11 अगस्त 2013 को तेलुगु विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सभागार में संपन्न समारोह में 'कमला गोइन्का फाउंडेशन' द्वारा मुझे 'भाभीश्री रमा देवी हिंदी साहित्य सम्मान' दिए जाने और मेरी पंचम काव्य-कृति 'प्रेम बना रहे' के प्रथम तेलुगु अनुवाद 'प्रेमा इला सागिपोनि' [अनुवादक : जी. परमेश्वर] के विमोचन के अवसर पर मित्रवर लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने अपने विरले लेकिन सहज अंदाज़ में मेरा परिचय दिया. उस परिचय-वक्तव्य का बिटिया लिपि ने वीडियो बना लिया था जिसे आज डॉ. जी. नीरजा ने यू-ट्यूब पर भी सहेज दिया. तीनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उस वीडियो को यहाँ आप सबके साथ बाँट रहा हूँ.
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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013
बुधवार, 14 अगस्त 2013
शनिवार, 30 जून 2012
रविवार, 10 जून 2012
याद आता रहा सर्वेश्वर का 'सुहागिन का गीत'
सप्ताह भर से अधिक के लिए धारवाड [कर्नाटक] जाना पड़ा. दो दिन तो मन प्रसन्न रहा - हैदराबाद की सिर फोडती गर्मी से राहत जो मिली थी. सुहानी शामें. बूंदाबांदी. पर अपने मन का खाना नहीं मिलता जी वहाँ. ऊपर से विभागीय अप्रिय चीज़ों से पैदा होने वाला तनाव. खैर!
शाम को चिन्न बसवेश्वर मंदिर के अहाते में बैठना अच्छा लगता था. दिन-दिन भर लंबी बैठकी से स्पोंडिलाइटिस और कमर दर्द का उभरना साधारण बात थी, लेकिन साथी प्राध्यापक डॉ. राजकुमार नाइक [कोप्पल,कर्नाटक] ने सगे भाई की तरह मेरा ख़याल रखा. मेरा रोम-रोम उन्हें आशीष देता है!
मेरा अनुभव रहा है कि मुझे सदा अच्छे लोग ज्यादा मिले हैं और इसलिए अच्छाई में मेरा अटूट विश्वास है. पर कटु अनुभव भी कम नहीं हैं - लोग अकारण आपके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं. लेकिन फिलहाल जाने दीजिए उन्हें.
मैं तो यह कह रहा था कि जब इस धारवाड-प्रवास में बोर हुआ तो बार-बार सर्वेश्वर का ''सुहागिन का गीत'' याद आता रहा. अभी देखा तो नेट पर मिल गया. लीजिए उद्धृत है-
चले नहीं जाना बालम
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
ड्योढी पर पहले दीप जलाने दो मुझको
तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझको
मंदिर के घंटे, शंख और घड़ियाल बजे
पूजा की सांझ-संझौती गाने दो मुझको
उगने तो दो पहले उत्तर में ध्रुवतारा
पथ के पीपल पर कर आने दो उजियारा
पगडंडी पर जल-फूल-दीप धर आने दो
चरणामृत जाकर ठाकुर जी का लाने दो
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
बेले की पहले ये कलियाँ खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इन से मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गाँठ पड़ी
रजनीगंधा से ज्वार-सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चन्दा
घर के आँगन में तनिक रोशनी आने दो
कर लेने दो तुम मुझको बंद कपाट ज़रा
कमरे के दीपक को पहले सो जाने दो
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
चुप रहो ज़रा सपना पूरा हो जाने दो
घर की मैना को ज़रा प्रभाती गाने दो
खामोश धरा, आकाश, दिशायें सोयीं हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोयीं हैं
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो
मिटने दो आँखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा-पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
चले नहीं जाना बालम
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
ड्योढी पर पहले दीप जलाने दो मुझको
तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझको
मंदिर के घंटे, शंख और घड़ियाल बजे
