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बुधवार, 29 मई 2013

साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में

राष्ट्रीय संगोष्ठी/ मुंबई/ 23-24 मई 2013 

23 - 24 मई 2013 को गोखले सोसायटी के शिक्षा महाविद्यालय में संगोष्ठी थी. विषय रहा – “साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में”. डॉ. त्रिभुवन राय के आदेश पर अपुन भी जा धमके. अच्छा रहा क्योंकि कई विभूतियों के दर्शन लंबे अरसे बाद करने का मौका मिल गया – प्रो. सुरेश उपाध्याय, प्रो. एस. बी. पंडित, श्री कैलाश चंद्र पंत, प्रो. रामजी तिवारी, डॉ. दामोदर खडसे, प्रो. केशव प्रथमवीर, डॉ. विद्या केशव चिटको, डॉ. इंदिरा शुक्ला आदि. और हाँ, कथालेखिका सूर्यबाला जी भी तो थीं. डॉ. महेंद्र कार्तिकेय बहुत याद आए – उन्होंने ही तो समकालीन साहित्य सम्मलेन के माध्यम से इन सबसे बरसों पहले मुझ साधनहीन का परिचय कराया था; और भी तमाम साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर देने वाले कवि महेंद्र कार्तिकेय को सभी ने याद किया. सुनने में आया कि श्रद्धेय चंद्रकांत बांदिवडेकर को भूलने की बीमारी ने घेर लिया है – वैसे स्वस्थ हैं; उनसे मिलने न जा सकने का मलाल है. खैर! संगोष्ठी विचारोत्तेजक रही. इसलिए भी मेरे लिए स्मरणीय कि जिस सत्र की अपुन ने अध्यक्षता की प्रो. रामजी तिवारी उसके प्रमुख वक्ता थे – गौरव दिया उन्होंने इस अकिंचन को. एक सत्र में अपुन को प्रमुख अतिथि की भूमिका निभानी पडी, तो कुछ दिन पहले इस विषय पर जो फोनिक गुफ़्तगू प्रो.देवराज से हुई थी उसे चिपका दिया. वे ही कुछ बिंदु यहाँ सहेज रहा हूँ ताकि सनद रहे.

साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में


• दूसरे विश्वयुद्ध के बाद में, खासकर जैसे जैसे हम बीसवीं शताब्दी के अंत की ओर बढ़े वैसे वैसे ही दुनिया में नए ध्रुव बनने शुरू हुए – संस्कृति में भी; शिक्षा में भी और साहित्य में भी 

• इस नए परिवेश के बारे में तीन चीज़ें खास तौर से विचारणीय हैं. एक तरफ तो ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ का मुद्दा उठाया गया – पहली चीज़ तो यही है.

• दूसरी यह है कि उपनिवेशवाद से आगे बढ़ करके ‘नव-उपनिवेशवाद’ शुरू हुआ. 

• और तीसरी चीज यह है कि एक ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ की धारणा शुरू हुई जो इंग्लैंड से शुरु होती है. बाकायदा जो कूटनीतिक लॉबी रही इंग्लैंड में, इन चालीस सालों में उसने बहुत कुशलता से लेख लिख करके, पुस्तकें प्रकाशित करके इस संदर्भ में एक पारिभाषिक चीज गढी जिसे उन्होंने ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ कहा. 

• इस तरह जिसे हम आज साहित्य, संस्कृति और शिक्षा विषयक विमर्श का ‘वर्त्तमान संदर्भ’ कह रहे हैं उसका निर्माण तीन चीज़ों से हुआ है – 1. सभ्यताओं के संघर्ष का सिद्धांत, 2. नव-उपनिवेशवाद और 3. सुरक्षित साम्राज्यवाद. 

• इसमें संदेह नहीं कि इन सबके पीछे कुछ देशों के, और कुछ समाजों के, उच्च अहम् की भावना काम करती रही है क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद में जो एक नई दुनिया बनी उसमें गरीब देशों ने अपने बारे में सोचना शुरू किया और उसमें एक उभार शुरू हुआ. यह उभार जो पश्चिम के देश हैं - खासकर ब्रिटेन है, और अमेरिका है, उन देशों के लिए खतरनाक साबित होने जा रहा था. 

