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गुरुवार, 6 जून 2024

निबंधकार ‘मर्मज्ञ’ की रचना-प्रक्रिया

 

निबंधकार ‘मर्मज्ञ’ की रचना-प्रक्रिया

✍️ _ऋषभदेव शर्मा_ 

ज्ञानचंद मर्मज्ञ (1959) का नाम मुख्य रूप से दक्षिण भारत में सक्रिय हिंदी साहित्यकारों में प्रथम पंक्ति में  शामिल है। कर्नाटक उनका विशिष्ट कार्यक्षेत्र है, जहाँ वे लगभग चार दशकों से निरंतर हिंदी की अलख जगाए हुए हैं। एक सरस और ओजस्वी गीतकार तथा मार्मिक निबंधकार के रूप में उन्होंने निजी और अनन्य पहचान अर्जित की है।

मानवीय संवेदनशीलता, प्रशस्त भारतबोध और उदात्त जीवन मूल्य मर्मज्ञ के साहित्य सृजन के आधारभूत मूलत्रिकोण की रचना करते हैं। अपने मुक्तकों और गीतों से लेकर आलेखों और निबंधों तक में वे एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। उनके निकट साहित्य सृजन शब्दक्रीड़ा और मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सजग आंदोलनी उपक्रम है। उनके निबंधों में उनकी यह नागरिक चेतना अत्यंत मुखर रूप में लक्षित की जा सकती है। 

यह मणिकांचन संयोग है कि ज्ञानचंद मर्मज्ञ कवि भी हैं और निबंधकार भी। निबंध/गद्य को कवियों की कसौटी कहा जाता है। मर्मज्ञ ने स्वयं अपने कवित्व को गद्य की इस कसौटी पर रख/परख कर यह सिद्ध किया है कि वे इन दोनों विधाओं के सिद्धहस्त रचनाकार हैं। दरअसल कविता का नाभिक भाव होता है, जबकि निबंध का नाभिक है विचार। कविता में विचार अगर ऊपरी तल पर तैरता दिखाई दे तो कवित्व छूँछा पड़ जाता है और निबंध अगर भावना में ऊभ-चूभ होने लगे तो गद्य वायवीय हो जाता है। इस दोहरे खतरे को पहचानते हुए, मर्मज्ञ ने अपनी कविताओं में विचार को काव्य सौंदर्य के उपकारक तत्वों और कल्पना के सर्जनात्मक उपयोग के सहारे जिस खूबी से भाव में ढाला है, उसी खूबी से अपने निबंधों में भाव तत्व को विचार के साथ निबद्ध करते हुए ललित गद्य की सृष्टि की है। उनके निबंधों के गद्य में भी खास तरह की अंतर्लय और भावप्रवणता है। इस तकनीक के सहारे वे अपने पाठक को भावोद्वेलित तो करते ही हैं, वैचारिक  दृष्टि से सजग भी बनाते चलते हैं। 

गद्य की कसौटी पर मर्मज्ञ की प्रतिभा तब और भी निखर जाती है, जब वे पाठक को अपने साथ भावों और विचारों की समांतर पटरियों पर सरपट दौड़ाते हैं। इस दौड़ में वे पाठक को कभी अकेला नहीं छोड़ते। अपने लक्ष्य विचार के प्रतिपादन और सटीक भाव के जागरण के लिए वे उसे इस तरह संबोधित करते चलते हैं कि उनके कथन बतकही और कथारस में भींजकर पाठक के मर्म को वेध जाते हैं। अवसर पाकर वे कभी कोई दृष्टांत सुनाते हैं, तो कभी मुक्ता जैसी कोई अनुभवसिद्ध सूक्ति जड़ देते हैं। प्रश्नों से लेकर आह्वान तक को उन्होंने बड़ी सफलता से अपनी निबंध शैली का चमत्कारी अंग बनाने में विलक्षण सफलता प्राप्त की है। 

ज्ञानचंद मर्मज्ञ की निबंध शैली में चिंतन और काव्य इस तरह परस्पर अंतर्ग्रथित हैं कि पता ही नहीं चलता कब वे चिंतन की डोर पकड़कर कविता की नदी में उतर जाते हैं और कब कवित्व के प्रवाह के साथ बहते-बहते विचार के भँवर जाल को मथने लगते हैं। इस दौरान वे एक ओर अगर रमणीय चित्रात्मकता का एक समांतर संसार रच डालते हैं, तो दूसरी ओर प्रश्नों की झड़ी तथा विडंबना और व्यंग्य के अद्भुत संयोजन से जीवन और जगत के कठोर और विरूपित चेहरे का साक्षात्कार भी कराते हैं। इतने सब झंझा-झकोर-गर्जन के बाद वे पाठक के हाथ को तब तक आत्मीयता से पकड़े रहते हैं, जब तक उसे अपने अभिप्रेत आदर्श की कोमल ज़मीन पर न उतार दें। इसीलिए उनका कोई निबंध अचानक समाप्त नहीं होता। बल्कि भावों और विचारों के चरमोत्कर्ष को छूकर हौले-हौले अवरोह की ओर बढ़ता है। इस तरह वे अपनी नागरिक चेतना को सफलतापूर्वक पाठकीय चेतना में संक्रमित करते हैं। 

मेरी समझ में यही निबंधकार ज्ञानचंद मर्मज्ञ की रचना प्रक्रिया का मर्म है। इसकी पुष्टि के लिए उनके गद्य और पद्य दोनों  से अनेकानेक उद्धरण दिए जा सकते हैं और उनकी विशद व्याख्या की जा सकती है। आशा है, कोई शोधार्थी अवश्य ही एक दिन इन तमाम बिंदुओं का अनुसरण करते हुए पूर्णाकार शोधप्रबंध प्रस्तुत करेगा। 000

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2023

भारतबोध : सांस्कृतिक-साहित्यिक संदर्भ

भारतबोध : सांस्कृतिक-साहित्यिक संदर्भ
- ऋषभदेव शर्मा

'भारतबोध' का सीधा सा अर्थ है 'भारत का ज्ञान', 'भारत की चेतना' अथवा 'भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति जागरूकता'। यह एक अवधारणा है जो भारत के इतिहास, संस्कृति और मूल्यों की गहरी समझ को बढ़ावा देना चाहती है। 2017 में नई दिल्ली में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में इसे 'भारत के विचार' के रूप में रेखांकित किया गया था। सेमिनार का आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल (बीएसएम) द्वारा किया गया था, जो पारंपरिक भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाला शैक्षिक संगठन है।

'भारतबोध' की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि भारत के पास एक अद्वितीय सभ्यतागत विरासत है जो संरक्षित करने योग्य है। भारतीय शिक्षण मंडल का तर्क है कि वैश्वीकरण और सांस्कृतिक समरूपीकरण की ताकतों द्वारा इस विरासत को नष्ट किया जा रहा है। उनका मानना ​​है कि भारतबोध भारत के अतीत और वर्तमान की गहरी समझ प्रदान करके इन ताकतों का मुकाबला करने में मदद कर सकता है। इसे 'ग्लोबल' होती जा रही दुनिया में 'लोकल' को सहेजने का भारतीय अभियान भी कहा जा सकता है। इसके लिए भारत शिक्षण मंडल ने पांच स्तंभों पर आधारित पाठ्यक्रम भी विकसित किया है। इसके अंतर्गत- 

1. इतिहास (प्राचीन काल से लेकर आज तक भारत का इतिहास),

2. संस्कृति (भारतीय कला, साहित्य और दर्शन),

3. मूल्य (भारतीय सभ्यता के मूलभूत जीवनमूल्य, जैसे अहिंसा, सहिष्णुता और करुणा),

4. विज्ञान और प्रौद्योगिकी (विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत का योगदान) और

5. वैश्विक आउटरीच (विश्व में भारत की भूमिका और अन्य संस्कृतियों के साथ इसके संबंध) 

- शामिल हैं। भारतबोध के शिक्षण का समर्थन करने के लिए पाठ्यपुस्तकों, वीडियो और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों सहित कई प्रकार की शैक्षिक सामग्री भी विकसित की गई है।

कहना न होगा कि भारतबोध की अवधारणा को मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। कुछ लोगों ने भारत की अनूठी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के एक तरीके के रूप में इसका स्वागत किया है, तो दूसरे कुछ ने इसे हिंदू राष्ट्रवाद का एक रूप बताकर इसकी आलोचना भी की है। विवाद अपनी जगह है, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सजता कि भारतबोध की अवधारणा भारत में लोकप्रियता हासिल कर रही है।

