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गुरुवार, 15 जून 2017

भारतीय संस्कृति : आज की चुनौतियाँ

भारतीय संस्कृति भारतवर्ष में बसे हुए विभिन्न मानव समुदायों की हजारों वर्षों की उस साधना का परिणाम है जो उन्होंने जीवन को उत्कृष्ट, उदात्त और श्रेष्ठ बनाने के लिए की. मनुष्य को उसके आदिम स्तर से उठाकर दिव्यता से भर देने के लिए जुड़े जो प्रयास अलग-अलग देशकाल में संपन्न हुए, यह संस्कृति उन्हीं का संपुंजन है. इसे यों भी कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति मनुष्य के भीतर छिपी हुई उसकी दिव्यता को प्रकाशित करने के प्रयत्नों का सामूहिक नाम है. यह इतनी बहुआयामी है कि इसका कोई एक लक्षण निर्धारित नहीं किया जा सकता. 

इसमें संदेह नहीं कि भारतवर्ष मनुष्यों का ऐसा महासमुद्र है जिसमें अनेक मानव समूह समय-समय पर आकर घुलते-मिलते गए हैं और इसकी सामासिक संस्कृति का निर्माण करते चले हैं. कई बार लोग यह कहते सुने जाते हैं कि भारत में ‘कई’ संस्कृतियाँ हैं. हम कहना चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति तो ‘एक’ ही है, लेकिन उसका सृजन करने वाली सांस्कृतिक धाराएँ अनेक हैं. महासमुद्र में मिल जाने पर अलग-अलग नदियों की धाराओं की पहचान खोजना पानी पर नाम लिखने जैसा व्यर्थ प्रयास कहा जाएगा. इन विभिन्न धाराओं में जो ‘अविरोधी भाव’ है वही भारतीयता है, भारतीय संस्कृति का केंद्रीय मूल्य है. विरोधों को खोज-खोज कर रेखांकित करना संस्कृति की सामासिकता को विघटित करने जैसा है. “जंगल में जिस प्रकार लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य भाव से उठते हुए पारस्परिक सम्मिलन से अविरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन अपनी संस्कृति के द्वारा एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र में रहते हैं.” (अग्रवाल, वासुदेवशरण. ‘राष्ट्र का स्वरूप’. पृथिवी पुत्र). सामूहिकता, सहअस्तित्व अथवा अविरोधी भाव की व्याख्या करते हुए डॉ. देवेंद्रनाथ शर्मा ने सही कहा है कि, “रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, उत्सव-त्योहार सब एक-एक हैं. एक कतार में खडा करा दिए जाएँ तो कहना असंभव होगा कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान, कौन ब्राह्मण, कौन क्षत्रिय, कौन वैश्य, कौन शूद्र. बिना बताए बगल के गाँव का भी कोई व्यक्ति इसका अंतर नहीं समझ सकता. भारत से जो लोग विदेश जाते हैं वे सब के सब भारतीय समझे जाते हैं. ... हमारी न तो ब्राह्मण संस्कृति है, न क्षत्रिय संस्कृति, न लुहार संस्कृति, न सुनार संस्कृति, न बढ़ई संस्कृति, न जुलाहा संस्कृति. ये तो विभिन्न पेशों के वर्ग हैं. संस्कृति सबकी एक ही है और वह है भारतीय संस्कृति. रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार, रस्म-रिवाज प्रायः एक ही हैं.” (शर्मा, देवेंद्रनाथ. भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता. निबंधश्री. पृ. 75-76). 