• तो इन लोगों ने मिल करके, यूरोप और अमेरिकन लोगों ने मिल करके; और इंग्लैंड के लोग साथ में शामिल हो गए इनके; और इन देशों ने उन देशों को दबाना शुरू किया जिन्हें वे तीसरी दुनिया के देश कहते थे.

• और इसमें एक नया परिवर्तन यह हुआ कि तीसरी दुनिया के कुछ देश ऐसे भी थे जिनके पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन तो नहीं थे पर एक-दो ऐसे प्राकृतिक संसाधन थे जिनसे वे पूरी दुनिया को अपने पक्ष में मोड़ सकते थे या दुनिया के निर्णयों को प्रभावित कर सकते थे. जैसे अरब देश. या पश्चिम एशिया के वे देश खासकर जिनके पास तेल का अपूर्व भंडार था; अभी भी है. तो जब इन देशों ने अपने बारे में सोचना शुरू किया और जब ईरान जैसे देश में लोकतंत्र की थोड़ी सी हवा बहनी शुरू हुई, कठमुल्लापन को पराजित करके और कुछ नई धारणाएँ शुरू हुईं, फैशन शुरू हुआ, नई तरह की शिक्षा शुरू हुई; तेहरान विश्वविद्यालय में बहुत खुला वातावरण शुरू हुआ और अरब के बहुत सारे लोग वहाँ आकर पढ़ने लगे – तो इस सबने कुछ खास देशों या कुछ साम्राज्यवादी देशों के कान खड़े कर दिए. 

• और वहाँ से इन देशों ने एक नया टर्म विकसित किया – सभ्यताओं का संघर्ष. इस सभ्यताओं के संघर्ष ने युद्धों को जन्म दिया नए सिरे से. और यह जो सभ्यता के संघर्ष के पीछे का जो छद्म है – इसको भी तीसरी दुनिया के देश जानते हैं, पहचानते हैं – खासकर बुद्धिजीवी पहचानते हैं.

• और युद्ध वास्तव में किस कारण से हुए या खड़े किए गए, इस चीज को भी अनुभव करते हैं – गरीब देशों के लोग. तो उन्होंने इसका प्रतिरोध करना शुरू किया और क्योंकि वे शक्तिशाली ज्यादा नहीं थे इसलिए वे अधिक कुछ कर नहीं सके. और सभ्यता के संघर्ष के नाम पर घोषित कर दिया गया कि जो पश्चिम एशिया और अरब देशों की सभ्यता है वह हिंसक है और रूढ़ है और प्रगतिविरोधी है – उसको दबाना जरूरी है – और उसे दबाने की कोशिश भी हुई. इसने पूरी दुनिया की संस्कृति को नए सिरे से प्रभावित किया. तो यह एक बड़ा मुद्दा है. 

• उधर इंग्लैंड में जो धारणा शुरू हुई थी – मतलब एक तरह से साम्राज्यवाद का पुनर्जन्म जो इंग्लैंड में हुआ - उनके मन में, लोगों ने, कहना चाहिए कि उसे आगे बढ़ावा दिया – उन्होंने एक नया टर्म गढा – जिसे ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ उन्होंने कहा. 

• सुरक्षित साम्राज्यवाद यह है कि इंग्लैंड के लोग और पश्चिम के लोग – यूरोप के लोग खासकर, यह मानते हैं कि उनकी जो व्यवस्था है वह बहुत सफल व्यवस्था है – आदर्श व्यवस्था है – और उस व्यवस्था को सुरक्षित रखना जरूरी है; और उसे सुरक्षित रखने के लिए उन देशों को दबाना जरूरी है जो खासकर एशियन देश हैं या अफ्रीकन देश हैं. तो यह जो अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देशों को दबाने की नीति है यह सुरक्षित साम्राज्यवाद है. 