भारतबोध की अवधारणा को परिपुष्ट करने में पं. दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का योगदान अविस्मरणीय है। वस्तुतः पं. दीन दयाल उपाध्याय भारतबोध के विचार के प्रमुख प्रस्तावक थे। उनका मानना ​​था कि भारत के पास एक अद्वितीय सभ्यतागत विरासत है जो संरक्षित करने योग्य है। उन्होंने तर्क दिया कि वैश्वीकरण और सांस्कृतिक समरूपीकरण की ताकतों द्वारा इस विरासत को नष्ट किया जा रहा है। उनका मानना ​​था कि भारतबोध भारत के अतीत और वर्तमान की गहरी समझ प्रदान करके इन ताकतों का मुकाबला करने में मदद कर सकता है। अपने लेखन में डॉ. उपाध्याय ने अक्सर 'एकात्म मानववाद' के महत्व के बारे में चर्चा की है। एकात्म मानववाद एक ऐसा दर्शन है जो सभी चीजों की परस्पर संबद्धता पर जोर देता है। यह व्यक्तिवाद के विचार को खारिज करता है और इसके बजाय समुदाय और सहयोग के महत्व पर जोर देता है। डॉ. उपाध्याय का मानना ​​था कि एकात्म मानववाद भारत की अद्वितीय सभ्यतागत विरासत को संरक्षित करने का सबसे अच्छा तरीका है। उन्होंने तर्क दिया कि एकात्म मानववाद एक ऐसे समाज के निर्माण में मदद करेगा जो अहिंसा, सहिष्णुता और करुणा के सिद्धांतों पर आधारित होगा।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतबोध के विचार के एक अन्य प्रमुख प्रस्तावक थे। वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। मुखर्जी का मानना ​​था कि भारत एक अद्वितीय संस्कृति और विरासत वाला एक 'आध्यात्मिक राष्ट्र' है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत को एक 'हिंदू राष्ट्र' होना चाहिए, जिससे उनका अभिप्राय एक ऐसे राष्ट्र से था जो 'हिंदू मूल्यों पर आधारित' हो। अपने लेखन में मुखर्जी ने अक्सर 'राष्ट्रीय एकता' के महत्व के बारे में चर्चा की है। राष्ट्रीय एकीकरण किसी राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों को एक साथ लाकर एक एकीकृत इकाई बनाने की प्रक्रिया है। मुखर्जी का मानना ​​था कि भारत के भविष्य के लिए राष्ट्रीय एकता आवश्यक है। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय एकता से एक मजबूत और एकजुट भारत बनाने में मदद मिलेगी। डॉ. उपाध्याय और मुखर्जी दोनों का मानना ​​था कि भारतबोध भारत के भविष्य के लिए आवश्यक है। उनका मानना ​​था कि भारतबोध भारत की अद्वितीय सभ्यतागत विरासत को संरक्षित करने और एक मजबूत और एकजुट भारत बनाने में मदद करेगा। डॉ. उपाध्याय और मुखर्जी के विचारों का भारतीय राजनीति और समाज पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। उन्होंने साहित्य को भी कहीं प्रत्यक्षतः तो कहीं परोक्षतः प्रभावित किया है।

यदि भारतबोध को एक आलोचना दृष्टि के रूप में ग्रहण किया जाए, तो कहना होगा कि हिंदी के भक्ति काल, नवजागरण काल, जागरण-सुधार काल और छायावाद काल के साहित्य में भारतबोध किसी भी प्रकार के मतवादी आग्रह से परे, सहज रूप में अभिव्यक्त हुआ है। छायावाद के बाद विचारधाराओं के आग्रह के कारण भारतबोध के स्वर नेपथ्य में अवश्य चले गए, लेकिन लुप्त कभी नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह रहा कि हिंदी साहित्य कहीं भी भारतीय संस्कृति से विमुख नहीं हुआ। जहाँ जहाँ साहित्य ने भारतीय संस्कृति को सम्मुख रखा, वहाँ वहाँ भारतबोध की मुखरता ध्यान खींचती है।

स्मरणीय है कि भारतीय संस्कृति भारतवर्ष में बसे हुए विभिन्न मानव समुदायों की हजारों वर्षों की उस साधना का परिणाम है जो उन्होंने जीवन को उत्कृष्ट, उदात्त और श्रेष्ठ बनाने के लिए की। मनुष्य को उसके आदिम स्तर से उठाकर दिव्यता से भर देने के लिए जुड़े जो प्रयास अलग-अलग देशकाल में संपन्न हुए, यह संस्कृति उन्हीं का संपुंजन है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति मनुष्य के भीतर छिपी हुई उसकी दिव्यता को प्रकाशित करने के प्रयत्नों का सामूहिक नाम है। यह इतनी बहुआयामी है कि इसका कोई एक लक्षण निर्धारित नहीं किया जा सकता।

इसमें संदेह नहीं कि भारतवर्ष मनुष्यों का ऐसा महासमुद्र है जिसमें अनेक मानव समूह समय-समय पर आकर घुलते-मिलते गए हैं और इसकी सामासिक संस्कृति का निर्माण करते चले हैं। कई बार लोग यह कहते सुने जाते हैं कि भारत में ‘कई’ संस्कृतियाँ हैं। हम कहना चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति तो ‘एक’ ही है, लेकिन उसका सृजन करने वाली सांस्कृतिक धाराएँ अनेक हैं। महासमुद्र में मिल जाने पर अलग-अलग नदियों की धाराओं की पहचान खोजना पानी पर नाम लिखने जैसा व्यर्थ प्रयास कहा जाएगा। इन विभिन्न धाराओं में जो ‘अविरोधी भाव’ है वही भारतीयता है, भारतीय संस्कृति का केंद्रीय मूल्य है; और भारतबोध का आधार भी। विरोधों को खोज-खोज कर रेखांकित करना संस्कृति की सामासिकता को विघटित करने जैसा है। “जंगल में जिस प्रकार लता, वृक्ष और वनस्पति अपने अदम्य भाव से उठते हुए पारस्परिक सम्मिलन से अविरोधी स्थिति प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय जन अपनी संस्कृति के द्वारा एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र में रहते हैं।” (अग्रवाल, वासुदेवशरण: ‘राष्ट्र का स्वरूप’; पृथिवी पुत्र)। सामूहिकता, सहअस्तित्व अथवा अविरोधी भाव की व्याख्या करते हुए डॉ. देवेंद्रनाथ शर्मा ने सही कहा है कि, “रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, उत्सव-त्योहार सब एक-एक हैं। एक कतार में खड़े कर दिए जाएँ तो कहना असंभव होगा कि कौन हिंदू है, कौन मुसलमान, कौन ब्राह्मण, कौन क्षत्रिय, कौन वैश्य, कौन शूद्र। बिना बताए बगल के गाँव का भी कोई व्यक्ति इसका अंतर नहीं समझ सकता। भारत से जो लोग विदेश जाते हैं, वे सब के सब भारतीय समझे जाते हैं।... हमारी न तो ब्राह्मण संस्कृति है, न क्षत्रिय संस्कृति, न लुहार संस्कृति, न सुनार संस्कृति, न बढ़ई संस्कृति, न जुलाहा संस्कृति। ये तो विभिन्न पेशों के वर्ग हैं। संस्कृति सबकी एक ही है और वह है भारतीय संस्कृति। रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार, रस्म-रिवाज प्रायः एक ही हैं।” (शर्मा, देवेंद्रनाथ: भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता: निबंधश्री: पृ. 75-76)।

अपने समस्त सांस्कृतिक वैभव को सुरक्षित रखने और संवर्द्धित रूप में अगली पीढ़ियों को सौंपने की जिम्मेदारी प्रत्येक ‘वर्तमान’ की होती है। कहना यह भी होगा कि आज इस समेकित विरासत के विभक्त होकर बिखर जाने का ख़तरा हमारे सामने है। इसीलिए सांस्कृतिक दृष्टि से हमारे समय की सबसे पहली चुनौती इस संस्कृति के स्वरूप को बनाए रखने की है। आवश्यकता इस बात की है कि “देश के विभिन्न अंगों को अलग-अलग लीकों में पड़कर विच्छिन्न हो जाने से बचाने के लिए प्रयत्न किया जाए। सदियों से साथ रहने वाले समाज क्रमशः एक-दूसरे से इतना परे हट जाएँ कि जब एक-दूसरे की ओर देखें तब उनकी आँखों में सख्य का आलोक न हो, जिज्ञासा अथवा कौतूहल का आकर्षण भी न हो, केवल घनीभूत अपरिचय और उपेक्षा एक पत्थर की दीवार की तरह बीच में खड़ी हो जाय – यह किसी भी देश के लिए स्वयं एक भारी ट्रेजेडी है।” (अज्ञेय: पुराण और संस्कृति: निबंधश्री: पृ. 68)। इस ट्रेजेडी की रचना उन तत्वों ने की है जिनकी सत्ता देश को बिखेरे रखकर ही बनी रह पाती है। ऐसी शक्तियाँ हमारी उपलब्धियों को भी हमारी न्यूनताओं के रूप में देखती-दिखाती हैं तथा हमारी परंपराओं, मिथकों, पुराणों और इतिहास की विकृत व्याख्याएँ करके देशवासियों को एक-दूसरे के विरुद्ध खडा कर देती है। संप्रदाय, भाषा, जाति, दल, नस्ल और विचारधारा पर आधारित इन कट्टरवादी और पृथकतावादी ताकतों को पहचाने और निष्प्रभावी बनाए बिना भारतीय संस्कृति और भारतबोध का संरक्षण और संवर्धन नहीं हो सकता।

