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बुधवार, 7 सितंबर 2022

भूमिका : "बनवासी बैगा : जीवनगाथा"


"बनवासी बैगा : जीवांगाथा" / प्रो. दिलीप सिंह/ 2022/ वाणी प्रकाशन, दिल्ली 

भूमिका

                                     - ऋषभदेव शर्मा 

हमारे समय के मूर्धन्य हिंदी भाषा चिंतक प्रो. दिलीप सिंह भाषा, साहित्य और संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान हैं। उन्होंने प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव और प्रो. विद्यानिवास मिश्र जैसे आचार्यों से संप्रेषण और सृजन की दीक्षा प्राप्त की है। यही कारण है कि उनके लेखन में एक ओर गहन शोध दृष्टि दिखाई देती है, तो दूसरी ओर लालित्य का सागर लहराता है। उन्होंने भाषा वैज्ञानिक लेखन से इतर अपने सर्जनात्मक लेखन में विधाओं की परंपरागत चौहद्दियों को तोड़ा है। संस्मरण और पाठ विश्लेषण को एक दूसरे में लपेटकर समीक्षा की एक नई शैली विकसित करना प्रो. दिलीप सिंह के ही बूते बात है। वे सही अर्थ में उत्तरआधुनिक युग के समीक्षक हैं। इस युग में हम विभिन्न वर्गीकरणों की सीमाओं को टूटते और एक दूसरे में विलीन होते देख रहे हैं। प्रो. दिलीप सिंह ने इसे विधाओं के स्तर पर चरितार्थ करके दिखाया है। प्रस्तुत कृति 'बनवासी बैगा' इसका नव्यतम उदाहरण है। उनकी इस कृति को किसी एक विधा के खाँचे में नहीं समेटा जा सकता। इसमें कथारस है, बतकही है, काव्यरस है, चित्रात्मकता है, स्मृतियों का खजाना है, रोजनामचे की क्रमिकता है, अनुभूतियों की गहराई है, कल्पना का सौंदर्य है, संवाद की स्वाभाविकता है, स्थितियों की नाटकीयता है, आख्याता की विश्वसनीयता है और लेखक की आत्मीयता है। इसलिए किसी विधाविशेष में वर्गीकृत करने से बचते हुए इस कृति के बारे में यह कहना काफी होगा कि यह निश्छल और प्रांजल गद्य है। ऐसा उत्कृष्ट गद्य जो अन्यत्र प्रायः दुर्लभ है!


प्रो. दिलीप सिंह ने इस कृति को उचित ही बैगा जनजाति के जीवन और जीवनदर्शन का सरल भाष्य कहा है। बैगा समुदाय के बहाने उन्होंने अरण्य, ग्रामीण और आदिवासी संस्कृति के उस आधारभूत मूल त्रिकोण की सहज साधना की है, जिसके आधार पर सभ्यता के उषाकाल में मानव संस्कृति की आदिम अधिसंरचना खड़ी हुई होगी। मध्यप्रदेश के वनवासी बैगा समुदाय के निकट सान्निध्य में रहकर प्रो. दिलीप सिंह ने यह अनुभव किया कि वह समुदाय पारंपरिक ज्ञान, कौशल और संस्कारों को तो बचाए हुए है ही, व्यापक भारतीय जीवन मूल्यों और आचार विचार का पोषक भी है। उनकी यह कृति इस समाज की संवाद संस्कृति को भी भली भांति बैगाओं की जुबानी हमें सुनाती है। एक समर्थ गद्यकार की रचना के रूप में इस कृति की बड़ी विशेषता इसमें धड़कती हुई लौकिक चेतना है, जो इड़ा की तुलना में श्रद्धा की सृष्टि अधिक प्रतीत होती है। इसमें एक ऐसे संसार की क्रमिक यात्रा है, जहाँ जड़ और चेतन सबके साथ बैगाओं का निजी रिश्ता है। इसलिए ये इतने प्राकृत हैं कि हँसें तो बहार छा जाए। वन इनमें और ये वन में रचे बसे हैं। इतने रचे बसे कि एक दूसरे के आनंद और संताप को आसानी को पहचान और परख लेते हैं। लेखक ने स्वयं को इनमें विलीन करके जंगल की माया का वैभव खुद जीकर देखा ही और अपनी लेखनी की सरस धार से उसे पाठकों के लिए पुनःसृजित किया है। उन्हें इस बात का मलाल भी है कि इन वनवासियों पर लिखने वालों ने घोटुल प्रथा तो देखी, लेकिन इस क्षेत्र की वनशोभा नहीं निहारी। कहना न होगा कि यह कृति इस अभाव की पूर्ति करने का समर्थ, सार्थक और सफल प्रयास है।

'वनवासी बैगा' अपने ललित प्रवाह में बैगा समुदाय की निजी पहचान को रेखांकित करती है। इस पहचान में शारीरिक बनावट से लेकर सजावट तक सब कुछ शामिल है। पोशाक और खानपान भी। मेले और पर्व भी। मौसम की अतियों को सहने की आदत भी- जैसे पता ही न हो कि अति हो गई! मौसम की मार इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। लेखक ने अपने संपर्क में आए अनेक स्त्री-पुरुषों के साक्ष्य से यह दर्शाया है कि ये वनवासी प्रकृति के माधुर्य और उसकी हलचलों में इस तरह रमे हुए हैं कि उनके तन मन प्रकृति के साथ एकाकार हो गए हैं। लेखक ने लगभग पाँच वर्ष इस लोक में जीकर सचमुच सारे नगरीय कल्मष से मुक्ति पा ली है। इस अरण्यवास ने उन्हें ऋषितुल्य पारदर्शिता का वरदान दिया है। वही पारदर्शिता इस रचना के हर पृष्ठ से झाँक रही है। एक खास तरह की निरभिमानता और बाल सुलभ निश्छलता प्रो. दिलीप सिंह के व्यक्तित्व का सदा से हिस्सा रही है। इसी ने उन्हें प्रेरित किया होगा कि वे कभी गोपाल तो कभी बिरसीबाई के समक्ष जिज्ञासु शिष्य की तरह बैठकर लोक ज्ञान के उनके भंडार को अपनी अंजुली में समेटकर पी जाएँ । वे बैगाओं के गीतों और लोक कथाओं से लेकर उनके मिथकीय विश्वासों तक पर मुग्ध हैं। उन्हें लगता है कि नर्मदा मैया ने स्वयं उनके जीवन की धारा ही बदल दी है और वे अरण्यगान के सम्मोहन में जंगली होते जा रहे हैं। जंगली यानी प्रकृत। सहज। अकृत्रिम। सत्य। आत्मतत्व के दर्शन के लिए इसी साधना की तो जरूरत होती है। सारे आवरणों से मुक्त मादल के बोल, टिमकी की तिड़ तिड़ और करमा नृत्य। जैसा जीवन, वैसा ही नृत्य। आदिम भारत की सरल संस्कृति। वनवासियों ने ही भारत की आत्मा को बचाकर रखा हुआ है।

आज कोरोना काल में हम भले ही अलग अलग पैथियों के नाम पर अतिशय बुद्धिमत्तापूर्ण बयानबाजियाँ करते फिरें, लेकिन इस सत्य को नहीं नकार सकते कि जल, जंगल और जमीन की आदिम संतानें आज भी जड़ी बूटियों के जिस जगत की जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी सँजोए हुए हैं, उसकी काट किसी पैथी वाले के पास नहीं है। प्रो. दिलीप सिंह ने बैगाचक पहुँचकर यह जानकारी अर्जित की कि मानव शरीर की ही नहीं, पशुओं की भी समस्त व्याधियों का उपचार इन वनों में उपलब्ध है। जानकर किसे अचरज न होगा कि वहाँ नवजात शिशु की नाल बाँस के पत्ते से काटी जाती है। एक तरफ यह सारा ज्ञान, तो दूसरी तरफ वन प्रांतरों में बहती संगीत की अद्भुत धारा। यह कृति चेताती है कि वनवासियों की यह सारी संपदा – भाषा-भूषा, गीत-संगीत, नृत्य, कथा-कहानी, उत्सव-त्योहार, हवाओं-दवाओं का ज्ञान, लोकसंस्कृति - खो न जाए, मर न जाए। इससे पहले जागना होगा, अन्यथा अभी जिस तरह एक बैगा गीत में आग लगने पर जंगल चीखता है और आदिवासी विलाप करते हैं, कहीं उसी तरह इस तमाम अरण्य संस्कृति के लुप्त होने पर भारतमाता को न रोना पड़ जाए। इसे क्या कहिएगा कि जंगल में आग लगने पर इन वनवासियों को अपने निराश्रित होने की उतनी चिंता नहीं, जितनी पीड़ा यह सोचकर होती है कि जलता हुआ पेड़ कितना तड़पता होगा - सेवा लाख करि हम, पेड़वन कलपत हो!

प्रो. दिलीप सिंह ने यों तो इस पुस्तक में बैगा समुदाय के तमाम संस्कारों की चर्चा की है, लेकिन अंतिम संस्कार का वर्णन बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। वे बताते हैं, बैगाओं में दोनों प्रथाएँ प्रचलित हैं - मृत शरीर को मिट्टी में गाड़ने की भी और चिताग्नि देने की भी। प्रायः सयानों को आग और युवाओं को मिट्टी दी जाती है। वनवासियों का कोई संस्कार भला संगीत के बिना कैसे हो सकता है! वे मृत्यु पर भी नगाड़ा बजाते हैं। लेकिन मृत्यु-ताल अलग ही होती है। स्थिर और दुखभरी। लेखक ने विस्तार से श्मसान के कर्मकांड का बखान किया है और धीमे से टिप्पणी की है - इन वनवासियों को भी मृत्यु की वेदना हमारे ही जैसी सालती है! एक खास बात का वे और जिक्र करते हैं कि मृत्यु संस्कार के रिवाजों में समधी और समधिन को बहुत महत्व दिया जाता है। अनुमान किया जा सकता है कि इस समधी-समधिन सम्मान से वैवाहिक रिश्तों और बेटी-बहू के सम्मान को कितना बल मिलता होगा। यह विडंबना ही है कि हमारे सभ्य समाज में समधी समधिन पारिवारिक संस्कारों से दूर दूर ही रखे जाते हैं। कन्या पक्ष के माता पिता तो जीवन भर हीन और बेचारे ही बने रहते हैं। लेखक ने कहा नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यही है कि वनवासी समाज तथाकथित सभ्य समाज की तुलना में रिश्ते नातों को अधिक सच्चा सम्मान देते हैं। इसके अलावा मृत्यु गाथा के बाद रात्रि में राम गाथा सुनते समय लेखक को इस सत्य की अनुभूति होती है कि जीवन मृत्यु से बड़ा है। लिखते समय वे इस प्रवास के साथी और आख्याता चर्रा का भाव-विगलित होकर स्मरण करते हैं - मृत्यु यहीं तो हार जाती है जीवन से। यदि हम मृत्यु को जीवन का ही एक चरण स्वीकार कर लें तो फिर मृत्यु का अवसाद कैसा, वेदना कैसी? आगे वे निष्कर्ष देते हैं कि हमारे बैगा बंधु बांधव इस जीवन सत्य को अपनी जिंदगी में उतार कर, घोल घोल कर पी चुके हैं। कहना ही होगा कि वह मृत्युंजय बोध पोथियाँ पढ़ पढ़ कर नहीं मिल सकता, जिसे प्रकृति की ये आदिम औलादें पल पल जीती हैं। प्रकृति से उपजा यह जीवन दर्शन ही आत्मा की अमरता के दर्शन वाली भारतीय संस्कृति का मूल है।

लेखक ने बैगाओं के नाच-रंग का बड़ा ही जीवंत, बिंबात्मक और सरस वर्णन किया है; लोक के साथ अपनी आत्मा को एकाकार करते हुए। प्रो. दिलीप सिंह खाँटी बनारसी हैं; बैगा नाच उन्हें बनारस पहुँचा देता है और वे मानो मादल पर थाप देकर अलग अलग गीतों की ताल निकालने लगते हैं। उन्हें इस लोक संगीत में संतों की चार-धाम यात्रा दिखाई देती है। लोक का रहस्य ही समवेत और सम्मिलित जीवन में छिपा है। लोक में मनुष्य अपने अपने अजनबी द्वीपों की सृष्टि नहीं करते, बल्कि मिल जुल कर महाद्वीप हो जाते हैं। सुख-दुख, जन्म-मृत्यु, गीत-संगीत, नृत्य-कला सबमें समवेत का यह भाव व्यक्तिवादी अँधेरे में पड़ी दुनिया से इस दुनिया को अलग करता है। यहाँ जैसे व्यक्ति है ही नहीं। लोक का एक अंश भर है वह। अपने में पूरे लोक को समेटे हुए। यह लोक संस्कृति भारत के हर हिस्से में मिल जाएगी - क्योंकि यही मूल है। लेखक ने रेखांकित किया भी है कि मिल बैठ कर गाने की रीत, स्वरों को छोड़ने पकड़ने का कौशल, मानवीय अनुभवों और जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति आपको भारत के सभी प्रांतों के लोक गीतों में मिल जाएगी।

वनवासियों-आदिवासियों को अशिष्ट और असभ्य कहने वाले तथाकथित सभ्यों को यह जानकर शर्म आनी चाहिए कि बैगा भाषा में गालियाँ नहीं हैं। शहर के बाजार से जरूर आ गई हैं! भला ऐसी संस्कृति में माँ और बहन की गालियाँ कैसे होंगी, जहाँ स्त्रियों को पूजा जाता हो। यही वजह है कि समाजभाषाविज्ञानी लेखक बैगा भाषा में अश्लील शब्दों को खोजने में विफल रहे!। यह भी पता चला कि उस समाज में समलैगिंकता बिलकुल नहीं। इस लोक में शब्द-वर्जनाओं के लिए भी कोई स्थान नहीं है। वे जैसा जीते हैं, वैसा बोलते हैं - कोई आवरण नहीं, कोई दुराव छिपाव नहीं।

लेखक ने इस लोक में रम कर उसके हर्ष-विषाद का प्रामाणिक लेखा जोखा अपनी डायरियों के सहारे इस किताब में उतार दिया है। लोक कथाओं को एक पूरा संसार वे पाठकों के सामने खोल कर धर देते हैं। बच्चों के खेलों के वर्णन में वे खुद बालक बन जाते हैं। पर्व-त्योहार की बात आती है, तो लोक प्रथाओं की एक एक बारीकी से परिचय कराते चलते हैं। कुल मिलाकर, बैगा वनवासियों की समग्र जीवन गाथा को उन्होंने उसमें डूबकर अपने माध्यम से व्यक्त किया है। यहाँ साक्षी भाव नहीं है। भोक्ता भाव भी नहीं। एक उन्मुक्त सहचर हैं दिलीप सिंह यहाँ बैगा लोकजीवन के। किनारे बैठकर तो दुनिया लहरों को गिनती है, लेकिन मोती उन्हें ही मिलते हैं , जो पानियों में गहरे पैठते हैं। प्रो. दिलीप सिंह ऐसे ही गोताखोर हैं। इतनी गहरी डुबकी लगाते हैं कि लोक बोध के मोतियों से मुट्ठियाँ भर भर लाते हैं। पाठक भी जितनी गहरी डुबकी लगाएँगे, शब्द से लेकर बोध तक की लोक संपदा इस अनोखी कृति में पाएँगे। तभी तो वह स्थिति उत्पन्न होगी कि बैगाचक से दूर जाकर भी मन वही रमा रहे - ऊधो मोहि ब्रज (बैगाचक) बिसरत नाहीं!

