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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

हिंदी अनुसंधान की नई दिशाएँ


उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद :
कार्यशाला : 18 फरवरी, 2016 :
-----------------------------------------------------------------------------------------  ऋषभदेव शर्मा
1.        परंपरागत दिशाएँ
-    साहित्यकार
-    साहित्यिक कृति
-    साहित्येतिहास : काल
-    साहित्यिक प्रवृत्ति
-    विचारधारा
-    भाषाविज्ञान

2.       परंपरागत शोध-दृष्टियाँ
-    काव्यशास्त्रीय : भारतीय, पाश्चात्य
-    समाजशास्त्रीय
-    ऐतिहासिक
-    मार्क्सवादी
-    मनोविश्लेषणवादी
-    शैलीवैज्ञानिक
-    रूपवादी
-    सौन्दर्यशास्त्रीय
-    मिथकीय

3.       नई शोध-दृष्टियाँ
-    तुलनात्मक अध्ययन : आधुनिक परिप्रेक्ष्य
-    लोक अध्ययन
-    स्त्री विमर्श
-    दलित विमर्श
-    आदिवासी विमर्श
-    अल्पसंख्यक विमर्श
-    पर्यावरण विमर्श
-    वृद्धावस्था विमर्श
-    किन्नर विमर्श

4.       नए शोध-क्षेत्र
-    हिंदी शिक्षण
-    अनुवाद समीक्षा : अनुवाद तुलना
-    प्रतीकांतरण : कथा/ नाट्य
-    राजभाषा क्रियान्वयन
-    पत्रकारिता : सम्पादकीय से विज्ञापन तक
-    टेलिविजन : समाचार से धारावाहिक तक : वस्तु से वास्तु तक 
-    फिल्म : रूपांतरण से उत्तर आधुनिकता तक : पटकथा/ संवाद/ गीत/ प्रतिपाद्य
-    प्रवासी साहित्य : डायस्पोरा / बहिर्गमन / विस्थापन : सांस्कृतिक संदर्भ   
-    लोक साहित्य : संरक्षण/ विवेचन
-    लुप्तप्राय भाषाएँ


गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ *


प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया
डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया 

जन्म तिथि : 2.2.1926  ('अभिनव प्रसंगवश' के विशेषांक में डॉ. कमल सिंह ने सूचना दी है कि डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया की 86वीं वर्षगाँठ 2.2.2012 को मनाई गई)  अथवा 6.11.1927 (प्रमाणपत्रों में).

निधन  : 21.11.2013.
.
काव्यभाषा विषयक अध्येय ग्रंथ :
हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ, कैलाश चंद्र भाटिया,
1983, तक्षशिला प्रकाशन
// कुल 22 निबंध//

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ 

काव्यभाषा के अध्ययन का निजी मॉडल

आधार = अनुभूति और अभिव्यक्ति की अन्योन्याश्रयता
              ऐतिहासिक भाषाविज्ञान
              हिंदी भाषा का विकास : वर्तन बिंदु (turning points).
 वैशिष्ट्य :
1. साधारणता की ओर : तद्भवता और देशजता की प्रवृत्ति
2. हर निबंध में सूत्र रूप में निर्भ्रांत लेखकीय स्थापनाएँ  (शब्दों की मितव्ययिता)
3. काव्यभाषा में प्रतीक
4. काव्यभाषा में विशेषण
[1] हिंदी भाषा का विकास : तद्भवता / साधारणता की ओर प्रस्थान

काव्यभाषा के विकास में हिंदी के सभी उप-रूपों ने – खड़ीबोली, ब्रजभाषा, अवधी आदि – पूरा पूरा योग दिया है. काव्यभाषा के रूप में जनभाषा ही समय समय पर अपनाई गई जिसको अधिकांश कवियों ने ‘भाषा’ ही कहा. मध्यदेश के ही नहीं, भारतवर्ष के सभी अंचलों ने इसको आगे बढ़ाया है. (अपनी बात)
रोड़ा कृत राउलवेल :

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पश्चिमी रूपों की बहुलता के कारण यह रचना पश्चिमी हिंदी का पूर्व रूप है जिस पर अन्य प्रादेशिक रूपों की यत्र तत्र छाया है. (11 वीं शती)

Ø प्राकृत अपभ्रंश काल में व्यंजनों का लोप
हंसगइ (हंसगति), सरउ-जलय (शरद-जलद), रोमराइ (रोमराजि), रयणि (रजनी),

Ø हकार का प्राधान्य
सोह (शोभा), नाह (नाथ), मुह (मुख), पहिरणु (परिधान)

पृथ्वीराज रासो :

13 वीं शती
तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी)

चंदायन :
पुरानी अवधी

विद्यापति :

पदावली की भाषा ‘देशी’ ठहरती है = मैथिली = तत्कालीन जनभाषा
विद्यापति की भाषा जन जन की भाषा थी. तब ही तो ‘देसिल बअना’ का प्रयोग किया गया जो उन दिनों लोकजीवन में प्रचलित जनसाधारण की भाषा थी और आज की हिंदी का आदि रूप.

कबीर :

भाषा का अन्नकूट रूप – पूर्वी, खड़ीबोली, पंजाबी, ब्रजभाषा, राजस्थानी
वस्तुतः कबीर द्वारा प्रयुक्त पंचमेली सुधुक्कडीभाषा ही उस समय की जन जन की भाषा थी जिसमें पूर्वी रूपों की अपेक्षा पश्चिमी रूपों, ब्रजभाषा तथा खड़ीबोली की प्रधानता थी.

