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शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

'लिए लुकाठी हाथ' के लेखक प्रवीण प्रणव का वक्तव्य

 

ऋषभदेव शर्मा  के साहित्य पर एकाग्र अपनी आलोचना पुस्तक 'लिए लुकाठी हाथ' (2024: हैदराबाद; बिभूति प्रकाशन) पर लेखक प्रवीण प्रणव का

           लेखकीय ...

एक साहित्यिक परिवेश से आने की वजह से साहित्य में रुचि होना स्वाभाविक है लेकिन यह रुचि बस शौकिया ही रही। 2007 में मैं नौकरी के सिलसिले में हैदराबाद आया। तब तक मेरी कविताओं में रुचि थी, यदा-कदा कुछ लिख भी लेता था लेकिन इससे ज्यादा मेरी निकटता साहित्य से नहीं रही। 2014-15 के आस-पास मेरी सक्रियता हैदराबाद में साहित्यिक जगत में हुई और जल्द ही मेरा परिचय प्रो. ऋषभदेव शर्मा से हुआ।


कम ही लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं। आरंभ में मेरी पहचान उनसे सिर्फ साहित्यिक कार्यक्रमों से हुई जहाँ उनके वक्तव्यों को सुनते हुए और उनकी कविताओं को सुनते हुए मैं उनसे प्रभावित होता रहा। तब तक यह ज्ञात भी नहीं था कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा विपुल साहित्य के रचयिता भी हैं। धीरे-धीरे मेरा परिचय उनके साहित्य से हुआ और फिर मैं उनके साहित्य से इस कदर प्रभावित हुआ कि आज शायद ही उनके द्वारा लिखा हुआ कुछ प्रकाशित/अप्रकाशित हो, जिसे मैंने न पढ़ा हो। उनकी कुछ किताबों की मैंने समीक्षा लिखी, उनके साहित्य पर आधारित कुछ साहित्यिक लेख लिखे, कुछ साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर वक्तव्य दिया।  विगत दस वर्षों में इस तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर मेरी समीक्षात्मक टिप्पणियों की एक लंबी फेहरिस्त बन गई। मैंने कई बार सोचा कि इन आलेखों को एक जगह एकत्रित कर पुस्तकाकार कर दिया जाय ताकि प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को समझने वालों के लिए यह एक उपयोगी किताब साबित हो सके। जो प्रो. ऋषभदेव शर्मा से या उनके साहित्य से परिचित नहीं हैं उनके लिए भी इन आलेखों को पढ़ना रुचिकर होगा। इसी सोच की परिणति के रूप में यह किताब ‘लिए लुकाठी हाथ’ आपके सामने है। 



प्रो. #ऋषभदेवशर्मा का रचनाकर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए, उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। #तेवरी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ किसी ‘वाद’ का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए ‘वाद’ का अर्थ ही वंचित वर्ग है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उनकी रचनाओं पर दृष्टिपात करते हुए, इन बिंदुओं की चर्चा हो। अपनी समीक्षाओं में मैंने कोशिश की है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए इनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ भी की जाए ताकि पाठकों के लिए न सिर्फ अधिक जानकारी मिले बल्कि इस तुलनात्मक अध्ययन से प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को वृहत अर्थों में समझा जा सके। 


जिनके साहित्य पर इस संग्रह के सभी लेख आधारित हैं, उन प्रो. ऋषभदेव शर्मा को धन्यवाद कहना उनकी शख्सियत को छोटा करने जैसा है। सच यह है कि मैं और मेरे जैसे कई नवांकुरों ने साहित्य की समझ प्रो. ऋषभदेव शर्मा से ही पाई है। उन्होंने अपना अमूल्य समय और सुझाव देकर, कई साहित्यकारों को इस योग्य बनाया है कि आज वे हिंदी साहित्य का जाना-पहचाना चेहरा बन सके हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना इस किताब की कल्पना नहीं की जा सकती थी। 


विगत कई वर्षों से आदरणीय प्रो. गोपाल शर्मा (Gopal Sharma)   और आदरणीय अवधेश कुमार सिन्हा (Awadhesh Sinha)  से लगातार साहित्यिक विचार-विमर्श होता रहा है और यह मेरी खुशकिस्मती है कि इस किताब के लिए इन दोनों ने ही अपना आशीर्वचन दिया है। आदरणीया प्रो.निर्मला मौर्य जी (Nirmala S Mourya)  के प्रति विशेष रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने इस पुस्तक को अपने आशीर्वचन से सुशोभित किया है। प्रो. देवराज (Dev Raj) जिनकी विद्वता का मैं कायल रहा हूँ और उससे भी ज्यादा उनकी सौम्यता और सरलता का। प्रो. ऋषभदेव शर्मा के तो वे गुरु भी रहे हैं। ऐसे में उनकी तरफ से इस पुस्तक के लिए लिखे गए शब्द हमारे लिए साहित्य के उत्कृष्ट सम्मान से कम नहीं हैं। मैं इन सभी महानुभावों के प्रति एक बार पुनः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। पुस्तक के प्रकाशन के लिए बिभूति प्रकाशन और मुद्रण के लिए हरिओम प्रिंटर्स का भी विशेष धन्यवाद और आभार।


इस किताब पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।   


              -प्रवीण प्रणव            @Praveen Pranav 

praveen.pranav@gmail.com

फ़ोन :  9908855506

                    हैदराबाद 

                   4 जुलाई, 2024.




गुरुवार, 18 जुलाई 2024

शुभाशंसा_प्रो. निर्मला एस. मौर्य_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 


 शुभाशंसा .....

जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा

  • निर्मला एस. मौर्य

… जो मंद-मंद मुस्कुराते हुए चुप रहते हैं और अचानक हँस कर कह देते हैं- ’प्रेम बना रहे!’... उनका यह कथन बरबस ही सामने वाले का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। कुछ न कह कर अपने व्यवहार से बहुत कुछ कह जाने वाला एक अनोखा व्यक्तित्व… जिसका नाम है डॉ. ऋषभदेव शर्मा… पारिवारिक मित्र, सहकर्मी, बड़े भाई सा स्नेह रखने वाले, अग्रज… ऐसे कई संबोधन हैं जो उनके ऊपर जँचते हैं!...