वर्तमान में संपूर्ण विश्व इस भय से ग्रसित है कि जाने कब पृथ्वीवासियों को उपलब्ध सारे प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो जाएँ। खतरा इतना बढ़ गया है कि शुद्ध हवा और पानी भी क्रमशः लुप्त होने के कगार पर हैं। भविष्य की चिंता करने वाले तो यहाँ तक सलाह देने लगे हैं कि मनुष्यों को शीघ्र ही पृथ्वी को छोड़कर कहीं और बसेरा ढूँढ़ लेना चाहिए। इसका अर्थ है कि उन्हें यह लगता है कि धरती पर मानव-अस्तित्व-विरोधी परिस्थितियाँ इतनी विकट हो चुकी हैं कि उनका कोई इलाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को बिगाड़ने के कारण पैदा हुई है। पाश्चात्य देशों की संस्कृतियाँ यह मानती हैं कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी है और प्रकृति की रचना मनुष्य के लिए हुई है। यही कारण है कि इन संस्कृतियों की प्रेरणा से मनुष्य ने प्रकृति का क्रूरतापूर्वक दोहन और शोषण किया है तथा हवा और पानी तक का संकट खुद पैदा किया है। इस संकट का समाधान भारतीय संस्कृति के पास है। हमारी संस्कृति में प्रकृति को पूज्य माना गया है। मनुष्य उसका स्वामी नहीं, बल्कि वह मनुष्य की माता है। माता और संतान के संबंध का यह भाव यदि आज के मनुष्य के भीतर पैदा किया जा सके, तो जितना कुछ बिगड़ा है उसे सुधारा जा सकता है। बात केवल इतनी ही नहीं है, बल्कि यह सारा का सारा जीवनमूल्य और नैतिकता की भिन्नता का मामला है। भारतबोध का सर्वाधिक ज़ोर भारतीय जीवनमूल्यों और नैतिकता की पुनर्स्थापना पर है, जिसके केंद्र में पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) की समझ विद्यमान है।

भारतीय मूल्य दृष्टि जीवन के दो मुख्य लक्ष्य मानती है – अभ्युदय (प्रोस्पेरिटी) और निःश्रेयस (लिबरेशन)। अभ्युदय से जुड़े हैं धर्म, अर्थ और काम; तथा निःश्रेयस से जुड़ा है मोक्ष। ये चारों जीवनमूल्य या पुरुषार्थ परस्पर निर्भर हैं। धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करते हुए, अर्थ अर्थात भौतिक सुख साधन अर्जित करना और कामनाओं को इस प्रकार पूर्ण करना कि यह सारी प्रक्रिया धर्मसम्मत बनी रहे, अभ्युदय का नैतिक आधार है। इसके साथ ही भोग में त्याग की वृत्ति बने रहना लोक कल्याण की प्रेरणा देता है। ऐसा व्यक्ति या ऐसा समाज ही तृप्ति की एक सीमा पर पहुँचकर अपने समस्त अर्जित को लोक के लिए अर्पित कर सकता है। इस विसर्जन से ही मोक्ष की भूमिका तैयार होती है। भारतीय अर्थशास्त्र का सार यह है कि उत्पादन का मोक्ष उपभोग में नहीं, दान में है। इसी सूत्र को आज भी यह विश्व अपना ले, तो बाजारवाद की तमाम विकृतियों पर विजय प्राप्त करके ‘कुटुंब भाव’ की प्रतिष्ठा की जा सकती है। अभिप्राय यह है कि भारतीय संस्कृति आज की दुनिया को साहचर्य, सामूहिकता और सहअस्तित्व को संभव बनाने वाला ‘कुटुंब भाव’ सौगात के रूप में दे सकती है. ‘कुटुंब भाव’ से हमारा अभिप्राय है, अपने हित से पहले विश्व परिवार के अन्य सदस्यों के हित की चिंता करना।

भारतीय संस्कृति की परंपरा बहुत पुरानी है। तरह-तरह के आक्रमणों के कारण इस परंपरा का काफी हिस्सा क्षत-विक्षत और नष्ट हो गया. फिर भी, लोक संपदा के रूप में जितना कुछ बचा है, वह भी कम नहीं है. उसे सहेजने तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की कसौटी पर परखने और उसे नया जीवन देने की बड़ी आवश्यकता है। ज्योतिष, योग, चिकित्सा, ललित कला, कृषि, प्रबंधन, राजनय, शिक्षा, वास्तु, मौसम विज्ञान आदि अनेक जीवनोपयोगी ज्ञान क्षेत्रों में भारत ने जो कुछ अर्जित किया, वह शास्त्र और लोक दोनों में फैला पड़ा है। इसे समेटा और सहेजा न गया तो यह नष्ट हो सकता है। इसलिए आज के संस्कृतिकर्मी के समक्ष इस सारी संपदा को संरक्षित करने की बहुत बड़ी चुनौती उपस्थित है, क्योंकि इस संपदा से ही हमारे सांस्कृतिक वैभव का निर्माण होता है।

यहाँ भाषा और साहित्य की चर्चा करना इसलिए भी आवश्यक है कि किसी भी राष्ट्र की संस्कृति साहित्य और भाषा द्वारा ही सँभालकर भावी पीढ़ियों को हस्तांतरित की जाती है। किसी एक साहित्यिक कृति का खो जाना या विकृत हो जाना संस्कृति के किसी पक्ष का खो जाना या विकृत हो जाना है। इसी प्रकार किसी एक मातृभाषा का लुप्त हो जाना भी उसके साथ जुड़ी हुई समूची सांस्कृतिक विरासत का लुप्त हो जाना है। नित नएपन की झोंक में यदि हम अपने साहित्य को विकृत करते हैं, या भाषा के एक भी प्रतीक को मर जाने देते हैं, शब्दों को प्रचलन के बाहर चला जाने देते हैं, साहित्यिक धाराओं को लुप्त हो जाने देते हैं, तो वस्तुतः हम संस्कृति की हत्या कर रहे होते हैं! अतः आवश्यकता इस बात की है कि हजारों मातृभाषाओं और जनभाषाओं से लेकर अनेक क्लासिक भाषाओं तक की विराट भाषिक और साहित्यिक संपत्ति को हम सँभालकर रखें, उसे समझें और समझाएँ तथा उसमें निहित उच्च मानवीय मूल्यों और उदात्त भारतीय संस्कृति को विश्व के समक्ष रखें।

वर्तमान संदर्भ में यह पूछा जा सकता है कि भारतबोध के विकास की दृष्टि से नए भारत के साहित्य से क्या अपेक्षाएँ हो सकती हैं। सो, इस दिशा में सबसे पहली अपेक्षा है कि हमारा साहित्य भारत के इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ को व्यक्त करे। ज्ञान और समझ को व्यक्त करने के लिए साहित्य एक शक्तिशाली उपकरण हो सकता है। भारत के अतीत और वर्तमान के विमर्श के सहारे साहित्य भारत के समृद्ध इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। दूसरी अपेक्षा है कि साहित्य में भारत की विविधता का उत्सव रूपायित होता दिखाई दे। भारत अपने लोगों और संस्कृतियों दोनों के मामले में महान विविधता का देश है। साहित्य भारत को बनाने वाले विभिन्न लोगों और संस्कृतियों को कथ्य बनाकर इस विविधता का जश्न मनाने में भूमिका निभा सकता है। तीसरी अपेक्षा यह है कि साहित्य भारत के मौलिक मूल्यों की पुनः पुष्टि करे। भारतबोध अहिंसा, सहिष्णुता और करुणा जैसे मौलिक भारतीय जीवनमूल्यों के महत्व पर जोर देता है। नए भारत के साहित्य को विभिन्न विधाओं में इन मूल्यों की पुष्टि करने वाला पाठ गढ़ना चाहिए। चौथी अपेक्षा यह है कि वह भारत के भविष्य के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करे। इस तरह हमारा साहित्य भारत के भविष्य की कल्पना का साधन भी हो सकता है। भारत कैसा हो सकता है, इसे कथ्य बनाकर साहित्य लोगों को अपने देश के बेहतर भविष्य की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करने में मदद कर सकता है।