जायसी : पद्मावत :

ठेठ अवधी = जो बोली लोक में समझी जाती थी. (जनभाषा)
मानस की अवधी से भिन्न
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार

तुलसी :

मुख्य समस्या = संस्कृत बनाम लोकभाषा = दुशाला बनाम कमली
का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए सांच
काम जु आवे कामरी, का लै करिज कुमांच
सार्थक शब्द चयन :
हनुमान = वानर, मरकट, कपि, बंदर (उत्पात), मारुत सुत, पवन कुमार, पवन सुत (सम्मान), प्रभंजनजाया (पराक्रम की पराकाष्ठा)

सूर :

सूर शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता

किसी भाषा की श्रेष्ठता का मानदंड केवल यह है कि उस भाषा में हम सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को व्यक्त कर सकें
= सूर और सूर की ब्रजभाषा दोनों समर्थ

देखना क्रिया :

अंग्रेजी = see, behold, look, perceive, watch, take notice

सूर = देखि, विलोक, निरखि, पलक, भुलोन, चितवति, दृष्टि रही, देख्यो, नैन भुलाने, झांकति, दर्शन, झखति आदि + नैन व्यापार पर 250 मुहावरे

v लोकोक्ति, मुहावरे – सैंकडों
ऊधो अब कुछ कहत न आवे /
सिर पर सौति हमारे कुबिजा /
चाम के दाम चलावे.

मीराँ :

तद्भव शब्दावली – 70-75%
सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक शब्दावली

बिहारी :

सूर, नंददास आदि अष्टछाप के कवियों ने जिस ब्रजभाषा को काव्य में चलते रूप में प्रयुक्त किया उसे बिहारी ने सुष्ठु एवं परिमार्जित किया.

गुरु गोबिंद सिंह :

टकसाली ब्रजभाषा + शैलीगत भेद : पंजाबी की विशेष छटा
चंडीचरित्र में पंजाबीपन तो इतना नहीं है पर खड़ीबोली की झलक स्थान स्थान पर अवश्य है जिसे कवि ने ‘रेखती शैली’ नाम दिया.
भाखा सुभ समकर हो घरि हो कृत्ति में
(ऐसी भाषा जो सबके लिए शुभ हो - का प्रयोग मैं अपनी कृति में कर रहा हूँ)
भाषा/ भाखा का आधार तद्भव शब्दावली है – पुरख, कालुख, बरखा, सीख, सिख, पुरुखत कुरुखेत
लोकोक्ति, मुहावरे
युद्ध वर्णन में सूदन, भयानक व रौद्र में भूषण, लालित्य में देव, अनुप्रास में पद्माकर, अभिव्यक्ति में घनानंद की भाषा का सा आनंद.

घनानंद :

लाक्षणिक उक्तियों और अभिव्यंजना कौशल के कारण रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि
सूर ने जिस ब्रजभाषा को काव्य का माध्यम अपनाया उसी को घनानंद ने व्यवस्थित रूप दिया.

तद्भव प्रियता – अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं
लोक शब्दावली – घनानंद के हाथों में आकार साहित्यिक बन गई
§ सल (ज्ञान, मालूम), संजोअे (संध्या का अंतिम भाग), लघेरि (लपेटकर), उजैना (उद्यापन करना), न्यार (चारा), पैछर (पैर की आवाज), झारां (सब के सब), ओटपाय (उपद्रव), टेहुले (शुभावसर के अनुष्ठान), गरैंठी (पूरे भरे पात्र से कुछ कम) आदि

मुहावरे, कहावतें =जीवित भाषा के प्राण
घनानंद सिद्धहस्त उस्ताद हैं.

ब्रज की टकसाली भाषा के समर्थक.

मैथिलीशरण गुप्त :

आपने खड़ीबोली के खड़ेपन, कर्कशता तथा परुषत्व को दूर कर उसे मधुरता और कोमलता प्रदान की.
शुद्ध परिष्कृत काव्योचित  बनाया
बोलचाल की सामान्य शब्दावली के साथ संस्कृत शब्दावली अपनाकर काव्य भाषा को समृद्ध किया.
लड़खड़ाती भाषा मिली थी – सौष्ठवमय बना दिया

सियारामशरण गुप्त :

एक साथ पद्य तथा गद्य में समान अधिकार रखने वाले सियारामशरण जी जैसे साहित्यकार कम हैं.
गद्य साहित्य में भी उनका कवि रूप छलका है.

जयशंकर प्रसाद : 

तद्भव शब्दावली के प्रयोग से यदि भावाभिव्यक्ति में सरलता होती है तो आप तत्सम के स्थान पर तद्भव का प्रयोग ही अच्छा समझते थे.
परस (स्पर्श), नखत (नक्षत्र), किरन (किरण), पीर (पीड़ा), थिर (स्थिर), साँझ (संध्या), तीख (तीक्ष्ण), सपना (स्वप्न), निबल (निर्बल), सुहाग (सौभाग्य), रात (रात्रि), नाच (नृत्य) आदि

प्रारंभिक कृतियों में ब्रजभाषा
बाद में बनारसी प्रयोग अधिक.

निराला : 

भावानुसार भाषा
भाषा का चलता रूप

लोक प्रचलित मुहावरों से युक्त भाषा प्रयोग में उनका व्यक्तित्व झांकता है
निराला की भाषा एक आदर्श भाषा है जिसने हिंदी के परिनिष्ठित रूप के विकास में पर्याप्त योग दिया.

