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गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

'स्वतंत्र वार्ता' में वर्धा ब्लॉगर संगोष्ठी





ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्‍मण रेखा खुद बनानी होगी - विभूति नारायण  राय

ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंडवाली विधा है - आलोक धन्वा

आभासी  दुनिया भी वास्तविक दुनिया का विस्तार है - ऋषभ देव शर्मा






 वर्धा,11 अक्टूबर।

महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्‍यालय, वर्धा में हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता’ विषयक दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्‍ठी संपन्न हुई। समारोह का उद्‍घाटन विश्‍वविद्‍यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने 






हबीब तनवीर प्रेक्षागृह  में 
किया। आरंभ में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने नए अभिव्यक्‍ति माध्यम के रूप में उभरी ब्लॉगिंग की विधा की अनंत संभावनाओं और उससे जुड़े खतरों की ओर इशारा करते हुए ब्लॉग लेखन के संबंध में  आचार-संहिता विषयक विचार-विमर्श की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। 
 



तदुपरांत  स्वागत भाषण  में हिंदी विश्‍वविद्‍यालय के प्रतिकुलपति प्रो.अरविंदाक्षन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में यूजीसी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रतिनिधियों और अधिकारियों को भी आमंत्रित करना चाहिए, जिससे वे जान सकें कि यह विश्‍वविद्‍यालय केवल साहित्य और उत्सवधर्मिता का ही केंद्र नहीं है, बल्कि  हिंदी को तकनीक से भी जोड़ने को प्रयासरत है। जब उन्होंने कहा कि मैं आप सबका स्वागत हृदय की भाषा में कर रहा हूँ तो सभागार करतलध्वनि  से गूँज उठा.






उद्‍घाटन वक्‍तव्य देते हुए कुलपति विभूति नारायण  राय ने कहा कि इंटरनेट ने राष्‍ट्रों की बंदिशों को तोड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि अभिव्यक्‍ति की स्वतंत्रता का जो उत्तर आधुनिक विस्फोट हुआ है, वह इंटरनेट से ही संभव हो सका है; लेकिन हम यहाँ दो  दिनों के लिए इसलिए भी उपस्थित हुए हैं कि हम इस बात पर बहस कर सकें कि इस माध्यम ने हमें एक खास तरह की स्वच्छंदता तो नहीं दे दी है! उन्होंने प्रश्‍न उठाया कि अपनी अभिव्यक्‍ति की स्वतंत्रता में कहीं हम यह तो नहीं भूल रहे हैं कि हम सारी सीमाएँ तोड़ रहे हैं और दूसरों की  भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं। राय का मानना था कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना तथा निहित स्वार्थ की सिद्धि के किए ब्लॉग के माध्यम का दुरुपयोग करना चिंतनीय विषय  है। उन्होंने यह जोड़ा कि   किसी कानून द्वारा नियमित किए  जाने के बजाय हमें ऐसा लगता है कि  हर एक ब्लॉगर को अपनी लक्ष्‍मण-रेखा खुद बनानी होगी। वी.एन.राय ने आगे कहा कि एक समझदार और सभ्य समाज के लिए जरूरी है कि उसके नागरिक अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचें  ताकि ऐसी स्थिति न आए कि राज्य को सेंसर लगाने की दिशा में  सोचना पड़े।

‘मधुमती’ की पूर्व संपादक  कथाकार  डॉ.अजित गुप्‍ता ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि ब्लॉगिंग त्वरित विचारों के त्वरित प्रस्तुतीकरण  की विधा है। उन्होंने राज्य की ओर से किसी आचार संहिता के लागू किए जाने की तुलना में ब्लॉगरों की पंचायत बनाने का सुझाव दिया जो आम नियंत्रण के सिद्धांत बना सकती है। उन्होंने हिंदी ब्लॉग जगत की कुछ बहसों के संदर्भ में कहा कि यदि मैं स्त्री संबंधी बात कहती हूँ तो यह ध्यान रखना होगा कि पुरुष भी इसे सुन रहे हैं। उन्होंने चिट्ठों का समग्र संकलन करनेवाले एग्रीग्रेटरों से अनुरोध किया कि वे अश्‍लील, खराब, बेनामी और भद्‍दी भाषा में लिखने वालों को समझाइश दें और उनको अनुशासित करें।













