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शुक्रवार, 31 मई 2013

रत्नों की प्रकृति

बहुमूल्य रत्नों के साथ तरह तरह के मिथ और आग्रह जुड़े हुए हैं जिनके अनुसार यह माना जाता है कि रत्न और उपरत्न व्यक्ति ही नहीं, राष्ट्रों और सभ्यताओं तक की तकदीर पलट देते हैं. इन्हें ग्रह-नक्षत्र और राशियों से जोड़कर देखा जाता है. भाग्य-चिकित्सा के अलावा रत्न मनोचिकित्सा और रोग-निवारण के लिए भी चमत्कारी माने जाते हैं. सबसे बड़ा चमत्कार तो रत्नों की चमक में है जो उनकी कटाई से पैदा होती है और नज़र को बाँध लेती है. इसीलिए रत्न सबसे अधिक आकर्षक सौंदर्यप्रसाधन हैं. रत्न अलंकार भी हैं और अलंकृत भी.

रत्नों की चमत्कारी शक्ति और पहचान पर यों तो अनेक पुस्तकें मिलती हैं लेकिन उनकी प्रकृति का वैज्ञानिक विश्लेषण करने वाली एक अत्यंत प्रामाणिक कृति गत दिनों प्रकाशित हुई है – ‘द नेचर ऑफ प्रेशियस जेमस्टोन्स् एंड जेम्स’. लेखक गोविंद प्रसाद किमोठी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में रहकर रत्नों के खनन का लंबा अनुभाव प्राप्त कर चुके हैं जो इस पुस्तक की विश्वसनीयता का आधार है. यह कृति बहुत अच्छी तरह कोयले से हीरा बनने की यात्रा का भी वर्णन करती है. लेखक ने रत्नों से जुड़ी हुई गाथाओं, पुराकथाओं और ज्योतिषीय मान्यताओं का विवरण देने के बाद विस्तार से इस विषय पर चर्चा की है कि भारत में रत्नों का उत्पादन कहाँ कहाँ होता है और इस उद्योग के विभिन्न आयाम क्या क्या हैं. अलग अलग रत्नों पर अलग अलग अध्यायों में सचित्र चर्चा की गई है. 

लेखक ने भारतीय सर्राफा बाज़ार में बिक्री के लिए उपलब्ध तमाम तरह के हीरे-जवाहरात के ऐतिहासिक और ज्योतिषीय ब्यौरे इस पुस्तक में दिए हैं. साथ ही यह भी बताया है कि एक ही नाम से किसी रत्न के कई सारे प्रकार बाज़ार में मिलते हैं जिनकी कीमत में ज़मीन आसमान का फर्क हो सकता है. प्रायः देखा गया है कि रत्नों के खरीदार रत्नों के सूक्ष्म भेद को पकड़ न पाने के कारण ठगे जाते हैं. ऐसे लोगों के लिए यह पुस्तक बड़े काम की है क्योंकि इसमें विस्तार से रत्नों के बहुमूल्य और साधारण होने की पहचान बताई गई है. 

27 अध्यायों वाली इस पुस्तक में भूगर्भ में बहुमूल्य रत्नों के निर्माण की प्रक्रिया, धरती में छिपे इस खजाने के संगृहीत होने की कहानी और रत्नों की पहचान के भौतिकीय-प्रकाशीय आधारों के अलावा दुनिया भर में इनकी आपूर्ति के स्रोत, कटाई-घिसाई-सजाई के साथ विपणन और व्यापार आदि पर भी विस्तार से चर्चा की गई है. यह जानना सुखद विस्मयकारी है कि हीरे आदि बहुमूल्य रत्नों की अनेक पहलुओं से कटाई और उनकी घिसाई के काम में भारत सदियों से सारी दुनिया में अग्रणी रहा है.यह कला दुनिया को भारत की ही दें है. स्मरण रहे कि सही कटाई-घिसाई-सजाई से ही साधारण लगने वाले पत्थर की चमक उभर कर आती है और उसकी यह चौध ही उसे बहुमूल्यता का संस्कार देती है.अभिप्राय यह है कि यह पुस्तक रत्नों में रुचि रखने वाले जन साधारण के लिए तो उपयोगी है ही, वैज्ञानिक अध्येताओं और रत्न-व्यवसायियों को भी रत्नविज्ञान पर संक्षेप में सर्वांग जानकारी के लिए इस पुस्तक को पढ़ना ही चाहिए.
द नेचर ऑफ प्रेशियस जेमस्टोन्स् एंड जेम्स,

गोविंद प्रसाद किमोठी, 
2012, 
प्रोफेशनल बुक पब्लिशर, हैदराबाद, 
पृष्ठ – 140, 
मूल्य – रु. 200.
- भास्वर भारत [प्रवेशांक]- अक्टूबर 2012- पृष्ठ 60-61.

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