अंततः यही कि प्रो. दिलीप सिंह की यह अनूठी कृति लोक अध्ययन के नए क्षितिजों का उद्घाटन करने वाली है।…


- ऋषभदेव  शर्मा
4 जुलाई, 2021

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

(गवेषणा-110) हिंदी भाषाचिंतन को प्रो. दिलीप सिंह का अवदान




हिंदी भाषाचिंतन को प्रो. दिलीप सिंह का अवदान

-ऋषभदेव शर्मा



हिंदी भाषाविज्ञान की परिवर्तनशील प्रकृति और उसके व्यापक होते जा रहे सरोकारों पर जिन इने-गिने भाषा अध्येताओं का ध्यान गया है उनमें प्रो. दिलीप सिंह (1951) का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने भाषावैज्ञानिक चिंतन को नवीन भाषा संदर्भों में परखने और तदनुरूप निष्पत्तियाँ प्रतिपादित करने का चुनौतीपूर्ण दायित्व निभाया है। उन्होंने अपने लेखन द्वारा भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर केंद्रित भाषा संदर्भ को सुनिश्चित समृद्धि प्रदान की है। वे एक ऐसे मर्मवेधी भाषावैज्ञानिक-समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिसकी दृष्टि सदा सकारात्मक, वस्तुनिष्ठ तथा कृतिकेंद्रित रहती है। वे साहित्य और भाषा को संस्कृति की ऐसी निष्पत्ति मानते हैं जिसका लक्ष्य मनुष्य और उसकी सामाजिकता है क्योंकि उनके लिए साहित्य और भाषा का विश्लेषण वस्तुतः मानव जीवन को सुंदरतर और समृद्धतर बनाने की साधना का ही दूसरा नाम है। उनकी यह मान्यता केवल लेखन तक सीमित नहीं है बल्कि उनका व्यक्तित्व भी इसी के ताने-बाने से बुना हुआ प्रतीत होता है। भाषा, समाज, संस्कृति और साहित्य इन चारों को आंतरिक रूप से संबंधित और परस्पर आश्रित मानने वाले प्रो. दिलीप सिंह अपने व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक आचरण में भी इन चारों के समीकरण को चरितार्थ करने वाले आधुनिक भाषाचिंतक हैं। वे बौद्धिक जड़ता को तनिक भी बर्दाश्त नहीं करते और समय की माँग के अनुरूप हर परिस्थिति में कुछ नया करने के लिए तत्पर रहते हैं।

समाज को भाषा का नियामक मानने वाले प्रो. दिलीप सिंह व्यक्त वाणी के साथ ही देह भाषा और संकेतों में निहित संस्कृति के भी गहन पारखी और प्रयोक्ता हैं। आँखों में अजीब आत्मीयताभरी चमक, मूँछों में रहस्यपूर्ण स्मित और होठों पर निश्छल अट्टहास उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व को रुक्ष होने से बचाते हैं। सामान्य वार्तालाप में विनम्रता और शालीनता का प्रतिपल ध्यान रखने वाले प्रो. दिलीप सिंह वक्ता के रूप में अत्यंत ओजस्वी और दृढ़ संप्रेषक माने जाते हैं जो प्रमाणों और उदाहरणों के बिना कभी नहीं बोलते और किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले विषय की आंतरिक तहों का अलग-अलग कोणों से खुलासा करते हैं। उनका लेखकीय व्यक्तित्व शोधकर्ता और सर्जक के अद्भुत सामंजस्य से निर्मित है।

प्रो. दिलीप सिंह ने भाषाचिंतन की दीक्षा प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव और पंडित विद्यानिवास मिश्र सरीखे भाषाविदों से प्राप्त की। उनकी भाषावैज्ञानिक मेधा वाराणसी, आगरा, धारवाड़, हैदराबाद और मद्रास जैसे भारत के अलग-अलग भाषिक स्वभाव वाले केंद्रों में शाणित हुई तथा फ्रांस और अमेरिका की भट्टियों में तपकर निखरी। ‘समसामयिक हिंदी कविता’ (1981) और ‘व्यावसायिक हिंदी’ (1983) जैसी क्रमशः संपादित और मौलिक पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने आरंभ में ही यह संकेत दे दिया था कि वे साहित्य अध्ययन और भाषाविज्ञान को परस्पर निरपेक्ष अनुशासन नहीं मानते। काव्य-भाषा और काव्य-शैली की भी उनकी समझ उतनी ही निर्मल हैं जितनी प्रयोजनमूलक भाषा और अनुवाद चिंतन की। आगे बढ़ने से पहले यह और जान लेना आवश्यक है कि प्रो. सिंह ने साहित्य और भाषा क्षेत्र के विशिष्ट और वरिष्ठ विद्वानों के साथ मिलकर प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव की हिंदी और अंग्रेज़ी में रचित संपूर्ण ग्रंथावली का संपादन किया है तथा विविध विश्वविद्यालयों और संस्थानों के भाषाविज्ञान के पाठ्यक्रमों की पाठ्यसामग्री भी विकसित, संपादित और प्रकाशित की है। इन सारे ही कामों में उनकी समाजभाषिक चेतना को प्रतिफलित देखा जा सकता है। वे संप्रेषण पर सर्वाधिक बल देनेवाले व्यावहारिक भाषाविज्ञानी हैं, इसमें संदेह नहीं। अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के व्यावहारिक प्रयोक्ता भाषाचिंतक के रूप में प्रो. दिलीप सिंह की ख्याति का आधार बनने वाले उनके ग्रंथों में ‘भाषा, साहित्य और संस्कृति’ (2007), ‘पाठ विश्लेषण’ (2007), ‘भाषा का संसार’ (2008), ‘हिंदी भाषाचिंतन’ (2009), ‘अन्य भाषा शिक्षण के बृहत संदर्भ’ (2010), ‘अनुवाद की व्यापक संकल्पना’ (2011) और ‘कविता पाठ विमर्श’ (2013) जैसी कृतियाँ शामिल हैं।

प्रो. दिलीप सिंह के इस समस्त भाषावैज्ञानिक लेखन के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने साहित्य विमर्श और भाषाचिंतन दोनों ही दृष्टियों से हिंदी जगत को समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंने हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं के पाठों के मर्म का भेदन करके उनके सौंदर्य का उद्घाटन किया है तथा दूसरी ओर सैद्धांतिक और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के विविध पक्षों को व्यवहारतः घटित करके दिखाया है। उनका समस्त चिंतन भारतीय मनीषा की परंपरानुसार भाषाकेंद्रित चिंतन है तथा अपने लेखन द्वारा उन्होंने इस परंपरा को आधुनिक दृष्टि से भी संपन्नतर बनाने का महत्कार्य किया है।

सामान्यतः आज भी यह माना जाता है कि भाषाविज्ञान जटिल वैचारिकता का शास्त्र है। लोग यह भी सोचते हैं कि भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी में बुरी तरह जकड़ा हुआ एक ऐसा तथ्यपरक अध्ययनक्षेत्र है जिसका आदि ही उसका अंत होता है। परंतु पिछले पाँच दशकों में भाषाविज्ञान अथवा भाषावैज्ञानिक अध्ययन की प्रविधियों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। एक ओर भाषा विवरण की सरणियाँ अर्थकेंद्रित हुईं तो दूसरी ओर अर्थ की सीमाएँ, जो परंपरागत भाषाविज्ञान में बोध तक सीमित थीं, प्रैगमेटिक्स तक फैल गईं। फिर भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर जो विमर्श हुए उन्होंने इस धारणा को तो कमज़ोर किया ही कि भाषाविज्ञान सिर्फ भाषा सिद्धांत अथवा भाषा विवरण की संरचनात्मक बुनावट को खोलने वाला शास्त्र है, यह भी प्रतिपादित किया कि वह अनुप्रयोग की जा सकने वाली एक उपयोगी प्रणाली भी है। इसी संदर्भ में प्रो. दिलीप सिंह ने भाषा सैद्धांतिकी और इसके अनुप्रयोग की सभी दिशाओं को टटोला और अपनी अवधारणाएँ प्रकट कीं। उनका लेखन भाषावैज्ञानिक चिंतन की संप्रेषणीयता का हामी है। सिद्धांतों को वे अपने भीतर जिलाते हैं और फिर उन्हें अनुप्रयोगात्मक स्तर पर भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज के घटकों के भीतर से प्रतिफलित करने का यत्न करते हैं। भाषावैज्ञानिक चिंतन में उनका अवदान यह माना जाएगा कि समय-समय पर उद्घाटित भाषिक और भाषावैज्ञानिक लेखन की अवधारणाओं को उन्होंने डाटा, पाठ और व्यावहारिक भाषा सामग्री के सहारे प्रस्तुत किया है। उनके भाषावैज्ञानिक लेखन का विस्तृत क्षेत्र ही यह जताने के लिए काफी है कि उनकी अध्ययन पीठिका कितनी मजबूत, तर्कबद्ध और पारदर्शी है। दूसरे शब्दों में उनका अवदान उनके सुदीर्घ चिंतन-मनन का निचोड़ है।

समाजभाषाविज्ञान
प्रो. दिलीप सिंह ने पिछली शताब्दी के सातवें दशक में ‘सामाजिक स्तर भेद और भाषा स्तर भेद’ विषय पर पीएचडी की थी। यह वह समय था जब भारत में भाषावैज्ञानिक विमर्श में समाजभाषाविज्ञान घुटनों के बल चल रहा था। दिलीप सिंह ने समाजभाषावैज्ञानिक सिद्धांतों को हिंदी भाषासमुदाय के भाषा वैविध्य के नज़रिए से विश्लेषित किया जिसमें यह अछूता पक्ष भी उजागर किया कि सामाजिक संरचना ही भाषा वैविध्य और भाषा विकास को संभव बनाती है। आगे चलकर समाजभाषाविज्ञान उनके लेखन का एक मूलाधार भी बना। उन्होंने पहली बार ‘समाजभाषाविज्ञान’ और ‘भाषा का समाजशास्त्र’ की वैचारिकता को ही स्पष्ट नहीं किया बल्कि ‘भाषा का समाजशास्त्र’ की सैद्धांतिकी में उल्लिखित उन सभी पक्षों को हिंदी भाषा के संदर्भ में व्याख्यायित किया जिनका उस समय तक तो अभाव था ही, आज भी जितना विस्तार इसे हिंदी भाषा की भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक छवियों के संदर्भ में मिलना चाहिए था, नहीं मिल सका है। प्रो. सिंह निरंतर इस दिशा में विचार करते आ रहे हैं। चाहे वे साहित्यिक पाठों का विश्लेषण कर रहे हों, चाहे हिंदी प्रयुक्तियों की व्याख्या, और चाहे अनुवाद प्रक्रिया और अन्य भाषा शिक्षण - सभी में एक संकेत की तरह वे समाजभाषावैज्ञानिक और भाषा की समाजशास्त्रीय प्रविधियों का निर्माण और प्रयोग करने की पहल करते हैं।

इस दृष्टि से उन्होंने विकल्पन, संप्रेषण और भाषा की सर्जनात्मकता पर जो चर्चाएँ की हैं, वे भारतीय भाषाओं और खासकर हिंदी भाषा के लिए आधार बनाई जा सकती हैं। प्रो. सिंह ने समाजभाषाविज्ञान की अपनी अध्ययन दृष्टि को बहुत व्यापक बनाकर प्रस्तुत किया है, जिसमें सस्यूर और चाम्स्की के वैचारिक द्वंद्वों से भी वे टकराए हैं ; लेबाव और हैलीडे की व्यावहारिकता को भी उन्होंने नए ढंग से देखा है तथा डेल हाइम्स के बहाने भाषा में संस्कृति के अंतस्थ होने की अनिवार्यता का भी पता उन्होंने दिया है। प्रयोग, संदर्भ, परिस्थिति और संप्रेषण जैसी सैद्धांतिक संकल्पनाओं को प्रो. सिंह ने हिंदी भाषा और साहित्य के विवेचन द्वारा जिस तरह पठनीय, संप्रेषणीय और वैज्ञानिक रूप में सामने रखा है वह उनके प्रवीण समाजभाषावैज्ञानिक होने का स्वतः प्रमाण है।