बेशक, ये कुछ उम्मीदें हैं जो भारतबोध के संदर्भ में नए भारत के साहित्य से की जा सकती हैं। याद रहे कि भारत के भविष्य को आकार देने में साहित्य की भूमिका भारत के लेखकों और पाठकों पर निर्भर है। यहाँ ठहरकर, कुछ विशिष्ट उदाहरण दिए जा सकते हैं कि भारतबोध को बढ़ावा देने के लिए साहित्य का उपयोग कैसे किया जा सकता है:

- ऐतिहासिक उपन्यास जो किसी प्रसिद्ध भारतीय नेता या घटना की कहानी कहता हो।

- लघु कथाओं का संग्रह जो भारत की विभिन्न संस्कृतियों का पता लगाता हो।

- कविता जो भारत के लोगों की विविधता का उत्सव मनाती हो।

- नाटक जो आज भारत के सामने आने वाली चुनौतियों और अवसरों की पड़ताल करता हो।

- ग्राफिक उपन्यास जो ऐसे युवा भारतीय की कहानी बताता हो जो दुनिया में अपना स्थान खोजने की कोशिश कर रहा है।

संभावनाएँ अनंत हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि साहित्य का उपयोग उन कथानकों और विमर्शों को रचने के लिए किया जाए, जो भारत और उसके लोगों के लिए सार्थक हों तथा भारत के सांस्कृतिक वैभव को उसके आज से जोड़ सकें।

यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि हम अपने इस सांस्कृतिक वैभव को प्रदर्शित करके न तो किसी को चमत्कृत करना चाहते हैं, न आतंकित। हम यह भी नहीं कहना चाहते कि कोई अन्य संस्कृति या संस्कृतियाँ हमारी संस्कृति से कमतर हैं। हम तो बस अपने सांस्कृतिक गौरव को महसूस करना चाहते हैं – बराबरी के साथ। हमारे इस सांस्कृतिक गौरव का आधार हमारी वह जीवनदृष्टि है जो किसी के साथ भी मेरा-तेरा जैसा भेदभाव नहीं करती, सबमें एक जैसी दिव्यता के दर्शन करती है और संपूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार तथा सारे ब्रह्मांड को अपना घर मानती है- ‘यत्र विश्वं भवत्येक नीडम्’। 000

- ऋषभदेव शर्मा

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

विश्व स्तर पर शक्ति की भाषा बनती हिंदी

 




विश्व स्तर पर शक्ति की भाषा बनती हिंदी

  • ऋषभदेव शर्मा 


नवंबर 2022 में दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं वाले 20 देशों के समूह जी-20 के बाली (इंडोनेशिया) में आयोजित शिखर सम्मेलन में वैश्विक राजनीति, अर्थनीति और कूटनीति की तमाम चर्चाओं से इतर जिस एक बात को खास तौर से हिंदी भाषा की वैश्विक स्वीकृति के उदाहरण के रूप देखा जा सकता है, वह रही अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता जेड तरार की सक्रिय उपस्थिति। जेड तरार हिंदी में उच्च कोटि की प्रवीणता रखते हैं। उन्होंने तमाम चैनलों को हिंदी में  साक्षात्कार दिया। अनुवादक की भूमिका तो निभाई ही। उनकी उपस्थिति इस तथ्य का प्रमाण है कि हिंदी अब विश्व स्तर पर 'शक्ति की भाषा' बन रही है। जैसे जैसे भारत विश्व की अग्रणी आर्थिक, व्यावसायिक और सामरिक ताकत बनता जा रहा है, वैसे-वैसे हिंदी को भी ताकत मिल रही है। भारत का सशक्त होना भारत की भाषा का भी तो सशक्त होना है न! हम सशक्त होंगे, तो दुनिया हमारी भाषा खुद ब खुद सीखेगी और बोलेगी। ऐसा होगा, तभी कहा जा सकेगा कि भारत ने 'भाषिक आज़ादी' हासिल कर ली है। तब भारत 'अंग्रेज़ी भाषा का उपनिवेश' नहीं रहेगा! 


समय समय पर भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा होने की हिंदी की योग्यता और संवैधानिकता को लेकर उठने वाले राजनैतिक विवादों और मतभेदों के बावजूद, समसामयिक परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा के महत्व को रेखांकित करने की दृष्टि से पिछले दस वर्ष के भारतीय राजनीति और वैदेशिक कूटनीति के परिदृश्य का अवलोकन करने से यह स्पष्ट होता है कि इस अवधि में कूटनैतिक और वैदेशिक संबंधों के क्षेत्र में हिंदी ने अपनी साफ-साफ आहट दर्ज कराई है। प्रधानमंत्री द्वारा कूटनैतिक चर्चाओं और औपचारिक संबोधनों के लिए विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी के व्यवहार से विश्व बिरादरी को यह संकेत मिला है कि भारत की भी अपनी राजभाषा (राष्ट्रभाषा) है और यदि वह इसके प्रयोग का आग्रही हो तो विशालतम गणतंत्र की अस्मिता की इस भाषा को दुनिया को इस देश के साथ संबंधों की खातिर व्यवहार में स्वीकार करना होगा। 


भाषा यदि राष्ट्रीय गौरव का एक प्रतीक है तो यह कहना होगा कि भले ही 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में संविधान ने अधिकृत कर दिया हो, व्यवहारतः विश्व बिरादरी के बीच भारत अब तक अंग्रेज़ी ही बरतता रहा है और धिक्कारा जाता रहा है: ऐसे में यदि भारत के प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्री/ अधिकारी राष्ट्रीय/ अंतरराष्ट्रीय औपचारिक अवसरों पर अपने वक्तव्य हिंदी में देने का नैतिक साहस दिखाते रहें तो इसे कूटनैतिक और वैदेशिक संबंधों के स्तर पर हिंदी के महत्व को स्थापित करने की पहल के रूप में देखना उचित होगा। इससे हिंदी को विश्वस्तरीय संबंधों की माध्यम-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने के अवसर मिलेंगे तथा विदेशों में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने को बढ़ावा मिलेगा। मानवीय और मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में भी हिंदी की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और जानबूझ कर इस भाषा की उपेक्षा करने वाले दूतावासों में इसे सम्मान मिलने की शुरूआत होगी। 


इस प्रकार के संकेत मिलने लगे है कि सभी देशों ने हिंदी से जुड़ने की दिशा में सोचना आरंभ कर दिया है। उदाहरणार्थ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के साथ विश्व के कई सारे बड़े देशों के विश्वविद्यालयों से हिंदी पढ़ाने की जिम्मेदारी के समझौते हुए हैं। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तो इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा ही रहा है। इसके अंतर्गत एक अनिवार्य पाठ्यक्रम ‘भारत परिचय’ का भी है जिसमें विशेष बल 1857 के बाद के अर्थात आधुनिक भारत पर है। अभिप्राय यह है कि आने वाले समय में विश्व स्तर पर आर्थिक-राजनैतिक परिवर्तनों के साथ हिंदी के जुड़ाव के लक्षण दिखाई देने लगे हैं।


कोई भी भाषा तभी महत्वपूर्ण और सर्वस्वीकार्य होती है, जब वह अपने आपको निरंतर प्रगति की संस्कृति से जोड़कर नए नए प्रयोजनों (फंक्शंस) के अनुरूप अपनी क्षमता प्रमाणित करे। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी ने अपना यह सामर्थ्य पिछले दशकों में सिद्ध कर दिखाया है कि वह विश्व मानव के जीवन व्यवहार के समस्त पक्षों को अभिव्यक्त करने वाली सर्वप्रयोजनवाहिनी भाषा है। बीज रूप में कहना हो तो हिंदी के महत्व का आज के परिप्रेक्ष्य में पहला समसामयिक प्रयोजन क्षेत्र कूटनैतिक और वैदेशिक संबंधों (डिप्लोमेसी) की भाषा का है, तो दूसरा पहलू शासन (गवर्नेंस) की भाषा का। तीसरा क्षेत्र प्रतियोगिता परीक्षाओं और रोजगार दिलाने वाली भाषा का; और चौथा चुनाव तथा राजनीति की भाषा का है। हिंदी की शक्ति के पाँचवें आयाम के रूप में मीडिया की भाषा को देखा जा सकता है, जिसके अंतर्गत प्रिंट और इलेक्ट्रानिक जनसंचार माध्यमों के अलावा फिल्म और नए (सोशल) मीडिया पर हिंदी के प्रभावी प्रसार का आकलन करना होगा। सूचना उद्योग हो या मनोरंजन उद्योग, बहुभाषी होना और हिंदी का व्यवहार करना, दोनों क्षेत्रों में सफलता की गारंटी सरीखा है। इससे रंग-बिरंगी हिंदी के जो रूप सामने आ रहे हैं, वे हिंदी की लचीली और सर्वग्राही प्रवृत्ति के प्रमाण भी हैं और परिणाम भी। भाषा मिश्रण पर नाक भौं सिकोड़ने वालों को हिंदी की केंद्रापसारी प्रवृत्ति और अक्षेत्रीय व समावेशी स्वभाव को ध्यान में रखना चाहिए अन्यथा वे इसके बहुप्रयोजनीय स्वरूप के विकास में रोडे ही अटकाते रहेंगे। इसे भाषा के खिचड़ी हो जाने की अपेक्षा प्रयोजन-विशेष के लिए लचीलेपन के रूप में ही ग्रहण किया जाना उचित होगा। अर्थात, हिंदी की पहले से विद्यमान और स्वीकृत सामाजिक शैलियाँ (हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी) अब भी अपनी जगह हैं और जीवंत प्रयोग में हैं तथा आगे भी रहेंगी, लेकिन हिंदी के जो नए रूप आज मीडिया के माध्यम से उभर रहे हैं, उन्हें भी नई शैली के रूप में स्वीकारना ज़रूरी है। उन्हें 'हिंगलिश' कहकर हिकारत की नज़र से देखना हिंदी को सीमित करना होगा। दरअसल, हिंदी की इन विविध शैलियों के प्रयोग के संदर्भ अलग-अलग हैं,  जो भाषा के बहुआयामी विकास के ही प्रतीक हैं। 