इस समस्त सांस्कृतिक वैभव को सुरक्षित रखने और संवर्द्धित रूप में अगली पीढ़ियों को सौंपने की जिम्मेदारी प्रत्येक ‘वर्तमान’ की होती है. कहना यह भी होगा कि आज इस समेकित विरासत के विभक्त होकर बिखर जाने का ख़तरा हमारे सामने है. इसीलिए सांस्कृतिक दृष्टि से हमारे समय की सबसे पहली चुनौती इस संस्कृति के स्वरूप को बनाए रखने की है. आवश्यकता इस बात की है कि “देश के विभिन्न अंगों को अलग-अलग लीकों में पड़कर विच्छिन्न हो जाने से बचाने के लिए प्रयत्न किया जाए. सदियों से साथ रहने वाले समाज क्रमशः एक-दूसरे से इतना परे हट जाएँ कि जब एक-दूसरे की ओर देखें तब उनकी आँखों में सख्य का आलोक न हो, जिज्ञासा अथवा कौतूहल का आकर्षण भी न हो, केवल घनीभूत अपरिचय और उपेक्षा एक पत्थर की दीवार की तरह बीच में खड़ी हो जाय – यह किसी भी देश के लिए स्वयं एक भारी ट्रेजेडी है.” (अज्ञेय, पुराण और संस्कृत, निबंधश्री, पृ. 68). इस ट्रेजेडी की रचना उन तत्वों ने की है जिनकी सत्ता देश को बिखेरे रखकर ही बनी रह पाती है. ऐसी शक्तियाँ हमारी उपलब्धियों को भी हमारी न्यूनताओं के रूप में देखाती-दिखाती हैं तथा हमारी परंपराओं, मिथकों, पुराणों और इतिहास की विकृत व्याख्याएँ करके देशवासियों को एक-दूसरे के विरुद्ध खडा कर देती है. संप्रदाय, भाषा, जाति, दल, नस्ल और विचारधारा पर आधारित इन कट्टरवादी और पृथकतावादी ताकतों को पहचाने और निष्प्रभावी बनाए बिना भारतीय संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन नहीं हो सकता. 

वर्तमान में संपूर्ण विश्व इस भय से ग्रसित है कि जाने कब पृथ्वीवासियों को उपलब्ध सारे प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो जाएँ. खतरा इतना बढ़ गया है कि शुद्ध हवा और पानी भी क्रमशः लुप्त होने के कगार पर हैं. भविष्य की चिंता करने वाले तो यहाँ तक सलाह देने लगे हैं कि मनुष्यों को शीघ्र ही पृथ्वी को छोड़कर कहीं और बसेरा ढूँढ़ लेना चाहिए. इसका अर्थ है कि उन्हें यह लगता है कि धरती पर मानव अस्तित्व विरोधी परिस्थितियाँ इतनी विकट हो चुकी हैं कि उनका कोई इलाज नहीं किया जा सकता. यह स्थिति मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को बिगाड़ने के कारण पैदा हुई है. पाश्चात्य देशों की संस्कृतियाँ यह मानती हैं कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है और प्रकृति की रचना मनुष्य के लिए हुई है. यही कारण है कि इन संस्कृतियों की प्रेरणा से मनुष्य ने प्रकृति का क्रूरतापूर्वक दोहन और शोषण किया है तथा हवा और पानी तक का संकट खुद पैदा किया है. इस संकट का समाधान भारतीय संस्कृति के पास है. हमारी संस्कृति में प्रकृति को पूज्य माना गया है. मनुष्य उसका स्वामी नहीं, बल्कि वह मनुष्य की माता है. माता और संतान के संबंध का यह भाव यदि आज के मनुष्य के भीतर पैदा किया जा सके तो जितना कुछ बिगड़ा है उसे सुधारा जा सकता है. बात केवल इतनी ही नहीं है, बल्कि यह सारा का सारा जीवन मूल्य और नैतिकता की भिन्नता का मामला है. 