शैलीविज्ञान
इसमें संदेह नहीं कि शैलीविज्ञान की जिन अवधारणाओं से प्रो. दिलीप सिंह प्रभावित दिखाई देते हैं, वह रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का शैलीवैज्ञानिक चिंतन है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि श्रीवास्तव का चिंतन एक जटिल वैचारिक प्रक्रिया से उद्बुद्ध है अतः उसे ठीक ढंग से समझना, उसके भीतरी बिंदुओं की पहचान करना और फिर उन्हें पाठ के संदर्भ में उपयोग में लाना आसान काम नहीं है। इस बात से ही पता चलता है कि वे शैलीविज्ञान के गहन अध्येता हैं और यह भी कि श्रीवास्तव में उद्धृत अन्य संदर्भों को उन्होंने अलग से भी पढ़ा-समझा और फिर अपनी एक राह बनाई। प्रो. सिंह ने भाषा, समाज और साहित्य को अविच्छिन्न देखा है। उनकी साहित्यिक अभिरुचि पाठ के भाषिक विधान से तय होती दिखाई देती है। संस्कृति संबंधी उनकी धारणाएँ भी रीति-रिवाज और आचरण से आगे जाकर प्रोक्ति में इनको घटित होते हुए देखती हैं। उनका समाजभाषावैज्ञानिक पक्ष भी प्रबल है क्योंकि यहाँ भी उन्होंने सामाजिक शैली, शैली वैविध्य, पाठों में गठाव और भाषिक अभिव्यंजना को मात्र चयन, विचलन, समांतरता और अग्रप्रस्तुति के खाँचों में न बाँट कर पाठ में द्वंद्व या तनाव तथा अभिव्यंजनात्मक औज़ारों के नजरिये से शैली की सहजता को आँकने की कोशिश की है। शैलीविज्ञान में इनका अवदान यह माना जा सकता है कि शैलीविज्ञान को शुद्ध भाषाई और संरचनात्मक मानने वाली विचारधारा को उन्होंने चुनौती दी और विभिन्न पाठों का विश्लेषण करके यह सिद्ध किया कि शैलीविज्ञान साहित्यिक पाठ के विश्लेषण की ऐसी प्रविधि है जो सामाजिक शैलीविज्ञान तक जाने का रास्ता भी हमें दिखलाती है। उनका अवदान यह भी है कि वे शैलीविज्ञान को समाजशैलीविज्ञान के दायरे में ले जाते हैं और हिंदी के पाठों के जरिये यह दिखा पाते हैं कि शैलीविज्ञान केवल भाषिक संरचना पर केंद्रित न होकर कला, संस्कृति और सभ्यता के विकास से भी साहित्य को जोड़ने का मार्ग दिखाता है।

प्रो. सिंह ने शैली की अवधारणा को भी नए आयाम दिए। सामाजिक शैली, बातचीत में लोक और सांस्कृतिक तत्वों का अवमिश्रण, संवादों की परिस्थितिजन्य बुनावट तथा प्रोक्ति के स्तर पर पाठों की अभिव्यंजनापरक संघटना को वे इस दृष्टि से देखते हैं कि यह स्पष्ट हो सके कि कृति के भीतर सन्निहित शैलीतत्व अपनी विविधता तो प्रकट करते ही हैं, वे कृति की आत्मा और मार्मिकता को भी उभार दे सकते हैं, देते हैं।

प्रो. सिंह ने अपने शैलीवैज्ञानिक अनुप्रयोगों में एक उल्लेखनीय काम यह भी किया है कि उन्होंने हिंदी की व्याकरणिक इकाइयों के सृजनात्मक प्रयोग की पड़ताल गद्य और पद्य दोनों प्रकार के पाठों मंे की है। इसके पहले पाठ विष्लेषण में इस प्रविधि का उपयोग दिखाई नहीं देता। इसके अतिरिक्त भाषा और संवेदना के नजरिए से भी प्रो. सिंह ने कभी षिल्प तो कभी पाठों की संरचना के द्वारा यह उद्घाटित किया है कि भाव और संवेदना को अपेक्षित उत्कर्ष देने में भाषिक विधान तथा भाषायी संयोजन की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने शैलीविज्ञान को व्यावहारिकता में ढालकर यह जता देने का यत्न किया है कि मात्र सैद्धांतिकता किसी शाास्त्र का न तो मूल होती है और न ही उसकी अंतिम परिणाति। जब तक उसका अनुप्रयोग नहीं किया जाता और सही प्रविधि से उसका इस्तेमाल नहीं किया जाता तब तक उसके प्रति भ्रांतियाँ बने रहने की तथा निरर्थक बहस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। शैलीविज्ञान की पृष्ठभूमि अत्यंत ठोस है तथा हिंदी के साहित्यिक पाठों की सटीक समीक्षा में इसे किस तरह अपनाया और पनपाया जा सकता है यह उनके पाठ विष्लेषण से समझने में हमें कोई दिक्कत पेष नहीं आती। एक विषेषता यह भी कि शैलीविज्ञान के सिद्धांतों को उन्होंने अपने भीतर पचाया है और फिर पाठों के जरिये उन्हें रूपाकार दिया है। इसीलिए उनके इन अध्ययनों में हमें न तो कोई झोल दिखाई देता है, न अस्पष्टता और न ही भ्रांति। संप्रेषणीयता उनके इस लेखन का अतिरिक्त गुण है जो ऐसे लेखनों में कदाचित ही दीख पड़ता है।

(अन्य) भाषा शिक्षण
यह जानकारी हो सकती है कि प्रो. सिंह ने अपने कैरियर की शुरूआत पहले विदेश और फिर देश में हिंदी शिक्षण से की। विदेशियों को हिंदी पढ़ाने का उनका सुदीर्घ अनुभव रहा है। साथ ही दक्षिण भारत में बरसों हिंदी पाठ्यक्रमों से और शोध से जुड़े होने के कारण उनकी दृष्टि भाषा अधिगम की उन समस्याओं पर स्वतः पड़ती रही है जिनकी वजह से दूसरी भाषा के ग्रहण में अथवा समझ में व्यवधान उत्पन्न होता है। अपने इन्हीं अनुभवों को प्रो. सिंह ने भाषा शिक्षण संबंधी लेखन में हमारे साथ बाँटा है। यहाँ भी व्यावहारिकता का दामन उन्होंने कहीं नहीं छोड़ा है। इसके पहले उनके सामने हिंदी में भाषाविज्ञान और भाषा शिक्षण, लेंगुएज टीचिंग एंड स्टाइलिस्टिक्स और व्यतिरेकी विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली अनेक पुस्तकें थीं। इनमें से अधिकतर सैद्धांतिक ज्यादा थीं, व्यावहारिक कम। उन्होंने एक काम महत्वपूर्ण किया; और जिसका अनुभव वे विदेश में कर चुके थे कि मसला केवल भाषा शिक्षण भर का नहीं है इसकी परिधि में साहित्य और संस्कृति शिक्षण का भी समावेश होना चाहिए। ऐसा उन्होंने करके भी दिखाया। भाषाशिक्षण की बात करते समय प्रो. दिलीप सिंह ने पहली बार उसकी ऐतिहासिकता को ही नहीं बल्कि इतिहास के माध्यम से उसकी विकास प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश की क्योंकि इन्हें समझे बिना उन समस्याओं को समझ पाना भी कठिन है जो भाषा अधिगम में अवरोध उत्पन्न करती हैं। इस संदर्भ में पुनः उनका जोर संप्रेषणपरक भाषा शिक्षण पर है। भाषा शिक्षण के संदर्भ में इसे उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की व्यवस्था’ कहा और इस अभिव्यक्ति की व्यवस्था में उन्होंने भाषिक के साथ-साथ भाषेतर उपादानों को अन्य भाषा शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं अनिवार्य सिद्ध किया है, ऐसा हिंदी में पहली बार घटित हुआ। इसके साथ ही अन्य भाषा शिक्षण में लिखित और उच्चरित भाषा के बीच भेदों और अंतर्संबंधों दोनों को लेकर चलने की जो प्रविधियाँ उन्होंने तैयार की हैं, वे अनूठी तो हैं ही, भाषिक सामग्री का उपयोग करने की वजह से ये कक्षा में उपयोग करने योग्य भी बन गई हैं। इस धरातल पर ही रूप के स्थान पर अर्थ पर बल देने तथा भाषा के प्रकार्यात्मक रूपों को अधिक स्थान देने की जो बात उन्होंने कही है वह संप्रेषण से भी आगे जाकर अन्य भाषा में बोधगम्यता और दक्षता तक पहुँचती है। इसीलिए भाषा दक्षता को प्रो सिंह ने अलग नजरिये से देखा है। तभी उन्होंने संप्रेषण सिद्धांत के अंतर्गत रोमन याकोब्सन और हैलीडे के विचारों को इतना उदाहरणपुष्ट और पारदर्शी बना दिया है जैसा कि कर पाना किसी सामान्य के बूते का नहीं है।

साहित्य शिक्षण (अभी तक जिस पर हिंदी में कोई चर्चा ही नहीं हो पाई है) की उनकी स्थापनाएँ अनुभवसिद्ध हैं। साहित्यिक पाठों में भाषा शिक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक तथा समाजमनोवैज्ञानिक घटकों को कैसे शिक्षणीय बनाया जा सकता है, यह प्रो. सिंह ने प्रक्रियात्मक पद्धति अपनाते हुए समझाया है। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि साहित्यिक पाठ के जो अंश उन्होंने साहित्य शिक्षण की बात करते हुए उदाहरणस्वरूप चुने हैं, वे वहीं से उठाए गए हैं जिन्हें वे पाठ विश्लेषण के लिए पहले चुन चुके थे। इस तरह उन्होंने यह भी दिखा दिया है कि पाठ विश्लेषण की परिधि में वे जिन शैलीवैज्ञानिक प्रविधियों का इस्तेमाल कर रहे थे वे बड़ी आसानी से भाषा शिक्षण की प्रक्रिया में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। यहाँ उनका शैलीवैज्ञानिक और समाजभाषावैज्ञानिक दोनों मुखर हैं।
संस्कृति शिक्षण पर उनका लेखन पहली बार दिखाई दिया है जिसके माध्यम से उन्होंने यह प्रतिपादित करने का यत्न किया है कि भाषा और संस्कृति का संबंध बेजोड़ होता है तथा पहली बार यह भी कि सांस्कृतिक तत्वों के घुलन के बिना न तो किसी सामाजिक भाषा का निर्माण होता है और न ही किसी सभ्यता का।

इस क्षेत्र में प्रो. सिंह ने भाषा शिक्षण की सैद्धांतिकी को भी प्रस्तुत किया है। इस सैद्धांतिक भूमिका को उन्होंने निःसंकोच प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव से ग्रहण कर लिया है और जहाँ जरूरत पड़ी है उसमें अपना कुछ जोड़ा है। जोड़ना और आगे की दिशा तय करना अथवा एक चिंतनबिंदु से दूसरे-तीसरे तक पहुँचना, प्रो. सिंह की भाषावैज्ञानिक लेखन पद्धति की अनोखी विशेषता है जिसे न तो दुहराव ही कहा जा सकता है और न ही पिष्टपेषण। उन्होंने भाषा षिक्षण के अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान से जुड़ने की या उसका अंग होने की चर्चा में अपनी इसी प्रतिभा का परिचय दिया है। जहाँ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान को सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग तक सीमित न करके उन्होंने शुद्ध भाषाविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान और यहाँ तक कि अनुवाद शास्त्र को भी इस तरह इसमें समाहित कर दिया है कि भाषा शिक्षण की जिन प्रविधियों को वे व्यावहारिक स्वरूप देते हैं वे यहाँ अपनी सैद्धांतिकता में भी दृढ़ बनी दिखाई देती हैं।

भाषा शिक्षण की अधुनातन आवश्यकताओं की ओर भी उनकी दृष्टि बराबर रही है। संप्रेषणपरक व्याकरण को तो वे वरीयता देते ही हैं लेकिन इसके भीतर वे सिर्फ बोलचाल की हिंदी या बातचीत की हिंदी की दक्षता तक ही इसकी सफल परिणति नहीं मानते हैं। उन्होंने पहली बार संप्रेषणपरक व्याकरण के भीतर अखबारों, फिल्मों, टीवी, रेडियो, लोक कलाओं, विशेष रूप से नाटकों के पाठों और भाषाविधान को भी अन्य भाषा शिक्षण में समाविष्ट करने का आग्रह किया है। इसीलिए विदेशी भाषा शिक्षण में विशेष रूप से उन्होंने ‘मीडिया और हिंदी’ पर अलग से बात की है और अन्य भाषा शिक्षण प्रकार्य को ‘लेंगुएज एफीशिएंसी’ की दृष्टि से प्रबल बनाने के लिए कंप्यूटर साधित भाषा शिक्षण पर भी उनके विचार अत्यंत वैज्ञानिक और सामग्रीपुष्ट हैं। यह भी शिक्षणीय है और यही उनकी चरम उपलब्धि भी है। जैसा कि उनसे अपेक्षित भी था, अन्य भाषा शिक्षण के समाजभाषिक पक्ष पर उन्होंने अलग से और विस्तार से विचार किया है। और एक अनूठा प्रयोग भी कि ‘तराना-ए-हिंदी’ के माध्यम से भाषाई तनाव और राष्ट्रीय भावना को उद्वेलित करने वाली भाषिक संरचना को उन्होंने भाषा शिक्षण की दृष्टि से संप्रेषित किया है। एक विषेष बात यह भी है कि भाषा शिक्षण पर उनके चिंतन में व्यावहारिकता अथवा इन्हें कक्षा में इस्तेमाल कर पाने की सहजता तो निहित है ही, इनमें ऐसे अनेक प्रारूप हैं जिनका सीधा उपयोग करके अन्य भाषा शिक्षण के मार्ग को, और अन्य भाषा शिक्षार्थी को भी, अधिक दक्ष, समर्थ और सक्षम बनाया जा सकता है। उनके भाषा शिक्षण संबंधी लेखन का यह सबसे बड़ा अवदान है।