इसी से हिंदी की शक्ति का छठा आयाम भी जुड़ा हुआ है जो विज्ञापन की भाषा से संबंधित है। कहना न होगा कि उत्तरआधुनिक भूमंडलीकृत विश्व वस्तुतः भूमंडीकृत विश्व है। इस भूमंडी या अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के जितने बड़े हिस्से को कोई भाषा संबोधित कर सके वह उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। हिंदी विज्ञापन भारत ही नहीं, दक्षिण एशिया और अरब देशों तक के उपभोक्ता को और साथ ही दुनिया भर में बसे भारतवंशियों को संबोधित और आकर्षित करने में सक्षम हैं; क्योंकि दुनिया भर में हिंदी समझने वालों की तादाद सर्वाधिक नहीं तो सर्वाधिक के आसपास अवश्य है। अतः ग्लोबल मीडिया और बाज़ार दोनों की भाषा की दृष्टि से अब कोई हिंदी को नकार नहीं सकता। 


यहीं हिंदी भाषा की शक्ति का सातवाँ बिंदु सामने आता है जिसका संबंध ज्ञान, विज्ञान और विमर्श की भाषा से है। भाषिक प्रयुक्तियों, तकनीकी शब्दावलियों और अभिव्यक्तियों की दृष्टि से हिंदी का भंडार अकूत है, लेकिन शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषाओं को स्वीकार न करने के कारण सभी भारतीय भाषाओं सहित हिंदी के प्रयोक्ता संदेह, संशय और हीन भावना के शिकार हैं। अब नई 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' के तहत भारतीय भाषाओं को उच्च और तकनीकी शिक्षा तक अपनाने की जो शुरूआत हुई है, उसके मार्ग में बाधाएँ ज़रूर हैं, लेकिन क्रमशः स्वीकार्यता बढ़ना भी तय है।  समाज को अंग्रेजीपरस्त औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आकर स्वतंत्र लोकशाही जैसा आचरण सीखना होगा और बुद्धिजीवियों को ‘निजभाषा’ के व्यवहार से जुड़े आत्मगौरव को अर्जित करना होगा। आज ज्ञान-विज्ञान-विमर्श के हर पक्ष को व्यक्त करने में हिंदी समर्थ हो चुकी है। पर जाने हमारे बुद्धिजीवी अपनी भाषा के व्यवहार में कब समर्थ होंगे? कहना न होगा कि भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठित करने के प्रावधान इस दृष्टि से अत्यंत महतवपूर्ण हैं। 


हिंदी की शक्ति का आठवाँ आयाम भारत की संपर्कभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा के 'थ्री-डाइमेंशनल' प्रकार्य से आगे बढ़कर 'फोर्थ डाइमेंशन' के रूप में विश्वभाषा बनकर उभरने से संबंधित है। इसका एक पक्ष तो राजनैतिक और कूटनैतिक है – संयुक्त राष्ट्र की भाषा के रूप में। विश्व हिंदी सम्मेलनों के बार बार ज़ोर देने का असर यह हुआ है कि सरकार इस ओर सचेत हुई है। इसी का परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने हिंदी भाषा को अपनी भाषाओं में शामिल कर लिया है। संयुक्त राष्ट्र के 1946 में पारित प्रस्ताव 13 (1) के तहत कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य को तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि दुनिया के लोगों को इसकी जानकारी नहीं हो जाती। इसी उद्देश्य के तहत अब हिंदी भाषा को भी संयुक्त राष्ट्र की भाषाओं में तो शामिल कर लिया  गया है, परंतु उसका संयुक्त राष्ट्र की 'आधिकारिक भाषा' बनना अभी बाकी है। लेकिन विश्वभाषा का दूसरा पक्ष शुद्ध रूप से व्यावहारिक है। व्यवहारतः आने वाले समय में वे भाषाएँ ही विश्वभाषा के रूप में टिकेंगी जिनमें बाज़ार की भाषा और कंप्यूटर की भाषा के रूप में टिके रहने की शक्ति होगी। बाजार की चर्चा पहले ही की जा चुकी है, रही कंप्यूटर की बात, तो आज यह जगजाहिर हो चुका है कि हिंदी कंप्यूटर  के लिए और कंप्यूटर  हिंदी के लिए नैसर्गिक मित्रों जैसे सहज हो गए हैं। हिंदी के कंप्यूटर-दोस्त होने के कारण तमाम सॉफ्टवेयर कंपनियाँ अब ऐसे उपकरण और कार्यक्रम लाने को विवश हैं जो हिंदी-दोस्त हों। दरअसल हिंदी ने साबित कर दिया है कि वह ‘दोस्त भाषा’ है – मीडिया की दोस्त, बाजार की दोस्त, कंप्यूटर की दोस्त। 


इस प्रकार एक सशक्त विश्वभाषा के रूप में भी अपने प्रकार्य को निभाने में हिंदी निरंतर अग्रसर है। इतना ही नहीं, वह कॉर्पोरेट जगत के दरवाज़े पर भी आ खड़ी हुई है तथा अंदर प्रवेश करने के लिए नया 'सोशियो-टेक्नोलॉजिकल' अवतार ले चुकी है। यही नहीं, अनुवाद-उद्योग की भाषा के रूप में हिंदी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में अत्यंत संभावनाशील और समर्थ भाषा के तौर पर अपने महत्व के नौवें आयाम को छू रही है। 


इसके अलावा अपने जन्म से ही साहित्य और संस्कृति की भाषा के तौर पर स्वयंसिद्ध सामर्थ्य आज भी हिंदी की प्रामाणिकता की दसवीं दिशा है, जिसके द्वारा वह विश्व मानवता के भारतीय आदर्श को परिपुष्ट करती है। इसी से जुड़ा है हिंदी भाषा की शक्ति का ग्यारहवाँ आयाम, जो राष्ट्रीय अस्मिता और निजभाषा के गौरव से संबंधित है। कहना न होगा कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, वह भारतीय अस्मिता का पर्याय है – हम चाहे कितनी ही मातृबोलियों और मातृभाषाओं का व्यवहार करते हों, हिंदी उन सबमें निहित हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनकर उभरती है। 


निस्संदेह, हिंदी के महत्व के और भी अनेक आयाम हैं, लेकिन वे सब इस विराट आयाम में समा सकते हैं। वस्तुतः ‘निजभाषा उन्नति’ से जुड़े राष्ट्रीय गौरव के बोध के बिना हृदय की वह पीड़ा मिट ही नहीं सकती जिसके दंश का अनुभव करके कभी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पराधीन देश को अहसास कराया था कि ‘बिन निजभाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल!’ हिंदी भाषा की इस शक्ति का बारहवाँ आयाम इसकी विश्व के अनेक देशों में प्रवासी भारतवंशियों के माध्यम से सजीव उपस्थिति से निर्मित होता है, जिसके अनेक उप-आयाम हैं। उनकी चर्चा फिर कभी। अभी इतना ही कि हिंदी हर लिहाज से वैश्विक स्तर पर शक्ति की भाषा के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। 000


  • प्रो. ऋषभदेव शर्मा, 


बुधवार, 25 मई 2022

आज़ादी आंदोलन : दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार और हिंदी पत्रकारिता

 


बीज व्याख्यान

आज़ादी आंदोलन : दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार और हिंदी पत्रकारिता

-        ऋषभदेव शर्मा

 

सबसे पहले तो आपको इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए इतना प्रासंगिक और विचारोत्तेजक विषय चुनने के लिए साधुवाद। इस विषय के स्पष्टतः तीन आयाम हैं। पहला आयाम है 'आजादी आंदोलन' दूसरा 'दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार' और तीसरा 'दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता'

