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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न




अनुवादक का द्वि-सांस्कृतिक होना बेहद ज़रूरी : योगेश भटनागर

हैदराबाद, २१ अक्टूबर २०१०.

"वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अनुवाद का महत्व पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है. साहित्य के अनुवाद के माध्यम से हम केवल किसी अन्य भाषा के लेखन से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस भाषा समाज की सामजिक-सांस्कृतिक परंपराओं  और विशेषताओं से भी परिचित होते हैं. अनुवादक एक भाषा में रचित साहित्य के अर्थ और रूप  भर को नहीं बल्कि उसके मूल्यों और सरोकारों को भी दूसरी भाषा में प्रकट करने का दायित्व निभाता है. ऐसा करने के लिए उसका द्विभाषिक के साथ साथ द्विसांस्कृतिक होना भी अपरिहार्य शर्त है. इस स्तर पर साहित्य का अनुवादक मात्र अनुसरणकर्ता  नहीं होता बल्कि मौलिक लेखक की भाँति ही सृजनकर्ता होता है."

ये विचार अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय  के रूसी अध्ययन संकाय के तत्वावधान में संपन्न 'चेखव का अनुवाद' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बोलते हुए प्रमुख चेखवविद लेखक और अनुवादक प्रो.योगेश चन्द्र भटनागर ने व्यक्त किये.

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो.जगदीश प्रसाद डिमरी ने बताया कि  इस संगोष्ठी-कार्यशाला में स्वीकृत किए  गए विभिन्न भाषाओं के अनुवादों को शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा. उन्होंने इसे समारोह की उपलब्धि और सफलता माना कि इसमें जहाँ एक ओर २० वरिष्ठ अनुवादक सम्मिलित हुए वहीं  इसके माध्यम से नए चेहरे के रूप में ११ युवा अनुवादक भी सामने आए जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में रूसी भाषा से सीधे अनुवाद की संभावनाओं के विस्तार का सूचक है.

उल्लेखनीय है कि दो दिन के इस समारोह में ६ अलग-अलग समूहों में ३२ अनुवादकों द्वारा विभिन्न भारतीय भाषाओं में किये गए चेखव के १२ छोटे-बड़े नाटकों के अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया गया. इस कार्य में द्विभाषिक विद्वानों के साथ साथ लक्ष्य भाषाओं हिंदी, मलयालम, तेलुगु, मराठी, ओडिया और बांग्ला  के मातृभाषा-भाषी विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया.


चेखव के भारतीय विशेषज्ञ प्रो.शंकर बसु, प्रो.योगेश भटनागर, प्रो.वरयाम सिंह और प्रो.पंकज मालवीय की उपस्थिति सभी प्रतिभागियों के लिए अत्यंत प्रेरणा-दायक रही.

कार्यशाला का निर्देशन प्रो.चारुमति रामदास तथा संयोजन डॉ.सत्यभान सिंह राजपूत ने किया. धन्यवाद ज्ञापन प्रो.मोनिका ने किया.

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

रूसी साहित्यकार चेखव के १२ नाटकों के ६ भारतीय भाषाओं में अनुवाद हेतु कार्यशाला



अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी उद्घाटित 
हैदराबाद, २० अक्टूबर.


विश्वप्रसिद्ध रूसी कथालेखक एवं नाटककार चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ  के उपलक्ष्य में  आज यहाँ अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय  के  परिसर में  रूसी भाषा विभाग के तत्वावधान में आयोजित ''चेखव का अनुवाद '' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला का उद्घाटन प्रसिद्ध  भारतीय चेखवविद  तथा जेएनयू के अधिष्ठाता प्रो. शंकर बसु ने   किया. उन्होंने चेखव की रचनागत विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें मानवीय संवेदना के अप्रतिम चितेरे की संज्ञा दी . 

उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता रूसी अध्ययन संकाय के डीन प्रो.आर.डी.अकेला ने की और बताया कि इस आयोजन में चेखव के एक पूर्णाकार तथा ११ एकांकी नाटकों के रूसी से सीधे हिंदी ,मराठी ,तेलुगु, बंगला,ओडिया और मलयालम भाषाओं में संपन्न अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया जाएगा जो अपने आप में एक कीर्तिमान होगा.

बीज भाषण सुप्रसिद्ध कवि एवं अनुवादक प्रो. वरयाम सिंह , जेएनयू , ने दिया. प्रो. सिंह ने कहा कि चेखव केवल रूसी लेखक ही नहीं थे, वे अपने समय में ही   भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुके थे क्योंकि उनकी रचनाओं की विषयवस्तु और उनके पात्र चिरंतन हैं. इस अवसर पर संबोधित करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि हिंदीजगत के भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों की भाँति चेखव भी ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अकालमृत्यु   के बावजूद कालजयी  सिद्ध हुए हैं.