अनुवाद विज्ञान
अनुवाद संबंधी अध्ययन भी प्रो. दिलीप सिंह का प्रमुख क्षेत्र है। इसकी वजह अनुवाद की व्यावसायिकता अथवा अनुवाद पाठ्यक्रमों की अधिकता नहीं है बल्कि ऐसा लगता है कि उनको शैलीविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान और भाषा शिक्षण इन तीनों को जोड़ते हुए देखने का एक रास्ता इस चिंतन में सुझाई देता है। वे अनुवाद विज्ञान की परिपाटीगत व्याख्या में एकदम प्रवेश नहीं करते। न तो वे अनुवाद प्रकारों पर बीसियों पृष्ठ खर्च करते हैं, न ही उसकी प्रक्रिया पर और न ही उसकी उन घिसी पिटी परिभाषाओं पर जिनका अब न तो कोई ओर रह गया है न छोर। उनकी दृष्टि केवल सिद्धांत और समस्याओं पर भी टिकी नहीं है और अगर कहीं टिकी भी है तो पूरी नव्यता के साथ और अनुवाद को उस तरह देखने की अनिवार्यता के साथ कि अनुवाद एक शास्त्र और एक क्रिया की तरह आधुनिक समाज ही नहीं बल्कि वैश्विक समाज को किस रूप में आगे ले जा सकता है अथवा जोड़ सकता है। इसी कारण वे अपनी बात को प्राकृतिक अनुवाद से शुरू करते हैं जिसे एकभाषी भी अंजाम देता है। उन्होंने पहली बार यह बताया कि कोडीकरण और विकोडीकरण की प्रक्रिया द्विभाषी ही नहीं होती, एकभाषी भी होती है। इस संदर्भ में उन्होंने अनूदित पाठ का जो सिद्धांत दिया है वह एक ओर उनकी समाजभाषावैज्ञानिक दृष्टि के प्रस्थान को प्रतिबिंबित करता है तो दूसरी ओर उनकी शैलीवैज्ञानिक प्रविधियों की पकड़ को। ऐसा इसलिए कि इस नई भूमिका को स्थापित करते समय वे जिन दो संकल्पनाओं को आधार बनाते हैं वे हैं पाठभाषाविज्ञान और संकेतविज्ञान। अनुवाद चर्चा में यह दृष्टि अन्यत्र सुलभ नहीं है। शायद इसीलिए वे अनुवाद के सामाजिक संदर्भ को भी उभार सके हैं जिसे उनकी नव्यता निःसंकोच होकर कहा जा सकता है।

उनके अनुवाद चिंतन में तीन बातें बहुत खुलकर और पहली बार आई हैं -एक अनुवाद समीक्षा और मूल्यांकन वाला पक्ष, दो - तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद के अंतःसंबंध और इनकी अन्योन्याश्रयता का संदर्भ तथा तीन - साहित्येतर अनुवाद का संदर्भ। कहना न होगा कि प्रो. सिंह के पहले इन तीनों पर विचार तो क्या संकेत भी नहीं मिलते।

समतुल्यता के सिद्धांत को उन्होंने संप्रेषणपरक मूल्यों से भी और भाषाविकल्पन से जोड़कर अनुवाद को मात्र एक भाषिक रूपांतरण न मानकर एक समाजसांस्कृतिक रूपांतरण प्रक्रिया सिद्ध कर दिया है। इन चर्चाओं में भी वे अपनी व्यावहारिकता कायम किए हुए हैं जिसे वे मूल और अनूदित पाठों की तुलनीयता के द्वारा सिद्ध करते हैं। नाइडा के समतुल्यता सिद्धांत को प्रो. सिंह ने अलग ढंग से विवेचित किया है जिसमें रूपात्मक समतुल्यता और गत्यात्मक समतुल्यता को उन्होंने हिंदी पाठ के संदर्भ में देखा है और यहाँ भी भाषिक उपादानों से अधिक महत्व उन्होंने सामाजिक अर्थ को दिया है। संभवतः इसीलिए अनुवाद समस्या को भी वे एक नए नजरिये से देख सके हैं। यहाँ उनका बल भाषावैज्ञानिक समीक्षा से अधिक अर्थ, भाषेतर संदर्भ, विशिष्ट प्रयोग, सांस्कृतिक रूपांतरण और भाषा प्रकार्य संबंधी समस्याओं तक फैलता चला गया है। इसमें क्या संदेह है कि साहित्यिक और साहित्येतर दोनों प्रकार के पाठों में ये तमाम तरह की समस्याएँ उभरती रहती हैं। फिर भी इस पर हमें कोई चर्चा दिखाई नहीं देती। ऐसा करके प्रो.सिंह ने अनुवाद कार्य को रूपांतरण के एक तरीके से कहीं आगे ले जाकर भाषाविकास की एक प्रक्रिया माना है। कहना न होगा कि इसके पहले भाषा विकास के संदर्भ में अनुवाद की भूमिका को अथवा उसके देय को नज़रअंदाज कर दिया गया था।

हिंदी में पहली बार अनुवाद समीक्षा और मूल्यांकन को प्रो. सिंह ने तरजीह दी। यहाँ भी उन्होंने तब तक उपलब्ध इस संकल्पना पर प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तकों और एकाध हिंदी पुस्तक की सैद्धांतिकी से किनारा करते हुए अंग्रेजी-हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेजी पाठों की समीक्षा के प्रारूप तैयार किए। उल्लेखनीय यह भी है कि उनके इस प्रारूप में कहीं ओट में हिंदी भाषा का इतिहास भी झाँकता है तो कहीं अंग्रेजी भाषासमाज की दुनिया को देखने वाली सीमित मानसिकता भी। ‘अनूदित पाठ में संप्रेषणीयता’ अथवा ‘अनूदित पाठ की संप्रेषणीयता’ यहाँ भी उनके लिए सर्वोपरि है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की समीक्षा शैली में अनुवादनीयता की परख संभवतः उन्होंने पहली बार की और इसी तरह ‘लाइट ऑफ एशिया’ के अनुवाद ‘बुद्धचरित’ की भी। इस दृष्टि से ‘गोदान’ के अंग्रेजी अनुवाद पर उनका जो विश्लेषण है उसमें डिस्कोर्स, शैली, समाज सांस्कृतिक पक्ष और लोकजीवन को तो केंद्र में रखा ही गया है; इस बहाने उन्होंने ‘साहित्यिक कृति भाषाबद्ध होती है’ इस कथन को भी बड़ी सहजता से हमारे सामने खोल दिया है। इस अध्ययन का प्रारंभिक हिस्सा अत्यंत विचारपुष्ट है जिसमें अनुवाद की चुनौतियों, अनुवादनीयता तथा अनुवाद समीक्षा/मूल्यांकन की तकनीक पर प्रो. सिंह ने अनूठा विमर्श किया है। इसका मूल्यांकन वाला पक्ष भी अत्यंत स्पष्ट और यह जतानेवाला है कि अनूदित पाठ की सीमाएँ लक्ष्य भाषा की सीमाएँ नहीं होतीं वे अनुवादक की सीमाएँ होती हैं।

अनुवाद विज्ञान को सामयिक संदर्भ देने का काम भी प्रो. सिंह ने बखूबी किया है। यह काम वे अपने लेखन में ही नहीं बल्कि संगोष्ठियाँ आयोजित करके, स्मारिकाएँ प्रकाशित करके भी एक लंबे अरसे से करते रहे हैं। उनके सुदीर्घ अनुभव और सतत वैचारिक मंथन से ही यह संभव हुआ कि साहित्येतर अनुवाद की इतनी व्यापक और संपूर्ण पीठिका हमारे सामने आ सकी। इस संदर्भ में उन्होंने साहित्येतर पाठ की अनुवाद समीक्षा का भी प्रारूप हमें दिया है। उल्लेखनीय है कि अनुवाद समीक्षा में भी वे संप्रेषण की भूमिका को भुलाते नहीं। इसके कारण ही उन्होंने व्यावसायिक अनुवाद तथा संचार क्रांति में अनुवाद की भूमिका जैसे अछूते विषयों पर भी अपनी लेखनी चलाई और अत्यंत उपयोगी संकेत हमें दिए हैं जिनके आधार पर हम इन दोनों ही दिशाओं में भारतीय भाषाओं की अनुवादनीय संभावनाओं और चाहें तो उनकी समस्याओं की भी परख कर सकते है। हिंदी पत्रकारिता की भाषा में अनुवाद को देखने के महत्वपूर्ण सूत्र भी वे हमारे सामने रख चुके हैं ; जरूरत इन्हें दिशा देने की है। बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता प्रो. सिंह की वैचारिकता का आधार रहे हैं। संभवतः इसीलिए उनका समाजभाषावैज्ञानिक भी, उनका शैलीवैज्ञानिक भी और साथ ही उनके भीतर का अनुवाद चिंतक भी चयन और संयोजन या एक ही शब्द में कहें तो समायोजन को जिस प्रकार देख पाता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। यह भी कह दिया जाए कि अनुवाद विज्ञान की सैद्धांतिकी में निविष्ट उन बिंदुओं में प्रो. सिंह की विषेष रुचि है जो स्रोत भाषा के संस्कारों को लक्ष्यभाषा के भीतर समाविष्ट करने की एक प्रक्रिया है, एक जरिया है और उनकी दृष्टि में यही संभवतः अनुवादक और अनुवाद कार्य दोनों का लक्ष्य है; और यदि नहीं है तो होना चाहिए।

भाषाविज्ञान/ हिंदी भाषा
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की सभी शाखाओं में पैठ रखने के साथ ही प्रो. दिलीप सिंह विवरणात्मक अथवा संरचनात्मक भाषाविज्ञान के भी सजग अध्येता हैं। उनकी यह पकड़ उनके पीछे उल्लिखित अवदानों से भी साफ झलकती है क्योंकि यह तो मानी हुई बात है कि जो व्यक्ति शुद्ध भाषविज्ञान में दीक्षित नहीं होगा वह उसकी सैद्धांतिकी का अनुप्रयोग कर पाने में भी समर्थ न हो सकेगा। भाषावैज्ञानिक परंपरा और उसके विकास के मद्देनज़र ही उन्होंने हिंदी भाषा को देखने का सर्वथा एक नया दृष्टिकोण हमें दिया। इस प्रकार के उनके लेखन से यह स्पष्ट भान हो जाता है कि वे न तो भाषाविज्ञान की रूढ़ियों का अनुकरण करने के पक्ष में हैं और न ही हिंदी भाषा को संस्कृत से अपभ्रंष और फिर खड़ीबोली आंदोलन से जोड़ते हुए उन्हीं-उन्हीं बातों को फिर-फिर दुहराने के, जो ‘हिंदी भाषा संरचना’ अथवा ‘हिंदी भाषा का इतिहास’ के नाम से अनेकानेक बार छापी जा चुकी हैं।

भाषाविज्ञान को उन्होंने एक प्रगतिगामी शास्त्र के रूप में स्वीकारा और प्रतिपादित किया है। इसीलिए वे अपने भाषावैज्ञानिक लेखन में भाषा प्रयोग की दिशाओं का संकेत करते हैं जिसमें उनकी दृष्टि भाषा संरचना और भाषा व्यवहार के परस्पर संबंधों से भाषाविज्ञान के उस ढांचे पर टिकी हुई है जिसे वे भाषा प्रयोग की दिशाओं में देखते हैं। यह उनका वैशिष्ट्य है कि भाषा संरचना के वास्तविक प्रयोग की सरणियाँ उन्होंने इस तरह तैयार की हैं कि भाषाविज्ञान का वह आधुनिक स्वरूप हमें दिखाई दे सका है जो इसके पहले दिखाई नहीं दिया था। बहुभाषिकता तथा कोडमिश्रण/ परिवर्तन की प्रक्रिया में भाषावैज्ञानिक चिंतनधारा उन्हें रुची है जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भाषावैज्ञानिक इकाइयों के ध्वन्यात्मक से लेकर वाक्यात्मक अवमिश्रणों को विश्लेषित कर दिखाया है। कहना न होगा कि इस भाषावैज्ञानिक विचार विमर्श में वे हिंदी भाषा को साथ लेकर चलना नहीं भूले हैं। यह देखा गया है कि भाषाविज्ञान पर बात करते समय सिद्धांत हावी हो जाते हैं। लेकिन प्रो. सिंह ने सिद्धांतों को महत्व देते हुए भी भाषाविज्ञान की उस सामयिक पृष्ठभूमि को महत्व दिया है जिसके कारण परंपरागत भाषाविज्ञान की अवधारणाएँ अब चुकी हुई मालूम पड़ने लगी हैं। इस संदर्भ में भाषिक इकाइयों के मानकीकरण के हवाले से भी उन्होंने भाषाविज्ञान का एक नया पाठ रचा है। इस विचार के अंतर्गत ही उनका यह मानना है कि मानक रूप समाज में प्रचलित अन्य रूपों में से एक विकल्प मात्र होता है। मानक मान लेने भी से अवमानक अथवा अमानक संरचनाओं का महत्व कम नहीं हो जाता। अतः भाषावैज्ञानिक अध्ययन में अब इन्हें भी सही जगह देने की जरूरत है। इसी धरातल पर भाषानियोजन के प्रश्न को भी प्रो. सिंह ने इस तरह देखा है कि यहाँ व्याकरणिक शुद्धता (जिसे कि अभी भी भाषा नियोजन का प्रमुख मुद्दा माना जाता है) की जगह पर भाषा समुदाय और उसके लोगों की प्रतिक्रिया को प्रमुख माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रो. सिंह उस आगे के भाषाविज्ञान के साथ हैं जो भाषा समुदाय और भाषा समूहों की मान्यताओं को जगह देता है। भाषा नियोजन में उनके चिंतन की धुरी फिशमैन रहे हैं इसीलिए फिशमैन के बहाने उन्होंने व्याकरण की समस्त इकाइयों, शब्द भेदों, ध्वन्यात्मक भेदों, वर्तनी संशोधन तथा पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की बात उठाई है जो परंपरागत भाषाविज्ञान के आमने-सामने रखकर देखने से अलग तो लगती ही है, यह भी पता देती है कि अब भाषाविज्ञान को विवरणात्मक ही न रहने देकर उस विवरणात्मकता को समय और समाज सापेक्ष बनाना जरूरी होगा।

