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शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

(पुस्तक) प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व

अवधेश कुमार सिन्हा (ज. 9 सितंबर, 1950) की 68वीं वर्षगाँठ पर उनकी शोधपूर्ण कृति "प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व)" (2018. हैदराबाद : मिलिंद प्र.) का प्रकाशन/लोकार्पण हैदराबाद के हिंदी जगत के लिए अत्यंत हर्षकारी है।  अवधेश जी बहुज्ञ लेखक हैं। उनका वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण उन्हें सतत अनुसंधाता बनाता है। एक स्वतंत्र जिज्ञासु शोधार्थी के रूप में रचित उनकी यह कृति भारतीय इतिहास और संस्कृति विषयक उनकी गहन अंतर्दृष्टि का परिचायक है।

सिंधुघाटी सभ्यता और वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक भारतीय समाज और उसकी संस्कृति को मनोविनोद और खेलकूद के साधनों और प्रकारों के क्रमिक परिवर्तन और विकास के माध्यम से उकेरने वाला यह ग्रंथ हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक भी पहुँचना चाहिए। आशा है, इसकी राष्ट्रीय उपादेयता को देखते हुए  विभिन्न भाषाओं के अनुवादक इस ओर आकृष्ट होंगे। 


मंगलवार, 19 सितंबर 2017

''दीवार में आले'' का लोकार्पण वक्तव्य : ऋषभदेव शर्मा


23 जुलाई 2017 को हिंदी भवन, नई दिल्ली के सभागार में 
कवि श्री रामकिशोर उपाध्याय के कविता संग्रह ''दीवार में आले'' के 
लोकार्पण के अवसर पर 
मुख्य वक्ता डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा दिया गया बीज वक्तव्य.

बुधवार, 2 नवंबर 2016

[व्याख्यान] देश और उसकी भाषा


भाषा देश की चेतनाधारा को व्यक्त करती है : ऋषभदेव शर्मा

[मिश्र धातु निगम लिमिटेड में हिंदी दिवस पर मुख्य अतिथि का संबोधन]


http://bit.ly/2cCZLYU

मिश्र धातु निगम लिमिटेड कंचनबाग़ हैदराबाद के हिंदी पक्षोत्सव समारोह 2016 के समापन कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय डॉ. दिनेश कुमार लेखी जी (अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक), श्री पी. वी. राज (निदेशक : वित्त), श्री एस. के. झा साहब (निदेशक : उत्पादन एवं विपणन ), हिंदी सेल की देख-रेख करनेवाले आदरणीय श्री ओम बिहारी श्रीवास्तव जी (कर्नल ), प्रिय भाई डॉ. बी. बालाजी, इस समारोह में समुपस्थित समस्त अधिकारीगण, डी.ए.वी. के छात्रगण और उनके अध्यापक–अध्यापिकाएँ या अभिभावक जो भी यहाँ हों – आप सबको हिंदी दिवस के अवसर पर शुभकामनाएँ समर्पित करता हूँ। 

दुनिया भर में हम हिंदुस्तानी लोग उत्सवधर्मी देश के रूप में जाने जाते हैं। कुछ और करें न करें, मौका-बेमौका हम उत्सव ज़रूर मनाते रहते हैं। कई बार इस बात को लेकर मज़ाक किया जाता है लेकिन इसका संबंध इस देश की मानसिकता से है। इस देश की मानसिकता सकारात्मकता और आनंद से जुड़ी हुई है। हम अपनी ज़िम्मेदारियों को, अपने कर्तव्यों को, आनंद के साथ जोड़कर दायित्व को बोझ न मानकर खेल की तरह लीलाभाव से संपन्न करें! शायद हमारे पर्वोत्सवों के पीछे भी यह बात जुडी हुई है और जब हम हिंदी दिवस मनाते हैं, तब भी बार-बार यह बात रेखांकित करते चलते हैं कि यह केवल उत्सव मनाना नहीं है! यह केवल पर्व नहीं है! यह केवल पुरस्कार लेने-देने व इन्क्रीमेंट वगैरह प्राप्त करने का ही एक अवसर या माध्यम या कारण नहीँ है !बल्कि अपने आपको, इस देश का ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते, इस देश के संविधान द्वारा सौंपे गए एक दायित्व के प्रति समर्पित करने की भावना इस पर्व या उत्सव के साथ जुड़ीं हुई है। इस विषय में, माननीय रक्षामंत्री एवं गृहमंत्री के संदेशों के माध्यम से जो बातें कही गईं, मैं उन्हीं बातों को इस देश के एक साधारण नागरिक की तरह आपके समक्ष फिर से रेखांकित करता हूँ। साधारण नागरिक के तौर पर मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि इस सारे-के–सारे भाषा संबंधी आचरण का, या आचार का, प्रभाव जिस पर पड़ता है वह इस देश का ‘कॉमन मैन’ यानी ‘साधारण आदमी’ है। उस आम आदमी की हैसियतसे इस देश के हर दूरस्थ गाँव के हर किसान के प्रतिनिधि के रूप में मैं यहाँ खड़ा होकर आपसे यह बात कह रहा हूँ कि मुझे, इस देश के आम आदमी को, आप अपनी उपलब्धियों की जानकारी कृपया मेरी भाषा में दीजिए। आप बहुत काम कर रहे हैं ! देश के लिए काम कर रहे हैं, विश्व के लिए काम कर रहे हैं, मनुष्यता के लिए काम कर रहे हैं; पर मेरे देश का किसान आत्महत्या कर रहा है! कहीं कुछ दूरी है! जो विकास हो रहा है और जिस व्यक्ति तक यह विकास पहुँचना है – उसके बीच में कहीं दूरी है। यहाँ मैं अमर्त्य सेन की पुस्तक ‘डेवलपमेंट ऐज़ फ्रीडम’ का उल्लेख करना चाहूँगा। अपनी पुस्तक के माध्यम से उन्होंने एक बहुत अच्छी बात उठाई है – वह यह कि स्वतंत्रता सबके लिए समान अर्थ नहीँ रखती। व्यक्ति अपनी ‘कैपेबिलिटी’ के अनुसार स्वतंत्रता का उपभोग कर पाता है। मेरा ‘सामर्थ्य’ यदि कम है तो स्वतंत्रता मेरे लिए कुछ और अर्थ रखती है और मेरा ‘सामर्थ्य’ अगर अधिक है तो स्वतंत्रता मेरे लिए अधिक अर्थ रखती है। अविकसित को ध्यान में रखकर जो विकास की बातें की जाती हैं, वे वास्तव में सामर्थ्य बढ़ाने के लिए की जाती है, ताकि मेरे लिए स्वराज्य या स्वतंत्रता का वही अर्थ हो सके जो उनके लिए है जो सामर्थ्यवान हैं। 