अज्ञेय : 

नई कविता की भाषा के लक्षण -
साधारण बोलचाल की भाषा
मुहावरे और पद विन्यास
सीधे जीवन से ली हुई तद्भव शब्दावली
देहात की भाषा का मुहावरा
तद्भव प्रयोग – दुःख सबको माँजता है (माँजना)

[2] निर्भ्रांत सूत्रात्मक लेखकीय स्थापनाएँ

रोडाकृत राउलवेल : शिलांकित काव्य – 11 वीं शती :
राजकुल विलास = राजभवन की रमणियों का वर्णन
हिंदी भाषा का विकास पथ और भी अधिक स्पष्ट करने में सहायक
विचारणीय प्रश्न = किस प्रदेश विशेष की भाषा
सर्वाधिक बाहुल्य पश्चिमी और मध्यवर्ती रूपों का. (पछाहीं अपभ्रंश का प्रभाव – शिवप्रसाद सिंह)

चंदवरदाई : पृथ्वीराज रासो – 13 वीं शती :

 तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी) = प्राचीन ब्रजभाषा = पिंगल
प्राचीन प्राकृताभास शब्दों की बहुलता + अरबी फारसी का मिश्रण

मौलाना दाऊद चंदायन - 14 वीं शती :

पाठ संपादन से जुड़े रहे
चंदायन की भाषा पुरानी अवधी है जिस पर पश्चिमी हिंदी का प्रभाव है.

रत्नाकर : उद्धव शतक :
भाषा की कारीगरी

जयशंकर प्रसाद : 

निराला के गीत संग्रह ‘गीतिका’ के प्रारंभ में प्रसाद ने काव्यभाषा की चार विशेषताएँ बताईं –
(1) नई पद योजना = वर्णों का भास्वर प्रयोग
(2) नई शैली = मूर्तिमती व्यंजना + नए प्रतीक
(3) नया वाक्य विन्यास = अपूर्ण वाक्य
(4) आभ्यंतर भावों के लिए शब्दों की नई भंगिमा - 
शब्दों के नवीन सार्थक प्रयोग
अनेकार्थवाची शब्दों में से समुचित शब्द का प्रयोग
शब्दों के सटीक प्रयोग – संज्ञा, विशेषण, क्रिया आदि.
छायामयी वक्रता के लिए ‘सर्वनाम’ का प्रयोग
समुचित उपनामों का प्रयोग
वैदग्ध्यमयी वाग्भंगी जिसके द्वारा अर्थवैचित्र्य और चमत्कार की सृष्टि की जाती है.

निराला : 

संस्कृत की तत्समप्रियता
सभी प्रकार की शैली में काव्य प्रणयन का अभ्यास
अनुप्रासमयता
चित्रमयता
ध्वन्यात्मकता

पंत : 

भाषा में स्वरों का महत्व
स्वर = काव्य संगीत का मूल तंतु

पर्याय चयन
पहली बार बड़ी गंभीरता से पंत जी ने पर्यायों की अर्थछटाओं पर विचार किया
भ्रू = क्रोध की वक्रता
भ्रकुटि = कटाक्ष की चंचलता
भौंह = स्वाभाविक प्रसन्नता, ऋजुता 
अनिल = कोमल शीतल वायु
वायु = निर्मल हवा
पवन, प्रभंजन = तेज हवा

प्रमुख विशेषता : समुचित शब्द चयन
पंत जी को खड़ीबोली अव्यवस्थित, क्षीण और दुर्बल रूप में मिली.
उन्होंने खड़ीबोली को संस्कृत के शब्द देकर खड़ा किया

खड़ीबोली काव्यभाषा को आर्द्रता, कोमलता, स्निग्धता, प्रांजलता, सहजता, मधुरता, रागात्मकता प्रदान करने का श्रेय पंत को है.

महादेवी : 

खड़ीबोली हिंदी के स्पष्ट दो रूप –
(1) संस्कृतनिष्ठ हिंदी – प्रिय प्रवास,
(2) संस्कृत के शब्दों से युक्त होते हुए भी बड़े बड़े संधि समास से मुक्त रूप जिसमें समुचित तद्भव शब्दावली का प्रयोग भी = छायावादी युग की काव्यभाषा

छायावादी युग में सूक्ष्म एवं अमूर्त की अभिव्यंजना के साथ शैली अवश्य दुरूह हो गई
पर भाषा की शक्ति और सौंदर्य में विकास हुआ.

प्रतीकात्मकता
मुक्त प्रयोग
विविधता
अनेकार्थता
भाषा को सौष्ठव, साथ ही गांभीर्य प्रदान करने की दृष्टि से महादेवी जी का विशेष महत्व है.

दिनकर : 

प्रारंभ से ही भाषा के प्रति सतर्क
छायावादी युग के प्रयोगों से शिक्षा
आक्रोश के लिए बलयुक्त भाषा
बलाघात के लिए ‘ही’ का प्रयोग -
मैं ही न हाय पहचान सकी
यह बात प्रभु पहले से ही कहते हैं
तुम्हें देखते ही मुझ में अजब भाव जगता
हम ही तुम्हें साकार नहीं तो छिपे हुए हैं
भाषा उनका चरम लक्ष्य था

अज्ञेय : 

संस्कारी भाषा के पोषक
अर्थवान शब्द की समस्या

कवि उसी भाषा का प्रयोग करता है जिसे वह रोज जीता है. जब हम बोलचाल में संकर भाषा का प्रयोग करते हैं, सारा समाज संकर भाषा में जीता है तब कविता में उसे क्यों प्रवेश नहीं मिलेगा (जोग लिखी)

सांस्कृतिक बिंब-
दिन का आरंभ = द्वार पर पड़े हल्दी रंगे पत्र
धरती = सवत्सा काम धेनु
संध्या के बादल = कपूर और सिंदूर की गाँठ
भोर की पुकार = रात के रहस्यमय स्पंदित तिमिर की भेदती कटार-सी
नदियाँ = रंभाती हुई धेनुएँ

आज के युग की देन – विसंगति, अकेलापन, कुंठा, यांत्रिक जीवन आदि -
के अनुकूल भाषा तैयार करने में जहां अज्ञेय सफल रहे हैं
वहाँ प्रतीकों, बिंबों, अभिप्रायों आदि को प्रस्तुत करने में अद्वितीय.