भाषा नियोजन में पहली बार प्रो. सिंह ने उन संभावित संविन्यासों की चर्चा की है जहाँ भाषा का व्याकरण केवल इकाइयों में बँटा नहीं होता, उसकी परख उपरूपों के संदर्भ में की जाती है। उपरूपों की चर्चा से भी आगे बढ़कर प्रो. सिंह सूक्ष्म भाषाविज्ञान और प्रोक्तिविज्ञान तक का सफर तय करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि आधुनिक भाषाविज्ञान की उन अवधारणाओं को वे आज की किसी भी जीवंत भाषा के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण में प्रतिफलित होते देखना चाहते हैं जो वास्तव में भाषा संरचना का इकाईगत विवरण न होकर इनकी प्रकार्यता (फंकक्षनलिटी) को उजागर कर सके। इस ओर भी संकेत कर देना जरूरी है कि अपने भाषावैज्ञानिक चिंतन में प्रो. सिंह ने हिंदी भाषा को अथवा कहें उसकी संरचनात्मक इकाइयों को ही सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया है।

हिंदी भाषा की शक्ति को अथवा उसकी समृद्ध परंपरा को प्रकट करने की प्रो. सिंह की प्रणाली एकदम अलहदा है। वे शब्दों की बात करते हैं जिसमें शब्दविज्ञान की समस्त अवधारणाएँ आ मिली हैं तो वे केंद्र में रखते हैं डॉ. रघुवीर को। यह चर्चा वास्तव में डॉ. रघुवीर के बहाने हिंदी शब्दशास्त्र पर है। हिंदी व्याकरण पर भी उनका दृष्टिकोण कुछ ऐसा ही है। उन्होंने शुरू किया है हिंदी के व्याकरणों के परिचय से, और फिर इन व्याकरणों की कोटियाँ तैयार की हैं जो हिंदी के शैक्षिक व्याकरण पर पहुँच कर पूरी होती हैं। उनका यह विवेचन वास्तव में हिंदी का संक्षिप्त व्याकरणी भी है और इस ओर संकेत भी कि यदि आज हिंदी का कोई व्याकरण तैयार करना हो तो उसके अनिवार्य मुद्दे कौन कौन से होंगे। हिंदी के ढेरों व्याकरण हमें मिल जाते हैं लेकिन उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को समेटते हुए इस तरह का आकलन मिलना मुश्किल है।

प्रो. सिंह ने देवनागरी लिपि पर भी लिखा है, दक्खिनी हिंदी पर भी और हिंदी की विभिन्न प्रयुक्तियों पर भी। हिंदी भाषा के संदर्भ में ये तीनों पक्ष कितने महत्वपूर्ण हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है। इनमें भी प्रो. सिंह ने अपनी उस दृष्टि को सुरक्षित रखा है कि यह केवल चर्चा भर न बने बल्कि इनके भीतर से कभी हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता प्रकट हो, कभी उसकी क्षेत्रगत व्यापकता तो कभी आधुनिकता; और इन बातों को वे बार-बार रेखांकित भी करते चलते हैं ताकि हिंदी भाषा का वह सशक्त ढांचा नितांत भाषावैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया जा सके जो वास्तव में हिंदी भाषा की प्राणशक्ति है। हिंदी, उर्दू, प्रयोजनमूलक हिंदी, हिंदी की संवैधानिक स्थिति पर की गई उनकी टिप्पणियाँ आधुनिक भाषाविज्ञान की अवधारणाओं से पुष्ट हैं। ऐसा करने से विषय सिर्फ विचार बनकर नहीं रह जाते बल्कि इनके माध्यम से हिंदी का वह सामाजिक यथार्थ भी फूटफूटकर बाहर निकलता है जिसे निकाल कर प्रवाहित करना ही उनका लक्ष्य भी रहा है।

प्रयोजनमूलक भाषा एक लंबे अरसे से अकादमिक बहस का विषय रही है। अभी भी इसके बारे में सोच विचार की सही लीक नहीं बन पाई है। प्रो. सिंह ने प्रयोजनमूलक हिंदी पर विस्तीर्ण चर्चा की है। प्रयोजनमूलक भाषा, उस पर चर्चा के इतिहास और इससे संबंधित देश विदेश की चिंतनधारा को समेट कर उन्होंने उन सारी अनर्गल बहसों को विराम दिया है जो अभी तक घटाटोप की तरह छाई हुई थीं। हिंदी की प्रयोजनमूलक शैलियों पर उनका जो कार्य है वह अतुलनीय है अर्थात ऐसा करके वे कई कदम आगे बढ़ गए हैं। व्यावसायिक हिंदी, पत्रकारिता की हिंदी, साहित्य समीक्षा की हिंदी और यहाँ तक कि पाक विधि की हिंदी के स्वरूप और संरचनागत वैशिष्ट्य का जिस तरह उन्होंने आकलन और विश्लेषण किया है उसे निःसंकोच होकर हिंदी की प्रयोजनमूलक शैलियों के आगामी अध्ययनों के लिए पद्धतियों अथवा प्रविधियों का पुंज माना जा सकता है।

हिंदी भाषा पर बात करते समय जैसा कि उनके जैसे भाषाविद के लिए स्वाभाविक है, उन्होंने हिंदी के सर्वदेशीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों की भी खोज खबर ली है। यहाँ भी वे आकलन मात्र से संतोष नहीं करते बल्कि उन्हें भाषिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में उजागर करते हैं और यह दिखाने का यत्न करते हैं कि हिंदी भाषा का व्याकरणिक, व्यावहारिक और साहित्यिक स्वरूप इतना सघन और फिर भी सहज है कि उसकी व्याप्ति में किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती। हिंदी भाषा प्रो. सिंह के लिए एक ऐसी भाषा है जो एक भाषा के रूप में ही नहीं, भारत की अस्मिता के रूप में पहचानी और स्वीकार की जाती है।

प्रो. दिलीप सिंह का भाषावैज्ञानिक संश्लिष्ट है। उसके भीतर भाषाविज्ञान की पूरी परंपरा पिरोई हुई है। वह भाषा को सिर्फ एक व्यवस्था मानने को तैयार नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि इससे अधिक आवश्यक यह है कि भाषा को उसके प्रकार्य, उसकी संप्रेषणीयता, उसकी परिवर्तनशीलता, उसकी अभिव्यंजनात्मक बहुरूपता और उसकी सामाजिकता के संदर्भ में देखा जाए। इसीलिए वे भाषाविज्ञान की उन अवधारणाओं को फलीभूत करना चाहते हैं जिनसे भाषा अध्ययन का ही नहीं, भाषा अस्तित्व का भी पूरा का पूरा परिदृश्य बदल जाता है। प्रो. दिलीप सिंह का एक अवदान यह भी है कि उन्होंने भाषावैज्ञानिक लेखन की एक संप्रेषणीय परंपरा कायम की है। यह उनकी विचार प्रक्रिया की भी विशेषता है और उनके संपूर्ण लेखन की भी।
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- प्रो. ऋषभदेव शर्मा

[पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा], # 208 ए - सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013, ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

[व्याख्यान] 'सूं सां माणस गंध' पर प्रो. दिलीप सिंह





6/9/2013 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद में 
डॉ. ऋषभ देव शर्मा के छठे कविता-संग्रह 
''सूं सां माणस गंध'' का
 लोकार्पण करते हुए दिया गया 
वरिष्ठ साहित्य-भाषा-चिंतक प्रो. दिलीप सिंह का 
अत्यंत सारगर्भित दो-टूक वक्तव्य.

रविवार, 3 जून 2012

देहरी : ऋषभ देव शर्मा की 35 स्त्रीपक्षीय कविताएँ


देहरी [स्त्रीपक्षीय कविताएँ]
कवि : ऋषभ देव शर्मा
प्रकाशक : लेखनी, सरस्वती निवास, यू - ९, सुभाष पार्क,
नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली - 110059.
[फोन : 011-25333263/64]
संस्करण : 2011
मूल्य : 250 रुपए 

पुस्तक का ऑनलाइन लिंक : ''देहरी''
संवेदना यदि कविता का उत्स है तो ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ संवेदनापरक अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाएँगी. कुछ कविताओं में संवेदना की स्मृतिजन्य उपस्थिति में भावुकता भी दिखलाई पड़ती है. यह ख़ास इसलिए है कि भावुकता प्रकट करने वाली भाषिक अभिव्यंजना आज की कविता से क्रमशः दूर होती जा रही है. 

कहने को तो ये कविताएँ स्त्रीवादी कविताएँ हैं; और अपनी विषयवस्तु में हैं भी. लेकिन ये स्त्री के इर्द गिर्द आकर ही ठहर नहीं गई हैं. इनमें पारिवारिक संरचना के बदलते स्वरूप की परख है, सामाजिक ढाँचे और मूल्यों के विघटन की आवाज़ है. पुराकथाओं के जरिये पुरुष-स्त्री संबंधों की, और स्त्री की, यातनागाथा की अभिव्यक्ति जैसे घटक भी इस तरह मिलाए हुए हैं कि इनमें स्त्री एक अलग इकाई की तरह नहीं बल्कि धुरी की तरह चित्रित है गोकि उसकी शोषणक्रिया के अनुष्ठान कम ही बदल पाए हैं. कविताएँ इन्हें बदलना चाहती हैं. जो कविताएँ स्त्री की ओर से प्रथमपुरुष में लिखी गई हैं, उनमें बदलाव की यह तड़प अधिक मुखर है. 

स्त्री की अनेक छवियाँ इन कविताओं में उभरी हैं. आदिवासी से लेकर घर परिवार की, महानगरों की, गाँवों-कस्बों की स्त्रियों की - घुटन, भीतर भीतर पक रही अनपूरी चाहें जब उनकी ललकार और चुनौती में बदलती हैं तो यह अलग-अलग कविताओं का संग्रह प्रबंध काव्य का गठन पाता सा लगता है. 

कवि ने अनुभूत ही लिखा है इसलिए हर कविता सच्ची है. झूठ इनमें इतना ही है जितना आए बिना कोई अच्छी कविता बनती भी नहीं. 

'देहरी' संग्रह की कविताएँ देहरी के भीतर वाली स्त्री के अनेक रूपों का चित्र खींचती हैं और देहरी के बाहर निकल सकने की उसकी इच्छाओं और इसके बावज़ूद नागपाश की तरह जो सामजिक रूढ़ियाँ उसे जकड़े हुए हैं उन्हें तोड़ने की और देहरी के भीतर जाने और फिर बाहर न निकल पाने की एकतरफा आमद को इस संग्रह की कविताएँ दृढ़ता से नकारती हैं. (पुस्तक के फ्लैप पर प्रकाशित वक्तव्य).


                                                                                              
-प्रो. दिलीप सिंह
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,चेन्नै-600 017

यह पुस्तक पीडीएफ फॉर्मेट में निम्नलिखित लिंक पर  सहेजी गई है - 

शुक्रवार, 11 मई 2012

सिनेमा पर वाणी प्रकाशन की चार किताबें चेन्नई में लोकार्पित

लोकार्पण के अवसर पर - बाएँ से -
प्रो. निर्मला मौर्य, प्रो. एस.एस.कुशवाहा, प्रो. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. भारत भूषण,
 प्रो. जवरी मल पारख, प्रो.दिलीप सिंह, डॉ. राधे श्याम शुक्ल एवं सी.एन.वी. अन्नामलै.
२८ और २९ अप्रैल २०१२ को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के मद्रास स्थित मुख्यालय में आयोजित ''साहित्य, सिनेमा और समाज'' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में वाणी प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित सिनेमा केंद्रित ४ नई किताबों का लोकार्पण भी संपन्न हुआ - बालीवुड पाठ, ए टेक्सचुअल स्टडी ऑफ अपु ट्रिलोजी, पश्चिम और सिनेमा, वाल्ट डिज़्नी. [रिपोर्ट और बाकी फोटो समय मिलने पर].

शनिवार, 17 मार्च 2012

दक्षिण भारत में हिन्दी के अध्ययन–अध्यापन की समस्याओं पर राष्ट्रीय कार्यशाला


उद्घाटनकर्ता प्रो.दिलीप सिंह का स्वागत सत्कार 
 हैदराबाद, 17 मार्च, 2012.
(रिपोर्ट - डॉ. आलोक पाण्डेय)
हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय हैदराबाद विश्वविद्यालय द्वारा स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद और महेश बैंक, हैदराबाद के सहयोग से “ दक्षिण भारत में हिन्दी के अध्ययन–अध्यापन की समस्याएं ” पर आयोजित त्रि दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ( 14-16  मार्च) का समापन मुख्य अतिथि श्री रमेश कुमार बंग और प्रति कुलपति प्र. ई हरिबाबू द्वारा कल दिनांक 16 मार्च को संपन्न हुआ. श्री रमेश कुमार बंग जी ने इस कार्यशाला के सकुशल संपन्न होने पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए महेश बैंक के इस प्रकार के राष्ट्रीय महत्त्व के सरोकारों और अपने हिन्दी प्रेम से श्रोताओं को अवगत कराया.