लंदन से आई हुईं  कवयित्री और लेखिका  डॉ. कविता वाचक्नवी ने आचार संहिता की आवश्यकता और उससे जुड़े तमाम मुद्‍दों पर विस्तृत चर्चा की और कहा कि चिट्‍ठाकारी रूपी माध्यम के विस्तार के साथ साथ शायद आनेवाले समय में आचार संहिता की आवश्यकताएँ बढ़ेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि खराब से खराब व्यक्‍ति को अच्छी चीज का आधिपत्य दीजिए वह उसे खराब कर देगा, और अच्छे व्यक्‍ति को खराब से खराब चीज दे दीजिए वह उसे अच्छा कर देगा। डॉ.वाचक्नवी ने भी साफ तौर पर माना कि आचार संहिता को आरोपित नहीं किया जा सकता और सुझाव दिया कि आप यह कर सकते हैं कि अनाचार पर दंड का विधान कर दें। उन्होंने कहा कि वे ब्लॉगरों से संयम और उदात्तता की उम्मीद करती हैं ताकि स्वच्छंदता और अराजकता न फैले। सस्ती लोकप्रियता और निरंकुशता से बचने की सलाह देते हुए 
डॉ. 
कविता वाचक्नवी ने याद दिलाया कि हमारे लिए ब्लॉग  मनोविलास नहीं बल्कि अपनी भाषा, लिपि, साहित्य और संस्कृति को बचाने का युद्ध है. 


उद्‍घाटन सत्र में प्रख्यात कवि और संस्कृतकर्मी आलोक धन्वा ने भी ब्लॉगिंग के संबंध में अपने विचार 
प्रस्तुत किए। उन्होंने ब्लॉगिंग को विस्मयकारी विधा बताते हुए इस माध्यम को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की वकालत की। आलोक धन्वा ने ब्लॉगिंग की तुलना रेल के चलन से करते हुए बताया कि शुरुआत में जैसे रेल यात्रा करने से लोग डरते थे लेकिन आज यह हमारी आवश्यकता बन गई है वैसे ही शायद अभी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में इसके प्रति हिचक है लेकिन आने वाले समय में यह जन समुदाय की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकती है। आलोकधन्वा ने अपने वक्‍तव्य में आगे कहा कि हम आजकल सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। इतना कठिन समय, पहले कभी नहीं रहा; द्वितीय विश्‍व युद्ध और अन्य संकटों से भी अधिक कठिन समय के दौर से हम गुजर रहे हैं जिसमें लोकतंत्र के लिए बहुत कम जगह बची है। आचार संहिता की बात करते हुए उन्होंने कहा कि समय और समाज की नैतिकता ही अभिव्यक्‍ति की नैतिकता हो सकती है। दुनिया कैसे बेहतर बने, इस दिशा में प्रयास करने वाली आचार संहिता ही ब्लॉगिंग की आचार संहिता हो सकती है। उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंडवाली विधा है।


                      ‘चिट्ठा चर्चा’ के संचालक अनूप शुक्ल ने कहा कि ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात करना खामख्याली है क्योंकि समय और समाज की जो आचार संहिताएँ होंगी वे ही ब्लॉगिंग पर भी लागू होंगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि अलग से कोई आचार संहिता कम से कम ब्लॉगिंग पर लागू न हो सकेगी क्योंकि यह ऐसा माध्यम है जिसमें किसी भी अनुशासन को लाँघने की संभावना निहित है। ब्लॉगिंग को अद्‍भुत विधा बताते हुए अनूप शुक्ल ने कहा कि यह अकेला ऐसा माध्यम है जिसमें त्वरित दुतरफा संवाद संभव है। ब्लॉग एक तरह से रसोई गैस की तरह है जिस पर आप हर तरह का पकवान बना सकते हैं अर्थात साहित्य, लेखन, फोटो, वीडियो, आडियो हर तरह की विधा में इसमें अपने को अभिव्यक्‍त कर सकते हैं।








 'भड़ास मीडिया डॉट कॉम’ के यशवंत सिंह ने भी आचार संहिता की अवधारणा का विरोध किया और अनामी तथा बेनामी ब्लॉगरों के समर्थन में अपनी बात रखी। उन्होंने यहाँ तक कहा कि हमें आज आचार संहिता बनाने वालों की आचार संहिता पर विचार करना चाहिए। इस अवसर पर हिंदी विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रो.अनिल कुमार राय ने कहा कि जहाँ आधुनिक संचार माध्यम समाप्‍त होते हैं वहाँ से नव माध्यम के रूप में ब्लॉग संचार की शुरुआत होती है जिसमें कोई संपादक नहीं होता अतः यदि पाठकों की टिप्पणियों को माडरेशन किया जाएगा तो वह एक संपादक की उपस्थिति के समान ही होगा। 