[3] काव्यभाषा में प्रतीक विधान

कबीर :

प्रतीकात्मक भाषा : जनभाषा : लोक प्रचलित प्रतीकों का प्रयोग
चरखा = जो चरखा जरि जाय बड़ेया ना मरे/ मैं कातों सूत हजार चर्खुला जिन जरे
कुम्हार और मिट्टी
कुंआ और पनिहारिन
कोई शब्द निरर्थक नहीं : नाम के साथ विशेषण का प्रयोग : प्रतीक
हंस कबीर = मुक्तावस्था,
कह कबीर = स्वोक्ति,
कहै कबीर = अन्य व्यक्ति की उक्ति,
दास कबीर = ईश्वर का उपासक,
कबीरा = अज्ञानी
जयशंकर प्रसाद :
ज्योत्स्ना = प्रफुल्लता
स्वच्छंद सुमन = आकंक्षा, उन्मुक्त अभिलाषा
किरण = उत्साह, स्फूर्ति
बासी फूल = म्लान भाव
रजनी का पिछला प्रहर = किशोरावस्था के बाद का समय
मतवाली कोयल = हृदय का उल्लास
कलियाँ = नवीन भाव
ऊषा की लाली = यौवन
सोने के सपने = आनंदमय जीवन
ज्योत्स्ना निर्झर = अपार सौंदर्य
झंझा/ आंधी = हलचल/ क्षोभ
मरु ज्वाला = अनंत पीड़ा
पंत : 
ऊषा = दिव्य माधुर्य
कली = नारी का बाल्यकाल
रजत = रूप, चंचलता/ चपलता
द्रौपदी के दुकूल = विरह की अनन्तता
घन = चिंताएं
गर्जन = वेदना
प्रभात = शैशव
बसंत = सुख
स्वर्ण = दीप्तिमान मानसिक सत्ता
गुलाब = जीवन एवं जगत
संध्या उषा = दुःख-सुख
दोपहर = यौवन
चांदनी = शीतलता

महादेवी : 
अँधेरा (विषाद),
वर्षा (करुणा),
ग्रीष्म (क्रोध),
वसंत (आनंद),
पतझर (निराशा),
मकरंद (आँसू),
मधुशाला (विश्व),
लू (प्रेम का अंत),
बुद्बुद(क्षण)

[4] काव्य भाषा में विशेषण प्रयोग

घनानंद

विशेषण का सम्यक प्रयोग.
नेत्र व्यापर की विभिन्न अवस्थाएँ
छके दृग = प्रेम के मद से मस्त
ललित लाल चख = प्रेम के मद से मस्त होने के कारण लाल नेत्र
तृषित चखन = रूप जल के प्यासे नेत्र
अंखियानी निपेटिन की = पेटू या अत्यधिक खाने वाली!
                                      रूपरस माधुर्य का पान करने की अत्यधिक अभिलाषी आँखें
अन्य :
‘आँखिन बानि अनोखी,
प्रीति पगी अंखियानि,
अँखिया दुखियानि कुबानि परी,
दीठि थकी अनुराग छकी,
लाजनि लपेटी चितवनि भेद भय भरि’ आदि

पंत : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
उन्मन गुंजन,
महासंगीत
वन अकलुष,
अमृत सत्य
स्वप्निल मन,
अमृत प्रीति
तंद्रिल तन
श्यामल छवि
नील = नील विहग, नील गगन, नील जलज
मधु = मधु पत्र, मधुक्षण, मधुरस
स्वर्ण = स्वर्ण किरण, स्वर्णहंस, स्वर्णिम स्पर्श

दिनकर : 

विशेषणों का सटीक प्रयोग / शोध की संभावना
भीगी तान, दहकती वायु, मीठी उमंग, चकित पुकार, तरंगित यौवन, अस्फुट यौवन, मीठी धूप, शीतल सुधा, शुचि स्मिति, मृदु स्मिति
रंग विशेषण –
शुभ्रमेघ, श्वेत फूल, सफ़ेद किरण,
नीलांतरिक्ष, नीले अँधियाले, नील कुसुम
विशेषण पदबंध –
इच्छा बहरे नयन,
कजरारे लोचन,
गले पिघले अनल,
व्यग्र व्याकुल प्राण,
अगम उत्ताल उच्छल सागर,

अज्ञेय : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
तारों सजा फूहड़ निलज आकाश (इत्यलम)
लंबी अंधियाली किसी घाटी में (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
फुटकी की लहरिल उड़ान (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
मरोड़ी हुई देह वल्ली (आँगन के पार द्वार)
छरहरे पेड़ की नई रंगीली फुनगी (आँगन के पार द्वार)
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की (हरी घास पर क्षण भर).