जब जब मन में आक्रोश अपने पाँव पसारता है, तब-तब ‘लेखनी से शब्द उतरते हैं पन्नों पर चुपचाप’ और पाठकों के हृदय को आंदोलित तथा आलोड़ित कर देते हैं।… डॉ. ऋषभदेव शर्मा का साहित्य संसार बहुआयामी है और इनकी रचनाओं में कहीं अकेलापन है, कहीं आदमी और धूप की कथाएँ हैं, कहीं बूँदे बरसती हैं तो कहीं अधूरे सपनों को पूरा करने का ख़्वाब है। वह कई अनुभवों से गुजरते हैं; ऐसा लगता है मानो उनका रचना संसार स्वयं गुपचुप बतियाता है। कहीं वह मन से आह्लादित होते हैं तो कहीं रिक्त मन की व्यथाएँ और वेदनाएँ पंक्तियों में उतर आती हैं। उनका साहित्य मानव के अस्तित्व का साहित्य है। अब आसपास का संसार बड़ी तेजी से बदल रहा है। इन बदलती हुई परिस्थितियों को आपकी रचनाओं में देखा जा सकता है क्योंकि, इन घटती हुई घटनाओं ने रचनाकार के मन को लगातार प्रभावित किया है और इन्हीं में से रचनाकार ने अपनी कृतियों के लिए पंक्तियाँ ढूँढ़ ली हैं तथा शब्दों के सहारे अपनी अभिव्यक्तियाँ दे दी हैं।  उनकी इन्हीं अभिव्यक्तियों को ‘लिए लुकाठी हाथ’ समीक्षा कृति में बहुत शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। इस समीक्षा कृति के समीक्षक प्रवीण प्रणव कहते हैं- ‘शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। उनकी रचनाएँ किसी वाद का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए वाद का अर्थ ही वंचित वर्ग में है।’ वह लिखते हैं कि- ‘ऋषभ जी की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए उनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ की जानी चाहिए।’ 


मैं यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ कि किसी भी कृतिकार या रचनाकार की रचनाओं का मूल्यांकन अन्य कोई कर ही नहीं सकता, उस पर दृष्टिपात  करते हुए विचार अवश्य किया जा सकता है; मूल्यांकन तो रचनाकार स्वयं अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व से करता है तथा लगातार अपने कृतित्व में सुधार करते हुए आगे बढ़ता चला जाता है। रचनाकार का अपना संसार और अपनी दुनिया होती है। मानव जीवन सम और विषम रेखाओं के बीच पलता है तथा  रचनाकार इन्हीं रेखाओं की अभिव्यक्ति, शब्दों को संवेदनाओं के धागों में पिरोकर करता है। 



प्रवीण प्रणव द्वारा लिखित यह समीक्षा कृति अपने आप में अनूठी है। इसमें कुल 9 आलेख शामिल हैं। ‘दीवानों की बस्ती में उम्मीदों का रोशनदान’ में ऋषभ जी के साहित्यिक व्यक्तित्व और उनके अवदान की चर्चा है। प्रणव जी कहते हैं- ‘साहित्य समाज दर्पण होता है लेकिन साहित्य साहित्यकार का भी दर्पण होता है।’ इस आलेख में ऋषभ जी के कवि कर्म की विस्तार से चर्चा की गई है और इसके साथ ही ‘देहरी’ जैसी कृति में किस प्रकार स्त्री पक्ष की चर्चा ऋषभ जी ने की है इसका बड़ा ही सूक्ष्म अवलोकन दिखाई देता है। समीक्षक कहते हैं- ‘प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा की कविताओं की नायिका किसी भी जुल्म को खामोशी से सह जाने की परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठाती है।’ ‘प्रेम बना रहे’, ताकि सनद रहे, धूप ने कविता लिखी है,कविता के पक्ष में, कथाकारों की दुनिया, हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान, कविता का समकाल, हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, जैसी अनेकानेक रचनाओं पर विचारोत्तेजक समीक्षा देखने को मिलती है।  समय-समय पर लिखे जाने वाले संपादकीयों  की चर्चाओं को ‘संपादकीयम - भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र’ में समेटा गया है। एक अच्छा व्यंग्य भी है ‘तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है’। यह रचना सियासत का कच्चा चिट्ठा खोलती है। ‘हम हैं बिलोकना चाहते जिस तरु को फूला- फला’ जैसे लंबे लेख में भाषिक संस्कृति के प्रति चिंता की दृष्टि दिखाई देती है। ‘कबहूँ न जाइ ख़ुमार’ बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है। ये सभी शीर्षक अपने आप में एक-एक पुस्तक के समान हैं और कभी मौका मिला तो इस समीक्षा पुस्तक पर अलग से अपने विचार अवश्य विस्तार से व्यक्त करूँगी। 


इसी प्रकार ‘अपने शिल्प की सीमा से बाहर जाकर लिखने की कला’ में डॉक्टर ऋषभ जी के लेखन सौंदर्य और लेखन प्रक्रिया की चर्चा है। ‘आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे’ में जीवन के भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। कोरोना काल की विभीषिकाओं के कई रंग इस आलेख को विचारोत्तेजक बनाते हैं। कोरोना महामारी के समय पूरा विश्व मृत्यु की काली छायाओं में लिपटा हुआ था, शहरों में सन्नाटा था। इस समीक्षा को पढ़ना उस लंबी काली रात के अँधेरों की याद दिलाता है।


इस तरह, लेखक प्रवीण प्रणव का यह समीक्षा ग्रंथ अपने हर शीर्षक में अनुभूतियों का ज़खीरा समेटे हुए है। समग्रतः, यह ग्रंथ पाठक के मन को बाँध लेने में समर्थ है, क्योंकि पाठक अपने मन  के सभी भावों और रंगों को  इन शीर्षकों में पाता है और स्वयं को इनसे जोड़ पाता है। चारों तरफ नज़र दौड़ाएँ तो यह  देखने में आता है कि अब समय जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही तेज़ी से मानव का अस्तित्व भी बदल रहा है। आज का साहित्य अपनी परिधि से बाहर निकल कर विश्व के विशाल प्रांगण में आ खड़ा हुआ है। रचनाकार बदलती हुई घटनाओं से तेज़ी से प्रभावित होता है और इन्हीं घटनाओं को अपनी कृतियों में जगह देता है। इन जीती- जागती कृतियों को समीक्षक ने जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा बनाकर प्रस्तुत कर दिया है। हर व्यक्ति जिस लक्ष्य को लेकर चलता है; उसका वह लक्ष्य पूरा हो, वह नव-सृजन कर पाए, यही मेरी कामना है। मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद अत्यंत आवश्यक होता हैं, तभी एक मजबूत रिश्ता बनता है।  यदि संवाद सार्थक न हो तो बरसों से बंद  हृदय के कपाट भी नहीं खुल पाते। प्रवीण प्रणव की समीक्षात्मक कृति ’लिए लुकाठी हाथ’ एक व्यक्तित्व  ही नहीं बल्कि एक अस्तित्व के मन के सफ़र की दास्तां है। साहित्य जगत में यह समीक्षा कृति सदैव अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी। 