मैं यहाँ महात्मा गांधी का नाम लेना चाहूँगा जो रक्षा मंत्री और गृह मंत्री के संदेशों में भी लिया गया है। आज से 98 वर्ष पूर्व सन 1918 में उन्होंने अपने संदेश में इस देश की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रस्तावित किया था। आगामी 2018 में उनके इस संदेश को पूरे 100 साल हो जाएँगे। उससे पहले तक कांग्रेस के सारे कामकाज अंग्रेज़ी में ही होते थे, लेकिन 1918 से वे हिंदी में होने शुरू हो गए। कारण कि गांधी जी चाहते थे कि हमारे आंदोलन की सारी गतिविधियों में पूरा देश भाग ले सके। इसके लिए उन्होंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा जैसी संस्था की स्थापना मद्रास में की थी। जब इस देश ने अपना संविधान बनाया और हिंदी संबंधी नीति का निर्धारण किया, तब भी महात्मा गांधी की इसी बात को ध्यान में रखा गया। यह अलग बात है कि किन्हीं दवाबों के तहत ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द से बचा गया और ‘राजभाषा’ शब्द आ गया। मैं आज यह कह रहा हूँ – राष्ट्रभाषा और राजभाषा दोनों ही शब्दों की नारेबाज़ी को छोड़िए। मुझे इस राष्ट्र के नागरिक की भाषा दे दीजिए – वह चाहे हिंदी हो, चाहे तमिल – तेलुगु हो, चाहे बांग्ला हो, असमिया या मणिपुरी हो। मुझे मेरे देश की भाषा में- मेरी भाषा में संबोधित कीजिए। यह चुनौती हम सबके सामने है। उनके लिए भी यह चुनौती है जो आम आदमी के लाभार्थ काम कर रहे हैं। आप जानते ही हैं कि मिश्र धातु निगम लिमिटेड जैसी संस्थाएँ मूलतः उत्पादक संगठन हैं जिन्हें बाज़ार में खरा उतरना होता है। इस संदर्भ में मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आनेवाले समय में दुनिया में भाषाओं के सामने जो स्थितियाँ हैं, जो चुनौतियाँ हैं, उनमें ‘बाज़ार’ और ‘कंप्यूटर’ ही दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। 