समारोह की संयोजक डॉ. चारुमति रामदास ने बताया कि इस कार्यक्रम में ३२ अनुवादक भाग ले रहे हैं जिनमें ११ नए चेहरे हैं. विविध भारतीय भाषाओं में इनके द्वारा किए गए अनुवादों का विश्लेषण करने के लिए  द्विभाषाविदों के साथ साथ विशेष रूप लक्ष्य भाषा के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है ताकि अनूदित पाठों  को लक्ष्य भाषाओं के मुहावरे में ढाला जा सके. 

उद्घाटन सत्र के बाद छः समानांतर समूहों में कार्यशाला आरम्भ हुई. दो दिन में   कार्यशाला के चार सत्र होंगे. 

समापन गुरुवार को प्रो. जे. पी. डिमरी की अध्यक्षता में संपन्न होगा. समाकलन व्याख्यान प्रसिद्ध चेखवविद , लेखक और अनुवादक प्रो. योगेश भटनागर , भूतपूर्व आचार्य - जेएनयू, देंगे. समारोह में हैदराबाद के अतिरिक्त  गुवाहाटी, नागपुर, पुणे ,लखनऊ, कोल्हापुर, आगरा , अमृतसर, चंडीगढ़, भंडारा, कोलकाता बनारस, रीवां, दिल्ली, तिरुवनंत पुरम, इलाहाबाद और  औरंगाबाद आदि स्थानों से आए हुए अनुवादक और विशेषज्ञ विद्वान् सम्मिलित हैं.  

 चित्र परिचय : 
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में आयोजित 'चेखव का अनुवाद' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला के उद्घाटन के अवसर पर - 
चित्र एक : (बाएं से) प्रो.ऋषभ देव शर्मा, प्रो.वरयाम सिंह, प्रो.शंकर बसु एवं प्रो.आर.डी.अकेला. 
चित्र दो : (बाएं से) प्रो.चारुमति रामदास(माइक पर), प्रो.ऋषभ देव शर्मा, प्रो.वरयाम सिंह, प्रो.शंकर बसु एवं प्रो.आर.डी.अकेला

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार समारोह संपन्न


दाएँ से - प्रो. हरिनारायण शर्मा, डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी, मोदलि नागभूषण शर्मा, पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु, पोत्तूरि वेंकटेश्वर  राव,
 विद्यानाथ शास्त्री और डॉ. पेरिशेट्टी  श्रीनिवास राव 
।

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार समारोह संपन्न

हैदराबाद, 17अक्तूबर, 2010 .

प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा के 94वें जयंती समारोह के अवसर पर श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा वर्ष 2010 के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। जयंती एवं पुरस्कार समारोह यहाँ रवींद्र भारती में प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ तेलुगु पत्रकार पोत्तूरि वेंकटे
श्वर 
राव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 

स्मरणीय है कि ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष तेलुगु साहित्य, हिंदी साहित्य और अभिनय जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस-दस हजार रुपये के तीन नकद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं। इस वर्ष तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार 83 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार महामहोपाध्याय डॉ. पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु को प्रदान किया गया, जिन्होंने तेलुगु तथा संस्कृत साहित्य को अपनी मौलिक तथा अनूदित रचनाओं से सुसंपन्न किया है 
। 
हिंदी साहित्य के लिए इस वर्ष ‘राष्ट्र नायक’ पत्रिका के संपादक 75 वर्षीय डॉ. 
हरिश्चंद्र
 विद्यार्थी को हैदराबाद में हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के उन्नयन के लिए दिया गया। इसी प्रकार प्रसिद्ध तेलुगु रंगकर्मी 75 वर्षीय डॉ. मोदलि नागभूषण शर्मा को अभिनय जगत में योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया। इसके अतिरिक्त न्यास की ओर से विभिन्न छात्र-छात्राओं को 'प्रतिभा 
पुर
स्कार' और ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी वितरित किए गए। 

आरंभ में मुख्य अतिथि पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने मट्टपर्ति वीरांजनेयुलु द्वारा चित्रित वेमूरि आंजनेय शर्मा के विशाल तैलचित्र को लोकार्पित किया। इस अवसर पर संबोधित करते हुए पोत्तूरि 
वेंकटेश्वर 
राव ने कहा कि वेमूरि आंजनेय शर्मा ने अपना पूरा जीवन हिंदी की सेवा और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय के कार्य के लिए समर्पित कर दिया,  अतः वे सही अर्थों में दक्षिण और उत्तर के सामाजिक-सांस्कृतिक सेतु के निर्माता थे। डॉ. पोत्तूरि ने आंजनेय शर्मा जी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता  और सामासिक संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का स्मरण करते हुए उन्हें नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय और आदर्श बताया। 

पुरस्कृत विद्वानों को समर्पित किए गए प्रशस्ति पत्रों का वाचन विद्यानाथ शास्त्री, कृष्णमूर्ति और ज्योत्स्ना कुमारी ने किया। समारोह का संचालन डॉ. 
पेरिशेट्टी 
श्रीनिवास राव ने किया। 

बिन दाढी सब सून!