शुभमस्तु…

  • प्रो. निर्मला एस. मौर्य 

    पूर्व कुलपति 

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश  





मंगलवार, 16 जुलाई 2024

अभिमत_प्रो. गोपाल शर्मा_'लिए लुकाठी हाथ' पर


आत्मीय संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित

                     - गोपाल शर्मा

यदि हम किसी साहित्यकार को जानते, पहचानते और सम्मानते हैं तो उन पर लिखना और उनकी रचनाओं पर स्वाधीन समीक्षात्मक लेखन की पेशकश करना कठिन हो जाता है।  कभी- कभी  इन्ही कारणों से आसान  भी हो जाता है।  इसलिए इस पुस्तक में संकलित   9  आलेखों  की पाठकोन्मुख समीक्षा करना कठिन और उनका क़िस्त-दर-क़िस्त पाठ करना आसान है।  

'लिए लुकाठी हाथ' के रचयिता (डॉ.) प्रवीण प्रणव उन जातकों में से हैं जो अंक 9 के प्रभाव से दूसरों की मदद करने वाले और अपनी ऊर्जा को परहित में लगाना पसंद करते हैं। आप भी अब जब इन 9 आलेखों का पाठ करने वाले हैं तो इस पुस्तक के शीर्षक के तीन बीज  शब्दों   का ध्यान रखें । लेखक प्रवीण प्रणव के 'लिए'  प्रो. ऋषभदेव शर्मा  की तेवरियाँ कबीर की 'लुकाठी' सी मार करती - मार्ग दिखाती हैं जो  अंतर 'हाथ' का सहारा देती है। इसलिए जब आलोचक प्रवर के रूप में कवि प्रवीण  इनका गूढ़ अध्ययन करके प्रसन्न होकर प्रसन्नवदन कवि ऋषभ को विलोकते हैं तो उनके रचना संसार में कभी भविष्य का  आईना  देखते हैं और कभी वर्तमान की नज़र।

इस रचना कर्म में इस बात को रेखांकित तो किया ही गया है कि कवि साहित्यकार  के रूप में  ऋषभ शिल्प की सीमा के पार जाकर अर्थ की खुमारी को उम्मीदों के रोशनदान से आलोकित करते हैं, यह भी बता दिया गया है कि कवि ऋषभ दीवानों की जिस बस्ती में रहते हैं  उसमें  नादान का प्रवेश कठिन है। यही इस संग्रह के सहेजक का मंतव्य दिखाई देता है जिसे वे इन पंक्तियों से क्या खूब समेटते हैं-  मुमकिन नहीं कि  शाम-ए-अलम की सहर न हो!  'खूबसूरत फूलों की खुशबू और बारूद की गंध से लबरेज़ होकर लिखी कविताओं से मानस मुकुल सुवासित होता है'-  क्या खूब पकड़े हैं!

अतः  इस संग्रह के पाठक इन आलेखों को उस कुंजी के समान लें, उस कर-ताली के मानिंद समझें जिससे भावों का अनुवाद कविता के अनुवाद से कई गुना बेहतर हो जाता है।  इस संग्रह में  उस तरफ भी दृष्टि दौड़ाई गई है जिस तरफ कवि की कविता का पुनर्जन्म होता है और  न ख़त्म होती कविता अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से पुनः  प्रकट हो जाती है।  यही नहीं, जब ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' सूक्ति को  सत्य चरितार्थ करते नित्य प्रति बरसों से संपादकीय लिखते उस गद्यकार  के चोखे गद्य से आलोचक प्रवीण   परिचय कराते हैं जिनके नाम में ही 'देव' है तो पाठक नए आलोक में  ऋषभदेव शर्मा के रचना कर्म को देखने-जाँचने-परखने का  सलीका और सुभीता सहज में ही पा जाता है।  

आत्मीय और आदरयुक्त संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित इन आलेखों के पाठ से  पाठक को गंभीर  समीक्षाओं के साथ-साथ यत्र-तत्र इनके रचनाकार के लेखन अनुभवों से परिचय भी हो जाता  है। यह 'लुकाठी' भावी लेखकों के लिए दिग्दर्शक भी  होगी, इसमें संदेह नहीं। 

साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले पाठकों   को पुस्तक की  अपनी  प्रति सुलभ हो, इसी अभिलाषा को पूरी होते देखना चाहता हूँ। इन आलेखों को पुस्तक के रूप में देखकर अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करने का यह सुअवसर मैं क्यों  गँवाता? मेरी भी आभा इसमें है और रहे। इसके लिए  उन सब  हाथों को  धन्यवाद जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन को संभव बनाया।  

पुस्तकों की शताधिक भूमिकाएँ  लिखकर संवीक्षक, संरक्षक और  साहित्य-संपन्न हो गए  ऋषभदेव शर्मा के सम्मुख एक और  यथायोग्य  प्रस्तुति !   