पूजा की सांझ-संझौती गाने दो मुझको
उगने तो दो पहले उत्तर में ध्रुवतारा
पथ के पीपल पर कर आने दो उजियारा
पगडंडी पर जल-फूल-दीप धर आने दो
चरणामृत जाकर ठाकुर जी का लाने दो
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
बेले की पहले ये कलियाँ खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इन से मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गाँठ पड़ी
रजनीगंधा से ज्वार-सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चन्दा
घर के आँगन में तनिक रोशनी आने दो
कर लेने दो तुम मुझको बंद कपाट ज़रा
कमरे के दीपक को पहले सो जाने दो
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
चुप रहो ज़रा सपना पूरा हो जाने दो
घर की मैना को ज़रा प्रभाती गाने दो
खामोश धरा, आकाश, दिशायें सोयीं हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोयीं हैं
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो
मिटने दो आँखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा-पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
ड्योढी पर पहले दीप जलाने दो मुझको
तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझको
मंदिर के घंटे, शंख और घड़ियाल बजे
पूजा की सांझ-संझौती गाने दो मुझको
उगने तो दो पहले उत्तर में ध्रुवतारा
पथ के पीपल पर कर आने दो उजियारा
पगडंडी पर जल-फूल-दीप धर आने दो
चरणामृत जाकर ठाकुर जी का लाने दो
यह डूबी-डूबी सांझ, उदासी का आलम
मैं बहुत अनमनी, चले नहीं जाना बालम
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
बेले की पहले ये कलियाँ खिल जाने दो
कल का उत्तर पहले इन से मिल जाने दो
तुम क्या जानो यह किन प्रश्नों की गाँठ पड़ी
रजनीगंधा से ज्वार-सुरभि को आने दो
इस नीम ओट से ऊपर उठने दो चन्दा
घर के आँगन में तनिक रोशनी आने दो
कर लेने दो तुम मुझको बंद कपाट ज़रा
कमरे के दीपक को पहले सो जाने दो
यह काली-काली रात, बेबसी का आलम
मैं डरी-डरी सी, चले नहीं जाना बालम
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
चुप रहो ज़रा सपना पूरा हो जाने दो
घर की मैना को ज़रा प्रभाती गाने दो
खामोश धरा, आकाश, दिशायें सोयीं हैं
तुम क्या जानो क्या सोच रात भर रोयीं हैं
ये फूल सेज के चरणों पर धर देने दो
मुझको आँचल में हरसिंगार भर लेने दो
मिटने दो आँखों के आगे का अंधियारा
पथ पर पूरा-पूरा प्रकाश हो लेने दो
यह ठंडी-ठंडी रात, उनींदा सा आलम
मैं नींद भरी सी, चले नहीं जाना बालम
सोमवार, 16 अप्रैल 2012
'देहरी' और 'कविता का समकाल' लोकार्पित
31 मार्च 2012 को भास्कर ऑडिटोरियम, हैदराबाद में एक विचित्र प्रतीत होने वाला आयोजन हबड-तबड में संपन्न हुआ. अर्थात 30 पुस्तकों का एक साथ लोकार्पण.
यार लोगों ने कहा - यह तो पुस्तक-मेले की तर्ज़ पर लोकार्पण-मेला हो गया! लोकार्पित पुस्तकों में से ज़्यादातर डॉ अनंत काबरा की थीं या उनके बारे में थीं.
इस विचित्र समारोह में हमारी भी दो बहुप्रतीक्षित किताबें रिलीज़ हो गईं -
1.देहरी - जिसमें पिछले वर्षों लिखी अपुन की कुछ स्त्रीपक्षीय कविताएँ हैं और
2.कविता का समकाल - जिसमें समकालीन कविता पर कुछ समीक्षात्मक आलेख हैं.
रविवार, 19 फ़रवरी 2012
द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ''भारतीय साहित्य : राम साहित्य से जुड़े कला संदर्भ'' संपन्न
मुंबई के हमारे मित्र डॉ. प्रदीप कुमार सिंह धुन के बड़े पक्के हैं. पिछले साल 'राम साहित्य' पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की थी उन्होंने साठये कॉलेज में; तभी संकल्प किया एक और वैसी ही संगोष्ठी का. और अभी 10-11 फरवरी 2012 को उसे साकार भी कर डाला. अभिनंदन!