भारतीय मूल्य दृष्टि जीवन के दो मुख्य लक्ष्य मानती है – अभ्युदय (prosperity) और निःश्रेयस (liberation). अभ्युदय से जुड़े हैं धर्म, अर्थ और काम; तथा निःश्रेयस से जुड़ा है मोक्ष. ये चारों जीवन मूल्य या पुरुषार्थ परस्पर निर्भर हैं. धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करते हुए, अर्थ अर्थात भौतिक सुख साधन अर्जित करना और कामनाओं को इस प्रकार पूर्ण करना कि यह सारी प्रक्रिया धर्मसम्मत बनी रहे, अभ्युदय का नैतिक आधार है. इसके साथ ही भोग में त्याग की वृत्ति बने रहना लोक कल्याण की प्रेरणा देता है. ऐसा व्यक्ति या ऐसा समाज ही तृप्ति की एक सीमा पर पहुँचकर अपने समस्त अर्जित को लोक के लिए अर्पित कर सकता है. इस विसर्जन से ही मोक्ष की भूमिका तैयार होती है. भारतीय अर्थशास्त्र का सार यह है कि उत्पादन का मोक्ष उपभोग में नहीं, दान में है. इसी सूत्र को आज भी यह विश्व अपना ले तो बाजारवाद की तमाम विकृतियों पर विजय प्राप्त करके ‘कुटुंब भाव’ की प्रतिष्ठा की जा सकती है. अभिप्राय यह है कि भारतीय संस्कृति आज की दुनिया को साहचर्य, सामूहिकता और सहअस्तित्व को संभव बनाने वाला ‘कुटुंब भाव’ सौगात के रूप में दे सकती है. ‘कुटुंब भाव’ से हमारा अभिप्राय है, अपने हित से पहले विश्व परिवार के अन्य सदस्यों के हित की चिंता करना. 

भारतीय संस्कृति की परंपरा बहुत पुरानी है. तरह-तरह के आक्रमणों के कारण इस परंपरा का काफी हिस्सा क्षत-विक्षत और नष्ट हो गया. फिर भी, लोक संपदा के रूप में जितना कुछ बचा है वह भी कम नहीं है. उसे सहेजने तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की कसौटी पर परखने और उसे नया जीवन देने की बड़ी आवश्यकता है. ज्योतिष, योग, चिकित्सा, ललित कला, कृषि, प्रबंधन, राजनय, शिक्षा, वास्तु, मौसम विज्ञान आदि अनेक जीवनोपयोगी ज्ञान क्षेत्रों में भारत ने जो कुछ अर्जित किया, वह शास्त्र और लोक दोनों में फैला पड़ा है. इसे समेटा और सहेजा न गया तो यह नष्ट हो सकता है. इसलिए आज के संस्कृतिकर्मी के समक्ष इस सारी संपदा को संरक्षित करने की बहुत बड़ी चुनौती उपस्थित है, क्योंकि इस संपदा से ही हमारे सांस्कृतिक वैभव का निर्माण होता है. 

यहाँ भाषा और साहित्य की चर्चा करना भी आवश्यक है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की संस्कृति साहित्य और भाषा द्वारा ही संभालकर भावी पीढ़ियों को हस्तांतरित की जाती है. किसी एक साहित्यिक कृति का खो जाना या विकृत हो जाना संस्कृति के किसी पक्ष का खो जाना या विकृत हो जाना है. इसी प्रकार किसी एक मातृभाषा का लुप्त हो जाना भी उसके साथ जुड़ी हुई समूची सांस्कृतिक विरासत का लुप्त हो जाना है. नित नएपन की झोंक में यदि हम अपने साहित्य को विकृत करते हैं या भाषा के एक भी प्रतीक को मर जाने देते हैं, शब्दों को प्रचलन के बाहर चला जाने देते हैं, साहित्यिक धाराओं को लुप्त हो जाने देते हैं तो वस्तुतः हम संस्कृति की हत्या कर रहे होते हैं. अतः आवश्यकता इस बात की है कि हजारों मातृभाषाओं और जनभाषाओं से लेकर अनेक क्लासिक भाषाओं तक की विराट भाषिक और साहित्यिक संपत्ति को हम सँभालकर रखें, उसे समझें और समझाएँ तथा उसमें निहित उच्च मानवीय मूल्यों और उदात्त भारतीय संस्कृति को विश्व के समक्ष रखें.

अंततः, यह कहना भी जरूरी है कि हम अपने इस सांस्कृतिक वैभव को प्रदर्शित करके न तो किसी को चमत्कृत करना चाहते हैं, न आतंकित. हम यह भी नहीं कहना चाहते कि कोई अन्य संस्कृति या संस्कृतियाँ हमारी संस्कृति से कमतर हैं. हम तो बस अपने सांस्कृतिक गौरव को महसूस करना चाहते हैं – बराबरी के साथ. हमारे इस सांस्कृतिक गौरव का आधार हमारी वह जीवनदृष्टि है जो किसी के साथ भी मेरा-तेरा जैसा भेदभाव नहीं करती. सबमें एक जैसी दिव्यता के दर्शन करती है और संपूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार तथा सारे ब्रह्मांड को अपना घर मानती है – ‘यत्र विश्वं भवत्येक नीडम्.’ 