- गोपाल शर्मा            

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 

भाषा विज्ञान विभाग, 

अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथोपिया।

सोमवार, 15 जुलाई 2024

भूमिका_श्री अवधेश कुमार सिन्हा_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 ::भूमिका::


लुकाठी की चिनगारियों से बनता दीप-स्तंभ

अवधेश कुमार सिन्हा

कोई ‘किसी’ के साथ बात करते हुए हर बार कुछ नया सोचने पर विवश हो जाए, हर बार कुछ नया सीखे, कुछ नया करने की प्रेरणा पाए, तो वह ‘किसी’ व्यक्ति निश्चित ही बहुमुखी और विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा। और खासकर तब जब सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में दैनन्दिन इनोवेट, दूसरों को इनफ्लुएंस व कनविन्स करने वाला कॉर्पोरेट जगत का एक उच्चस्थ प्रबंधन विशेषज्ञ उस ‘किसी’ से मिलने के बाद स्वयं इनफ्लुएंस हो रहा हो, इनोवेट करने की प्रेरणा पा रहा हो तो वह ‘किसी’ व्यक्ति कई मामलों में वाकई असाधारण एवं अनुकरणीय होगा। इस पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’  में वह ‘किसी’ प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा हैं और कॉर्पोरेट जगत का वह प्रबंधन विशेषज्ञ प्रवीण प्रणव हैं यानि इस कृति के रचनाकार। 


जिस प्रवीण प्रणव के लिए सत्रह वर्षों पूर्व जॉब के लिए हैदराबाद आने के समय साहित्य में अभिरुचि शौकिया थी, लेकिन वही प्रवीण जब पिछले लगभग नौ वर्षों के अंतराल में एक मुकम्मल कवि, ग़ज़लकार, कहानीकार, समीक्षक, संपादक बन जाते हैं, राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका का संपादन करने लगते हैं, इस कृति को लेकर सात पुस्तकों के लेखक/संपादक बन जाते हैं, अनेकों साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित होते हुए भारत के सौ प्रमुख युवा साहित्यकारों की सूची में शामिल हो जाते हैं, हैदराबाद के युवा आईटी प्रोफेशनल्स के बीच कविता के प्रति अभिरुचि पैदा करने के लिए कई मंचों के द्वारा अलख जगाते हैं, साहित्य उनके लिए मानसिक शांति का पर्याय बन जाता है, तो इन परिवर्त्तनों के पीछे कहीं-न-कहीं सहृदय प्रेरणा के स्रोत गुरुवर ऋषभदेव शर्मा का प्रभाव होना स्वाभाविक लगता है।

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में हिंदी साहित्य के आचार्य रहे तथा वर्तमान में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के परामर्शी के तौर पर कार्यरत कवि, भाषाविद, समीक्षक, पत्रकार, संपादक एवं मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रखर वक्ता तथा सम्मोहक व्यक्तित्व वाले प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा का साहित्यिक वर्णपट सतरंगी और उसका फलक विस्तृत है। सत्य की लुकाठी लेकर पाखंड में चिनगारियाँ लगाने वाले (सत्य की लेकर लुकाठी/ वह खड़ा बाजार में;/ पाखंड ने/ चिनगारियाँ महसूस कीं/ अपने परों में !)  तेवरी काव्यांदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. शर्मा एक ओर अपनी कविताओं में जहाँ आक्रोश में निरंकुश सत्ता के विरुद्ध जनमानस को आंदोलन के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं, युग के स्वरों में आग बोते हैं- ‘बो रहा है आग वह/ युग के स्वरों में/ और हम दुबके हुए/ अपने घरों में’,  वहीं दूसरी ओर वह इतने कोमल हो जाते हैं कि फूल की पंखुड़ियों को नोचने से भी परहेज करते हैं- ‘उस दिन मैंने फूल को छुआ/ सहलाया और सूँघा/ हर दिन की तरह/ उसकी पंखुड़ियों को नहीं नोचा’। पुरानी ज़मीन की मिट्टी से काफी खुबसूरत एवं सार्थक मूर्तियाँ गढ़ने में सिद्धहस्त प्रो. शर्मा  अपनी कई कविताओं में पौराणिक आख्यानों  का उद्धरण लेकर आज की समस्याओं की जटिलताओं का बखूबी विश्लेषण करते हैं, बदलते परिवेश में उनकी स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करते हैं- ‘मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी/ नहीं थी मैं नैषध की दमयंती/ मैं शकुंतला भी नहीं थी/ राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था’। स्त्री-विमर्श पर उनकी कविताएँ उस स्त्री के साथ मज़बूती के साथ खड़ी दिखाई देती हैं ‘जिसका एक पैर/ ज्वालामुखी के मुँह पर है/ और दूसरा/ समुद्र की गहराई में छिपी/ सबसे निचली पहाड़ी पर’। ये कविताएँ न केवल स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाती हैं, वरन् पुरुषों को भी उनके दायित्वबोध का अहसास कराती हैं। एक दैनिक समाचार-पत्र के संपादकीय लेखक/ पत्रकार के रूप में भी उनके प्रतिदिन के साहित्यिक फ्लेवर से संपृक्त संपादकीय लेख समसामयिक होते हुए भी भविष्य की राह दिखाते हैं और सत्ता को सचेत करते हुए जन-साधारण के लिए दीप-स्तंभ का काम करते हैं। एक समीक्षक के तौर पर बिना किसी सख़्त टिप्पणी के कंसट्रक्टिव फीडबैक वाली उनकी समीक्षाएँ लेखकों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित करती  हैं। यही कारण है कि बहुसंख्यक नवोदित लेखकों के वे सबसे पसंदीदा समीक्षक, भूमिका-लेखक हैं। आज के लगातार बदल रहे आधुनिक परिवेश में जहाँ भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का क्षरण होता जा रहा है, वहीं प्रो. ऋषभदेव शर्मा उन विरले आचार्यों में से हैं जिनके वर्षों पुराने परा-स्नातक छात्र-छात्राएँ, एमफिल व पीएचडी के शोधार्थी आज भी अपने गुरु प्रो. शर्मा को वही सम्मान देते हैं, वही आदर-भाव रखते हैं जो वर्षों पूर्व उनकी कक्षा में पढ़ते हुए और उनके निर्देशन में शोध करते हुए देते थे । आज के समाज का यह एक अनुकरणीय उदाहरण है। 


प्रवीण प्रणव समय-समय पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा के कविता-संग्रहों, आलोचना ग्रंथों एवं संपादकीय संकलनों पर समीक्षाएँ लिखते रहे हैं जो यत्र-तत्र पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में प्रकाशित होती रही हैं। ‘लिए लुकाठी हाथ ’ उन्हीं समीक्षाओं और टिप्पणियों का एकत्रित संकलन है जिसमें प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व व कृतित्व का समग्र आकलन नौ आलेखों में शामिल है। पुस्तकाकार रूप में यह संकलन निश्चित तौर पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा जैसे विलक्षण एवं बहुआयामी प्रतिभा के साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाओं को एक ही जगह समग्रता में समझने, उससे कुछ सीखने, प्रेरणा लेने के लिए न केवल हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए वरन् इसमें अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए भी उपादेय है, संग्रहणीय है। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अधिक से अधिक लोग प्रो. शर्मा के साहित्य के प्रति आकृष्ट होंगे और इनके साहित्य पर अधिक गहन विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ होगी ।


अवधेश कुमार सिन्हा

ग्रेटर नोएडा (पश्चिम), गौतमबुद्ध नगर

उत्तर प्रदेश

 

शनिवार, 13 जुलाई 2024

आशीर्वचन_प्रो. देवराज_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 




::आशीर्वचन::

लुकाठी के गुणों का अंत नहीं...  