अयोध्या शोध संस्थान, संस्कृति मंत्रालय, उत्तर प्रदेश के सौजन्य से साठये कॉलेज, मुंबई में आयोजित ''भारतीय साहित्य : राम साहित्य से जुड़े कला संदर्भ'' शीर्षक इस द्विदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संस्कार समूह के अध्यक्ष डॉ. कृष्ण कुमार पित्ती ने किया. विशेष अतिथि रहीं लिथुआनिया की क्रिस्टीना डोलोनीना. महाराष्ट्र भर के अनेक विद्वानों, प्राध्यापकों और शोधार्थियों के अलावा अमृतसर, इलाहाबाद,चेन्नई, तिरुवनंतपुरम , अहमदाबाद, अयोध्या, लखनऊ, वाराणसी, शिमला, तिरुपति, उज्जैन, दिल्ली, धारवाड, मिजोरम, चंडीगढ़, रोहतक, खंडवा, सूरत, हजारीबाग, बरेली और हैदराबाद से आए विद्वानों-विदुषियों ने विषय के विविध आयामों को प्रकाशित किया. दक्षिण कोरिया के डॉ. को जोंग किम भी पधारे और रूस में हिंदी अधिकारी रह चुकीं डॉ.जोगेश कौर भी आईं.
अलग अलग सत्रों में जिन मुद्दों पर चर्चा की गई उनमें शामिल रहे - भारतीय संस्कृति में राम, राम की कलाओं का अंतर्संबंध, भारतीय संस्कृति और राम साहित्य, भारतीय संस्कृति और चित्रकलाओं में राम साहित्य , भारतीय संस्कृति और मूर्ति व स्थापत्य कलाओं में राम साहित्य, भारतीय संस्कृति और नृत्य कलाओं में राम साहित्य, भारतीय संसृति और संगीत कलाओं में राम साहित्य, भारतीय संस्कृति और लोकनाट्य व रामलीला में राम, भारतीय कलाओं में रामचरित.
पहले दिन की सांझ नाटक, संगीत और नृत्य के नाम रही . खास तौर पर क्रिस्टीना डोलोनीना के कत्थक नृत्य और डॉ. मीनाक्षी के भरतनाट्यम ने मन मोह लिया. रामचरित संदर्भित विभिन्न भाषाओँ के लोकगीतों ने श्रोताओं कों द्रवित कर दिया तो मुजीब खान के निर्देशन में आइडियल ड्रामा इंटरनेशनल एकाडेमी की नाट्य प्रस्तुति 'प्रेमचंद की रामलीला' भी प्रेक्षकों के लिए रोमांचकारी रही.
अंत में यह कन्फेशन कि सयोजक के कहे अनुसार ''भारतीय चित्रकला में राम'' पर अपुन ने जो परचा वहाँ पढ़ा और प्रशंसा बटोरी, उसका पूरा पूरा श्रेय अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाओं के मर्मज्ञ संग्राहक चित्रकार पद्मश्री जगदीश मित्तल जी को जाता है जिनसे प्राप्त जानकारी और दिशानिर्देश के आधार पर ही वह परचा लिखा जा सका.
और हाँ, जनाब प्रदीप जी ने सितंबर 2012 में एक और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का संकल्प आज सवेरे ही फोन करके व्यक्त किया है, इस आदेश के साथ कि अभी से तैयारी शुरू कर दीजिए . मैंने उनके जीवट को प्रणाम किया और सलाह दी- भले आदमी, कुछ देर तो आराम कर लिया करो. उत्तर मिला- राम काज कीन्हे बिना मोहि कहाँ विश्राम!
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012
रही भीलनी देखती बिखरे जूठे बेर
12 फरवरी 2012, रविवार.
आज डॉ. देवराज हैदराबाद आए.
कुछ ही घंटे रुके. मुंबई से आए थे और विशाखापट्टनम जाना था.
सूचना पाते ही कई आत्मीय जन मिलने आ जुटे.
चार घंटे की अच्छी संगोष्ठी सी ही हो गई घर पर.
