार के नाते। उन्होंने दुखी सी आवाज में कन्‍फर्म किया। मंगलवार, 8 फरवरी, 2011 को रात के बारह बजे डॉ.विजयराघव रेड्डी ने अंतिम सांस ली। कुछ समय पूर्व बीमार जरूर थे, पर इन दिनों तो ठीक ही थे। अस्थमा और प्रोस्टेट की व्यथा काफी अरसे से थी। पर अचानक ऐसा हो जाएगा - लगता न था। सोचा डॉ.शकुंतला रेड्डी जी को फोन करूँ। पर कर न सका। ऐसे मौकों पर मैं बड़ा असहाय सा हो जाता हूँ - असहज सा भी। दूर पास के दोस्तों को फोन कर करके जैसे स्वयं को हल्का करने की कोशिश करता रहा। 

अभी कुछ ही दिन पहले तो हमने उन्हें उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में बुलाया था। वे हर वर्ष हमारे व्यतिरेकी भाषाविज्ञान के विद्यार्थियों को संबोधित करने आया करते थे। मैं खुद उस कक्षा में बैठा। लगभग दो घंटे तक वे पढ़ाते रहे थे। बोर्ड पर कभी कोई तालिका बनाते, कभी कोई आरेख खींचते। बीच बीच में छात्रॊं से तेलुगु में भी बतियाते। मैंने हिंदी और तेलुगु के व्यतिरेक संबंधी कई जिज्ञासाएँ रखीं। उन्होंने उदाहरण देकर सबका समाधान किया। वे बहुत जोर से नहीं बोलते थे, पर उनकी क्लास सुनकर यह लगा कि प्रभावी अध्यापन के लिए गलेबाजी की अपेक्षा विषय की गहरी समझ चाहिए होती है। और वह उनके पास थी। आज जब डॉ.विजयराघव रेड्डी की लहीम शहीम पर सुदृढ़ काया पंचतत्व में विलीन हो गई है तो पता नहीं उनके छात्रों को कैसा लग रहा होगा। लेकिन मुझे जरूर ऐसा लग रहा है कि भाषाविज्ञान का एक सुलझा हुआ अध्यापक हमारे बीच से चला गया। 

डॉ.विजयराघव रेड्डी का जन्म 25 जून, 1938 को आंध्र प्रदेश की राजम्‌पेट तहसील के कोंड्‍लोपल्ली गाँव में हुआ था। वे सही अर्थों में सेल्फ मेड मैन थे। 1959 में वे केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में शैक्षिक सहायक के रूप में नियुक्‍त हुए थे। अपने श्रम और प्रतिभा के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्‍त करते हुए आगे चलकर उन्होंने इस संस्थान के विभिन्न केंद्रों में अध्यापन किया और हैदराबाद केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक के रूप में यथासमय अवकाश ग्रहण किया। बाद में दो वर्ष उन्होंने आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष के रूप में भी भाषा और साहित्य की सेवा की। उनके न रहने का अर्थ यह भी है कि तुलनात्मक साहित्य, भारतीय साहित्य और अनूदित साहित्य के परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य का पुनर्पाठ करनेवाला एक गहन अध्येता नहीं रहा। 

डॉ.विजयराघव रेड्डी का कार्यक्षेत्र लगभग पूरा भारत रहा। आगरा तो केंद्र था ही, हैदराबाद में लंबे समय तक रहकर उन्होंने भाषा शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ साथ भारतीय भाषाओं के सौहार्द का वातावरण भी अपने सुचिंतित  व्याख्यानों, अनुवादों और शोध पत्रों द्वारा बनाया। पूरे भारत में उनके मित्र और प्रशंसक हैं - मद्रास में प्रो.दिलीप सिंह हों या असम में चित्र महंत अथवा इम्‍फाल में देवराज, सभी उनके यूँ अचानक चले जाने की खबर से धक्‌ से रह गए। किसी को संतोष था तो यही कि चलो अभी तीन दिन पहले फोन पर उनसे बात तो हो गई थी। जबकि किसी को मलाल था कि काफी अरसे से उनके खत का जवाब नहीं दिया गया था। दरअसल रेड्डी जी भाषाविद होकर भी रूखे सूखे विद्वान नहीं थे। वे सहृदय दोस्त थे। मौका मिलते ही कोई किस्सा - कहानी या चुटकुला सुना बैठते थे। खुलकर हँसते थे और कभी कभी तो ताली देने के लिए हथेली भी बढ़ा देते थे। मैं उन्हें हर प्रकार से वरिष्‍ठ जानकर संकोच और दूरी बरतता था पर वे हमेशा अपनी बाँह से मेरी पीठ घेर कर मुझे खींचकर छाती से लगा लेते थे। आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि सदा सबके मुँह पर खरी बात कह देने वाले और कभी कभी कठोर भी प्रतीत होनेवाले पोलि विजयराघव रेड्डी भीतर से बहुत आर्द्र थे। तभी तो उनके स्पर्श में इतनी ऊष्‍मा थी। निश्‍चय ही देश भर में फैले उनके दोस्तों को लग रहा होगा कि एक अंतरंग मित्र चला गया, यारों का यार चला गया।

डॉ.विजयराघव रेड्डी को कुछ वर्षों से हम लोग लौहपुरुष कहने लगे थे - जब से पूर्वोत्तर में एक खतरनाक सड़क हादसे को झेलकर वे फिर से पहले की तरह अपने सारस्वत कार्य क्षेत्र में आ डटे थे। ऐसी अदम्य जिजीविषा सबमें नहीं होती। इसी जिजीविषा के बल पर उन्होंने पूर्वोत्तर भारत को अपनी साहित्यिक आत्मा का हिस्सा बना लिया था। अगर मैं कहूँ कि पूर्वोत्तर भारत के हिंदी जगत की उनके न रहने से अपूरणीय क्षति हुई है, तो यह शत प्रतिशत सच होगा। उन्होंने वहाँ की भाषाओं और बोलियों के संबंध में जो जानकारियाँ संग्रहीत करके हिंदी जगत के सामने प्रस्तुत कीं, उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। खास तौर से बोडो जनजाति से संबंधित ऐसी जानकारियाँ इस भाषावैज्ञानिक ने खोजबीन कर प्रस्तुत कीं  जो इससे पहले हिंदी में नितांत अनुपलब्ध थीं। दरअसल उनके निधन से हमने हिंदी का एक ऐसा व्यावहारिक भाषाचिंतक खो दिया है जिसे भाषाविज्ञान की बारीकियों के साथ साथ इस देश की जमीनी सच्चाई की बारीकियाँ भी मालूम थीं।

पोलि विजयराघव रेड्डी नहीं रहे अर्थात एक भाषाचिंतक, एक अनुवादक, एक अध्यापक, एक अनुसंधाता और एक लेखक नहीं रहा। नहीं, इतना ही नहीं, वे नहीं रहे तो एक संस्कृति सेतु नहीं रहा, वे नहीं रहे तो एक स्वागतातुर मित्र नहीं रहा, वे नहीं रहे तो एक निश्‍छल हँसी नहीं रही।

जाओ, डॉ.पोलि विजयराघव रेड्डी, आप अपनी महायात्रा पर जाओ। आपके महाप्रयाण के अवसर पर हिंदी जगत आपकी सेवाओं का स्मरण करते हुए आपको अश्रुपूर्ण विदाई दे रहा है। ओम्‌ शम्।।