प्रिय प्रवीण जी, 

'लिए लुकाठी हाथ' की पाण्डुलिपि पढ़ने और फिर कुछ लिख भेजने के लिए इतना कम समय था कि गंभीरतापूर्वक लिखने लायक कुछ अधिक तत्व ढूँढना-खोजना मुश्किल हो गया। मैं जिस तरह का आलसी और कामचोर हूँ, उसके चलते यह काम और भी दुष्कर अनुभव हुआ। फिर भी आपने इतने परिश्रम पूर्वक प्रो. #ऋषभदेव_शर्मा के साहित्य की जो समालोचना की है, वह टुकड़े-टुकड़े ही सही, अपनी ओर खींचती रही। इसलिए जो कुछ और जितना कुछ पढ़ पाने पर जो भी अनुभव किया, चिट्ठी में लिखे दे रहा हूँ--


आपने अपनी विवेचना-बुद्धि का अधिकतम सदुपयोग करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य (यद्यपि विवेचना के लिए कुछ ही काव्य-संकलन चुने हैं, लेकिन संदर्भानुसार बात उनके समग्र काव्य-संसार की कर दी है, अत: यह प्रो. ऋषभ के संपूर्ण काव्य-संसार की ही समालोचना है) में उनकी जन-पक्षधर-चेतना को प्रारंभ में ही मूल्यांकन के लिए चुना है। यह मेरे लिए अप्रत्याशित आश्चर्य और संतोष का विषय है कि आपने किसान-मजदूर, शोषित-पीड़ित, निर्धन-निर्बल तथा अधिकारहीन आम-जन में स्त्री को भी शामिल करके प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य में एक साथ सबकी खोज की है। आपके इस विवेचन-विश्लेषण के निष्कर्षों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के जन-पक्षधर-काव्य के कुछ वैशिष्ट्यों का उल्लेख है, जैसे--- ‘आम जन का जीवन, आम जन का दुख, आम जन का क्षोभ और क्रोध, आम जन की आवाज़ बन कर उनके साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता, आम जन को सावधान करना कि लड़ाई उस व्यवस्था से है, जिसकी मुट्ठी में हवा भी क़ैद है, आम जन का आह्वान कि अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी, जय-पराजय की न सोच कर सत्य के पक्ष में आवाज़ उठाने की जरूरत, धार्मिक उन्माद, भड़कते दंगे, भूखे पेट का व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाना हिंसा नहीं, न्याय की मांग,  स्त्रियों के भाव, क्षोभ, घुटन, प्रेम, दर्द का सजीव चित्रण, स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर स्त्रियों के हाथों में पकड़ा दिए गए झुनझुने, स्त्रियाँ दोयम दर्जे की गुलाम, स्त्रियों को संगठित होकर आवाज़ उठाने की जरूरत’ आदि। कह सकता हूँ कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की तेवरियों और जनपक्षीय मुक्तछंद कविताओं को आपने उसी रचनात्मकता, समालोचक की ईमानदारी और संघर्ष-चेतना के दबाव में पढ़ा है, जिसने कवि से इन कविताओं की रचना कारवाई है।   

शायद इसीलिए, जब मैं आपके ‘लेखकीय’ में पढ़ रहा था कि “प्रो. ऋषभदेव शर्मा का रचना-कर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है”,  तभी लग गया था कि आपका निष्कर्ष होगा कि “प्रो. शर्मा वंचितों के कवि हैं, सदियों से दबी हुई स्त्रियॉं के कवि, किसान, मजदूरों के कवि हैं या यूँ कहें कि हर उस व्यक्ति के कवि हैं, जिसका रिश्ता पीड़ा से है और ऐसे हर व्यक्ति की आवाज़ प्रो. शर्मा की लेखनी उठाती रही है।”  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य-संसार में और गहरे उतरते हुए आप प्रेम के उस रूप तक पहुँच गए हैं, जिसकी आभा तो मोती की आभा को पराजित करती लगती है, लेकिन कहीं उसमें आपको खुरदरा प्रेम भी दिख गया है। यह आपकी बहुत पैनी अनुवीक्षण-दृष्टि की छाया लगी, जो मुझे अपने साए में नागार्जुन की उस एक कविता तक ले गई, जिसमें ‘कटहल के छिलके सी जीभ’ उपमा का प्रयोग है। बाबा की वह कविता पाठक को भीतर तक छील देती है और प्रो. ऋषभ की, आपकी नजर में आई यह प्रेम कविता भी प्रेम के साधक-अध्येताओं को सचाई के चाकू से चीर डालती है।   क्या आपको नहीं लगता की प्रो. ऋषभ की ये प्रेम कविताएँ ही उन कविताओं की भी स्रोत हैं, जिन्हें आपने ‘नदी, झील, संगम, फूल और मिठास’ की फुनगियों से बातें करती हुई कविताओं के रूप में बड़ी मेहनत से खोजा है और उन्हीं में से कुछ को ‘भेड़िए की बजाय मनुष्य बनने की कोशिश’ में लगे आदमी की कविताएँ कहा है; तभी तो कुल मिला कर प्रो. ऋषभ की ये कविताएँ ‘मानवता के बचे रहने की आशा’ की कविताएँ हैं। 

लेकिन भाई, एक अतिवादी निष्कर्ष से बच सके होते तो अच्छा लगता। आप कहते हैं कि “प्रेम को परिभाषित करने के लिए प्रयोग में लाए गए बिंब और प्रतीक न सिर्फ नए और अनसुने हैं, बल्कि ये प्रेम को लौकिक से अलौकिक और जीवन की क्षण भंगुरता से परे पवित्र, निश्चल और रूहानी प्रेम की तरफ ले जाते हैं।” इसमें बिंबों और प्रतीकों का नया या अनसुना होना तक तो बात ठीक है, परंतु यह प्रेम को अलौकिक या रूहानी दिशाओं की ओर ले जाने वाला निष्कर्ष धर्मराज के रथ की तरह ज़मीन से चार अंगुल ऊपर उठ गया लगता है। हाँ आपका यह अध्ययन-निष्कर्ष खूब गले उतरता है कि “प्रो. शर्मा की कविताओं में कुछ भी आयातित नहीं है--- कविता में जो भाषिक सौंदर्य है, पौराणिक घटनाओं या पात्रों का मिथक के रूप में प्रयोग है या बिलकुल ही अनोखे अलंकरणों के माध्यम से सौंदर्य की व्याख्या; सब कुछ प्रो. शर्मा के अपने हैं और जिन्हें कहीं और, किसी और की कविता में इस तरह नहीं पाया जा सकता।”         