प्रो. एन. गोपि, डॉ. राधेश्याम शुक्ल, डॉ. रंगय्या, डॉ.जी. नीरजा दम्पति, डॉ.बी. बालाजी दम्पति, सीमा मिश्र दम्पति तो थे ही, द्वारका प्रसाद मायछ भी पत्नी और पुत्र के साथ आ धमके.
इंटरव्यू, कविता पाठ और परिचर्चा .......खूब समां बंधा. संभव हुआ तो रिकॉर्डिंग कभी ज़रूर साझा करूँगा.
डॉ. एम वेंकटेश्वर जी नहीं आ सके......कहीं फँस गए थे.
अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी भी कसमसाकर रह गए......तीन दिन से अस्वस्थ हैं.
पूनम [डॉ. देवराज जी डॉ. पूर्णिमा जी (श्रीमती ऋषभ) को इसी तरह बुलाते हैं] और मनी [बिटिया] को डॉ. देवराज के आने से अपार प्रसन्नता हुई. मनी के लेखन और फोटोग्राफी के काम को देखकर डॉ. साहब रोमांचित और गद्गद हो उठे. कढी और सूखी मटर का भी कई बार गुणगान किया.
और मैं.......मन ही मन बस कभी शायद आज ही के लिए कहा दोहा दुहराता रह गया .....
पाहुन तुम आए गए रुके न थोड़ी देररही भीलनी देखती बिखरे जूठे बेर
शनिवार, 31 दिसंबर 2011
भाषा संस्कृति संगम
भारत डिग्री कॉलेज फॉर वोमेन, काचीगुडा,हैदराबाद में २९ दिसंबर २०११ को ''भाषा-संस्कृति संगमम'' का आयोजन किया गया. वयोवृद्ध प्रो. ए.सुब्बा राव ने अंग्रेजी और उसमें बुनी संस्कृति पर समाज भाषा वैज्ञानिक नज़रिए से प्रकाश डाला , तो कवि और भाषातत्ववेत्ता प्रो. एम. सूर्यनारायण मूर्ति ने विस्तार से समझाया कि किस तरह तेलुगु भाषा और तेलुगु संस्कृति आज खतरे में हैं.
अपुन के जिम्मे तो भारतीय संस्कृति पर बोलना आया था. सो पंडित-द्वय अर्थात प.हजारी प्रसाद द्विवेदी और प.विद्या निवास मिश्र का सहारा लेकर अविरोधी धर्म, पुरुषार्थ चतुष्टय, आश्रम व्यवस्था, तीन ऋण तथा तीन द [दमन-दान-दया] की व्याख्या कर दी और मुक्तिबोध का सहारा लेकर '' जो भी है उससे बेहतर चाहिए'' का नारा बुलंद कर डाला. [अरे हाँ, मुक्तिबोध से याद आया - उन पर केंद्रित फिल्म ''सतह से उठता आदमी'' लाया है बेटा मुझे दिखाने के लिए. कल उसे दिल्ली लौटना है. चलूँ, वह फिल्म देख डालूँ. वरना बालक का दिल टूट जाएगा.]

बुधवार, 28 दिसंबर 2011
आज कमल जी आए थे
काफी वक्त गुजर गया जब डॉ. राम कुमार तिवारी जी [निर्दोष] ने उप्पुगुडा [हैदराबाद] में मेधावी छात्रों कों सम्मानित और पुरस्कृत करने के लिए कार्यक्रम रखा था. पर आज वह प्रसंग ताज़ा हो आया. हुआ यों कि वयोवृद्ध कवि सत्यनारायण शर्मा 'कमल' जी उनके यहाँ होते हुए मेरे पास आए संस्थान में, तो तिवारी जी ने उनके हाथ उस आयोजन के कुछ फोटो भी भिजवा दिए.