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* हम अपने ही भंडार से अवगत नहीं हैं.
आज आवश्यकता है कि हम साहित्य और लोक में बिखरे भाषा संबंधी इस खजाने को पहचानें. [सूर]

* तुलसी की भाषा का रूप समन्वयात्मक है.
कहीं उसे किसी शब्द से घृणा नहीं.
आज के लिए अनुकरणीय. [तुलसी]
* मौन तथा व्यंजना  - 
मौन भी अभिव्यंजना है:/ जितना तुम्हारा सच है/ उतना ही कहो. [अज्ञेय]'
O

* 29-30 मार्च 2014 को बेलगाम (कर्नाटक) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी 'पुण्य स्मरण' में  दूसरे  दिन डॉ. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में संपन्न डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पर केंद्रित विचार सत्र में प्रस्तुत डॉ. ऋषभ देव शर्मा के व्याख्यान की आधार-सामग्री. 

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

भारतीय साहित्य में भक्ति आंदोलन : कुछ टिप्पणियाँ


1. भक्ति आंदोलन ने संपूर्ण भारत को एक सूत्र में जोड़ने का अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक – सांस्कृतिक कार्य संपन्न किया. वैदिक विचारधारा के अतिरिक्त बौद्ध और जैन विचारधाराएँ भी आरंभ में उत्तर से दक्षिण की ओर गईं. दक्षिण की भावप्रवण मानसिकता के साथ इनका संघर्ष भी हुआ और संगम भी; और धीरे धीरे उत्तर और दक्षिण दोनों की भक्ति परंपराएं एक समान भावभूमि पर स्थापित हुईं.

2. विशेषकर बौद्ध विचारधारा से बल पाकर हाशिए के समाज – जन जातियाँ और दलित जातियाँ उठकर खड़ी हुईं और भागवत परंपरा के साथ उसके समन्वय से भक्त संतों की परंपरा का विकास उत्तर और दक्षिण दोनों में हुआ.

3. महाभारत के परवर्ती काल में उत्तर भारत में जब शकों का आधिपत्य हुआ तो आभीरों को राज सेवा में नियुक्तियां मिलीं. आगे चलकर शकों के दक्षिण की और प्रस्थान के समय उनके साथ ये आभीर भी दक्षिण आए. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में आभीरों के कई राज्य कायम हुए. इससे उनकी धार्मिक विचारधारा के रूप में पंचवीर (कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और साम्ब) का दक्षिण में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ.

4. आभीरों की कृष्ण भक्ति का दक्षिण की तमिल भक्ति परंपरा से संगम होने पर उसमें मायोन, नप्पिनै की लोक कथाओं के आधार पर राधा और रास का समावेश हुआ.

5. हाशिए के समाजों ने अपने समाजों की आवश्यकता के अनुरूप अपने आराध्य देवताओं की कल्पना की और उनके नाम संकीर्तन, लीला गायन और गुणानुवाद को वर्ण और जाति के भेद से परे मनुष्य की मुक्ति का आधार माना. दक्षिण से यह प्रवाह पुनः उत्तर की ओर चला और पुराण साहित्य से जुड़कर भव्य रूप में खड़ा हुआ. उदाहरण के लिए प्रह्लाद जैसी पौराणिक कथाओं की प्रेरणा का उल्लेख किया जा सकता है जिन्हें उत्तर और दक्षिण दोनों के भक्ति आंदोलन ने समान रूप से ग्रहण किया. इस प्रकार भक्ति आंदोलन विभिन्न आध्यात्मिक विचारधाराओं के परस्पर आदान-प्रदान का प्रतीक बन गया जिसके विकास में उत्तर और दक्षिण दोनों के भक्तों और संतों की समान भूमिका है – और भावभूमि भी समान है.

6. संस्कृत में उपलब्ध भक्ति साहित्य राम कथा और कृष्ण कथा को तेलुगु भक्त कवियों ने अपने ढंग से पुनः सृजित किया जिससे भागवत धर्म या सात्वत विचारधारा को तेलुगु लोक में व्याप्त होने का अवसर मिला.

7. भक्ति साहित्य हमें भारतीयता के समान सूत्र उपलब्ध कराता है और यह बताता है कि इस आंदोलन के विकास में सारे भारत का साझा प्रयास सम्मिलित है जो वस्तुतः भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट जागरणकाल का प्रतीक है.
    
आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी की संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य 
25 जनवरी,  2012

फोटो- अप्पल नायुडु.

गुरुवार, 19 मई 2011

वह अज्ञेय था

आवाज़ एक - वह चिम्पैंजी था.
आवाज़ दो - वह हिजड़ा था.
आवाज़ तीन - वह लंपट था.
आवाज़ चार - वह बहुगामी था.
आवाज़ पाँच - वह अवैध संतान का पिता था.
आवाज़ छह -  वह अंग्रेजों का जासूस था.
आवाज़ सात- वह सीआईए का एजेंट था.
आवाज़ आठ - वह अमौलिक था.
आवाज़ नौ - वह कुंठित था.

दसवीं आवाज़ आकाश से आई - वह शब्द था
                                                      आकाश था
                                                      सृष्टि था
                                                      अज्ञेय था. 

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

ब्लागर -सर्वे : सहयोग का अनुरोध

कुमार लव द्वारा ब्लागरों के संबंध में एक सर्वेक्षण किया जा रहा है.
इस विषय में प्राप्त उनकी अपील सहयोग के अनुरोध के साथ यहाँ प्रकाशित की जा रही है.
सभी ब्लॉगर मित्र सहयोग करने की कृपा करें.
(ऋषभ)




Hi,

I am doing a study to understand what are the different skills that Indian bloggers have developed to participate in the new media revolution. Since no such study has been carried out so far, I hope this would help educators who are preparing students to enter into the world soon as well.

Also, it would let us appreciate the differences in a Hindi blogger and a blogger who blogs in English.