मैं आपसे यह नहीं कहने जा रहा हूँ कि हिंदी पूरी दुनिया में कैसे और कितनी फैली है, स्टेटिस्टिक्स लगाने वाले लोगों के लिए भले ही यह विवाद का विषय हो! ‘मंदारिन बोलने-समझने वाले लोग अधिक हैं कि हिंदी बोलने-समझने वाले लोग’ - विवाद तो इस पर भी होता है। परंतु यह तय है कि पहले और दूसरे स्थान पर यही दोनों भाषाएँ हैं। अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ इसके बाद के स्थानों पर आती हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि दो वर्ष पहले मैं यहाँ आया था, पिछले वर्ष नहीं आ सका कारण कि चीनी विद्यार्थियों की कक्षा लेने हेतु मैं ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा‘ गया था। सभी इस बात को जानते हैं कि वहाँ 11 या 12 या शायद इससे अधिक देशों के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। मेरी कक्षा में 15 या 16 चीनी विद्यार्थी थे। मैंने उनसे पूछा,” हमारे यहाँ अनेक भाषाएँ हैं और उनके नाम अलग-अलग हैं; क्या आपके यहाँ एक ही भाषा बोली जाती?” उन्होंने कहा, ”हम जो दो लड़कियाँ बराबर में बैठी हुई हैं अगर हम अपनी-अपनी मातृभाषा में बोलने लगें तो हम एक दूसरे की बात को नहीं समझ सकतीं, बावजूद इसके हम सभी मंदारिन भाषी हैं।” गड़बड़ यही है कि ‘हम सब’ ‘भारतीय भाषी’ नहीं हैं ! माफ़ करेंगे – जब गणित पढ़ते थे तब मास्टर जी ने बताया था कि स्टेटिस्टिक्स इज थ द साइंस ऑफ फ़ूल्स - आँकड़ों का खेल तो बेवकूफ बनाने का खेल है। फिर भी, इसे नकारा नहीं जा सकता कि संख्या-बल की दृष्टि से हमारे पास बहुत बड़ी शक्ति है। इस ग्लोबलाइज़्ड विश्व की उदारीकृत अर्थव्यवस्था में यह शक्ति, यह जनसंख्या एक बहुत बड़े ‘बाज़ार’ का सृजन करती है। इस बाज़ार में केवल हमें हिंदुस्तान की ही चीजें नहीं बेचनी हैं। हिंदुस्तान रूपी बाज़ार में दुनिया को अपनी तमाम चीजें बेचनी हैं। इसलिए आप परवाह करें या न करें, लेकिन विदेशों को इस बात की परवाह होने लगी है कि भारत को एक बाज़ार के रूप में संबोधित करना है तो भारत की भाषा में, और उसकी अपनी हिंदी में, संबोधित करना पड़ेगा। यहाँ मैं प्रसिद्ध मैनेजमेंट गुरु प्रह्लाद के सिद्धांत का उल्लेख करना चाहूँगा। उन्होंने कहा है कि भारत की जनता का जो पिरामिड है उसके उपरी हिस्से में इसकी क्रय शक्ति की दृष्टि से ‘सैचुरेशन आ चुका है, वह संतृप्त है अब; और आज का जो बाज़ार है वह इस पिरामिड के निचले हिस्से में है जिसे संबोधित करने के लिए हिंदी से अधिक कारगर भाषा कोई और नहीं है। इसका कारण भी आँकड़े हैं। इस देश के कम-से-कम 55% लोगों की मातृभाषा किसी-न-किसी रूप में हिंदी है चाहे आप उसे कोई बोली कहें - राजस्थानी कहें, खड़ीबोली कहें, ब्रजभाषा कहें या मैथिली कहें! क्षमा करें संविधान ने अब मैथिली को एक अलग भाषा का नाम दे दिया है और भी ऐसे नाम संविधान की आठवीं अनुसूची में जुड़ सकते हैं, तथापि ये सब हिंदी की भौगोलिक शैलियाँ ही हैं। इसके अलावा शेष क्षेत्रों का भी हिसाब लगाया जाय तो कम-से-कम 90% या उससे अधिक इस देश की जनता हिंदी समझती है। इसलिए हिंदी का विज्ञापन इस देश की जनता के सर्वाधिक प्रतिशत तक पहुँचता है। व्यापार-व्यावसाय एवं उसकी भाषा के लिए विज्ञापन तो केवल एक पक्ष है। पहला पक्ष उत्पादन (प्रोडकशन) का है और दूसरा पक्ष है विपणन (मार्केटिंग) का। इससे संबंधित जितनी भी संप्रेषण गतिविधियाँ हैं; जैसे किसी कारखाने में काम करने वाले कारगर से लेकर उसके प्रबंध-निदेशक तक के बीच का जो संवाद है और फिर इस संगठन या जहाँ भी कोई चीज उत्पादित हो रही है, उसका जनता से जो संवाद है – इस संवाद के लिए आज हमें हिंदी को अपनाने और समर्थ बनाने की ज़रूरत है। अगर हमने इसे समर्थ नहीं बनाया तो यह सारी स्वतंत्रता हमारी भाषा के लिए भी घातक हो सकती है। इसलिए बार-बार हिंदी के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। हमें अपने उत्पादों से संबंधित साहित्य को भी मूलतः हिंदी में ही तैयार करना चाहिए, न कि मूलतः अंग्रेज़ी में तैयार करके उसका हिंदी अनुवाद करना चाहिए। ऐसा करने से भाषा में एक नकलीपन आ जाता है।

पिछली बार आदरणीय डॉ. लेखी का व्याख्यान मैंने सुना। उनकी भाषा संबंधी अनुभवजनित धारणाओं एवं खुले विचारों से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इसलिए बहुत संकोच के साथ मैं ये सारी बातें कह रहा हूँ। डॉ. बी. बालाजी ने मुझे इस कैंपस में लगाए गए उन 10-12 बोर्डों के बारे में बताया जिन पर संदेशात्मक स्लोगन्स लिखे गए हैं। ये स्लोगन्स कितने पारदर्शी (ट्रांस्परेंट) हैं! असली चीज़ यही है। भाषा को स्वीकार्य बनाने के लिए हम प्रायः ‘सरलता’ की माँग करते हैं। यह गलत है। भाषा ‘सरल’ और ‘कठिन’ नहीँ होती। भाषा ‘परिचित’ और ‘अपरिचित’ होती है। जब तक हम किसी भाषा से परिचित नहीं होते, तब तक वह हमें कठिन लगती है। जैसे ही हमारा परिचय बढ़ता है, आत्मीयता भी बढ़ जाती है। जब चार बार आप किसी शब्द को सुनेंगे, छह बार उसे लिखेंगे तो धीरे-धीरे उसकी आदत पड़ जाएगी। हिंदी का हाजमा तो बहुत ही बढ़िया है, बिल्कुल भारतीय संस्कृति की तरह – अनेक प्रवाह आकर इसमें समा गए, न जाने कितनी धाराएँ आकर इस धारा में मिल गईं और एक हो गईं! कोई ज़बरदस्ती अपने आपको अलग बनाए रखे तो अलग बात है; नहीं तो यह देश सारी संस्कृतियों को समा लेने वाला देश है। ऐसी ही हमारी भाषा हिंदी है। चाहे जो शब्द ले आइए – थोड़ सा कहीं से उसको रद्दा लगाकर, कहीं से रगड़कर, कहीं ज्यों-का-त्यों लेकर – कहीं हम उसे अंगीकार कर लेते हैं, कहीं स्वीकार कर लेते हैं, कहीं ज्यों-का-त्यों उसका अनुवाद कर लेते हैं, कहीं थोड़ा सा अदल-बदल लेते हैं – अनुकूल कर लेते हैं! बहुत सारी अंतरराष्ट्रीय शब्दावली हमने ज्यों-की-त्यों ग्रहण की है। हिंदी कठिन नहीं है; जो लोग प्रयोग नहीं करते उन्हें वह अपरिचित लगती है। इस अपरिचय से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि परिचय बढ़ाया जाय। यदि मैं 25 साल से एक अपार्टमेंट में रहता हूँ और मैंने अपने पड़ोसी से परिचय नहीं किया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह और मैं जन्मजात शत्रु होंगे। अचानक किसी एक दिन किसी एक कारण से हम दोनों की बात होती है और हम बड़े अच्छे दोस्त बन जाते हैं। अन्यथा हम बस एक –दूसरे के बारे में अनुमान ही लगाते रहते। मेरे कहने का अर्थ है कि भाषा का प्रयोग करते रहना चाहिए। 