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य



अभी ९-१० अक्टूबर २०१०  को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दो दिन का आयोजन था - हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और कार्यशाला. अपने कस्बाई काम्प्लेक्स के कारण मैं ऐसे आयोजनों से कन्नी काट जाया करता हूँ जहाँ महान व्यक्तित्व पधार रहे हों - चाहे सचमुच के या फिर भरम के. इस आयोजन के बारे में भी मन  में द्वंद्व था - जाऊँ या न जाऊँ. न जाने का जेनुइन कारण भी उपस्थित था - हमारे संस्थान में दूरस्थ माध्यम के छात्रों का संपर्क कार्यक्रम. पर मुझे इनकार करके भी जाना पड़ा - सिद्धार्थ जी [संयोजक] के आग्रह को टालना संभव नहीं था मेरे लिए. उन्होंने जब फोन पर पहला ही वाक्य कहा- 'आपके निर्णय ने तो मुझे उदास कर दिया' - तो उनकी आवाज़ से  लगा कि वे सच बोल रहे हैं, औपचारिकता नहीं निभा रहे. सोचा - जाना पड़ेगा ही शायद. और जब उन्होंने मेरे बताए सब कारणों को निरस्त करते हुए कहा - 'मैं आपका आना निश्चित मान कर चल रहा हूँ' - तो लगा, किसी ने बहुत आत्मीयता से हथेली पर उष्ण सा दबाव दिया हो. ऊपर से कविता जी के फोन और ईमेल ने मेरे लिए कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं छोडी.

दो गाड़ियों का आरक्षण कराया था. उस दिन सवेरे आठ बजे बेटी ने  स्थान कन्फर्म होने की बात कही तो मैंने सोचा - रात १० बजे वाली गाडी है,और प्रथम नवरात्र की औपचारिकताओं में लग गया. लेकिन मेरी हालत उस वक़्त शायद देखने लायक रही होगी जब मुझे बताया  गया कि गाड़ी  दिन के १० बजे है. जेट स्पीड  से तैयार होकर भागना पड़ा. भला हो उस अपरिचित भले आदमी का जिसने मुझे लिफ्ट दे दी वरना स्कूल का समय होने के कारण कोई भी ऑटो चलने को तैयार न था. इसीलिए घर से निकलते वक़्त बेटी को देवीस्वरूप मानते हुए चरणस्पर्श किए थे  और मन ही मन माँगा था  कि गाड़ी छूट न जाए. वह मेरे इस आचरण पर पहले तनिक हकबकाई , और फिर हँस दी.

गाड़ी पकड़ी गई तो  जान में जान आई. वर्धा उतरते ही शोधार्थी जोशी जी ने मुझे सहज ही चीन्ह लिया और फादर कामिल बुल्के के नाम पर स्थापित अतिथिशाला में प्रस्थापित कर दिया. उस समय वहाँ खुले में कुछ ज़ोरदार चर्चा चल रही थी. मैंने अनुमान  किया कि अवश्य ही यह 'आज की कहानी के सरोकार' पर गोष्ठी होगे जिसकी सूचना गत दिन कविता जी दे चुकी थीं. मैं शामिल नहीं था पर अच्छा लगा विद्वानों को इस तरह साहित्यचर्चा में शाम बिताते देखकर. 

गोष्ठी से छूटते ही  कविता जी आईं. मुझे उनके कुछ महीने पहले के एक्सीडेंट की जानकारी थी; फिर भी उन्हें छड़ी के सहारे धीरे धीरे संभल संभल कर चलते देखना मेरे लिए सहज नहीं था. मैं धक् से रह गया. अभिवादनादि का भी शायद मैं ठीक से उत्तर न दे पाया होऊँ, क्योंकि मेरी इच्छा हो रही थी कि आयु में बड़े होने के अधिकार के साथ उन्हें खूब डाँटूं. [पर नहीं, मैंने वापस लौटने तक भी एक बार भी उनसे उस दुर्घटना की चर्चा तक नहीं उठाई.] कविता जी अनेक वर्षों बाद इतनी प्रसन्न और उत्साहपूर्ण दिखीं  - उनकी बिटिया का रिश्ता तय हो गया है न! [ अभी कल ही की तो बात लगती है जब पहली बार घर जाने पर उसने मुझे बेहद संकोच के साथ अपनी पहली कविता दिखाई थी - और छोटी सी हथेली भी!]