Please help us in the endeavor by filling the survey:


It will take about 10 minutes, and is completely anonymous.

Thanks a lot for your participation (in anticipation). I would share the results of this study with you before I publish it anywhere, by the end of April.

Regards
Luv 

बुधवार, 19 जनवरी 2011

प्रेम, कहानी, चमेली और चर्चा


अभी उस दिन डॉ. रेखा शर्मा ने हैदराबाद-दूरदर्शन के हिंदी पत्रिका कार्यक्रम चमेली के लिए बुला भेजा.[यह बात दरकिनार कि बहुतों को इस कार्यक्रम के नामकरण से विचित्र सी फीलिंग आती है.मुझे तो अपने हैदराबाद की दक्खिनी शायरी  की व्यंजना का बोध होता है.] बुलावा आज की कहानी में प्रेम की बदलती अभिव्यंजना पर केंद्रित चर्चा के लिए था.शायद संयोजकों के अचेतन में वसंत पंचमी, वेलेंटाइन डे और होली के मौसम का ख्याल रहा होगा. खैर साहब, खूब भटकाव भरी चर्चा रही. भटके बिना प्रेम की बात हो भी कैसे सकती है. आज की कहानी को  'उसने कहा था' तक का बोझा उठाना ही था, सो उठाया. डॉ.शशांक शुक्ल [संपादक, परमिता] ने ठेठ आज के बढ़िया मुद्दे उठाए. डॉ. शुभदा वांजपे, डॉ. रेखा शर्मा और डॉ.दुर्गेश नंदिनी ने अपनी बातें सप्रमाण रखीं. अपुन ने तीन बिंदुओं पर जोर  दिया - नई पीढ़ी को चाहे जितना केरियरिस्ट दिखाया जाता रहे, प्रेम की चाह और तड़प उसमें भी सदा के जैसी ही है; प्रेम, विवाह  और सहजीवन के त्रिकोण में सहजीवन का कोण कहानीकारों को खास तौर पर उद्वेलित कर रहा है ; और कि प्रेम की दृष्टि से आज का समय बेहद असंवेदनशीलता, असहिष्णुता, अमानुषिकता एवं बर्बरता का समय है जिसमें कट्टरवाद के निशाने पर आया हुआ प्रेम फिलवक्त कहानीकारों की सबसे ज्यादा तवज़्ज़ो चाहता है. प्रोड्यूसर जनाब इम्तियाज़ साहब ने सारी गुफ्तगू का खूब मज़ा लिया और साथ खड़े होकर  निजी कैमरे से यह फोटो भी खिंचवाया.
चित्र : इरफाना फातिमा   

मंगलवार, 30 मार्च 2010

स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति - चर्चा

पिछली प्रविष्टि के क्रम में...
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Dr sahab, I know why you are writing ! I want to share with you an advise of a German writer to a new writer. Its totally new for me. The advisor says, " If you think you are capable of living without writing, do not write."

Yours
Abdul Hameed Khan, Mumbai
29 March 2010
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आदरणीय ऋषभदेव जी
आपका सन्देश देखा. बहुत संक्षेप में आपने अपने लेख का आशय प्रस्तुत कर दिया है. संगोष्ठी में आपकी सक्रिय और सार्थक भागीदारी केलिए हम आपके आभारी है. आपकी प्रस्तुति धारदार थी और बावजूद कुछ असहमतियों के संगोष्ठी को आगे बढाने में सहायक रही. स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति की सीमाओं और उसके व्यावहारिक पक्ष को आपने अपनी शैली में प्रस्तुत किया जो मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण है. खेद इस बात का रहा कि उस पर कोई चर्चा नहीं हुई और न ही अध्यक्ष महोदय ने कोई टिप्पणी की. मै बहुत जल्द एक रिपोर्ट बनाकर आपको भेजूँगा.

एम वेंकटेश्वर (प्रो. एम. वेंकटेश्वर, हैदराबाद)
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बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें .
बहुत अच्छा लगा कि आपने स्पष्ट किया कि स्त्री अपनी निरीहता (जितनी दिखाई जाती रही उतनी निरीह तो मुझे कभी नहीं लगी)से उबर कर सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय-सचेत हो गई है .
वह रपट पढ़ने की उत्सुकता है .

सादर ,
प्रतिभा. (डॉ. प्रतिभा सक्सेना, यूएसए )

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आदरणीय ,
बहुत सारी बधाइयां उम्दा जगह पर उच्च स्तरीय व्याख्यान के लिए. वेंकटेश जी तो वैसे भी निःस्वार्थ भाव से मित्र स्नेही हैं ही.
पूरा भाषण भी पोस्ट करेंगे तो अच्छा रहेगा. मेरे जैसे जो लोग जा नहीं सके कम से कम पढ़ तो लेंगे.

सादर,
आलोक (डॉ. आलोक पाण्डेय, हैदराबाद)
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रिद्दे (ऋ.दे.) कहीं हो और धारा के खिलाफ नहीं तैरे, ये कैसे हो सकता है.

अतुल कनक. कोटा
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प्रिय डॉ. ऋषभ देव, सस्नेह.
"स्त्री और उपभोक्ता-संस्कृति" विषयक संगोष्ठी में तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत थीसिस से मैं सहमत हूँ. निश्चय ही आज स्त्री उपभोक्ता वस्तु नहीं रही है, बल्कि स्त्री तो आज उपभोक्तावाद को प्रभावित करने वाली प्रमुख इकाई बन गई है. प्रो. म. वेंकटेश्वर जी को मेरा नमस्कार कहें. कभी हैदराबाद आने का मन है ताकी ऋषभ देव की प्रगति अपनी आँखों से देख सकूं. 20 से 23 मार्च तक रांची में फादर डॉ. कामिल बुल्के की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित संगोष्ठी में गया था, बहुत सुन्दर रही.