संगोष्ठी निदेशक डा.आलोक पाण्डेय : उद्देश्य कथन 
६ सत्रों में विभाजित इस कार्यशाला का उदघाटन दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा चेन्नई के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह  और  मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. राम जी तिवारी ने संयुक्त रूप से मानविकी संकाय के डीन प्रो. मोहन जी रमनन की अध्यक्षता में १४ मार्च को किया था. इस कार्यक्रम में स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद की तरफ से डॉ विष्णु भगवान जी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे. ६ सत्रों में विभाजित इस कार्यशाला में पूरे देश से लगभग ६० विद्वतजनों - जिनमें चेन्नई से दिलीप सिंह और मधु धवन, रांची से ध्रुव तननानी, मुंबई से राम जी तिवारी, कांचीपुरम से नागेश्वर राव, अमरावती से ज्योति व्यास, गुलबर्गा से मैत्री ठाकुर हैदराबाद से एम वेंकटेश्वर ,  विष्णु भगवान् , टी मोहन सिंह, माणिक्य अम्बा , शीला मिश्र, शुभदा बांजपे, एफ एम सलीम, जे आत्मा राम,करण सिंह ऊटवाल, रहीम खां, हेमराज दिवाकर, रेखा रानी, जी नीरजा, मृत्युन्जय सिंह, गोरखनाथ तिवारी आदि अनेक विद्वानों, अध्यापकों और शोधार्थियों ने भाग लिया और अपने प्रपत्र पढ़े.  

दूसरे दिन का पहला सत्र : स्त्री सत्ता !

राष्ट्रीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए वरिष्ठ भाषावैज्ञानिक  प्रो. दिलीप सिंह ने दक्षिण भारत में स्कूल स्तर से हिन्दी की समस्या के निदान पर  बल दिया. बीज व्याख्यान  देते हुए प्रो राम जी तिवारी ने हिन्दी के प्राथमिक  शिक्षण को मजबूत करने की आवश्यकता बतायी. डॉ विष्णु भगवान ने भाषा की सम्पूर्ण जानकारी के अभाव में गलत अनुवाद की समस्या पर बल देते हुए कहा कि भाषा की समस्याओं को दूर कर के ही अच्छा अनुवादक बना जा सकता है . प्रो ऋषभदेव  शर्मा ने शिक्षकों की  जवाबदेही पर बात की. 

डा.पी.मानिक्याम्बा : वक्तव्य 




कार्यशाला के समापन सत्र में बोलते हुए प्रति कुलपति प्रो. ई . हरिबाबू  ने  त्रिभाषा  प्रणाली की उपयोगिता को रेखांकित किया . अंत में कार्यशाला के उपनिदेशक डॉ एम आन्ज्नेयुलू ने संगोष्ठी रपट प्रस्तुत की और कार्यशाला  के निदेशक  डॉ आलोक पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए, विशेष रूप से महेश बैंक के चेयरमैन रमेश कुमार बंग  और स्टेट बैंक हैदराबाद के डॉ विष्णु भगवान को, उनके बैंक की तरफ से आर्थिक  सहयोग  प्रदान करने के लिए विशेष धन्यवाद  दिया.

तीसरे दिन का पहला सत्र : प्रो.ऋषभ देव शर्मा की अध्यक्षीय टिप्पणी  

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता -3

स्वतंत्र वार्त्ता - 23 /10 /2011  

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता -2

स्वतंत्र वार्त्ता - 16/10/2011

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता -1

स्वतंत्र वार्त्ता -9 .10 .2011  

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ : प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ


- प्रो. दिलीप सिंह 



पिछले कुछ वर्षों से हिंदी क्षेत्र के कई स्वनामधन्य आधुनिक हिंदी के स्वघोषित स्तंभ जगह-जगह स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की प्रासंगिकता और उपादेयता पर प्रश्न खडे़ करने लगे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना कोई योगदान कभी नहीं दिया है। भारत के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठकर तथा हिंदी की समितियों में घुसपैठ करके ये अपने आप को हिंदी का स्वयंभू समझने लगे हैं। 

मुझे पूरा यकीन है कि इनमें से किसी को भी यह पता न होगा कि पूरे भारत में हिंदी की कितनी स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं या इनकी कितनी शाखाएँ देश के कोने-कोने में कहाँ-कहाँ, क्या-क्या काम कर रही हैं। वे यह भी न जानते होंगे कि हिंदी क्षेत्र के कौन-कौन से लोगों ने गांधी जी की प्रेरणा से दक्षिण, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में जाकर, वहाँ रह-बस कर हिंदी का कितना और कैसा काम किया है। इन्हें लगता है कि हिंदी साहित्य में विमर्शों की आवाजाही, आलोचकीय दृष्टिकोणों तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों पर ये जो बहसें करते आ रहे हैं उनकी शाश्वतता के आगे हिंदी भाषा को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रयत्न अनावश्यक हैं, अप्रासंगिक हैं - इनकी अब न तो कोई उपादेयता रह गई है और न ही ज़रूरत। 

उपयोगिता की चर्चा ; स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के लिए यूँ तो मुझे निरर्थक लगती है। पर संदेही मनों और हिंदी विरोधी (हिंदी भाषा को सिर्फ हिंदी भाषी क्षेत्र की वस्तु मानना निःसंदेह हिंदी की अखिल भारतीय अस्मिता का विरोध है) मानसिकता वाले दिलों में घर कर गए भ्रमों पर से परदा हटाने के लिए यह चर्चा बामानी भी लगती है। इस अफसोस, खेद और क्षोभ के साथ कि अपने ही देश में हमें स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता गिनाने की आवश्यकता भला क्यों पड़ रही है। उस देश में जिसकी ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी स्वतंत्रता पूर्व से मान्य और सम्मान्य रही है और जिसके माध्यम से राष्ट्र की भावात्मक और सांस्कृतिक एकता का सपना देखा गया था। और स्वतंत्रता के बाद जिसे राजभाषा की संवैधानिक मान्यता मिली हुई है और ये संस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 351 को अमली जामा पहनाने का काम अपने-अपने स्तर पर जी-जान लगाकर कर रही हैं। 

मैं अपनी सारी आधुनिक वैचारिकता के बावजूद यह मानता हूँ ; चाहे यह कुछ लोगों को निरी भावुकता ही क्यों न लगे कि ये संस्थाएँ हमारी धरोहर हैं, हमारी जातीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता की धरोहर। इस बात पर डॉ. धीरेंद्र वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. राम विलास शर्मा और इन संस्थाओं के साथ जुड़े अनेक भाषाविद् और हिंदी चिंतक अत्यंत तार्किक ढंग से मुहर लगा चुके हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों के अवसर पर प्रकाशित स्मारिकाओं में भी इन संस्थाओं की महती भूमिकाओं और ऐतिहासिक महत्व को बार-बार रेखांकित किया जाता रहा है। हिंदी की इन संस्थाओं का अपना प्रेरक इतिहास तो है ही, इनमें या इनके भीतर भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम पृष्ठ भी अंकित हैं। यदि हम इनकी सही परख करें तो यह साफ दिखाई देता है कि इन संस्थाओं ने इतिहास के साथ रहकर या जरूरत पड़ने पर उससे लड़-भिड़ कर भी अपना इतिहास बनाया है। कई बार इन्होंने इतिहास की वक्र दिशा को सीधी राह भी दिखाई है या कहें उसे सीधी राह पर लाई हैं। कहना न होगा कि इतिहास से यह मुठभेड़ ही इन संस्थाओं को राष्ट्रीय/स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनाती है। कई विद्वानों ने इस ओर संकेत किया है कि 1857 की लड़ाई में पराजय का मूल कारण यही था कि हमारे पास तब ‘एकता की भाषा’ का अभाव था। संपर्क भाषा के अभाव से भिन्न-भिन्न सूबों के बीच संप्रेषणीयता और संपर्क की कड़ी न जुड़ सकी सो उत्कट उत्साह और उदात्त बलिदानी तेवर के बावजूद हमें ब्रिटिश हुकूमत के सामने हार का मुँह देखना पड़ा। 1857 की इस पराजय के मूल कारण को गांधी जी समझ गए थे। अतः ‘राष्ट्रभाषा आंदोलन’ को उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में जगह दी। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की स्थापना की। और राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम इन्हें सौंप कर जीवन पर्यंत इनकी निगहबानी और सरपरस्ती करते रहे। गांधी जी की दूरदृष्टि का नतीजा हमारे सामने है। राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से एकजुट राष्ट्र के सामने ब्रिटिश साम्राज्य का कभी न डूबने वाला सूर्य (जैसा कि कहा जाता था) अस्ताचल में डूब गया। 

स्वतंत्रता के आंदोलन में खादी और स्वदेशी की तरह ही कौमी ज़बान की आवाज ने भी जन-जन को आंदोलित कर दिया था। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के इतिहास में यह सभी कुछ तफ़्सील से दर्ज है। इस तरह की संस्थाओं के लिए यह प्रश्न उठाना कि अब इनकी क्या जरूरत है, आज के प्रबुद्ध वर्ग के दिमागी दिवालियेपन की निशानी ही माना जाएगा। 

राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उत्थान और सामाजिक जागरण आज भी राष्ट्रीय स्तर पर ज्वलंत मुद्दे हैं। इनकी सिद्धि में हिंदी भाषा की भूमिका अब और भी प्रबल बन कर उभर रही है। इन बातों को दुहराने की जरूरत नहीं है। बस इतना ही कहना है कि इन तीनेां के लिए जितना प्रयास और संघर्ष ; अनेकानेक प्रकार की कठिनाइयों और अड़चनों के रहते हुए भी; इन संस्थाओं ने किया है - इनकी संभाल की है - इन्हें संभव बनाया है, उसकी कोई और मिसाल नहीं दी जा सकती। किसी संस्थागत ढाँचे का आदर्श स्वरूप उसके राष्ट्रीय, वैश्विक और प्रगतिशील दृष्टिकोण के मद्देनजर ही रचा और परखा जाता है। स्वतत्रंता के पहले यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय, भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता को केंद्र में रख कर विकास पा रहा था और आज उसके दृष्टिकोण भारतीय संविधान की उद्देशिका (प्रिएंबल) में निहित ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ वाले सूत्र से प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं। इन संस्थाओं पर आक्षेप करने वाले चाहे संविधान के भाग 4 क में उल्लिखित नागरिक कर्तव्यों को बिसरा चुके हों पर ये संस्थाएँ इन दस कर्तव्यों में से तीन (ख, ग, च) का पालन इन्हें अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मान कर करती चली आ रही हैं - 

(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे ; 

(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे ; 

(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परीक्षण करे। 

कहना यह है कि भारतीय भाषाओं की अस्मिता को राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए, भारत की सामासिक संस्कृति को भाषायी एकता के लिए तथा राष्ट्रीय आंदोलन की गांधीवादी चेतना को भारतीय मूल्यों के प्रसार के लिए अपने भीतर आत्मसात कर लिया है, इन संस्थाओं ने। राष्ट्रीय अखंडता, सामासिक संस्कृति का अनुरक्षण, भाषायी एकता, गांधीवादी चिंतन, भारतीय मूल्य आदि इनके लिए फैशन या नारेबाजी के विषय नहीं है, ये सभी इन संस्थाओं के व्यक्तित्व, इनकी प्रकृति में जज़्ब तत्व हैं। इन संस्थाओं के प्राण-तत्व हैं। यहाँ एक दृष्टांत पर्याप्त होगा कि हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी के द्वंद्व के, जो बेशक उपनिवेशवादी विकृत मस्तिष्क के षड्यंत्र का नतीजा था, इन संस्थाओं ने ही समाधान ढूँढ़े और निकाले। 

इसमें कोई संदेह नहीं और यह आलोचना अथवा शर्मिंदगी का बायस नहीं कि हिंदी संस्थाओं के लक्ष्य और उद्देश्य दोनों ही कहीं-न-कहीं भावनाओं से प्रेरित रहे हैं। यह स्वाभाविक है क्योंकि भाषा, समाज और संस्कृति के प्रश्न स्वतः ही भावना से आ जुड़ते हैं। हिंदी भाषा - यह तो भावनाओं के उद्वेलन के हमेशा केंद्र में रही है। अपनी जोड़ने की मूल प्रकृति के बावजूद यह तोड़ने का साधन भी बनाई जाती रही है। मैंने अभी हिंदी-उर्दू द्वंद्व की बात की। इसी तरह ब्रज बनाम खड़ी बोली हिंदी, भारतीय भाषाएँ बनाम हिंदी और हिंदी बनाम अंग्रेजी का द्वंद्व खड़ा करके और आम जन की भावनाओं को भड़का कर हिंदी भाषा के स्वाभाविक विकास को कितने आघात लगे, लिखने-बताने की आवश्यकता नहीं है। यदि कहना ही चाहें तो हिंदी अस्मिता चोटिल हुई, कई भारतीय भाषाएँ अकारण हिंदी के विरोध में खड़ी दिखाई देने लगीं, देश बँट गया, ‘हिंदी न लादो’ आंदोलन हिंसक तांडव करने लगा। कहना न होगा कि हिंदी की पहचान को कायम रखने का, बँटवारे के दर्द को बाँटने का और हिंदी विरोधी आंदोलनों को क्रमश: हिंदी सौहार्द में बदलने का काम भी इन्हीं हिंदी संस्थाओं ने किया है, और आज भी कर रही हैं। 