सिद्धार्थ जी आए. गले मिले और प्रथम परिचय में ही इतने अपने लगे कि अब तक विस्मित हूँ. मैंने उन्हें आर्यसमाजी समझा था - उनका ब्लॉग है न 'सत्यार्थ मित्र' [ 'सत्यार्थ प्रकाश' की याद दिलाने वाला नाम.बाद में जाना कि सत्यार्थ उनके सुपुत्र का शुभनाम है.] मेरे उपवास का मज़ाक उड़ाया जा सकता है और मूर्तिपूजा के खिलाफ उपदेश भी दिया जा सकता है - इसका पूरा खतरा था. संकोच सहित मैंने भूमिका बनाई कि प्रगतिशील होते हुए भी कुछ मामलों में रूढ़िग्रस्त हूँ. पर जब उन्होंने बताया कि वे स्वयं नवरात्र का उपवास रखे हुए हैं तो दुविधा मिट गई. मुझे उन्होंने अपने आवास पर फलाहार के लिए आमंत्रित किया तो कविता जी ने लगभग चहकते हुए कहा - 'वहाँ आपको देवी के दर्शन होंगे'. और ये पंक्तियाँ लिखने का मेरा उद्देश्य इतना भर है कि यह स्वीकार करूँ कि सचमुच सिद्धार्थ जी के घर में मैंने देवी के दर्शन किए. सौभाग्यवती रचना अत्यंत सौम्य हैं - बेहद स्नेहमयी. इस  तरह उन्होंने स्वागत किया कि वात्सल्य ने मुझे औपचारिक शिष्टाचार का अतिक्रमण करने को बाध्य कर दिया - मैं हर आयु की महिला को बरसों मैडम कहते रहने का अभ्यासी हूँ पर श्रीमती त्रिपाठी को मैंने कुछ ही मिनटों में कई बार बेटी [बेटा] कहकर संबोधित किया -  खासकर जब वे और फलादि लेने के लिए आग्रह कर रही थीं .

और हाँ , याद आया - सिद्धार्थ जी ने सेब और मौसमी अपने हाथों छीले और काटे. वे बड़ी तन्मयता से यह कार्य कर रहे थे. मुझे देखते देखा तो बताने लगे कि उन्हें किसी के भी काटे फल पसंद नहीं आते. इस पर मैंने खाद्य पदार्थों के सौंदर्यशास्त्र पर एक संक्षिप्त प्रवचन दे डाला जिसे आतिथेय दंपति ने अत्यंत श्रद्धा से सुनकर अपनी सहिष्णुता का परिचय दिया. साबूदाने की खीर और सेंधा नमक से सुवासित आलू का स्वाद दिव्य था. मैं धन्यता की अनुभूति में गद्गद  था.

कुछ देर घरेलू बातचीत करके अतिथिगृह लौटने पर आलोकधन्वा जी और जय कुमार झा जी के सत्संग का लाभ लिया. आलोकधन्वा बड़े कवि हैं, लेकिन सहज मनुष्य. वेणुगोपाल जी का उल्लेख करते ही खुल पड़े.उन्हें अगले दिन  संगोष्ठी के मंच पर सुना, और शाम को कविगोष्ठी में भी.कुछ तेवरियों के अंश सुनाने का मौका मुझे भी मिला. मुझे सदा अचरज रहेगा कि इतने बड़े कवि ने तीसरे दिन विदा के समय मेरी दो पंक्तियाँ दुहराते हुए रचनाधर्म का स्मरण कराया - 'बर्फ पिघलाना ज़रूरी हो गया चूँकि / चेतना की हर नदी पर्वत दबाता है.' दरअसल उन्होंने बहुत ध्यान से सबकी कविताएँ सुनी थीं.कविता जी को तो उन्होंने विधिवत कवि घोषित  किया. प्रियंकर पालीवाल जी की कविताएँ मुझे ख़ास लगीं. हमारे कई बड़े कवियों की कविताओं के अलावा जब रवि नागर जी ने एक पाकिस्तानी कवयित्री की रचना हारमोनियम पर सुनाई - '' सीता को देखे सारा गाँव / आग पे कैसे धरेगी पाँव'' - तो मन भीतर तक भींज सा गया. मेरी इच्छा हुई एक पल को कि नागर जी को कंधे पर उठाकर गोल गोल दौडूँ. पर बात मन में ही रखनी पडी क्योंकि अपनी ताक़त का मुझे अनुमान है!