गृहमंत्री का जो संदेश यहाँ प्रस्तुत किया गया, उसमें अंत में उन्होंने दो सुझाव दिए हैं – एक तो यह कि किसी बदलाव को स्वीकार्य बनाने में अधिकारीगण महत्वपूर्ण होते हैं। अधिकारी किसी भी संगठन का रोल मॉडल होता है। अन्य कामकाज के साथ ही वार्तालाप से टिप्पणी लिखने तक जब अधिकारी हिंदी का प्रयोग करेंगे तब सबकी वह हीन भावना टूटेगी जिसके तहत यह माना जाता है कि अंग्रेज़ी लिखने-बोलने से ही आप बौद्धिक होते हैं, इंटेलेक्चुअल होते हैं। यह धारणा टूट रही है। इसे टूटना ही चाहिए। इसे तोड़िए। अगर यह नहीं टूटती है तो जबरदस्ती तोड़िए, अधिक-से-अधिक साधारण और भारतीय बनकर दिखाइए। ऐसे अवसर पर जब तथाकथित सभ्यता यह सिखाती हो कि हिंदी बोलना असभ्यता है, जमकर अक्खड़ भाषा हिंदी बोलिए। हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम या अन्य भारतीय भाषा बोलना अशिष्टता या असभ्यता नहीं है। अंग्रेज भले ही हमारे देश की भाषा को वर्नाक्यूलर अर्थात गँवारू भाषा कहते रहे हों; लेकिन आज समय आ गया है कि दुनिया को हम बताएँ कि दुनिया के समस्त ज्ञान - चाहे वह आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हो या प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, को हमारी भाषा में व्यक्त करने का सामर्थ्य हमारी भाषा के भीतर है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक ढंग से व्यक्त करना भी जरूरी है। इसके लिए कुछ आवश्यक बातें मैं उदाहरण सहित कहना चाहूँगा। बहुधा जब हम सिस्टम खरीदते हैं या सॉफ्टवेयर लेते हैं तब हम इस बात पर ध्यान नहीँ देते कि इसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं जबकि उपभोक्ता होने के नाते हमें ध्यान देना चाहिए। हमें माइक्रोसॉफ्ट से कहना चाहिए कि अभी तक भी आपने माइक्रोसॉफ्ट के पब्लिकेशन वाले सॉफ्टवेयर में भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड का समर्थन नहीं दिया है । हम ऑफिस में यूनिकोड में काम कर रहे हैं परंतु जब हमें अपनी पत्रिका छपवानी होती है तब हमारा सारा काम बेकार हो जाता है। फिर किसी चाणक्य या शिवा या कृतिदेव फॉन्ट में टाइप कराना होता है! यूनिकोड में काम करने का क्या फायदा हुआ? यदि इस देश के तमाम उपभोक्ता हाथ उठाकर कह दें कि कल से हम आपके सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं करेंगे अगर आप हमें पब्लिकेशन में हिंदी समर्थन नहीं देते तो ऐसे में माइक्रोसॉफ्ट और गूगल एवं अन्य सब भी हिंदी समर्थन अवश्य प्रदान करेंगे। केवल यही नहीं ऐसी बहुत सारी सेवाएँ हैं। सबसे पहले हमें स्वयं अपनी भाषा हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। मशीन पर काम करना सीखने की दृष्टि से छोटी कक्षा से ही कंप्यूटर पर काम करना सिखाया जाता है। कक्षा 2-3-4 का बच्चा कंप्यूटर पर सब काम कर रहा है लेकिन जरा सोचिए, “क्या यही काम वह हिंदी या अपनी भाषा में कर सकता है?” जब आप उसे अंग्रेज़ी में पक्का करके 20 साल बाद किसी ऑफिस में लाएँगे और कहेंगे कि बेटा, इस कंप्यूटर पर हिंदी में काम करो। यह सोचने की ज़रूरत है कि, वह ऐसा क्यों करेगा और कैसे करेगा? कंप्यूटर प्रशिक्षण के कार्यक्रमों में हिंदी और भारतीय भाषाओं की उपस्थिति अनिवार्यतः होनी चाहिए। मैं बार-बार हिंदी के साथ भारतीय भाषा शब्द पर जोर दे रहा हूँ क्योंकि हिंदी अकेले कुछ नहीं कर सकती। हिंदी और भारतीय भाषाएँ मिलकर ही वास्तव में हिंदी बनती है। इस देश की ‘भारत-भारती’ बनती है । 

