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शुक्रवार, 31 मई 2013

हिंदुस्तानी ज़बान

हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुम्बई द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘हिंदुस्तानी ज़बान’ का नया अंक कई कारणों से पठनीय है. मुखपृष्ठ पर गिरिजा कुमार माथुर का गीत ‘पन्द्रह अगस्त’ (आज जीत की रात/ पहरुए सावधान रहना/ खुले देश के द्वार/ अचल दीपक समान रहना). बीच के पन्नों में गत वर्ष जन्मशताब्दी के अवसर पर अपेक्षाकृत कम याद किए गए गोपाल सिंह नेपाली की प्रसिद्ध कविता ‘रोटियों का चंद्रमा’ (रोटियों का चंद्रमा, बादलों के पार है,/ और मृत्यु-लोक में, रोज़ इंतज़ार है./ भीख की प्रथा चली, दान का प्रचार है./ भोर हो गई मगर, मूर्च्छना गई नहीं,/ रोटियाँ गरीब की, प्रार्थना बनी रहीं.). हिंदी दिवस पर कमलेश्वर की कहानी ‘नागमणि’ का पुनर्पाठ करते हुए डॉ.सूर्यनारायण रणसुभे ने इसे गांधी युग के एक निष्ठावान और त्यागी कार्यकर्ता की करुण कहानी कहा है. उन्होंने भाषा के संबंध में तेजी से बढ़ रही हमारी पराधीनता के अलावा समाज की लक्ष्यहीनता के सन्दर्भ में भी इस कहानी को प्रासंगिक पाया है. स्वयं संपादक डॉ.माधुरी छेड़ा ने भी अपनी बात में नोटिस किया है कि ‘नागमणि’ के विश्वनाथ की तरह आज के हिंदी प्रचारक निराशा और हताशा के आलम में कह उठते हैं – अब कुछ नहीं हो सकता! आज़ाद भारत की तस्वीर कलरफुल होनी चाहिए थी वह नेगटिव होकर ग्रे हो गई और सरकार खलनायक. उनका यह प्रश्न पाठक को झकझोरता है कि क्या हम इस जनतांत्रिक व्यवस्था में आज़ाद भारत के जिम्मेदार नागरिक होने का अपना रोल ठीक से निभा रहे हैं.

हिंदी-उर्दू की इस द्विभाषी पत्रिका में दोनों भाषाओं को बराबर का हिस्सा दिया गया है. गांधीदर्शन से लेकर लोक साहित्य तक पर्याप्त वैविध्यपूर्ण विचारोत्तेजक सामग्री इसे पठनीय और संग्रहणीय बनाती है. 
हिंदुस्तानी ज़बान, त्रैमासिक शोध पत्रिका, जुलाई-सितंबर 2012, वर्ष 44, अंक 3, (सं) माधुरी छेड़ा, कार्यालय – महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महात्मा गांधी बिल्डिंग, 7 नेताजी सुभाष रोड, मुम्बई 400 002, पृष्ठ – 96, मूल्य – रु.20.
- भास्वर भारत [प्रवेशांक]- अक्टूबर 2012- पृष्ठ 61.


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