दो दिन के आयोजन में कई नए मित्र बने. शायद उन सबसे भविष्य में परोक्ष या अपरोक्ष संपर्क बना रहे. फिलहाल नाम परिगणन करना औपचारिक लगेगा. पर कई पुराने मित्र भी मिले. प्रो.कृष्ण  कुमार सिंह भी उतने ही भाव विभोर थे जितना मैं. प्रो.ए. अरविन्दाक्षन वहाँ प्रतिकुलपति हैं ,लेकिन कोच्चिं की यादों के साथ बेहद अपनेपन से बतियाए. उन्होंने ही संगोष्ठी के उद्घाटन  सत्र में सबका स्वागत किया - ह्रदय की भाषा में. विस्मय है कि कुछ मित्रों ने उनके उच्चारण में मलयालम के संस्पर्श पर विनोद किया है, यदि वे अरविन्दाक्षन जी के मौलिक और अनूदित साहित्य से परिचित होते तो उनकी टोन कुछ और होती. हिंदीवालों की हठधर्मिता  और स्वयं को बिग ब्रदर समझने की प्रवृत्ति ने पहले ही हिंदी का बहुत नुकसान कर लिया है - ब्लॉगर मित्रों को इसे जानना चाहिए. उद्घाटन कुलपति विभूति नारायण राय जी ने किया . बढ़िया बोले - दो टूक बातें, ब्लॉगर बिरादरी की अपेक्षा प्रभावित पक्षकार की तरह. मुझे अध्यक्ष के नाते उनके निकट कुछ देर बैठने का अवसर मिला तो मैंने १९८४ के नजीबाबाद के लेखक सम्मलेन की याद दिलाई जो बाबा नागार्जुन के संरक्षण में संपन्न हुआ था. इस बहाने 'उन्नयन' के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र जी का भी सन्दर्भ आ गया. 

संगोष्ठी और कार्यशाला की गतिविधि और उपलब्धि पर अलग से लिखा जा चुका  है. यहाँ इतना भर कि आयोजकों ने महात्मा  गांधी के नाम पर खड़े किए गए  हिंदी विश्वविद्यालय की परिक्रमा कराने के साथ ही सेवाग्राम स्थित बापू कुटी और पवनार स्थित विनोबा आश्रम के दर्शन की भी व्यवस्था की थी. बड़े तडके उठकर सब साथी तैयार हो गए. उत्साह सभी का देखने लायक था.खास करके प्रो.अनीता कुमार, डॉ.अजीत गुप्ता,अनूप शुक्ल, गायत्री शर्मा, सुरेश चिपलूणकर, अशोक कुमार मिश्र, अविनाश वाचस्पति , विवेक सिंह, रवींद्र प्रभात और शैलेश भारतवासी अत्यंत उत्सुक दिखे. पूरे रास्ते सभी चीख चीख कर गांधी दर्शन पर चर्चा करते रहे.सभी दोनों ऐतिहासिक स्थलों से अभिभूत थे. गांधी जी  की प्रगतिशीलता पर काफी विचार विमर्श चला और कई चिट्ठाकारों ने यह सामूहिक निष्कर्ष दिया कि - यदि गांधी जी आज के समय में  होते तो वे सफलतम ब्लॉगर हुए होते क्योंकि उन्हें जनसंचार माध्यमों की शक्ति की पहचान थी और वे इनका देशहित में सटीक उपयोग करना जानते थे.

दस अक्टूबर की सांझ बड़ी भारी थी. और भी भारी बना दिया उसे सिद्धार्थ-रचना दंपति के निश्छल शिशुवत आचरण ने. दोनों ने हर साथी के साथ खड़े होकर बीसियों फोटो खिंचवाए. हम लोग गोल दायरे में बैठे थे. वे दोनों एक एक के पीछे आकर खड़े होते और फोटो खिंचवाते. इतना ही नहीं जो मित्र अपने कमरों में थे, उनके साथ फोटो के लिए कमरे में पहुँच  गए. होगा यह आयोजन विश्वविद्यालय का , पर हमारे लिए तो यह शुद्ध रूप से सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के परिवार का उत्सव बन गया. यहाँ तक ही बस नहीं, सबको पाथेय  के रूप में गरमागरम पूरी सब्जी का पार्सल भी दिया गया. 

सिद्धार्थ जी स्वयं स्टेशन पहुँचाने आए थे. विदा का क्षण सत्य ही भावुकता का क्षण था!