हिंदी और भारतीय भाषाओं को बाजार की भाषा बनाना और इन्हें कंप्यूटर की सर्वसमर्थ भाषा के रूप में स्थापित करना आने वाले समय की हमारी चुनौतियाँ हैं जिन्हें हमें पार करना ही है। मनोरंजन के क्षेत्र की, प्रकाशन के क्षेत्र की, मीडिया के क्षेत्र की चुनौतियों को हमने पार कर लिया है। मीडिया में सब जगह हिंदी छाई हुई है। मनोरंजन में फिल्म इंडस्ट्री इतनी व्यापक है जहाँ सब जगह हिंदी छाई हुई है। लेकिन जो फिल्म इंडस्ट्री के देवी-देवता कहे जाते हैं, आइकॉन्स कहे जाते हैं, हम उनका कॉलर कब पकड़ेंगे कि तुम भी हिंदी बोलना सीखो। स्क्रीन पर हिंदी बोल लेते हो लेकिन जब कोई तुमसे बात करने आता है तब अंग्रेज़ बन जाते हो! ये बातें एक्टिविज़्म की हो सकती हैं। आपको लग सकता है कि इन बातों से क्या लेना-देना है! हमें इन सबसे लेना-देना है। भाषा संबंधी शोध करने वाले लोगों का कहना है कि दुनिया की 6000 भाषाओं में से आधी से ज्यादा भाषाएँ गायब होने के कगार पर हैं। हालाँकि हिंदी और तेलुगु को कोई ऐसा खतरा नहीं है लेकिन हमें चेत जाना चाहिए। बाजार की तलवार दोधारी है। इस बाज़ार का लाभ उठाकर हम हिंदी को विश्वव्यापी बना सकते हैं। अगर हम जागरूक नहीं हुए तो हमारी हिंदी के ऊपर अंग्रेज़ी या कोई अन्य भाषा जो पहले ही लदी हुई है, और भी ऐसे ही लद जाएगी। इस स्थिति में हम टूटी-फूटी विदेशी भाषा सीखकर अपने बाज़ार को चलाने की कोशिश करते रहेंगे और हास्यास्पद बनते रहेंगे। बाज़ार, शिक्षा, न्याय और प्रशासन में हिंदी आएगी, तभी सच्चे अर्थ में हमारी राष्ट्र भाषा बनने पर उसकी विश्व भाषा की दावेदारी ईमानदार दावेदारी होगी। 

मित्रो, बहुत सारी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मैं समझता हूँ कि रक्षामंत्री और गृहमंत्री के संदेशों में मुख्य बातें कही जा चुकीं हैं। आप सबको विश्राम देने के लिए बीच में मैं थोड़ी देर के लिए यहाँ आकर खड़ा हो गया। ‘मिधानी राजभाषा शील्ड’ आरंभ करने के लिए मैं आप सबको शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं विशेष रूप से प्रबंध निदेशक महोदय को और आप सबको बधाई देता हूँ कि आपकी यह सोच उदाहरण बने। हैदराबाद के ही सभी सरकारी कार्यालयों एवं उपक्रमों में इसका समावेश करने से हम और विद्यार्थियों एवं लोगों को साथ जोड़ सकेंगे। एक द्वीप, एक आइलैंड, बनकर नहीं रह जाएँगे। बड़ी अच्छी बात है कि लगभग 150 अधिकारियों, कार्यकर्ताओं एवं अनेक विद्यार्थियों ने इन प्रतियोगिताओं में भाग लिया। शायद 24-25 विद्यार्थियों को पुरस्कृत भी किया जा रहा है। यह आँकड़ा बहुत ही प्रसन्न करने वाला आँकड़ा है।