मेरा विचार है कि 'आजादी आंदोलन' शब्द-युग्म बहुत सोच-समझ कर बनाया गया है। इसी प्रकार का प्रयोग है- 'आज़ादी का अमृत महोत्सव'  जब हमअमृत महोत्सवजैसे तत्सम शब्द-युग्म का प्रयोग कर रहे हैं तो 'स्वतंत्रता' का प्रयोग करके 'आज़ादी' को रखा गया है। इस मिश्रित शब्द-चयन की जड़ आज़ादी की लड़ाई के साथ-साथ विकसित हुए हिंदी आंदोलन के इतिहास में है। भाषा, पत्रकारिता, समाज और राजनीति के तत्कालीन चिंतकों ने यह महसूस किया कि अखिल भारतीय सार्वदेशिक संपर्क की भाषा से लेकर स्वाधीनता संग्राम की राष्ट्रभाषा तक के रूप में हिंदी की स्वीकार्यता तभी संभव है, जबकि वह संस्कृतनिष्ठ और अरबी-फारसीनिष्ठ होने के आग्रह से मुक्त रहे। इसीलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महात्मा गांधी और प्रेमचंद तक ने जन-प्रचलित हिंदी के मध्यमार्ग को चुना। बाद में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 351 के तहत इसे ही भारत करे सामासिक संस्कृति के अनुरूप सब भाषाओं से शब्द और अभिव्यक्तियाँ लेते हुए इस तरह विकसित करने की बात कही गई कि हिंदी की प्रकृति सुरक्षित रहे। तो, मेरी समझ में 'आज़ादी आंदोलन' पद हिंदी प्रचार आंदोलन की इसी सर्वसमावेशी दृष्टि का प्रतीक है। इसी दृष्टि का परिणाम।है कि हमअमृत महोत्सवजैसा एक सांस्कृतिक या संस्कृतनिष्ठ पद लेकर आते हैं और उसके साथआजादीजोड़ते हैं। समन्वय की इस चेतना की आज बड़ी जरूरत है, क्योंकि कई तरह के शुद्धतावादी जड़ आग्रह परिवेश को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं।  इसीलिए मैं कहना चाहूँगा कि  आजादी आंदोलनशब्द-युग्म वास्तव में इस देश की बहुलतावादी और समन्वयवादी संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है। जो हमारी सांस्कृतिक पुष्ट परंपरा है और जो दैशिक अथवा देशज परंपरा है, उन दोनों को परस्पर जोड़कर  इस राष्ट्र की सामासिक संस्कृति का निर्माण होता है। हमारी सामासिक संस्कृति की विशेषता है कि उसमें किसी प्रकार की हठधर्मिता और शुद्धतावाद के लिए जगह नहीं। बल्कि एक-दूसरे को ग्रहण करने की भावना, सर्वग्राह्यता या ग्राहकता अंतर्निहित है। भारतीय संस्कृति की जो ग्राहकता, समन्वयशीलता और  मिश्रणशीलता है, वह आजादी जैसे उर्दू या अरबी-फारसी मूल से आए शब्द और आंदोलन जैसे संस्कृत परंपरा से आए शब्द, इन दोनों, के गले मिलने से तैयार होती है।

यही वह हिंदुस्तानी परंपरा है जो हमें यह बताती है किआजादी आंदोलनहमारे 'नवजागरण आंदोलन' का विस्तार है। नवजागरण आंदोलन     को  राजा राममोहन राय या आर्य समाज या ब्रह्म समाज या नारायण गुरु या रवींद्रनाथ या भारतेंदु हरिश्चंद्र या गुरजाड़ा अप्पाराव से लेकर सुब्रह्मण्य भारती तक ने अपने-अपने ढंग से नेतृत्व प्रदान किया।  वह एक प्रकार से इस देश को जड़ रूढ़ियों से मुक्त करने का आंदोलन था। सोए हुए राष्ट्रीय-सांस्कृतिक गौरव को जगाने का आंदोलन था।    स्वाभिमान जागने पर गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होने की चेतना तो बाद में आई।  पहले तो हमारी जो सामाजिक रूढ़ियाँ थीं, जड़ रूढ़ियाँ थीं, जो अशिक्षा के कारण या कहें मध्यकालीन चेतना के परलोकवाद, पुनर्जन्मवाद इत्यादि के हमारे मानस पर हावी होने के कारण हमारी गुलामी का मूल कारण बनी हुईं थीं, उन बेड़ियों को तोड़ने और काटने का काम नवजागरण आंदोलन कर रहा था।  उस नवजागरण आंदोलन के बीचोंबीच 1857 का हमारा प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष उपस्थित होता है। इसके बाद कंपनी के हाथ से विक्टोरिया के हाथ में भारत की बागडोर चली जाती है और उपनिवेशवाद या औपनिवेशिक शासन अपना नंगा नाच दिखाना शुरू करता है। तो हमाराआजादी आंदोलनआगे चलकर औपनिवेशिक शासन के विरोध के लिए उठ खड़ा होता है। इसीलिए आजादी आंदोलन के  एक पक्ष को मैं नवजागरण आंदोलन के विस्तार के रूप मे आपके सामने रखना चाहता हूँ। साथ ही यह कि औपनिवेशिक शासन और औपनिवेशिक मानसिकता के विरोध की चेतना जगाने में स्वभाषा और पत्रकारिता आंदोलन ने भी केंद्रीय भूमिका निभाई। हमारे आज़ादी आंदोलन का सबसे बड़ा श्रेय यही है कि हमारे देश को हमारे इस आंदोलन ने 'भयमुक्त' कर दिया। हमारे पास दुनिया की सबसे विराट औपनिवेशिक सत्ता से टकराने के लिए गोला-बारूद नहीं था। गोला-बारूद की ताकत पर लड़ते, तो इतिहास कुछ और होता। ठीक है, वैसे भी लड़े हैं।  लेकिन गोला-बारूद से ज्यादा महत्वपूर्ण था, हमारा सिर उठाकर खड़े होना। जब कोई गुलाम सिर उठाकर खड़ा होता है किसी मालिक के सामने; उसकी आँखों मे आँखें डालकर बात करता है तो सामने वाला क्रोध में, अपमान में, प्रतिहिंसा में तिलमिला उठता है। आपको कुछ करने की जरूरत नहीं ! सबसे बड़ी चीज यही है कि कोई जेलेंस्की किसी पुतिन के सामने आँख दिखाकर खड़ा हो जाए। दुनिया भर में यही होता है हमेशा। आक्रमणकारी हों, उपनिवेशवादी हों, साम्राज्यवादी हों- वे सारी ताक़तें जिस एक बात से क्रोध में आती हैं, वह है आपका स्वाभिमान। तो, हमारे आजादी आंदोलन ने इस देश के आबाल-वृद्ध-नर-नारी को भयमुक्त कर दिया। एक वैदिक उद्घोष हैयतेमहि स्वराजये अर्थात हम स्वराज के लिए सदा यत्न करें। यह एक प्रतिज्ञा नवजागरण के आंदोलन से आगे बढ़कर आजादी के आंदोलन ने इस देश के प्रत्येक नागरिक के मन में प्रतिष्ठित कर दी।  स्वतंत्रता की इस चेतना को गांधीजी या उनसे पहले तिलक ने इस देश की नसों में प्रवाहित किया। उनसे भी पहले हिंदी नवजागरण की हम बात करें  या दूसरे प्रांतों के जागरण की बात करें; बंगाल से लेकर के केरल और तमिलनाडु तक सर्वत्र स्वदेशी, स्वराज्य और स्वभाषा- इन तीनस्वकी चेतना को नवजागरण आंदोलन ने पूरी तरह से जगा दिया था। यह काम उस समय का साहित्य और उस समय की पत्रकारिता कर रही थी।