इस चर्चा के बाद भी यदि कोई ‘बुद्धि संपन्न’ व्यक्ति इन संस्थाओं की उपयोगिता या प्रासंगिकता पर प्रश्न-चिह्न लगाता है तो उससे यह पूछना पड़ेगा कि ये प्रश्न तो तभी उठ सकते हैं जब कोई व्यक्ति या संस्था जनता या राष्ट्र के लिए अनुपयोगी या अप्रासंगिक सिद्ध हो चुकी हो। फिर प्रतिप्रश्न यह भी उठता है कि किस दृष्टि से उपयोगी-अनुपयोगी। किस नजरिए से प्रासंगिक-अप्रासंगिक। जनहित और राष्ट्रहित जिन संस्थाओं का आदर्श हो तथा भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान की परंपरा को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता की स्थापना जिनका लक्ष्य - उनके लिए हर तरह के प्रश्नचिह्न बचकाने और बे-खयाल ज़हन का ही परिणाम माने जाएंगे। वैसे क्या कहा जाय। हम सभी जान-देख-सुन और पढ़ रहे हैं कि तुलसी और प्रेमचंद ही नहीं, कुछ समय से महात्मा गांधी की प्रासंगिकता पर चर्चा करने को भी प्रबुद्धजनों की एक बड़ी जमात लालायित दिखाई देने लगी है। 

हिंदी भले ही अखिल भारतीय भाषा न हो या न मानी जाय। कोई चाहे तो उसे भारत की प्रमुख संपर्क भाषा भी न माने। एक वर्ग विशेष अपने हठ के चलते चाहे अंग्रेजी को भारत की संपर्क भाषा मनवाने पर तुला हो। पर अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी भाषा के सर्वाधिक प्रचलन से कोई इनकार नहीं कर सकता। नकारा इस तथ्य को भी नहीं जा सकता कि भारत की प्रमुख भाषा के रूप में ही वैश्विक स्तर पर हिंदी के पठन-पाठन को महत्व दिया जा रहा है। हिंदी के प्रचलन में मीडिया और हिंदी फिल्मों के योगदान का जिक्र तो हम बढ़-चढ़ कर करते हैं पर हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं का इस संदर्भ में कोई नाम भी नहीं लेता; लेना चाहिए। और स-तर्क लेना चाहिए। इसमें क्या संदेह कि हिंदीतर भाषा भाषी क्षेत्रों में हिंदी को सहेजने तथा इसके प्रचार-प्रसार का कार्य ये संस्थाएँ बरसों से कर रही हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन की पहल करने में भी हिंदी की एक स्वैच्छिक संस्था ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ आगे आई। मैं अपनी संस्था की बात करूँ तो देश-विदेश के शोध-छात्र हमसे संपर्क करने आते हें। हमारे पुस्तकालय का उपयोग करते हैं। हमारे पदाधिकारियों - अध्यापकों से बातचीत रिकार्ड करते हैं। कुछ ही माह पहले जर्मनी से एक शोध-छात्रा चेन्नई आई थी। वह गांधी चिंतन पर काम करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के जरिए हिंदी आंदोलन के राजनैतिक पहलुओं की पड़ताल करना चाहती थी। वह छात्रा जर्मनी से हिंदी सीख कर भारत आई थी। उसके पास सभा से संबंधित ढेरों जानकारियाँ थीं। हमारी प्रकाशित सामग्री देख कर वह हतप्रभ हो गई थी। यहाँ भारत में किसे पड़ी है कि वह हमारी पत्रिकाएँ पढ़े। किसकी रुचि हमारी पत्रिकाओं की पुरानी फाइलों में है। कितने लोगों ने देखी होंगी हमारी रजत जयंती, स्वर्ण जयंती और हीरक जयंती के अवसर पर प्रकाशित स्मारिकाएँ। वास्तव में यही वे लोग हैं जिनके मन में हिंदी की इन संस्थाओं को लेकर गुबार उठते रहते हैं। 
अब मैं बात दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की करना चाहूँगा क्योंकि तीस वर्षों से मैं इस संस्था के विभिन्न पदों पर सेवा करता आ रहा हूँ। मेरे देखते-देखते दक्षिण भारत में इस संस्था का प्रसार कई गुना बढ़ा है। हिंदी पढ़ने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह संख्या लाखों में पहुँच चुकी है। स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन मिला है। बच्चे-किशोर हिंदी पढ़ने में रुचि दिखा रहे हैं। हिंदी शिक्षण के द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने सर्व-शिक्षा की धारणा को पुष्ट किया है। हिंदी के माध्यम से भारत की छवि प्रतिबिंबित करने में सभा की पाठ्यपुस्तकों ने मानदंड स्थापित किया है। सभा के प्रकाशन भारतीय भाषाओं के आपसी तालमेल और परस्पर अनुवाद की परंपरा को साक्षात करने वाले हैं। 1964 में स्थापित सभा का विश्वविद्यालय विभाग (उच्च शिक्षा और शोध संस्थान) अपनी नवोन्मेषी दृष्टि के कारण सराहना का पात्र बना है। रोजगारपरक (प्रयोजनमूलक) हिंदी के पाठ्यक्रमों को इसने सबसे पहले एम.ए. स्तर पर प्रारंभ किया। शोध कार्य को नई दिशा दी – व्यतिरेकी भाषा अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य, अनुवाद: समीक्षा और मूल्यांकन, हिंदी भाषा का समाजभाषिक - शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर शोध कार्य करवा कर संस्थान ने दक्षिण भारत में अपनी अलग पहचान बनाई है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा आधुनिक प्रौद्योगिकी का सही इस्तेमाल करके अपनी कार्य प्रणाली को सक्षम बनाने में भी पीछे नहीं रही है। और सबसे बड़ी बात यह कि इस संस्था ने शिक्षा के भारतीय स्वरूप को सुरक्षित रखा है। और इससे भी बड़ी बात यह कि यहाँ हिंदी शिक्षण ने जाति-धर्म, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष का भेद मिटा दिया है। सभा के कार्यकर्ताओं में और विद्यार्थियों में भी स्त्रियों की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है। गांधी जी राष्ट्रभाषा हिंदी के महत्व की बात करते समय दक्षिण भारत की स्त्रियों से हिंदी सीखने की विषेष अपील किया करते थे। उनका मानना था कि यदि एक महिला हिंदी सीखेगी तो उसका पूरा परिवार हिंदी के निकट आएगा। लगता है गांधी जी की अपील आज भी दक्षिण भारत की महिलाओं को, लड़कियों को कहीं से प्रेरित करती आ रही है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के महत् कार्य की बात करते समय यह कहना जरूरी लगता है कि इसने उत्तर-दक्षिण के बीच एक मज़बूत सेतु निर्माण का बीड़ा उठा रखा है। यह संस्था दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार का जितना और जैसा काम कर रही है वह निश्चित ही कई सरकारी हिंदी संस्थाएँ मिल कर भी नहीं कर सकतीं। 

कमोबेश हिंदी की सभी संस्थाएँ, खासकर हिंदीतर क्षेत्रों में ; इसी तरह राष्ट्रीय हित में काम कर रही हैं - भाषाओं को जोड़ने का, लोगों को जोड़ने का, देश को जोड़ने का। पर आँखों में खून के आँसू आ जाते हैं इनकी आर्थिक विपन्नता देख कर। आर्थिक सहायता के नाम पर सरकार कुछ ठीकरे इनके सामने फेंक देती है। क्या आप विश्वास करेंगे कि जो हिंदी अध्यापक (प्रचारक) गाँव-गाँव में हिंदी शिक्षण की अलख जगाता है उसे एक हजार रुपये माहवार दिए जाते हैं। जो कार्यकर्ता रात-दिन काम करते हैं, उनका वेतन भी कुछ हज़ार से ज़्यादा नहीं है। जिस विश्वविद्यालय विभाग की चर्चा की गई उसके प्राध्यापकों के लिए आठ हजार, रीडर के लिए बारह हजार और प्रोफेसर के लिए सोलह हजार का अनुदान भारत सरकार प्रदान करती है। इस प्रकार की विपन्नता की स्थिति में भी हिंदी भाषा के लिए विस्तीर्ण कार्य दक्षिण भारत में किया जा रहा है। क्यों उपेक्षा की जा रही है, समझ में नहीं आता। आप देखिए कि कुछ ही बरसों पहले पनपी अन्य हिंदी संस्थाओं और हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को किस तरह सर आंखों पर बैठाए हुए है सरकार। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की दयनीय दशा देख कर कभी-कभी यह सोचने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है कि हिंदीतर भाषाभाषी प्रांतों में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार और विकास करने का बीड़ा उठाने की सज़ा तो इन संस्थाओं को नहीं दी जा रही है! इन संस्थाओं की ओर सभी पीठ फेरे बैठे हैं। चाहे वे हिंदी के पुरोधा हों, चाहे साहित्य-संस्कृति के अलमबरदार या फिर राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि। 

आफ़रीन है इन संस्थाओं को और इनके कार्यकर्ताओं को जो अपनी धुन में हिंदी के लिए निछावर होने का व्रत साधे हुए हैं। जिन्हें आँधी, पानी की कोई परवाह नहीं। गांधी का नाम इनकी ज़बान पर है और बापू के सपने इनकी आँखों में। ये संस्थाएँ धनधान्य में खेलने की न तो इच्छा रखती हैं और न ही इसके लिए हाथ-पैर पटकती हैं। ये अपनी दाल-रोटी में खुश हैं। इन्हें रंज अपनी उपेक्षा का है। जिन्हें देश भर की भरपूर सराहना मिलनी चाहिए थी वे संस्थाएँ तानों और शिकायतों का सामना कर रही हैं। पिछड़ा मान कर इनकी अवहेलना की जा रही है। निश्चित ही बाहरी चमक-दमक का इन संस्थाओं में अभाव है। यहाँ न तो चमचमाते भवन हैं और न ही पाँच सितारा होटलनुमा अतिथि गृह। गांधी की सादगी इनकी आत्मा में बसी है। ये अपना श्रम जानती हैं। श्रम का मूल्य पहचानती हैं। पकी फसल खाने की इनकी आदत नहीं है। इन्होंने हिंदी की ज़मीन गोड़ी और रोपी है कि फसल आने वाली पीढ़ियों को मिल सके। पर अफ़सोस कि इनके कार्यकर्ताओं के पेट जल रहे हैं। 

जो आधुनिक हैं, ‘हिंदी-सेवा’ कर के संपन्न हैं, देश-विदेश में जिन्होंने हिंदी की दुकानें खोल रखी हैं, उनके लिए ये संस्थाएँ दरिद्र हिंदी प्रचारकों की एक भटकी हुई जमात से अधिक कुछ नहीं। ये जब कभी कृपा कर के हमारी संस्थाओं में आते हैं तो इन्हें गांधी के चित्र से, ‘वर दे’ गाने से, दीप-प्रज्वलन से, स्वागत-सम्मान से वितृष्णा होती है कि आज के उत्तर-आधुनिक युग में भी हिंदी के कार्यक्रमों में आप लोग यह सब क्यों करते हैं। इन हार्दिक शिष्टाचारों को वे हमारा पिछड़ापन मानते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि हमारी संस्था में उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श पर ही नहीं, भाषा और भाषाविज्ञान, अनुवाद चिंतन, दूरस्थ शिक्षा के उन अनेक पहलुओं पर गोष्ठियाँ और कार्यशालाएँ होती रहती हैं जिनका नाम भी शायद उन्होंने न सुना होगा। हिंदी की इन संस्थाओं ने आधुनिकता की अंधेरी गलियों में अनंत भटकन के समानांतर एक प्रकाशमान रास्ते का विकल्प हमें दे रखा है। इस रास्ते पर हमारे साथ बहुत ही थोड़े-से लोग चलने को उद्यत होते हैं। बाकी तो इसे एक दिशाहीन, गंतव्यहीन पगडंडी मान कर अपनी गलियों के अंधेरों में ही मगन हैं। 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ हिंदीतर राज्यों में द्वितीय भाषा हिंदी के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 को पोसने वाली अमृत बूँदें हैं। इनके अपने प्रेस हैं। मासिक हिंदी पत्रिकाएँ हैं। ढेरों प्रकाशन हैं। छोटे-छोटे केंद्रों पर भी हिंदी पुस्तकालय हैं। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास में ‘राष्ट्रीय हिंदी पुस्तकालय’ है जहाँ दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों के हिंदी शोध छात्रों का तांता लगा रहता है। ये संस्थाएँ प्रौढ़ शिक्षा का बड़ा केंद्र हैं। हिंदी परीक्षाओं के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है। हिंदी भाषा के माध्यम से ज्ञान-साहित्य का प्रणयन और प्रसार दक्षिण भारत में देख कर प्रारंभ में मैं भी चकित रह गया था। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास दक्षिण की भाषाओं के वाङ्मय धरोहर का संपादन-प्रकाशन करने में तथा अनूदित सामग्री प्रकाशित करने में अग्रणी है। कोश-कार्य भी स्तरीय हुए हैं - खासकर त्रिभाषा और बहुभाषा कोष। अनुवाद अध्ययन को हम विशेष महत्व दे रहे हैं, अनुवाद करने वालों को भी। हिंदी व्याकरण लेखन और भाषाविज्ञान पर पुस्तकें तैयार करने की आवश्यकता को हमारी सभा शुरू से पहचानती आ रही है। पूरे दक्षिण भारत में इन व्याकरणों को सम्मान मिला है - इनका खूब उपयोग किया जा रहा है। दक्षिण भारत के हिंदी सेवी मुझ जैसे हिंदी भाषियों से जब यह प्रश्न करते हैं कि आप लोग दक्षिण भारत की भाषाएँ सीख कर उनके वाङ्मय का हिंदी में अनुवाद क्यों नहीं करते? या कि हिंदी व्याकरण की तनिक भी जानकारी हासिल करने का प्रयत्न हिंदी मातृभाषाभाषी क्यों नहीं करते? तो बगलें झांकने के सिवा हम कुछ नहीं कर पाते। ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झांकते नजर आएँगे। 

समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता। आधुनिकता, इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि इस शब्द के आज कई भिन्नार्थ (शेड्स) या कहें अनेक प्रत्याख्यान (इंटरप्रेटेशन) तैयार किए जा चुके हैं। नव्यता कई स्तरों पर और कई तरह की चाहिए होगी। इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। नव्यता के स्तर हैं: 

(1) भाषा, साहित्य, शिक्षण पद्धतियों, शिक्षण सामग्री आदि को अकादमिक विकास के परिप्रेक्ष्य में नए और ताज़े की ओर ले जाने वाले दृष्टिकोण या एप्रोच की नव्यता ; 

(2) हिंदी के द्वितीय भाषा उपभोक्ता की एक सीमा-सी बाँध दी गई है। इस सीमा को तोड़ते हुए हिंदी भाषा की सामयिक भूमिका को पहचान करते हुए ‘बोलचाल की हिंदी’, ‘व्यावहारिक हिंदी’, ‘मीडिया की हिंदी’ जैसे अल्पकालिक कार्यक्रमों अथवा दक्षिण भारतीय भाषाओं के ‘सम्प्रेषणपरक भाषा’ कार्यक्रमों को अधुनातन भाषा शिक्षण प्रविधियों के अनुसार विकसित करने की नव्यता ; 

(3) नवोन्मेषी तथा सतत विकासशील (आधुनिकीकृत) भाषा के रूप में विज्ञापन, बाजार, फैशन, नए उत्पाद, पाक कला में प्रयुक्त हिंदी प्रयुक्तियों (रजिस्टरों) के विश्लेषण तथा उन्हें पाठ्यक्रमों में स्थान देने की नव्यता ; 

(4) पाठ्यक्रमों में सामयिक, आधुनिक और वैश्विक संदर्भों को स्थान देने की नव्यता ; 

(5) प्रवेश प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन आदि को वेब-साइट के माध्यम से पारदर्शी बनाने की नव्यता ; 
(6) सभी स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बीच परस्पर विचार-विमर्श की अनिवार्यता है। ‘अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ’ के होते हुए भी इन संस्थाओं के बीच अकादमिक अथवा कार्यक्रम केंद्रित सामूहिक बहस, आदान-प्रदान और सहयोग का नितांत अभाव है। नतीजतन हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार एवं विश्व में चल रहे हिंदी कार्यक्रमों को इन संस्थाओं द्वारा मिल सकने वाली अपेक्षित मदद/सहयोग के लिए उपयोगी योजना नहीं बन पा रही है। और इस तरह ‘विश्व में हिंदी’ का ढाँचा, उसकी आवश्यकताओं तथा भारतीय परिवेश में इनकी प्रासंगिकता को नया रूप-संदर्भ दे पाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। 

(7) हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर नवीन दृष्टि से पुस्तकें तैयार करना भी इन संस्थाओं का दायित्व है जिसका निर्वाह उन्होंने अपनी स्थापना के साथ ही करना प्रारंभ कर दिया था। कहना न होगा कि इन प्रकाशनों ने हिंदी संबंधी तत्कालीन ज़रूरतों की पूर्ति ही नहीं की, मापदंड भी रचे। पर पिछले कुछ दशकों से यह काम थोड़ा शिथिल पड़ा है। आज यदि ये संस्थाएँ निम्नलिखित दिशा में अपनी रचनाधर्मिता प्रदर्शित कर सकें तो निश्चित ही वे हिंदी भाषा और साहित्य के लिए गंभीर काम कर सकेंगी क्योंकि अनावश्यक बहसों और विमर्शों ने इन गंभीर दायित्वों से हिंदी जगत को छिटका रखा है - 

(क) व्यावहारिक/संप्रेषणपरक हिंदी व्याकरण लेखन (पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया और समाजी हिंदी डाटा पर आधारित) 

(ख) वार्तालाप केंद्रित हिंदी का ‘डिस्कोर्स ग्रामर’ लेखन (साहित्यिक कथा-पाठों पर आधारित) 

(ग) ‘हिंदी साहित्य का समेकित इतिहास’ लेखन (जिसमें हिंदीतर क्षेत्रों में मौलिक हिंदी लेखन तथा अनूदित साहित्य का विशेष बल देते हुए समावेश हो) 

(घ) हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं का इतिहास लेखन (मात्र स्थापना, कार्य एवं प्रकाशन आदि का विवरण या आंकड़ा ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन, स्वतंत्रता आंदोलन और साहित्यिक धाराओं के बदलाव में इनकी भूमिका का रेखांकन) 

(च) हिंदी भाषा विकास को केंद्रीयता प्रदान करते हुए हिंदी का साहित्येतिहास लेखन 

(छ) हिंदी वैयाकरणों के योगदान पर लेखन (जिसमें भिन्न भारतीय भाषाभाषियों तथा विदेशी वैयाकरणों के योगदान पर भी विश्लेषणात्मक टिप्पणी हो) 

(ज) हिंदी भाषाविज्ञान की परंपरा के बहाने हिंदी भाषा की संरचना पर किए गए विवेचनों पर तुलनात्मक लेखन। 

निश्चित ही स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ इस ऐतिहासिक महत्व के लेखन को संभव बना सकती हैं। इन संस्थाओं के प्रबुद्ध हिंदी सेवी तथा भारत-भर के हिंदीतर क्षेत्रों में कार्य करने वाले ‘रिसोर्स पर्सन्स’ के सहयोग से ये काम योजनाबद्ध और समयबद्ध ढंग से करके हिंदी भाषा के अद्यतन स्वरूप और पुरोधाओं के योगदान को हिंदी जगत के समक्ष रखा जा सकता है और पिछड़ा, पुराना-धुराना, रूढ़िवादी होने का जो आरोप तथाकथित प्रबुद्धजन हमारी संस्थाओं पर लगाते रहते हैं, उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर आगे के इतिहास में इन संस्थाओं का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया जा सकता है। संदेही मानसिकता वालों को यह लग सकता है कि स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बस का नहीं है कि वे इन कामों को अंजाम दे सकें। पर हम जैसे लोग जो दक्षिण भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित हिंदी संस्था में काम कर रहे हैं, इनकी क्षमता को पहचानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास ने जिन दिशाओं की ओर बढ़ने का साहस दिखाया है और असंभव-से लगने वाले काम कर दिखाए हैं, वह उनकी क्षमता, दक्षता, लगन और उत्साह का स्वतः प्रमाण है। 

हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं की सीमाएँ और कमियाँ भी हैं। एक तो इन्हें सामान्य नियम मानकर अनदेखा भी किया जा सकता है। पर यह प्रवृत्ति ठीक नहीं कि ‘ऐसा तो सभी संस्थाओं या संगठनों में होता है’ कहकर अपना दामन बचा लिया जाय। यदि बड़े-बड़े दायित्वों को हमें अंजाम देना है तो अपनी इन कमियों पर भी हमें आलोचनात्मक और कड़ी दृष्टि रखनी होगी. इन्हें दूर करने के हरसंभव और त्वरित उपाय भी करने होंगे। इस बात को स्वीकारने में कोई संशय नहीं है कि ये संस्थाएँ अपनी-अपनी तरह से हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं पर इनकी गति अपेक्षाकृत धीमी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसे प्रचार माध्यमों से लोगों तक पहुँचाने के प्रति भी हम अधिकतर उदासीन ही दिखाई देते हैं। 

हम जगाने-चेताने वाली भाषा की प्रतिनिधि संस्थाएँ हैं, पर हममें ऊर्जा की कमी है। हमने ढर्रे पर चलने को और लीक न तोड़ने की प्रवृत्ति को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। हम नए बनना चाहते हैं, पर हिचकते हुए। ‘हम हिंदी जैसी दरिद्र भाषा की बेचारी संस्थाएँ हैं’ - यह हीन ग्रंथि हमारे कार्यकर्ताओं को भी ग्रसे हुए है। हिंदी को ‘मातृभाषा-अन्य भाषा’ के घेरे से बाहर खींच कर उसे ‘भारतीय भाषा’ कहने, मानने और बनाने की आवाज उठाने में हम संकोच करने लगे हैं। हमारी रगों में हिंदी है लेकिन हमारी आत्मा हिंदी में नहीं है। हिंदी या मातृभाषाओं को पीछे ढकेलने वाले रथों के चक्र को पीछे ढकेलने की जगह हम बस हाथ उठा-उठा कर चिल्ला रहे हैं कि देखो-देखो वे रथ को चढ़ाए आ रहे हैं - चाहे वह अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का रथ हो, चाहे हिंदी-विरोध का, चाहे प्रशासनिक स्तर पर भारतीय भाषाओं की अवहेलना का या चाहे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को येन केन प्रकारेण झुठलाने और चुनौती देने का। लगता है कि हमारी जुझारू वृत्ति चुकती-सी जा रही है। इसकी जगह आपसी टकराव की प्रवृत्ति में इजाफा हो रहा है। हिंदी संस्थाएँ एक दूसरे से अलग-थलग रह कर ‘अपनी ढपली अपना राग’ की कहावत को चरितार्थ करने लगी हैं। हम एक जुट हो कर साथ-साथ क्यों नहीं चल सकते? इस अलगाव की वजह से न जाने कितनी कमियाँ आ सिमटी हैं हमारे भीतर. इन सबसे छूटे बिना निस्तार नहीं। हम मिल कर प्रोजेक्ट करें जो भी हमने किया है, या कर रहे हैं तो सही मायनों में अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी के गौरव और उसे मिलने वाले सम्मान का स्वतः ही प्रोजेक्शन होगा। फिर कोई भी हमारी ‘पहचान’ को चैलेंज करने का साहस नहीं कर सकेगा। 

हमने बरसों-बरस हिंदीतर भाषी ज़मीन पर हिंदी का पौधा रोपा है। अपनी दीवानगी का खाद-पानी दे कर हमारे पूर्वजों ने इसे सींचा है। क्या इस लहलहा रहे पौधे को हम यों ही सेंत में मुर्झाने देंगे। कदापि नहीं। सीमाएँ कोई ऐसी विकट नहीं हैं जिनसे पार न पाया जा सके। हम इनसे टकराने की शपथ ले लें तो ये कहाँ टिक पाएँगी। संकटों का सामना करने और डट कर संघर्ष करने का इतिहास गवाह है कि ये संस्थाएँ जनता की संपत्ति हैं, धरोहर हैं। उनके प्रेम ने, गांधी और हिंदी में उनके विश्वास ने हिंदी भाषा को ‘हिंदी क्षेत्र’ की सीमा से बाहर निकाल कर सुदूर क्षेत्रों के गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है। हिंदीतर भाषाभाषी आमजन जब हमारे साथ हैं, इन संस्थाओं में उनका विश्वास है, हज़ारो-लाखों की संख्या में जो हिंदी सीखने, हिंदी का काम करने के लिए हमसे जुड़ने को आतुर हैं तब चिंता किस बात की है। 

हाँ, अब वह भी कह देना चाहिए जिसकी वजह से मेरा मन उद्वेलित हुआ। मैं जानता हूँ कि मेरी लेखन-शैली इतनी आक्रामक पहले कभी नहीं हुई है। पर मजबूर हूँ। बहरों को सुनाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोलना पड़ा। संयम फिर भी बरता गया है। कुछ ही माह पहले हिंदी के एक स्वनामधन्य मठाधीश दक्षिण भारत की किसी हिंदी संस्था में अपने ‘पधारने’ का किस्सा सुनाते हुए मुँह बिचका कर कह रहे थे - ‘कैसी हैं ये संस्थाएँ। न ढंग की बिल्डिंग, न कैंपस। छोटे-छोटे कमरे, स्कूली बरामदे, हुँह।’ फिर मुझसे पूछा ‘क्या आपके यहाँ का भी यही हाल है?’ मेरे जवाब की परवाह किए बिना अपनी ही रौ में कटाक्ष-भाव से शातिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले - ‘चलते समय उस संस्था के अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि आपको कैसा लगा तो मैंने कह दिया कि मुझे तो यही लगा कि ऐसी हिंदी संस्थाओं को आग लगा देनी चाहिए। आज हिंदी कहाँ की कहाँ पहुँच गई है फिर जरूरत क्या है इस प्रचार-फ्रचार की।’ मैंने अब अपनी बात कही संक्षेप में, वही सब जो इस लेख में लिखा है। पर वे तो ठाने हुए थे और हिंदी का भाग्यविधाता होने के अहं में चूर थे। अपनी इस खामखयाली से भी वे पूरी तरह मुतमइन थे कि आज नहीं तो कल ये संस्थाएँ अपनी मौत आप मरेंगी। इन्हें तो खत्म होना ही है। बकने दीजिए उन्हें जो ठीक से हमें जानते भी नहीं। ऐसे अनजानों के प्रलाप पर हम कान भी क्यों धरें। इनकी ओर उपेक्षा भरी नज़रों से देखते हुए गालिब की तरह यही कहेंगे और हमें मिटता देखने की इनकी तमन्ना पर हम भी कटाक्ष करेंगे कि - 

सुना था परखचे गालिब के कल उड़ेंगे मगर
देखने हम भी गए थे प ’ तमाशा न हुआ।

[लेखक प्रतिष्ठित हिंदी भाषा-विज्ञानी, शिक्षाविद् एवं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव हैं........और भाषाविज्ञान/ समाज-भाषाविज्ञान के मेरे गुरु भी.... Posted  to "हिन्दी भारत" By - (डॉ.) कविता वाचक्नवी]

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