अंत में, मैं उन बच्चों की विशेष प्रशंसा करना चाहता हूँ जिन्होंने यहाँ सरस्वती-वंदना प्रस्तुत की। मैं उनके अध्यापकों की भी विशेष प्रशंसा करता हूँ। उन्होंने वाणी की वंदना की। वाणी भाषा है। सरस्वती और कुछ नहीं, यह भाषा है। यही भाषा विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। इस देश में यह माना जाता है कि सृष्टि नाद से उत्पन्न हुई है। सबसे पहले आकाश था। आकाश में नाद था। यह नाद ही, यह वाणी ही पहला तत्व है। बाकी जितने तत्व हैं वह उसके बाद उत्पन्न हुए हैं । जब हम कहते हैं ,‘ हे हिंदी तू हंस है , हे वाणी तू हंसवाहिनी और जगद्व्यापिनी है।’ तो हमारे इस कथन में हमारी एक कामना व्यंजित होती है! हंस विद्वान लोगों को कहा जाता है। यहाँ हमारी कामना है कि विद्वत्ता के ऊपर एक ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण करते हुए भारत की भाषा जगद्व्यापिनी हो। हमारी कामना है कि हम ‘ग्लोबल’ बनें। जब हम कहते हैं – ‘हे माँ, तू हमें उजाला दे’, ‘हे माँ, तू हमें प्रेम दे’, ‘हे माँ, तू करुणामयी है’, ‘हे माँ, तू हमारा कल्याण कर’ तो इस प्रार्थना के माध्यम से इस देश की संस्कृति व्यक्त होती है। इस देश का सांस्कृतिक मूल्य व्यक्त होता है। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का, केवल बाजार चलाने का या केवल कंप्यूटर चलाने का ही माध्यम नहीं है। भाषा देश की पूरी-की-पूरी चेतना-धारा को व्यक्त करने और जोड़ने का माध्यम है। 1918 के व्याख्यान में महात्मा गाँधी ने कहा था कि इस देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, प्रशासनिक इत्यादि कार्यों के साथ, यदि कोई एक भाषा ऐसी हो सकती है, जो पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत को व्यक्त कर सके, तो वह हिंदी ही हो सकती है । यह बात 1918 में भी सच थी और 2018 में भी सच रहेगी। आपने मुझे यहाँ आने का यह अवसर प्रदान किया इसके लिए बहुत-बहुत-बहुत कृतज्ञ हूँ। नमस्कार। 

(लिप्यंकन : डॉ. चंदन कुमारी, पटना)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

नेट की तैयारी : ज़रूरी बातें

उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद : द्विदिवसीय कार्यशाला - दूसरा दिन : ऋषभदेव शर्मा  # 25 फरवरी,2016

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-         अर्हता : एम ए – 55% - 28 वर्ष [जे आर एफ]
-         83 विषय – 88 केंद्र – 3 प्रश्नपत्र  - बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ
-         द्वितीय – 100 अंक – 50 x 2 – 1 ½ घंटे
-         तृतीय – १५० अंक – 75 x 2 – 2 ½ घंटे-         NO NEGATIVE MARKING.
 ++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ 1.         3-4 महीने पहले से तैयारी करें.2.        तृतीय सत्र से ही....3.       नेट के निर्धारित पाठ्यक्रम को परीक्षक की दृष्टि से पढ़ें.4.       पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र/ अभ्यास मालाएं/ MOCK टेस्ट्स – अधिकाधिक ...5.       रटने/उगलने की अपेक्षा अवधारणाओं/ संकल्पनाओं को समझें.6.       पाठ्यक्रम को बहुविकल्पी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के निर्माण की संभावना की दृष्टि से पढ़ें.7.       सतत अभ्यास द्वारा उत्तर देने की अपनी गति सुधारते रहें,8.       और...और...पढ़ें. मुख्य बिंदु नोट करें. सरलता से दोहराने का मानसिक अभ्यास करें. तथ्यों को वर्गीकृत करें.9.       विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त करें.
10.    अपनी याददाश्त और एकाग्रता को बढाएं –                                 i.            दोहराएं  :  स्मृति – 24 घंटे में 18% और 1 महीने में 5% शेष.                                ii.            पढने और दोहराने की गति बढाएं.
                              iii.            थकने पर केवल 3 मिनट का विश्राम.
                              iv.            तथ्यों के अंतर्संबंध पहचानकर काल्पनिक चित्र/कथा बनाएं.                               v.            शृंखलाबद्ध करें [ लर्निंग सेक़ुएन्केस].                              vi.            आत्मनिरीक्षण करके अपनी आदतें बदलें.                            vii.            प्रतिदिन कम से कम 6 घंटे स्वाध्याय करें.                           viii.            निरंतरता बनाए रखें.                              ix.            सकारात्मक रहें.-           

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

हिंदी अनुसंधान की नई दिशाएँ


उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद :
कार्यशाला : 18 फरवरी, 2016 :
-----------------------------------------------------------------------------------------  ऋषभदेव शर्मा
1.        परंपरागत दिशाएँ
-    साहित्यकार
-    साहित्यिक कृति
-    साहित्येतिहास : काल
-    साहित्यिक प्रवृत्ति
-    विचारधारा
-    भाषाविज्ञान

2.       परंपरागत शोध-दृष्टियाँ
-    काव्यशास्त्रीय : भारतीय, पाश्चात्य
-    समाजशास्त्रीय
-    ऐतिहासिक
-    मार्क्सवादी
-    मनोविश्लेषणवादी
-    शैलीवैज्ञानिक
-    रूपवादी
-    सौन्दर्यशास्त्रीय
-    मिथकीय

3.       नई शोध-दृष्टियाँ
-    तुलनात्मक अध्ययन : आधुनिक परिप्रेक्ष्य
-    लोक अध्ययन
-    स्त्री विमर्श
-    दलित विमर्श
-    आदिवासी विमर्श
-    अल्पसंख्यक विमर्श
-    पर्यावरण विमर्श
-    वृद्धावस्था विमर्श
-    किन्नर विमर्श