प्रवीण जी, कमाल किया है आपने। आप अचानक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की दो कालजयी कविताओं की ओर खींच ले गए। मुझे याद है, संग्रह में आने के पहले ही संयोगवश माँ और पिता पर रची गई ये कविताएँ पढ़ने को मिल गई थीं। मैं भी आप ही की तरह अपने आँसू नहीं रोक सका था। कविताओं में मुझे अपने अदेखे माँ-पिता बहुत याद आए थे। इन कविताओं की काव्यात्मकता अथवा काव्य-शिल्प पर मैं कभी विचार नहीं कर सका। साहित्य के पाठक का यह अक्षम्य दोष है, इस बात को स्वीकार करता हूँ, लेकिन क्या करूँ, ये कविताएँ काव्यशास्त्र की देहरी पर चढ़ने ही नहीं देतीं।   आपका मूल्यांकन सही है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की “दो कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद एक लंबे विराम की आवश्यकता होती है। आँखें भर आती हैं, मन विचलित होता है, कई स्मृतियाँ मानस-पटल पर कौंध जाती हैं। माँ और पिता के बारे में लिखी गई इन दो कविताओं के लिए प्रो. शर्मा को किसी भी बड़े से बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया जा सकता है।”   

काव्य की ही तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य का विश्लेषण भी आपने अत्यंत व्यापक और बहुज्ञ अध्ययन-दृष्टि का प्रयोग करते हुए किया है। आपके अध्ययन-निष्कर्षों को (भी) निचोड़ कर प्रो. ऋषभ के पत्रकारितेतर गद्य की विशेषताओं की छोटी-सी सूची बनाना चाहूँ, तो काटाकूटी करने के बाद उसमें कुछ-कुछ ये विशेषताएँ होंगी--- ‘मूलत: कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना का मुख्य विषय भी कविता, गद्य में कविता जैसा ही भाषिक सौंदर्य, कम शब्दों में अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहने का कौशल, लेखकीय ईमानदारी का निर्वाह, भक्ति कालीन कवियों के मूल्यांकन में भक्ति से अधिक मानवीय मूल्यों की खोज, हिंदी के गोरखनाथ से लेकर अधुनातन कवियों और कथाकारों के मूल्यांकन के साथ ही तेलुगु, तमिल आदि भाषाओं के रचनाकारों का भी मूल्यांकन, हिंदी साहित्येतिहास में स्थान बना चुके छायावाद, प्रगतिवाद, समकालीन कविता आदि आंदोलनों की परीक्षा, लघुकथा जैसी चुनौतीपूर्ण विधाओं का विश्लेषण, कालजयी उपन्यासों की परीक्षा, कथा साहित्य में दलित और आदिवासी विमर्श की खोज, स्त्री-पुरुष संबंधों के चित्रण की परीक्षा, साहित्य में गाँव, बच्चे, मानवाधिकार, वैश्वीकरण का यथार्थ, इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी की शक्ति और संभावनाओं की तलाश, हिंदी के भारतीय और वैश्विक संदर्भों का साक्षात्कार, कविता और कथा में शहरीकरण और जनपदीय चेतना की खोज’ आदि। प्रो. शर्मा के गद्य में इन विशेषताओं के खोजी होने के चलते आप समझ सकते हैं कि यह ‘आदि’ हाथी का पाँव है, जिसमें असंख्य पाँव समाए हुए हैं।   

‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के लेखों की समालोचना करते हुए आप लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा से टकराने की ओर भी बढ़े हैं। इसके एक लेख ‘रामकथा आधारित एनिमेशन ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज’ : एक अध्ययन’ में प्रो. ऋषभदेव शर्मा रामकथा और उसके चरित्रों के साथ नीना पेले द्वारा किए गए व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए ‘आस्थावादी प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी’ के बदले कलाकार और लेखक की स्वतंत्र चेतना के पक्षधर ‘उत्तर आधुनिक व्यक्ति’ का रवैया अपनाते हैं। प्रवीण जी, आप इससे भीतर ही भीतर बेहद आहत अनुभव करते हैं, इतने अधिक कि अपने आप को यह कहने से नहीं रोक पाते कि “इसमें दो-राय नहीं कि इस फिल्म, जिसमें स्क्रिप्ट, एनिमेशन से लेकर निर्देशन तक का बीड़ा नीना पेले ने उठाया, में उन्होंने बेहतर काम किया है, लेकिन स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जाकर संदर्भ से अलग परिस्थितियों का चित्रण, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उस सीमा-रेखा का उल्लंघन है, जहाँ जनमानस की भावनाएँ आहत होती हैं।” इसके बाद इस एनीमेशन से ही अपने समर्थन में उदाहरण देते हैं--- “दशरथ की मृत्यु के समय कैकेयी की गोद में उनका सिर होना और कैकेयी का अश्लील फिल्मों की नायिका की तरह नर्स के कपड़ों में अर्धनग्न और उत्तेजक चित्रण समझ के परे है।” सीता, रावण और राम के संबंध में भी वहीं से कुछ प्रसंग चुन कर प्रस्तुत करते हैं, जो आपके लिए इससे भी वीभत्स लगने वाले हैं। अंत में आपकी टिप्पणी है कि आपको यह “उदारमना लेखक द्वारा ‘मूँदें आँखि कतहुं कोउ नाहीं’ वाली उदारता को जारी रखने जैसा लगता है।” सच कहूँ, यद्यपि आप अपने क्षोभ को पचा गए हैं, बहस से भी विरत से ही हो गए हैं, टिप्पणी भी अति संकोच पूर्वक ही की है, फिर भी यहाँ (मूल पाठ के) ‘लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा’ से (इस पुस्तक के) ‘लेखक प्रवीण प्रणव’ का जो भी थोड़ा-बहुत टकराव दिखता है, वह बहुत प्यारा और ईमानदारी भरा लगता है। वरना, हिंदी में जो लोग प्रशस्तिपरक लेखन के अभ्यस्त हैं, वे अपने प्रिय लेखक के लिखे पर न कोई शंका करते हैं, न सवाल उठाते हैं, न बहस खड़ी करते हैं और न कोई ऐसा आलोचनात्मक टकराव पैदा होने देते हैं, जो उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी होने की गवाही दे।   