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद/
आवास : 208 -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर,
हैदराबाद - 500013.
       मोबाइल  :  08121435033 
व्हाट्सएप्प : 08074742572.







शुक्रवार, 25 मार्च 2016

[व्याख्यान] हिंदी भाषा की संस्कृति

1. भाषा एक साथ बहुत कुछ है. 
वह-
संप्रेषण की एक बहुमुखी व्यवस्था है,सोचने-विचारने का माध्यम है,सर्जनात्मक अथवा साहित्यिक अभिव्यक्ति का कलात्मक साधन है,एक सामाजिक संस्था है,
राजनैतिक विवाद का सार्वकालिक मुद्दा है तो
किसी देश को एकता के सूत्र में बांधने और उसके विकास का जरिया भी है.
                                           .[दिलीप सिंह, भाषा का संसार, पृष्ठ 9]

2. भाषा = एक विशिष्ट मानव व्यवहार : संप्रेषण के निमित्त 
संप्रेषण : भाषा का प्रयोग करके क्या करना चाहते हैं/ परपज. क्यों / नीड. प्रसंग/ रेफरेंस, कॉन्टेक्स्ट. मनोदशा /मूड. विषय / थीम, टॉपिक . [हैलिडे]

3.  मनुष्य 
= सामाजिक प्राणी
= बोलने वाला प्राणी
= बातचीत करने वाला प्राणी /होमोलोगन
= लिखने वाला प्राणी

4. .सर्जनात्मक वृत्ति : शैली 
सहवाग ने पांच चौके जड़े / मारे.
धोनी ने रनों की झड़ी लगा दी / ढेर सारे रन बनाए.
मोहन की बात में दम था/ ठीक थी.
वह मुँह बाए देखता रहा / कुछ नहीं समझा.

 5. अर्थ : प्रतीक और बिंब 
अर्थ शक्यता / मीनिंग पोटेंशियल
कमल-पंकज = सौंदर्य/ कोमलता/ शुभ
धुआँ = निराशा/ अनिश्चय
बादल= अनुभूति की सघनता/ वेदना
लालिमा = क्रोध/ लज्जा

6. भाषा : लचीलापन 
संभावनाओं का पुंज
- पारिस्थितिक संदर्भ/ कॉन्टेक्स्ट ऑफ़ सिचुएशन
- सांस्कृतिक संदर्भ / कल्चरल कॉन्टेक्स्ट

7.  पराभाषाविज्ञान / पैरालिंग्विस्टिक्स
         - मुद्रा/आसन :
टेबल पर पैर पसारना [दीवार]/
आगे झुकना/
पीछे टिकना/
कोहनी टेबल पर/
ओंठ बिचकाना/
आँख मिलाना 
- अंगविक्षेप/ जेस्चर :
तेजी से बदलाव : नैनन ही सों बात 
- काकु/ उतार-चढ़ाव :
 फुसफुसाकर/
भर्राई आवाज़/
 जोर से/
 कलपते हुए/
 झल्लाते हुए/
 क्क्क्कक्क्क किरन