4.       नए शोध-क्षेत्र
-    हिंदी शिक्षण
-    अनुवाद समीक्षा : अनुवाद तुलना
-    प्रतीकांतरण : कथा/ नाट्य
-    राजभाषा क्रियान्वयन
-    पत्रकारिता : सम्पादकीय से विज्ञापन तक
-    टेलिविजन : समाचार से धारावाहिक तक : वस्तु से वास्तु तक 
-    फिल्म : रूपांतरण से उत्तर आधुनिकता तक : पटकथा/ संवाद/ गीत/ प्रतिपाद्य
-    प्रवासी साहित्य : डायस्पोरा / बहिर्गमन / विस्थापन : सांस्कृतिक संदर्भ   
-    लोक साहित्य : संरक्षण/ विवेचन
-    लुप्तप्राय भाषाएँ


मंगलवार, 25 नवंबर 2014

सोनिया

16/11/2014 को कादंबिनी क्लब, हैदराबाद द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित समारोह में अरुणाचल प्रदेश की युवा लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने नजीबाबाद के वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक स्नेही  की काव्यकृति ''सोनिया'' का लोकार्पण किया. इस अवसर पर प्रो. देवराज [वर्धा] और डॉ. अहिल्या मिश्र [हैदराबाद] ने कवि को बधाई दी तथा प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित प्रेमकाव्य के अंशों का वाचन किया. प्रकाशक अमन कुमार त्यागी ने 'सोनिया' की समीक्षा प्रस्तुत की तथा डॉ. अशोक स्नेही ने फोन-वार्ता करते हुए सबके प्रति आभार व्यक्त किया.


भूमिका


प्रेम सृष्टि की मूल शक्ति है. वही आकर्षण और चेतना का स्रोत है, मुक्त मनोभाव है. प्रेम व्यक्ति को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाता है. प्रेम जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और प्रेम का अभाव जीवन को भटका देता है. सारे भाव प्रेम में से ही उपजते हैं, उसी में विलसते हैं  और उसी में लीन हो जाते हैं. प्रेम की यह लीला देश और काल की सीमाओं से परे देह और दैहिकता के पार मन और आत्मा की लीला है. प्रेम ऐसा अहोभाव है जो हमारे अस्तित्व पर कोमलता के किसी क्षण में गुलाब की पंखुड़ियों पर बरसती हुई ओस की बूंदों की तरह उतरता है. जब हमारे अस्तित्व पर प्रेम उतरता है तो हम रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरते हैं, सहज संवेदनशील हो उठते हैं. प्रेम में पाना महत्वपूर्ण नहीं होता, प्रेम में होना महत्वपूर्ण होता है. खोने-पाने का गणित व्यापारी रखा करते हैं, प्रेमीजन नहीं. प्रेम जब उतरता है तो कविता फूटती है. यह हो सकता है कि हर प्रेमी कवि न होता हो पर कविता फूटती अवश्य है. भले ही निःशब्द रह जाए. 

यही विस्मयकारी अनुभव अशोक स्नेही (1954) के अस्तित्व पर भी उतरा है. स्वभावतः कविता भी फूट पड़ी है. निःशब्द नहीं सशब्द; क्योंकि अशोक स्नेही आतंरिक अनुभूतियों को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करना जानते हैं. प्रणय के स्पंदनों को, अपरिचिता के साथ कल्पना लोक में विहार की विविध मनोदशाओं को, शब्दचित्रों में बाँधना उन्हें भली प्रकार आता है. उनके मनोजगत की सर्वथा निजी अनुभूतियों का मुकुलित और प्रस्फुटित रूप है – ‘सोनिया’. यह अनपाए प्यार की अद्भुत गाथा है. 

‘सोनिया’ डॉ. अशोक स्नेही की काव्यकला का सुंदर नमूना है. इसमें कवि ने अपरिचित प्रेयसी के साथ कल्पना में रास रचाया है. मिलन और विरह के सारे अनुभव कोमल मन के झनझनाते तारों पर झेले हैं. मनवीणा के तारों की इस झंकार में कभी अप्रतिम रूप की अभ्यर्धना बज उठती है तो कभी उत्कंठित मानस की इच्छाएँ तरंगित होने लगती हैं. प्रिया का रूप कवि को प्रकृति के साथ एकाकार प्रतीत होता है और प्रकृति प्रिया के एक एक अंग में समाई लगती है. इस अपरिचित कविप्रिया के होंठ दहकते लाल टेसू हैं, नयन बहकते मस्त भँवरे हैं, अंग अंग चहकता है, चंचल चितवन दुधारी तलवार चलाती है और गालों पर अंगार खिलते हैं. यह नायिका अत्यंत कोमल है, चंचल है, मोहिनी है. कभी कवि को वह इतनी निकट लगती है कि मिलन की मन्नतें माँगकर इच्छाओं की पूर्ति का द्योतक कलावा कलाई में बाँध लेती है और रविवार की छुट्टी में कवि उसे पीपल पर नाम गोदने चलने के लिए आमंत्रित करता है; तो कभी कवि स्वयं को सम्मोहित अनुभव करता है – ऐसे हर क्षण में प्रिया अपनी नरम उँगलियों से छूकर नवरस रंग बहार का संचार करती है, काव्य की प्रेरणा बन जाती है. चरम समर्पण के क्षणों में यह कविप्रिया गंगा और माँ भी बन जाती है. वही सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक मूल्य क्षरण के बीच नई मूल्य चेतना का प्रतीक बनकर प्रकट होती है और वही सारे प्रवादों और अपवादों के बीच सहज संबल प्रदान करती है. 