लेकिन भाई, आपकी इतनी प्रभावकारी लेखकीय ईमानदारी के बाद ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के ही बहाने प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य-लेखन में आई पुनरावृत्ति का स्पष्टीकरण मुझे नहीं जमा। आपने लेखन का एक नितांत सही पक्ष खोजा है--- समय-समय पर किए गए लेखन में कहीं-कहीं पुनरावृत्ति-दोष का आ जाना। यह किसी भी ऐसे लेखक के संदर्भ में होना संभव है, जो लगातार और बिना थके लिखता हो अथवा जिसे इतना अधिक लिखना पड़ता हो। यह एक अपरिहार्य लेखन-दोष है, जिसके लिए उस लेखक को कोई ऐसी कैफियत देने की जरूरत नहीं होती, जो पैरों न चल सके। और, उस लेखक के समालोचक को भी--- इस दोष का उल्लेख कर देने के अलावा--- कोई रक्षा-दीवार खड़ी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। अब आप अपना दिया स्पष्टीकरण देखिए, “साहित्य, संस्कृति और भाषा जैसे विषयों पर ये लेख अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं, इसलिए कुछ बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है; लेकिन यह खलती नहीं, क्योंकि हर लेख में पाठकों के लिए बहुत कुछ नया है और जिन बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है, वे इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें बार-बार दुहराया ही जाना चाहिए। विपणन (Marketing) के क्षेत्र में ‘Rule of 7’  एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो यह कहता है कि यदि आप चाहते हैं कि ग्राहक कुछ याद रखे, तो कम से कम सात बार आप उसे ग्राहक के सामने लाएँ।” इसके बाद आप डॉ. राजेंद्रप्रसाद की ‘साहित्य, शिक्षा और संस्कृति’ पुस्तक के प्रकाशन का उदाहरण देते हैं, जो उनके 28-29 वर्ष की अवधि में समय-समय पर दिए गए भाषणों का संग्रह है। डॉ. राजेंद्रप्रसाद ने पुनरावृत्ति (और विरोधाभास) की संभावना को बड़े सहज रूप में स्वीकार किया है, लेकिन उसके लिए कोई सफाई नहीं दी है। मैं जो कहना चाहता हूँ, आशा है, आप उसे समझ रहे हैं।  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा पत्रकार की भूमिका निभाने के क्रम में किए गए लेखन का मूल्यांकन करते हुए पुन: आपके निष्कर्ष ध्यान खींचते हैं। आपके कुछ निष्कर्ष, जो मुझे खूब भाए, वे हैं--- ‘साहित्यकार होने के कारण पत्रकारीय लेखन में पठनीयता का सौंदर्य राजनीतिक विश्लेषकों से अधिक, सरल भाषा में पाठकों के सामने वस्तुस्थिति रखना, अपने विचार बिना किसी लाग-लपेट के प्रकट करने में विश्वास रखना, घटना के भीतरी-बाहरी वर्तमान प्रभाव के साथ ही उसके भविष्य में होने वाले फलितार्थ का संकेत करना, सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पैनी नज़र बनाए रखना, संवेदनशील मुद्दों पर सशक्त और संतुलित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना, मतदान के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति की आलोचना के साथ ही उसे मतदाता की ओर से ‘नोटा’ के रूप में भी देखने का सुझाव देने के बहाने सभी विषयों में राजनीतिक-सत्ता और नागरिक के संबंधों को परखने पर बल देना’ आदि। यहाँ आपका वस्तुनिष्ठ एवं संतुलित अभिमत और भी प्रभावित करता है--- “पत्रकारिता के क्षेत्र में, जहाँ पीतपत्रकारिता का बोलबाला है, जहाँ बहुसंख्यक लोग अंधभक्ति या अंधविरोध के खेमे में शामिल हो बिगुल बजा रहे हैं; जहाँ खबरों की प्रामाणिकता, टीआरपी या पाठक तक पहुँच के आधार पर तय की जाती हो; तटस्थ रह पाना इतनी मुश्किलों और चुनौतियों भरा विकल्प है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को आज विस्मय की नज़र से देखा जाता है। इन कठिन परिस्थितियों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा (1957) के संपादकीय लेखों को पढ़ना जेठ की दुपहरी में मलय पवन की शीलता के समान है।”    

प्रवीण जी, ‘लिए लुकाठी हाथ’ में समय-समय पर लिखे गए आपके जितने समालोचना-लेख संकलित हैं, वे सभी निजी अध्ययन-निष्कर्षों, गहरी आत्मीयता, मूल्यांकन की गंभीर इच्छा और समालोचना के लिए अनिवार्य सत्यनिष्ठा का प्रतिफल हैं। जब आप कहते हैं कि “मुझे याद है, जब मैंने प्रो. शर्मा को जानना शुरू ही किया था, तब लगता था कि इनकी कविताओं की चर्चा होनी चाहिए। कई मंचों से बाद में यह हुआ भी। लगा कि इनकी कविताओं पर आलेख लिखे जाने चाहिए और वह भी हुआ। इनके समग्र साहित्य को पढ़ कर लगा कि इनके बारे में लोगों को और जानना चाहिए और एक विस्तृत किताब आनी चाहिए”, तो पता चल जाता है कि यह पुस्तक एक ऐसी नागरिक-ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए सामने आ रही है, जो आज के साहित्य की लेखक-पाठक दुनिया में विलुप्त होने के कगार पर है। ऊपर से, जिस लेखक के साहित्य पर यह पुस्तक केंद्रित है, वह ऐसा है, जिसका व्यक्तित्व सभी के भीतर वैचारिक ऊर्जा जगाता आया है। आप भी अनुभव करते हैं कि “कम ही लोग ऐसे होते हैं, जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं।” 

ऐसी अगाध आत्मीयता के जल से भीगी हुई टटकी आलोचना हिंदी के पाठकों को एक अलग तरह का पठन-सुख देगी, यह सोच कर अच्छा लग रहा है। अपने ढंग के इस अभिनव कार्य के लिए आपको शुभकामनाएँ।  