शर्मा जी आयु के नवें दशक में हैं. अपने सुपुत्र के साथ आए थे. बहुत अशक्त हो गए हैं. ऊंचा तो वे सुनते ही हैं. पर आज पहली बार उन्हें बेंत के सहारे झुककर चलते देखा तो मैं धक्क रह गया. पता चला कि दोनों घुटने जवाब दे चुके हैं और आपरेशन करने से डॉक्टरों ने मना कर दिया है क्योंकि हृदय झेल नहीं पाएगा. अभी पिछले वर्ष जब मिले तो शर्मा जी इतने थके और पराजित से न थे. पर आज... उनकी आवाज में ...खा ...ली ....प ....न.....सा था.बोले - साल छः महीने का जीवन है अब क्या आपरेशन करावें? सब परिचितों का हालचाल पूछते रहे .१५ मिनट रुके होंगे मेरे पास. मैं भी निकल रहा था. वे भी निकल गए. पर मन भारी हो गया. परमात्मा उन्हें स्वस्थ रखे....वे दीर्घायु हों...!
शर्मा जी आयु के नवें दशक में हैं. अपने सुपुत्र के साथ आए थे. बहुत अशक्त हो गए हैं. ऊंचा तो वे सुनते ही हैं. पर आज पहली बार उन्हें बेंत के सहारे झुककर चलते देखा तो मैं धक्क रह गया. पता चला कि दोनों घुटने जवाब दे चुके हैं और आपरेशन करने से डॉक्टरों ने मना कर दिया है क्योंकि हृदय झेल नहीं पाएगा. अभी पिछले वर्ष जब मिले तो शर्मा जी इतने थके और पराजित से न थे. पर आज... उनकी आवाज में ...खा ...ली ....प ....न.....सा था.बोले - साल छः महीने का जीवन है अब क्या आपरेशन करावें? सब परिचितों का हालचाल पूछते रहे .१५ मिनट रुके होंगे मेरे पास. मैं भी निकल रहा था. वे भी निकल गए. पर मन भारी हो गया. परमात्मा उन्हें स्वस्थ रखे....वे दीर्घायु हों...!
रविवार, 30 अक्टूबर 2011
नवलेखक शिविर के बहाने
हिंदी की सार्वदेशिक स्वीकार्यता और सामासिक संस्कृति की दृष्टि से केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा चलाई गई योजनाओं में प्रतिवर्ष आठ ''हिंदीतरभाषी हिंदी नवलेखक शिविर'' आयोजित करना भी शामिल है. नब्बे के दशक से कभी कभार अपुन को भी इनमें विशेषज्ञ के रूप में बुलाया जाता रहा है. अभी गत दिनों डॉ. भगवती प्रसाद निदारिया जी और डॉ.मोहम्मद नसीम जी (नसीम बेचैन) के निमंत्रण पर ऐसे ही एक शिविर में आठ दिन के लिए अहमदनगर [महाराष्ट्र] जाने का अवसर मिला. खूब मस्ती रही. लगे हाथ शिर्डी और शनिशिंगनापुर की धार्मिक यात्रा भी हो गई. एक दिन यार लोग मुझे चकमा देकर अन्ना हजारे से भी उनके गाँव रालेगनसिद्धि जाकर मिल आए ( वैसे मेरी उतनी श्रद्धा भी नहीं थी कि शिर्डी की थकन के बावजूद वहां जाना चाहता ).
अहमदनगर खूबसूरत जगह है. लोग वहां के बहुत अच्छे हैं. बेहद खूबसूरत मन वाले - चाहे अध्यापक हों या छात्र. प्रो. ऋचा शर्मा अहमदनगर महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष हैं. अत्यंत सुरुचिसंपन्न विदुषी - पता चला कि उनका संबंध अपने सहारनपुर वाले कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर जी के परिवार से है. पतिदेव उनके राजीव शर्मा जी एयरफोर्स में रह चुके हैं और अब अपना व्यवसाय चलाते हैं.उन्होंने खूब नगर दर्शन कराया . एक रात तो ख़ास तौर से कढाई वाला दूध पिलाने ले गए. खैर नगर (मेरठ) के कई प्रसंग याद आ गए. इसी तरह दूसरी शाम किला [वह जेल जहाँ कभी पंडित जवाहर लाल नेहरु और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सरीखे स्वतंत्रता सेनानी रखे गए थे और उन्होंने अपनी कालजयी कृतियाँ रची थीं] और सलावत खान का मकबरा दिखा लाए.