8.  भाषा प्रकार्य / फंक्शन्स : हैलिडे
1. साधनपरक INSTRUMENTAL : चाहिए/ चाहता हूँ/ करूँ/ देखूं/ इच्छा है कि...
2. नियंत्रक REGULATORY : देखो, दौड़ो, खाओ, पकड़ो, चलो.
स्वामित्व- दूसरों की चीज़ नहीं छूनी चाहिए.
धमकी – अगर फिर गाली दी तो पीटूंगा.
नियम – सिगरेट पीना मना है.
चेतावनी – घास पर न चलें.
सुझाव- अधिक से अधिक भाषाएँ सीखनी चाहिए
.3. अंतःक्रियात्मक INTERACTIONAL : बातचीत, मज़ाक, हँसी उड़ाना, मनाना, तर्क करना, सहमति-असहमति जताना.
4. व्यक्तिगत PERSONAL : निजता: भाव, विचार, आकांक्षा
5. अन्वेषणात्मक  HEURISTIC : जानना, समझना, प्रश्न-उत्तर
6. कल्पनात्मक IMAGINATIVE : अपनी दुनिया अपना परिवेश – रचना/ कहानी, कविता, अनुमान, प्रतीक
.7. प्रतिनिधानात्मक REPRESENTETIONAL : प्रयोजनमूलक : कार्यालय, विज्ञान, समाचार, विज्ञापन.... 

9.  संस्कृति 
1. मानव के द्वारा सृजन – साहित्य, संगीत, कला, ...
2. भाषा, प्रथा, संस्कार : शिष्टाचार, आचरण, धर्म, सदाचार, मूल्य-व्यवस्था.

 10.  भाषा और संस्कृति
जॉन लायंस : क्योंकि भाषा समाज-संदर्भित होती है, इसलिए भाषा व्यवहार को उस भाषा की विशिष्ट सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में संदर्भित किए बिना स्पष्ट नहीं किया जा सकता . 
लोक संस्कृति : हिंदी/ मणिपुरी/ अरुणाचली/ पंजाबी/ तमिल/ तेलुगु...
धर्म और संस्कृति : हिंदू/ मुस्लिम ....
राष्ट्रीय संस्कृति : भारतीय/ चीनी/ ब्रिटिश......

11.  सर्वनाम प्रयोग
पद, अवस्था और अधिकार का सूचक
आयु और लिंग के अनुसार भी परिवर्तन
परस्पर मेलजोल, घनिष्ठता, भावनात्मक एकता, औपचारिकता का द्योतक
मैं/ हम : रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं और नाम है शहंशाह!
तू/ तुम/ आप : पहले जाँ, फिर जाने जाँ, फिर जाने जानाँ हो गए !
 माँ/ भगवान : माँ! तू कहाँ गई थी? /
हे भगवान! अब तू ही रक्षा कर.
 आप : नाराजगी, व्यंग्य
आदरसूचक [ये] : यह/ये/वह/वे/वो  : ये तो घर पर नहीं हैं./ तुम बड़े वो हो!/

12. रिश्ते-नाते 
विविध स्तर : रक्त संबंध, विवाह संबंध, वंश संबंध
पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन
संयुक्त परिवार
निर्भरता और दायित्व

13.  संबोधन : शिष्टाचार 
औपचारिक संबोधन : स्तर भेद : अपरिचय : स्त्री-पुरुष
आत्मीय संबोधन : कहाँ के हो, भैया?/ गोरखपुर का, अम्मी!/ मेरा बेटा जिंदा होता तो तुम्हारे जैसा ही हुआ होता, भैया! आज तुमने अम्मी कहा तो लगा मेरा बेटा ही पुकार रहा है. [ रामदरश मिश्र, दूसरा घर]
अति आत्मीय संबोधन : पगली/ जी- एजी/ हुज़ूर-सरकार/
जातिपरक संबोधन : मिश्रा जी, मौलवी साहब
व्यवसायपरक संबोधन : मास्टर जी, नेता जी,
प्रथम नाम/ उपनाम

14.  अभिवादन और आशीर्वाद 
चरण स्पर्श/ पालागीप्रणाम/ नमस्ते/ नमस्कार/ दंडवत प्रणाम/ करबद्ध प्रणाम / सलाम
हाथ मिलाना/ आलिंगन : प्यार की झप्पी
आशीर्वाद / सिर सूंघना/ पीठ थपथपाना / सिर छूना
जीते रहो/ चिरंजीवी भव/ पुत्रवती भव/ सौभाग्यवती भव/ विजयी भव/ खुश रहो/ शुभकामना......

 संदर्भ – 
गुर्रमकोंडा, नीरजा : 2015 : अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख : दिल्ली : वाणी

सिंह, दिलीप : 2007 : भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण: दिल्ली : वाणी