सस्नेह--- 

देवराज 

पूर्व अधिष्ठाता : मानविकी संकाय 

मणिपुर विश्वविद्यालय, 

इम्फाल (मणिपुर)

गुरुवार, 6 जून 2024

निबंधकार ‘मर्मज्ञ’ की रचना-प्रक्रिया

 

निबंधकार ‘मर्मज्ञ’ की रचना-प्रक्रिया

✍️ _ऋषभदेव शर्मा_ 

ज्ञानचंद मर्मज्ञ (1959) का नाम मुख्य रूप से दक्षिण भारत में सक्रिय हिंदी साहित्यकारों में प्रथम पंक्ति में  शामिल है। कर्नाटक उनका विशिष्ट कार्यक्षेत्र है, जहाँ वे लगभग चार दशकों से निरंतर हिंदी की अलख जगाए हुए हैं। एक सरस और ओजस्वी गीतकार तथा मार्मिक निबंधकार के रूप में उन्होंने निजी और अनन्य पहचान अर्जित की है।

मानवीय संवेदनशीलता, प्रशस्त भारतबोध और उदात्त जीवन मूल्य मर्मज्ञ के साहित्य सृजन के आधारभूत मूलत्रिकोण की रचना करते हैं। अपने मुक्तकों और गीतों से लेकर आलेखों और निबंधों तक में वे एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। उनके निकट साहित्य सृजन शब्दक्रीड़ा और मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सजग आंदोलनी उपक्रम है। उनके निबंधों में उनकी यह नागरिक चेतना अत्यंत मुखर रूप में लक्षित की जा सकती है। 

यह मणिकांचन संयोग है कि ज्ञानचंद मर्मज्ञ कवि भी हैं और निबंधकार भी। निबंध/गद्य को कवियों की कसौटी कहा जाता है। मर्मज्ञ ने स्वयं अपने कवित्व को गद्य की इस कसौटी पर रख/परख कर यह सिद्ध किया है कि वे इन दोनों विधाओं के सिद्धहस्त रचनाकार हैं। दरअसल कविता का नाभिक भाव होता है, जबकि निबंध का नाभिक है विचार। कविता में विचार अगर ऊपरी तल पर तैरता दिखाई दे तो कवित्व छूँछा पड़ जाता है और निबंध अगर भावना में ऊभ-चूभ होने लगे तो गद्य वायवीय हो जाता है। इस दोहरे खतरे को पहचानते हुए, मर्मज्ञ ने अपनी कविताओं में विचार को काव्य सौंदर्य के उपकारक तत्वों और कल्पना के सर्जनात्मक उपयोग के सहारे जिस खूबी से भाव में ढाला है, उसी खूबी से अपने निबंधों में भाव तत्व को विचार के साथ निबद्ध करते हुए ललित गद्य की सृष्टि की है। उनके निबंधों के गद्य में भी खास तरह की अंतर्लय और भावप्रवणता है। इस तकनीक के सहारे वे अपने पाठक को भावोद्वेलित तो करते ही हैं, वैचारिक  दृष्टि से सजग भी बनाते चलते हैं। 

गद्य की कसौटी पर मर्मज्ञ की प्रतिभा तब और भी निखर जाती है, जब वे पाठक को अपने साथ भावों और विचारों की समांतर पटरियों पर सरपट दौड़ाते हैं। इस दौड़ में वे पाठक को कभी अकेला नहीं छोड़ते। अपने लक्ष्य विचार के प्रतिपादन और सटीक भाव के जागरण के लिए वे उसे इस तरह संबोधित करते चलते हैं कि उनके कथन बतकही और कथारस में भींजकर पाठक के मर्म को वेध जाते हैं। अवसर पाकर वे कभी कोई दृष्टांत सुनाते हैं, तो कभी मुक्ता जैसी कोई अनुभवसिद्ध सूक्ति जड़ देते हैं। प्रश्नों से लेकर आह्वान तक को उन्होंने बड़ी सफलता से अपनी निबंध शैली का चमत्कारी अंग बनाने में विलक्षण सफलता प्राप्त की है। 

ज्ञानचंद मर्मज्ञ की निबंध शैली में चिंतन और काव्य इस तरह परस्पर अंतर्ग्रथित हैं कि पता ही नहीं चलता कब वे चिंतन की डोर पकड़कर कविता की नदी में उतर जाते हैं और कब कवित्व के प्रवाह के साथ बहते-बहते विचार के भँवर जाल को मथने लगते हैं। इस दौरान वे एक ओर अगर रमणीय चित्रात्मकता का एक समांतर संसार रच डालते हैं, तो दूसरी ओर प्रश्नों की झड़ी तथा विडंबना और व्यंग्य के अद्भुत संयोजन से जीवन और जगत के कठोर और विरूपित चेहरे का साक्षात्कार भी कराते हैं। इतने सब झंझा-झकोर-गर्जन के बाद वे पाठक के हाथ को तब तक आत्मीयता से पकड़े रहते हैं, जब तक उसे अपने अभिप्रेत आदर्श की कोमल ज़मीन पर न उतार दें। इसीलिए उनका कोई निबंध अचानक समाप्त नहीं होता। बल्कि भावों और विचारों के चरमोत्कर्ष को छूकर हौले-हौले अवरोह की ओर बढ़ता है। इस तरह वे अपनी नागरिक चेतना को सफलतापूर्वक पाठकीय चेतना में संक्रमित करते हैं। 

मेरी समझ में यही निबंधकार ज्ञानचंद मर्मज्ञ की रचना प्रक्रिया का मर्म है। इसकी पुष्टि के लिए उनके गद्य और पद्य दोनों  से अनेकानेक उद्धरण दिए जा सकते हैं और उनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। आशा है, कोई शोधार्थी अवश्य ही एक दिन इन तमाम बिंदुओं का अनुसरण करते हुए पूर्णाकार शोधप्रबंध प्रस्तुत करेगा। 000

सोमवार, 25 मार्च 2024

होली है पर्याय प्रेम का!





रंगपर्व की हार्दिक शुभेच्छाएँ स्वीकारें!  

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होली है पर्याय प्रेम का

  • ऋषभदेव शर्मा 


सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

1.
होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का -
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का -
रँगें
और
रँग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का -
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का -
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !


2.
होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !


3.
गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।

ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल! 000