अब थोड़ी चर्चादक्षिण भारत में हिंदी प्रचारकी। दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार की क्या आवश्यकता थी, इस प्रश्न का उत्तर भी आज़ादी आंदोलन के इतिहास में ही छिपा है।  1857 के स्वतंत्रता संग्राम के असफल होने (या कुचल दिए जाने) के कारणों में एक बड़ा कारणसंप्रेषण की कमीथा। क्योंकि हम अलग-अलग भाषाओं में अपने-अपने क्षेत्रों में तो आंदोलन का संचालन कर रहे थे, लेकिन सारे देश का- सारे प्रांतों का जो कोऑर्डिनेशन होना चाहिए था, उस समन्वय की कमी के कारण, संप्रेषण की कमजोरी के कारण, हमारा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम असफल हुआ। अन्य कारण और भी हैं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि पूरे देश में चिंगारी अलग-अलग रूप में फूटी। ये सारी की सारी चिंगारियाँ एकान्वित नहीं हो सकीं। ये गजल के अलग-अलग शेरों की तरह बिखरा हुआ प्रभाव उत्पन्न कर सकीं। गीत के एक सूत्र में पिरोए अलग-अलग बंधों की तरह मिला हुआ एकान्वित प्रभाव ये चिंगारियाँ उत्पन्न नहीं कर सकीं। इसका कारण था - संप्रेषण की कमी। इसीलिए यह महसूस किया गया कि आज़ादी आंदोलन के लिए एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। इसका चरम हमें महात्मा गांधी के उन भाषणों में देखने को मिलता है जो कर्नाटक, इंदौर और भरूच में उन्होंने दिए। अखबारों के माध्यम से भी उन्होंने इस विषय पर व्यापक विमर्श किया कि - इस देश की राष्ट्रभाषा क्या होनी चाहिए?  उसमें कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए? इसके लिए उन्होंने पाँच सूत्र भी दिए। तब एक साल के मंथन के बाद चाहे वे कांग्रेस के अधिवेशन रहे हों, चाहे हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन रहे हों; उनमें यह स्वीकार किया गया कि इस देश की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकती क्योंकि उसमें वे पाँचों ही विशेषताएँ नहीं पाई जातीं। दूसरे कि, जो हमारी भारतीय भाषाएँ हैं, उनमें ही वह सामर्थ्य है कि वे इस देश के हर प्रांत के लोगों को जोड़नेवाली भाषा की भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन उनमें भी स्वतंत्रता आंदोलन के बीच में हमें जब यह काम करना है कि सारे भारतवासियों को आपस में जोड़ सकें, उसके लिए हमें एक ऐसी भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में चाहिए थी जिसे अमलदारों के लिए सीखना आसान हो, जिसे अधिक से अधिक लोगों (हिंदीतर भाषियों को) को कम से कम समय में सिखाया जा सके, जिसके लिए किसी प्रकार का तात्कालिक स्वार्थ ध्यान में रखा जाए और जिसके माध्यम से इस देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की ज्ञान-संपदा को, सभी प्रकार की चेतना को अभिव्यक्त किया जा सके। यह भी ज़रूरी समझा गया कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों, ताकि कम लोगों को उसे आरंभ से सीखने की ज़रूरत हो। और तब पाया गया कि हिंदी इन सब दृष्टियों से भारत के लिए सबसे अधिक समर्थ राष्ट्रभाषा हो सकती है। इस तरह राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार करने के बाद 1918 मेंदक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाकी स्थापना हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय के रूप में की गई। आगे चलकर इसेदक्षिण भारत हिंदुस्तानी प्रचार सभाकहा गया। बाद में 'हिंदुस्तानी' को 'हिंदी' कर दिया गया। मैंने जानबूझ कर आरंभ में जोआजादी आंदोलनशब्द-युग्म की बात उठाई थी, उसका आशय इस ओर इशारा करना था कि महात्मा गांधी 'दक्षिण भारत हिंदुस्तानी प्रचार सभा' कहने के पक्षधर थे। अर्थात उन्हें हिंदी का वह रूप राष्ट्रभाषा के रूप में ज़्यादा पसंद था जिसमें तो उर्दू यानी  फारसी-अरबी के प्रति आग्रह हो, संस्कृत के प्रति आग्रह हो, बल्कि जो बोलचाल के उस मार्ग को स्वीकार करे जिसे आमफहम भाषा कहा जाता है।

इस प्रकार, 1857 से सीख लेकर और महात्मा गांधी के पाँच सूत्रों से अनुप्राणित होकर के 'सभा' की स्थापना की गई। एक प्रकार से दक्षिम भारत में हिंदी प्रचार को 'रचनात्मक कार्य' का अनिवार्य अंग बना दिया गया। महात्मा गांधी ने रचनात्मक कार्य के जो 'एकादश व्रत' स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़कर के दिए थे; उन 11 व्रतों में एक है- ‘स्वदेशीस्वदेशी' और 'स्वराज्यदोनों की सिद्धि के उन्होंनेस्वभाषाको अपनाने पर ज़ोर दिया। कहा जा सकता है कि हिंदी प्रचार आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए गांधी-खादी-हिंदी - ये सब एक तरह से पर्याय थे; भारतीय राष्ट्रीयता के अनन्य प्रतीक थे।  1918 से चला यह हिंदी प्रचार का रथ संपूर्ण दक्षिणावर्त की यात्रा करता हुआ आज भी निरंतर गतिमान है और भारत जननी को एक-हृदय बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा रहा है - एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एक-हृदय हो भारत जननी!

विचारणीय विषय का तीसरा पक्ष है हिंदी पत्रकारिता। नहीं; इसे पूर्वपक्ष के साथ जोड़कर देखना होगा। अर्थातदक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता’! गौरतलब है कि 2021, 2022 या आनेवाला 2023 जो भी वर्ष कह लेंयह पूरा समय दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी का वर्ष है। इसका मध्य बिंदु 2022 हाने से इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में आज़ादी आंदोलन और हिंदी प्रचार के संदर्भ में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता पर विमर्श बेहद प्रासंगिक है। यहाँ से यह संदेश भी पूरे देश में जाना चाहिए कि "इस वर्ष को भारत भर में 'दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी' के रूप में मनाया जाए!"

स्मरणीय है कि हिंदी पत्रकारिता का आरंभ भले हम 'उदंत मार्तंड' से स्वीकार करें या उससे भी पहले असम से प्रकाशित एक ईसाई मत प्रचारक अल्पज्ञान हिंदी पत्र से मानें। लेकिन दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में  हिंदी पत्रकारिता का वास्तविक उद्भव और विकास हिंदी प्रचार आंदोलन के आरंभ होने के बाद ही हुआ। इस लिहाज से 1921 और 1922 की अवधि दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता का आरंभ-बिंदु है।

आप जानते हैं कि पूरे हिंदी क्षेत्र में आजादी और नवजागरण की चेतना को जगाने का भारतेंदु मंडल ने कार्य किया।  भारतेंदु मंडल के तमाम रचनाकार पत्रकार भी थे। हिंदी पत्रकारिता का जन्म ऐसे समय हुआ जब देश में स्वतंत्रता की चिंगारी जाग रही थी और ऐसे समय में हिंदी पत्रकारिता को निखरने का स्वर्णिम अवसर उस आंदोलन के बीच में मिल गया। इधर दक्षिण में 1918 में हिंदी आंदोलन का उदय हो रहा था और उसे गति देने के लिए हिंदी पत्रकारिता की आवश्यकता थी। यह अलग बात है कि जब हम हैदराबाद या तेलंगाना-आंध्रप्रदेश की बात करें तो यहाँ निजाम शासन काल में जो दमन था उसका विरोध करने के लिए हिंदी पत्रकारिता ने एक विद्रोही तेवर स्वीकार किया। यहाँ तक कि भूमिगत पत्रिकाएँ यहाँ से निकलीं। लेकिन विशेष रूप से तमिलनाडु से जो हिंदी पत्रकारिता आरंभ होती है, वह हिंदी प्रचार के निमित्त ही आरंभ हुई थी।| तिलक युग और गांधी युग जिन्हें हम हिंदी पत्रकारिता ही नहीं, भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण युग मानते हैं, उनके बीच में यह दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता तमिल क्षेत्र में निखरकर सामने आई। यहाँ अत्यंत वरिष्ठ अथवा प्रथम पंक्ति के हिंदी प्रचारक आर. सारंगपाणि के ऐतिहासिक महत्व के आलेखदक्षिण की हिंदी पत्र-पत्रिकाएँका हवाला ज़रूरी है।  मैं इसके कुछ अंशों को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जिससे दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के शताब्दी वर्ष का औचित्य और हमारे आज के विषय की प्रासंगिकता दोनों स्पष्ट होंगे।