उद्‍घाटन समारोह की अध्यक्षता हैदराबाद से आए प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने की। अध्यक्षीय भाषण देते हुए प्रो.शर्मा ने आचार संहिता, नैतिकता, बेनामी ब्लॉगर और संबंधित मसलों पर अपने विचार व्यक्‍त किए। बेनामी ब्लॉगरों के बारे में अपनी राय व्यक्‍त करते हुए उन्होंने कहा कि छद्‍म पहचान को ब्लॉग जगत में प्रोत्साहित करना पाखंड को प्रोत्साहित करने के समान है। उन्होंने बताया कि ब्लॉग जगत की आचार संहिता की जगह इंटरनेट की नैतिकता पर व्यापक परिप्रेक्ष्य में चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नैतिकता का स्वर्णिम सिद्धांत यह है कि जैसा व्यवहार हम दूसरों से चाहते हैं, हम भी वैसा ही व्यवहार दूसरों से करें। उन्होंने इंटरनेट की दुनिया को विशुद्ध आभासी दुनिया मानने से इनकार करते हुए कहा कि यह आभासी दुनिया वास्तव में वास्तविक दुनिया का विस्तार है। प्रो.शर्मा ने कहा कि मेरी चिंता का कारण बच्चे हैं जो झूठी पहचान बनाकर इंटरनेट और ब्लॉग के माध्यम से गलत आचरण कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेनामी बड़े बड़े काम करते होंगे, मैं उनका अभिनंदन करता हूँ, लेकिन इसे नियम नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि पाखंड हर जगह निंदनीय है। ब्लॉगिंग कोई खिलवाड़ नहीं है, सामाजिक और नैतिक कर्म है। अतः जिस बात को सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकते वह ब्लॉग पर भी कहने का हक हमें नहीं है। हममें यह हिम्मत होनी चाहिए कि जिसे हम सही समझते हैं उसे कह सकें। प्रो.शर्मा ने उदाहरण सहित बताया कि यदि कमेंट व्यक्‍तिगत आक्षेप, अश्‍लीलता और अनैतिकता वाले हों तो उन्हें हटाने का अधिकार होना चाहिए लेकिन स्वस्थ आलोचना को सम्मान मिलना चाहिए भले ही वह कटु हों। ब्लॉग को संवाद का माध्यम बनाया जाए, अखाड़ा नहीं। पारस्परिक शिष्टाचार जो हम अपने आम जीवन में बरतते हैं , उसे ब्लॉगजगत में भी अपनाना चाहिए । डॉ. शर्मा ने यह भी ध्यान दिलायाकि ब्लॉग को समाज सुधार और नैतिकता के अतिरिक्‍त बोझ से लादने के बजाय उसे अपने भीतर की उदात्तता का दर्पण बनाना आवश्‍यक है।



संचार विभाग के विभागाध्यक्ष  अनिल कुमार राय ने धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा - जहाँ  आधुनिक संचार माध्यम समाप्त होते हैं वहाँ  से इसकी शुरुआत होती है। यदि हम टिप्पणियों का  माडरेशन करने लगे तो फ़िर यह तो एक संपादक की उपस्थिति ही हुई।



देश भर से आए लगभग 25 ब्लॉगरों ने उद्‍घाटन सत्र के बाद चार समूहों में आचार संहिता के विविध आयामों पर अलग अलग गहन चर्चा की जिसके निष्‍कर्षों को दूसरे दिन परिचर्चा सत्र में प्रस्तुत किया गया। 







दूसरे दिन के प्रथम सत्र में  सर्वप्रथम  विश्वविद्यालय के सामूहिक ब्लॉग हिन्दी-विश्व का लोकार्पण कुलपति के हाथों संपन हुआ. उल्लेखनीय है कि उक्त ब्लॉग डॉ. कविता वाचक्नवी के निर्देशन और सहयोग से बनाया गया है  और प्रीति सागर को ब्लॉग का मोडरेटर नियुक्त किया गया है. उदयपुर से आई हुईं डॉ अजित गुप्ता के लघुकथा संग्रह का लोकार्पण भी कुलपति विभूतिनारायण राय के करकमलों द्वारा संपन्न हुआ.