स्नेहाशीष सहित,
डॉ. अरुण (डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण', रुड़की)
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With all due respects and apologies I would beg to differ. Agreed 'upbhogtavad' and upbhogta sanskriti' are two different things but that is not the subject. It is 'stree and upbhogta sanskriti'. When we talk of women we do not talk of a particular class or segment but for women all over the country. True in metros a few women may have attained a special status but these are exceptions and do not prove the rule. Day in and day out we do hear, read and witness exploiation, rape, gang rape of women and it has become a part of our day to day life. What do we do after reading all this. We blame the present culture and forget about this and wait to read the same again next day.

As a matter of fact we have inherited the culture of sexually exploiting and slaving the women. A fast look to various traits of 'Indra' would clinch the issue. It is the king of 'swarga' who has raped Ahilya and goes scot-free. Ahilya's husband ( I do not recollect his name pronto) who is supposed to know all past, present and future does not rebuke Indra but banishes Ahilya in a most unhuman manner which does not behove a 'siddh rishi' of his stature. It is the same Indra who deputes 'Urvashi' to entice Rishi Vishwamitra by prostituting. Even Lord Krishna had 16,000 ranis. And as devout Hindus we all read and recite these very stories with utmost reverance. Oh: What a creed we are?.

With this background which we carry in our heart of hearts, I think, none of us is qualified to talk on the subject unless it is for self propagation.

I do not know whether I am a rebel or sadist but I have expressed what I feel on the subject.

With best of regards,
sincerely - g.d. agarwala (गुरु दयाल अग्रवाल, हैदराबाद)
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@ g.d. agarwala
आदरणीय अग्रवाल साहेब,
सादर नमन.
मुझे आपके विचार जानकर अच्छा लगा.
आपने तो एक प्रकार से मेरा समर्थन ही किया है क्योंकि आप कह रहे हैं कि स्त्री के प्रति जो भी अपराध हो रहे हैं उसके लिए भूमंडलीकरण और बाज़ार की आज की ताकतें भर ज़िम्मेदार नहीं है. ज़िम्मेदार वह भोगवाद है जो पुरुषसत्ता का अनिवार्य अंग है. मैं इसमें यह जोड़ना चाहता हूँ कि यदि स्त्री जागरूक और एकजुट होकर इस भोगवाद को चुनौती दे तो वह इसका प्रतिरोध करने की संस्कृति को मज़बूत कर सकती है. उपभोक्तावाद का प्रतिरोध कर सकने की ताकत अर्जित करने को मैंने उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पारिभाषित करने की कोशिश की है.

मुझे संतोष है कि आप सरीखे कई वरिष्ठ मित्रों ने मेरी बात पर ध्यान दिया है. असहमत होना लोकतांत्रिक है,मुझे उस पर कोई आपत्ति क्यों होने लगी. मैं जानता हूँ कि मेरी बात न तो पूर्ण है न अंतिम. यह तो विमर्श का एक कोण है..बस.

सादर आपका
ऋषभ
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रविवार, 28 मार्च 2010

इफ्लू : ''स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति''

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय , हैदराबाद, में नए-नए खुले ''हिन्दी एवं भारत अध्ययन विभाग'' में २४-२५ मार्च २०१० को भाषा, साहित्य और संस्कृति के समकालीन परिदृश्य पर विचार-विमर्श के लिए द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई. देश भर के दिग्गज विद्वान् पधारे. सचमुच उपयोगी, ज्ञानवर्धक और स्मरणीय चर्चाएँ हुईं.

विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर का अपुन पर सदा अहेतुक स्नेह रहा है. सो उनके बुलावे पर अपनेराम भी जा धमके ''संस्कृति'' विषयक सत्र में ''स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति'' पर बोलने. बड़ा संकोच सा था. आखिर मंच पर अन्य वक्ताओं के रूप में प्रो. मैनेजर पांडेय और डॉ. जगदीश चतुर्वेदी व्यंग्य और आक्रमण की मुद्रा में गरज रहे थे. अध्यक्षासन पर हमारे समय के शीर्ष आलोचक श्रद्धेय प्रो.नामवर सिंह ऋषितुल्य साक्षीभाव लिए विराजमान थे.

अस्तु, वेंकटेश्वर जी के उकसावे पर हमने अपनी थीसिस धर ही दी कि उपभोक्तावाद और उपभोक्ता संस्कृति दो अलग-अलग चीज़ें हैं तथा स्त्री आज उपभोक्ता वस्तु और उपभोक्तावाद का शिकार नहीं रह गई है, बल्कि वह स्वयं एक ओर तो बाज़ार को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में उभरी है तथा दूसरी ओर स्वयं उत्पादक एवं प्रबंधक की भूमिका में आ गई है. लेकिन मज़ा तो तब आया जब अध्यक्ष महोदय ने बड़ी सफाई से हमारे इस सारे पराक्रम को नकारते हुए इस विषय पर एक अक्षर तक बोलने से मना कर दिया.[चलो अच्छा हुआ, कम से कम चपत तो नहीं लगाई!]

पूरी रपट के लिए मैंने प्रो.एम.वेंकटेश्वर जी से निवेदन किया है. तब तक इतना ही सही.