महात्मा गांधी का, हिंदी आंदोलन का और स्वतंत्रता आंदोलन का संबंध कैसे है यह इस आलेख के पहले ही वाक्य से व्यक्त हो जाता है।महात्मा गांधी द्वारा प्रवर्तित हिंदी प्रचार आंदोलन जब दक्षिण में जोर पकड़ने लगा तब उस आंदोलन के अग्रणियों को सहज ही आनंद होने लगा। उन्होंने अपने आनंद का अनुभव समस्त दक्षिण में फैले हुए अपने अन्यान्य साथियों और सहयोगियों के साथ ही करना चाहा। प्रचारकों ने चाहा कि विभिन्न केंद्रों में प्रचार की परिस्थितियों, प्रगति के विवरणों और अपने-अपने अनुभवों के संबंध में वे आपस में चर्चा करें और आगे का कार्यक्रम बनाने में उससे लाभ उठाएँ।यानी हिंदी पत्रकारिता की जरूरत क्यों महसूस हुई दक्षिण में, वह यहाँ बताया जा रहा है।हिंदी सीखने वाले लोगों ने चाहा कि अपनी पाठ्य-पुस्तकों के अलावा हिंदी की कुछ पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ें और अपनी हिंदी योग्यता बढ़ा लें। प्रचार आंदोलन के संचालकों ने अपनी सेवाओं को कुछ व्यापक, सबल और सामान्य रूप देने का एक सक्षम साधन चाहा बस। सबों की इच्छाओं और माँगों की पूर्त्ति करते हुके प्रचार आंदोलन को व्यापक एवं सामान्य रूप देकर पुष्ट करने के उद्देश्य से मद्रास से एक हिंदी पत्रिका चलाने पर सब जगह ज़ोर दिया जाने लगा। किसी आंदोलन की सिद्धियों पर उत्सव मनाना, प्रगति के विवरण प्रकाशित कर लोगों को प्रोत्साहित करना, खुले तौर पर उसकी समस्याओं की चर्चा करना, सामान्य रूप देकर व्यापक बना देना- ये सब सभा के प्रचार तंत्र के ही भिन्न-भिन्न पहलू होते हैं।  इसीलिए उन्होंने बहुत दूरदर्शिता के साथ निश्चय किया कि दक्षिण मेंहिंदी प्रचार आंदोलनके पोषण के लिए मद्रास से कोई पत्रिका चलाई जाये। फलस्वरूप संवत 1979 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन जनवरी 1923 में मद्रास मेंहिंदी प्रचारकका जन्म हुआ। बाद में यह पत्रिका बंद हो गई और फिरहिंदी प्रचार समाचारके नाम से यह पत्रिका आज तक प्रकाशित होती है। इसलिए जनवरी 1923 हमारे दक्षिण भारत के हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर है। और अब हम उसके शताब्दी वर्ष में गए हैं। वैसे तोहिंदी प्रचारक को दक्षिण से निकली पहली हिंदी पत्रिका नहीं कहा जा सकता। उसके जन्म से करीब तीन साल पहले ही हिंदुस्तानी सेवा दल की तरफ से डॉ. एन. एस. हार्निकर के संपादकत्व मेंस्वयंसेवकनामक हिंदी-अंग्रेजी पत्रिका हुबली से निकलने लग गई थी, जो करीब 10 साल तक निकली थी। फिर उसी समय मद्रास के साहूकार पेट से कांग्रेस प्रचार के लिए उत्साही हिंदी विद्वान श्री क्षेमानंद राहत के संपादकत्व में निकले हिंदी साप्ताहिकतिलकका भी उल्लेख होना चाहिए|’

इस प्रकारस्वयंसेवक', 'तिलक' और 'हिंदी प्रचारक’- ये पत्रिकाएँ 1921 से 1923 की कालावधि में ही आरंभ हुईं। इसीलिए 2022 को दक्षिण भारत के हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के शताब्दी संदर्भ का केंद्रीय वर्ष कहा जा सकता है| आप इसके एक वर्ष पहले भी जा सकते हैं और एक वर्ष आगे भी जा सकते हैं। (कोरोना के कारण सब कार्य बाधित हुए होते, तो इस शताब्दी समारोह का समारंभ संभवत: 2021 में ही होना पूर्णतः सटीक होता!)

आर. सारंगपाणि ने आगे बताया है कि 'हिंदी प्रचारक' के संपादक हुआ करते थे ऋषिकेश शर्मा 'तैलंगऔर इसके प्रकाशक के रूप में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय, ट्रिप्लीकेन, मद्रास का इसके ऊपर उल्लेख था। आवरण के भीतरी पृष्ठ पर 'हिंदी प्रचारक' के तीन मुख्य उद्देश्य अंकित थे-

पहला उद्देश्य था- दक्षिण भारत में राष्ट्रभाषा हिंदी-हिंदुस्तानी का प्रचार करना।  ध्यान रखें आज जब आप हिंदी आंदोलन की बात करते हैं, हिंदी-हिंदुस्तानी प्रचार की बात करते हैं, जन-गण-मन की बात करते हैं या वंदे मातरम की बात करते हैं- इनका उल्लेख करना भी उस जमाने में 'राजद्रोह' हुआ करता था। यह कोई साधारण काम नहीं था, स्वतंत्रता आंदोलन का एक अंग था और इसके लिए हिंदी प्रचारकों को ब्रिटिश शासन द्वारा प्रताड़ित भी किया जाता था।

दूसरा उद्देश्य था- दक्षिण के आंध्र-तमिलनाडु-केरल और कर्नाटक इन प्रांतों में 'ज़ोर-शोर से शांतिपूर्वक' हिंदी प्रचार का आंदोलन और संगठन करना। याद रहे कि गांधीजी का निर्देश था कि हिंदी प्रचारकों को जेल जाने से बचना है। स्वतंत्रता आंदोलन के पहली पंक्ति के लोग सत्याग्रहों के कारण जब जेल में हुआ करते थे,  तब ये हिंदी प्रचारक बाहर रह करके पूरा भूमिगत स्वतंत्रता आंदोलन अपने कंधों पर संभालते थे। इसीलिए मैंने पहले ही कहा है कि हिंदी आंदोलन दक्षिण में वास्तव में आजादी आंदोलन का एक अनिवार्य और अभाज्य अंग रहा है और उसका मूलमंत्र यही रहा है कि अपना काम 'ज़ोर-शोर' से करो लेकिन 'शांतिपूर्वक करो', उग्रता के साथ नहीं। गिरफ्तार होने से बचना ज़रूरी था, ताकि आंदोलन चलता रहे!

तीसरा उद्देश्य था इस पत्रिका का-  दक्षिण भारत के सरकारी तथा देशी राज्यों के स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और जातीय संस्थाओं  के समाजों के (प्रांतीय कार्यों को छोड़कर) देशव्यापी कार्यों में हिंदी-हिंदुस्तानी को उचित स्थान दिलाना। कहना होगा कि भारत की जो राजभाषा नीति बाद में निर्मित हुई, उसका मूल यहाँ पर ही है।  गांधी की नीति में उसका मूल है- आपको राज्यों के लिए अलग-अलग राजभाषा चाहिए, लेकिन एक सार्वदेशिक भाषा (पूरे देश के लिए एक भाषा) चाहिए थी, जिसे राष्ट्रभाषा कहा गया। अतः हिंदी का काम करते हुए प्रांतीय भाषाओं का संरक्षण भी इस पत्र का एक उद्देश्य था। आज भी दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विविध पाठ्यक्रमों में प्रांतीय भाषा का पर्चा इसीलिए शामिल है। इस पूरे आंदोलन का ध्येय दक्षिण में हिंदी को रोपना रहा है; थोपना नहीं!

पत्रिका (हिंदी प्रचारक) के उस प्रथम अंक में प्रकाशित अपने शुभ संदेश में साहित्य सम्मेलन प्रयाग के तब के प्रधानमंत्री श्री ब्रजराज ने दक्षिण के प्रचारकों से अपील की थी कि उतना शक्तिशाली काम करें कि शीघ्र ही सम्मेलन को दक्षिण भारत में अपना काम समाप्त कर उन-उन प्रांतवासियों के हाथ में हिंदी प्रचार का कार्य सौंपने का सुअवसर प्राप्त हो।' यह बड़ा महत्वपूर्ण था। वे लोग जानते थे कि कल को कुछ लोग कहेंगे कि हिंदी अपना साम्राज्यवाद थोप रही है; इसलिए उन्होंने कहा कि  प्रयाग का कार्यालय अपना काम समेटकर प्रयाग जाये और दक्षिण में हिंदी आंदोलन का कार्य स्वयं दक्षिण के हिंदी प्रचारक सँभाले। बाद में ऐसा ही हुआ भी।  दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने  ऐसे अनेक समर्थ हिंदी प्रचारकों का निर्माण किया और इसमें हिंदी पत्रकारिता का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा कि वे अपनी अखिल भारतीय पहचान निर्मित कर सके।

कुल मिलाकर, दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के शताब्दी वर्ष में या आजादी आंदोलन के अमृत वर्ष में आज  फिर  उसी 'ज़ोर-शोर' और 'शांति' के साथ पूरे भारत में नए सिरे से एक और हिंदी आंदोलन की ज़रूरत है। यह भी कि आज दक्षिण की तुलना में उत्तर को हिंदी आंदोलन की अधिक आवश्यकता है, ताकि लोगों के मन-मस्तिष्क में जमे बैठे हुए भाषायी उपनिवेशवाद को  खुरच-खुरच कर निकाला जा सके। 000

(24 से 27 मार्च, 2022 तक पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया गया ऑनलाइन बीज व्याख्यान।

रिकॉर्डिंग के आधार पर लिप्यंकन : डॉ. चंदन कुमारी। संपर्क: chandan82hindi@gmail.com)