और हाँ, एक बहुत प्यारा दोस्त मिल गया इस प्रवास में - आनंद मणि त्रिपाठी - वे वहां प्राध्यापक हैं; हर पल मुस्तैद; हर ज़िम्मेदारी के लिए तैयार. चांदनी चौक [जी हाँ, अहमदनगर में रास्तों और मुहल्लों के नाम दिल्ली वाले ही हैं] पर उतरने से लेकर तारकपुर अड्डे पर विदा लेने तक वे छाया की तरह साथ रहे. मज़े की बात यह कि अन्य विशेषज्ञों का भी यही अनुभव रहा कि वे उनके साथ भी छाया की तरह रहे. पता नहीं उनके पास कोई प्रेतसिद्धि है क्या!
और हाँ, एक बहुत प्यारा दोस्त मिल गया इस प्रवास में - आनंद मणि त्रिपाठी - वे वहां प्राध्यापक हैं; हर पल मुस्तैद; हर ज़िम्मेदारी के लिए तैयार. चांदनी चौक [जी हाँ, अहमदनगर में रास्तों और मुहल्लों के नाम दिल्ली वाले ही हैं] पर उतरने से लेकर तारकपुर अड्डे पर विदा लेने तक वे छाया की तरह साथ रहे. मज़े की बात यह कि अन्य विशेषज्ञों का भी यही अनुभव रहा कि वे उनके साथ भी छाया की तरह रहे. पता नहीं उनके पास कोई प्रेतसिद्धि है क्या!
दिल्ली से आईं डॉ. शाहीना तबस्सुम जी से पहली बार भेंट हुई. हिंदी और उर्दू दोनों की ही साहित्यिक परंपराओं की उन्हें गहरी जानकारी है. सारा व्यवहार उनका एकदम अनौपचारिक - लेकिन अत्यंत भद्र और शालीन. बोलीं, भाभी के लिए कुछ नहीं ले जाएंगे अहमदनगर से? मैंने बता दिया कि मैं कभी कहीं से कुछ नहीं ले जाता. यह तो अच्छी बात नहीं, ज़रूर कुछ तो पत्नी और बच्चों के लिए आपको ले जाना चाहिए- बहुत अच्छा लगता है- यह मैं जानती हूँ; उन्होंने कहा तो मैंने और डॉ नसीम ने अपने अपने परिवार के लिए वस्त्र खरीद ही डाले! और तो और अपने अहंकार के खोल में क़ैद भीषण महाकवि उद्भ्रांत जी पर भी उनकी बातों का इतना असर हुआ कि पहली बार उन्होंने भी पत्नी और बेटी के लिए साड़ियाँ खरीद डालीं और वह भी अकेले बाज़ार जाकर.
अब जब बात उद्भ्रांत जी की छिड़ ही गई है तो कहना ही होगा कि वे भी हमेशा याद रहेंगे लेकिन कडवी याद की तरह. अरे साहब, पहली ही शाम उन्होंने शराब पीकर यश पैलेस के रूफ गार्डन में वह हंगामा बरपा किया कि बिना अपराध के मुझे उनके अपवित्र पाँव छूकर माफी माँगनी पडी कि आयोजकों के कहने से मैं उस सुबह उनके कमरे [डबल बेड रूम] में उतनी देर भर को टिकने चला गया था जितनी देर में दूसरा कमरा मेरे लिए व्यवस्थित किया गया. उनकी इस बदतमीजी का यह भी अपमानजनक प्रभाव हुआ कि अगली शाम जब मैं, नसीम जी और आनंद त्रिपाठी रूफ गार्डन में भोजन करने गए तो हमें वहां बैठने नहीं दिया गया. शिविर की बैठकों में भी उद्भ्रांत जी प्रायः अपनी आत्मकथा और आत्मश्लाघा में ही व्यस्त रहे. मेरे ख़याल से वे ऐसे शिविर के लिए एक सौ परसेंट अनफिट मार्गदर्शक हैं.
नवलेखक कई प्रांतों से आए थे - आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा और असम आदि से. सभी पर्याप्त संभावनाओं से लबरेज़ दिखाई दिए. खास बात यह कि सभी में अपनी ज़मीन की सुगंध को हिंदी में भरने की ललक दिखाई दी.इस सृजनेच्छा को मैं विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ!
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