शनिवार, 21 नवंबर 2009

छायावादी वर्षा : बादल राग से दुख की बदली तक

छायावाद : बादल/वर्षा/पावस/सावन












सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
1. बादल राग (1,2,3,4,5,6) (परिमल)
2. जलद के प्रति (परिमल)
3. अलि, घिरि आये घन पावस के (परिमल)
4. छाये आकाश में काले-काले बादल देखे (बेला)
5. गर्जन से भर दो वन (राग विराग)
6. कौन तम के पार ? (राग विराग)
7. लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो, (राग विराग)
8. उत्साह (बादल, गरजो!) (राग विराग)
9. बादल छाये (राग विराग)
10. बातें चलीं सारी रात तुम्हारी (राग विराग)
11. काले-काले बादल छाये (राग विराग)
12. टूटी बाँह जवाहर की (राग विराग)
13. खुला आसमान (राग विराग)
14. फिर बेले में कलियाँ आईं (राग विराग)
15. मालती खिली, कृष्ण मेघ की (राग विराग)
16. प्यासे तुमसे भरकर हरसे (राग विराग)
17. जिधर देखिये, श्याम विराजे (राग विराग)
18. पारस, मदन हिलोर न दे तन (राग विराग)
19. केश के मेचक मेघ छूटे (राग विराग)
20. धिक मनस्सब, मान, गरजे बदरवा (राग विराग)
21. धिक मद, गरजे बदरवा (राग विराग)
22. मुक्तादल जल बरसो, बादल (अर्चना)
23. गगन गगन है गान तुम्हारा (अर्चना)
24. बीन वारण के वरण घन (अर्चना)
25. घन आये, घनश्याम न आये (अर्चना)
26. तपी आतप से जो सित गात (अर्चना)
27. मन मधु बन, आली ! (अर्चना)
28. पथ पर मेरा जीवन भर दो (अनामिका)
29. बादल, गरजो (अनामिका)
30. नाचे उस पर श्यामा (अनामिका)
31. वर्षा (नए पत्ते)
32. घन, गर्जन से भर दो वन (अपरा)
33. बादल (अपरा)
34. आये घन पावस के (अपरा)







सुमित्रानंदन पंत
1. मौन निमंत्रण (तारापथ)
2. पर्वत प्रदेश में पावस (रश्मिबंध)
3. युग विषाद (रश्मिबंध)
4. वर्षा गीत (रश्मिबंध)
5. काले बादल (मुक्ताभ)
6. मेघों के पर्वत (मुक्ताभ)
7. बदली का प्रभात (चिदंबरा)
8. झंझा में नीम (चिदंबरा)
9. कृष्ण घन (चिदंबरा)
10. काले बादल (सुनता हूँ मैंने भी देखा) (चिदंबरा)
11. सावन (चिदंबरा)
12. जगत घन (चिदंबरा)
13. अंतरव्यथा (चिदंबरा)
14. युग विराग (चिदंबरा)
15. मेघों के पर्वत (चिदंबरा)









जयशंकर प्रसाद
1. उनको देख कौन रोया (कामायनी)
2. रूप (झरना)
3. पावस प्रभात (झरना)
4. आह रे, वह अधीर यौवन (लहर)
5. जो घनीभूत पीड़ा (आँसू)











महादेवी वर्मा
1. मेह बरसने वाला है (प्रथम आयाम)
2. बारहमासा (माँ कहती अषाढ़ आया है) (प्रथम आयाम)
3. मरजाद सँभारहु (प्रथम आयाम)
4. मुक्तावलियान में (प्रथम आयाम)
5. षड्ऋतु (कुमकुम से नभ बंध सजे) (प्रथम आयाम)
6. पपीहे से (प्रथम आयाम)
7. करते करुणा घन छाँह जहाँ (प्रथम आयाम)
8. पानी से (प्रथम आयाम)
9. सागर हू न पठायो इन्हें (प्रथम आयाम)
10. नहिं कारे न ऊदे न गर्जन हारे (प्रथम आयाम)
11. बादल (कहाँ गया वह श्यामल बादल) (प्रथम आयाम)
12. विहान रहा (प्रथम आयाम)
13. कण की महिमा (प्रथम आयाम)
14. घटा गिरती रही (प्रथम आयाम)
15. हंस दूत (प्रथम आयाम)

16. जो न प्रिय पहचान पाती (दीपशिखा)

17. मैं न यह पथ जानती री (दीपशिखा)
18. झिप चलीं पलकें तुम्हारी पर कथा है शेष (दीपशिखा)
19. मिट चली घटा अधीर (दीपशिखा)
20. मेघ-सी घिर झर चली मैं (दीपशिखा)

21. निमिष से मेरे विरह के कल्प बीते (दीपशिखा)
22. मैं पलकों में पाल रही हूँ (दीपशिखा)

23. नव घन आज (नीलांबरा)
24. तुम्हें बाँध पाती सपने में (नीरजा)
25. आज क्यों तेरी वीणा मौन (नीरजा)
26. शृंगार कर ले री सजनि (नीरजा)

27. घन बनूँ वर दो मुझे प्रिय (नीरजा)
28. आ मेरी चिर मिलन यामिनी (नीरजा)

29. कमलदल पर किरण अंकित (नीरजा)
30. क्या नयी मेरी कहानी (नीरजा)
31. जाने किसकी स्मित रूम झूम (नीरजा)
32. मुस्काता संकेत भरा नभ (संधिनी)
33. लाये कौन संदेश नये घन (संधिनी)
34. प्राणपिक प्रिय-नाम रे कह (संधिनी)
35. मिट चली घटा अधीर (संधिनी)

36. कहाँ से आए बादल काले (संधिनी)
37. मैं नीर भरी दुख की बदली (संधिनी)