परिचर्चा सत्र में ब्लॉगरों ने अपने विचार व्यक्‍त किए। शुरूआत सुरेश चिपलूणकर ने की और बताया कि दूसरे के ब्लॉग पर टिप्पणी करना सबसे अच्छा तरीका है ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए। उन्होंने तथ्यात्मक बातें लिखने और सामग्री स्रोत का लिंक देने पर जोर दिया. हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि आप जो भी लिखें पूरी बात पक्की जानकारी से लिखें । उन्होंने विस्फोट, मोहल्ला, भड़ास, अर्थकाम. काम का उदाहरण देते हुए बताया इन ब्लॉगों को उद्यमिता के माडल के रूप में लिया जाना चाहिए। रवींद्र प्रभात ने शालीन भाषा के प्रयोग को सर्प्रथम आचार का दर्ज़ा दिया तथा सकारात्मक बने रहने के लाभ गिनवाए। अविनाश वाचस्पति ने कहा कि आचार संहिता की बात अगर न भी मानें तो मन की बात माननी चाहिए और ऐसी बातें करने से बचना चाहिए जिससे लोगों को बुरा लग सकता हो । प्रवीन पांडेय ने अतियों से बचने की सलाह दी और गायत्री शर्मा ने नामी ब्लॉगों का उदाहरण देते हुए ब्लॉग की सामाजिक उपयोगिता के बारे में अपनी बात कही। यशवंत सिंह ने माना कि हिंदी पट्टी को लोग अतियों में जीने के कारण या तो अराजक हो जाते हैं या फिर बेहद भावुक. उन्होंने गालियों और गप्पों के बजे तथ्यात्मक लेखन को पुष्ट करने की ज़रूरत बताई।



भोपाल के चर्चित ब्लॉगर रवि रतलामी ने ''इन्टरनेट के नवीनतम प्रयोग और "ब्लॉगिंग के आवश्यक पहलू'' विषय पर टेली कॉन्फ्रेसिंग के जरिये भी कार्यशाला को संबोधित किया और प्रतिभागियों के प्रश्नों के उत्तर दिए उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर पंजीकृत पचास से अधिक प्रशिक्षुओं को कंप्यूटर पर हिंदी और यूनिकोड में काम करने तथा ब्लॉग बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण संजय 
बेंगाणी
और शैलेश भारतवासी द्वारा  दिया गया। इसके अतिरिक्‍त प्रथम दिन की संध्या कवि सम्मेलन के नाम समर्पित रही जिसकी अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ कवि आलोक धन्वा ने की तथा संचालन डॉ.कविता वाचक्नवी ने किया। दूसरे दिन की प्रातः बेला में सभी अतिथि ब्लॉगरों ने सेवाग्राम स्थित महात्मा गांधी की कुटी तथा विनोबा भावे के पवनार आश्रम का भ्रमण किया।















इस आयोजन का सर्वाधिक उपादेय पक्ष यह रहा कि साइबर-अपराध और तत्संबंधी कानूनों के मर्मज्ञ विद्वान (सुप्रीम कोर्ट) अधिवक्‍ता पवन दुग्गल ने विस्तार से इंटरनेट की संभावनाओं और सीमाओं के वैधानिक पक्ष पर प्रकाश डाला और चिट्ठाकारों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। समापन सत्र में कुलपति विभूति नारायण राय के हाथों प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र दिए गए। पूरे समारोह का संयोजन आतंरिक संपरीक्षा अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने अत्यंत सुरुचिपूर्ण शैली में किया।








श्री राकेश, श्री राजकिशोर, श्री आलोक धन्वा, ऋषभदेव शर्मा, प्रो. प्रियंकर पालीवाल, डॉ.कविता वाचक्नवी, डॉ. अजित गुप्ता, श्री अनूप शुक्ल, डॉ.अशोक कुमार मिश्र, श्री रवीन्द्र प्रभात, प्रो. अनीता कुमार, श्री सुरेश चिपलूनकर, डॉ.महेश सिन्हा, श्री संजय बेंगाणी, श्री प्रवीण पाण्डेय, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री जाकिर अली रजनीश, श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री संजीत त्रिपाठी, श्रीमती रचना त्रिपाठी, श्री यशवंत सिंह, श्री विवेक सिंह, श्री जय कुमार झा, श्री शैलेश भारतवासी, श्री विनोद शुक्ला, सुश्री गायत्री शर्मा, श्री विषपायी, आदि की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की. खचाखच भरे सभागार में अध्यापकों, विद्यार्थियों, विभिन्न विभागों के सहयोगियों, देश के अनेक भागों से अपने संस्थान द्वारा कार्यशाला में भाग लेने हेतु नियुक्त अनेक राजभाषा अधिकारियों/ अध्यापकों आदि की उपस्थिति  ने भी कार्यक्रम को  भव्य व सार्थक बनाया.

ब्लागिंग पर दो दिनी वर्कशाप के समापन सत्र के ठीक बाद सभी ने वीएन राय के साथ एक साथ खड़े होकर ग्रुप फोटो खिंचवाईं.




--By डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee to "हिन्दी भारत" 
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