इसमें संदेह नहीं कि डॉ. अशोक स्नेही के जीवन में प्रेम का यह अवतरण उस मोड़ पर हुआ है जब कवि को यह अनुभव हो चुका है कि संबंधों के ताने-बाने मकड़ी के जाले हैं, जीवन समझौतों का दूसरा नाम है. ऐसी स्थिति में इस प्रेम के सहारे कवि एक समानांतर दुनिया में, सपनों के संसार में, ही मुक्ति का बोध पाता है, इस समानांतर संसार में ही घने बबूलों के जंगल, दरिंदों के दंगल, विघ्न और अमंगल को विलीन करने वाला ऐसा जादू है, जिसके लोक में पहुंचकर कवि यथार्थ जगत के समस्त दुखों से निस्तार पाता है. यह समानांतर जगत ही डॉ. अशोक स्नेही की ‘सोनिया’ का जगत है, रूप के जादू का जगत है, प्रेम का जगत है. 

प्रेम के इस जादुई जगत के सृजन और प्रकाशन के लिए कवि को बधाई देते हुए मैं उनके यश की कामना करता हूँ. 

12 जून 2014                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा 
नजीबाबाद  (यात्रा)                                                                                                     

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

गांधी और हिंदी के साथ 'अपुङ' की चुस्की



अरुणाचल प्रदेश, ३० सितंबर २०१४.
आज दोइमुख स्थित सरकारी महाविद्यालय में जाने का अवसर मिला. प्रसंग था ''हिंदी-गांधी और राष्ट्रीय एकता'' विषयक 'दिशा विन्यास कार्यशाला'. स्नातक स्तर के छात्र-छात्राओं ने हिंदी में नुक्कड़ नाटक, काव्य पाठ, भाषण और गीत-संगीत से महात्मा गांधी की प्रासंगिकता और अरुणाचल प्रदेश में हिंदी की सहज व्याप्ति का तो बोध कराया ही, शिक्षा और रोजगार की समस्या पर फिर से सोचने को बाध्य भी किया. अरुणाचली हिंदी की संप्रेषणशक्ति भी महसूस की. सचमुच, प्राध्यापकों और छात्रों  ने जी-जान से तैयारी की थी. मैं उन सबके प्रति नतमस्तक हूँ. 
अरुणाचल टाइम्स ने इस समारोह की रिपोर्ट देते हुए लिखा है -
Hindi Divas and Gandhi Jayanti

DOIMUKH, Sep 30: 

Blending the events of Hindi Divas and Gandhi Jayanti, the department of Hindi, Government College Doimukh today organized ‘Hindi-Gandhi Aur Rashtriya Ekta’ programme to acknowledge the importance of Hindi language and also to commemorate the birth anniversary of Mahatma Gandhi, here at its college premises.

Addressing the gathering, Director of Higher and Technical Studies Joram Begi said that the success of Hindi language in the state can be understood with the fact that the highest numbers of National Eligibility Test (NET) qualifiers are Hindi students.
However, stating that Hindi no doubt have given a common platform for communication among different tribes of Arunachal Pradesh, Begi added that due importance should also be given to respective indigenous dialects so that it survives, especially by youths.
Begi also appealed them to participate in the mass cleanliness drive, which has been initiated under ‘Swachh Bharat Abhiyan’ across the state, by cleaning their college surroundings and also their respective residential areas.
Further stating that the most important thing that India needs now is cleanliness, Begi urged the students and faculties present to give their contribution towards cleanliness drive which he opined would be an honest tribute to Mahatma Gandhi.
Professor Rishabha Deo Sharma of Hyderabad who attended the programme as special guest said that regionally spoken Hindi like that of Mumbai, Kolkata, Hyderabad, Arunachal and others, though may not be grammatically sound but should be adopted and given equal recognition as it make Hindi language as national language in true sense.
The main attraction of the programme was the creative satirical statement on educational scenario of the state, delivered in a form of street play titled ‘Jahan Shiksha Ki Buniyad Nahi Hai’. The street play was performed by a group of 44 students which was led by assistant professor Tai Togung, department of Hindi, Government College Doimukh.

कार्यक्रम के बाद दोइमुख की एक स्थानीय नेत्री और जिला परिषद की सदस्य के आवास पर विशिष्ट सांस्कृतिक भोज की व्यवस्था थी. ''टी टोटलर हूँ'' बताकर आतिथेय का मान रखने को ''अपुङ'' की एक चुस्की अपुन ने भी भरी. पता नहीं कि ऐसा स्वाद कभी और किसी पदार्थ का अपने अनुभव में आया हो!? शायद नहीं... अर्थात एक अलग स्वाद. बड़े स्नेह से पूछ-पूछ कर मातृभाव से उन लोगों ने भोजन कराया - मुझ शाकाहारी के लिए भी अनेक प्राकृतिक पदार्थ थे. तृप्ति हुई. आनंद आया.

अपुङ  के बारे में खोजने पर यह जानकारी मिली -
Apo (drink)
From Wikipedia, the free encyclopedia

Apo or Apung is a rice beer. It is popular among the tribes in the North East Indian states of Arunachal Pradesh and Assam. It is prepared by fermentation of rice. It is generally distributed among the participants in a bamboo shoot.[1]
The Nyishi people, who form the major part of the local tribal population in Nirjuli, celebrate Nyokum annually. They serve the local drink, Apung made by fermentation of rice. The Nyishi people offer the drink, every time they drink it, to the spirits (wiyus) by letting few drops of it fall on the ground.[2]
[चित्र सौजन्य - तादो नाबाम]