• और इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण यह है कि ये जो साम्राज्यवादी शक्तियां है इनमें भी आपस में प्रतिस्पर्धा है. इसीलिए जब यूरोपीय संघ बना तो इंग्लेंड ने सायास उससे अपने को अलग रखा – अपनी पहचान के नाम पर – वह शामिल नहीं हुआ . यह उनका आतंरिक सुरक्षित साम्राज्यवाद था 

• यह जो एक आतंरिक साम्राज्यवाद था – केवल इंग्लैंड का था – और एक सुरक्षित साम्राज्यवाद इंग्लैंड और यूरोप का मिला-जुला साम्राज्यवाद था. इसने पूरी दुनिया का नया वातावरण बनाकर खड़ा कर दिया 

• और उधर अमेरिकी नीति के तहत खुली अर्थ व्यवस्था के नाम पर जो बाजारवाद शुरू हुआ और सारी दुनिया को बाजार के रूप में बदलने की जो कोशिशें हुईं, उसके पीछे भी अमेरिकन हित खासकर जुड़े हुए हैं. चूंकि उसका उत्पादन बिकना है या समृद्ध देशों का उत्पादन बिकना है - जो उसके बाजार की जरूरत है. 

• इसने भाषा बदल दी पूरी तरह से. भाषा बदल दी – मतलब भाषा का छद्म पहले की अपेक्षा सबसे अधिक बढ़ गया. 

• और शिक्षा का छद्म भी बढ़ा. 

• इससे नई समस्याएं पैदा हुईं – नई चुनौतियां पैदा हुईं.

• भाषा का छद्म बढ़ा – भाषा में अपने स्वार्थों को छिपाने की कोशिशें पहले की अपेक्षा अधिक हो गईं. जो चालाक देश हैं उन्होंने इसको किया. 

• यह जो भाषा का छद्म है इसे हम देख ही रहे हैं. यहाँ तक कि अमेरिकन नीति यह है कि जो उसके हितों के पक्ष में है वह उसका दोस्त है और जो उसके हितों के काम नहीं आ रहा है वह उसका दुश्मन है – बीच का कोई रास्ता नहीं हैं उसके यहाँ. लेकिन इसे कभी कहता नहीं है वह. वह हमेशा या तो लोकतंत्र का नाम लेता है, या सभ्यता को बचाने का नाम लेता है, या जनता को तथाकथित तानाशाहों के पंजों से मुक्त करने का नाम लेता है – चाहे वह सद्दाम के हाथ से मुक्त करना हो या फिर चाहे सीरिया के सुलतान के हाथ से मुक्त करना हो या कि त्रिपोली के गद्दाफी के हाथ से मुक्त करना हो. वह कभी यह नहीं कहता कि वह अपने स्वार्थों के लिए ऐसा कर रहा है. बल्कि लोकतंत्र का मसीहा बनने का पाखंड रचता है. यह भाषा का सबसे बड़ा छद्म है जो किसी भी शताब्दी से ज्यादा है. 

• भारतीय राजनीति और प्रशासन से लेकर मीडिया और विज्ञापन तक के लिए भी यह बात उतनी ही लागू है. भाषा अभिव्यक्ति का नहीं पाखंड का माध्यम बन कर रह गई है.

• इसी प्रकार शिक्षा का छद्म यह है कि शिक्षा के नाम पर एक मूल्यहीन दुनिया गढ़ी जा रही है. हम बहुत आसानी से देख सकते हैं कि आज शिक्षा के कौन से रूप प्रभावशाली बन गए हैं. अगर हम यह मानते हैं कि शिक्षा सुधार के लिए होती है – संशोधन के लिए होती है - तो यह वह अर्थ है जिसे बहुत पीछे फेंक दिया गया है 

• अब तो संस्कृति, इतिहास और समाजबोध विहीन आई टी है. मनुष्यता के सारे मूल्यों से विहीन कंप्यूटर शिक्षा है. यह शिक्षा का छद्म है. 

• हम कह रहे हैं कि हम दुनिया में शिक्षा बढ़ा रहे हैं और इसको स्थापित करने के लिए हमने एक नया शब्द गढ़ लिया है – जॉब ओरियंटेड – रोजगारोन्मुख. रोजगारोन्मुख वह है जिसमें मशीनीकरण सबसे अधिक है या सूचनाओं का संग्रह सबसे अधिक है – और जीवन का विश्लेषण सबसे कम है. यह शिक्षा का छद्म है. 

• यह जो परिवर्तन हुआ है दुनिया में– इसने एक नया परिदृश्य रच दिया है और इस परिदृश्य में शिक्षा हो – चाहे संस्कृति हो – चाहे साहित्य हो, इन तीनों की भूमिकाएँ बदल गई हैं, इन तीनों की विश्वसनीयता भी बदल गईं हैं और इन तीनों की जिसे हम कहते हैं रचनात्मक शक्ति -जो इन तीनों में होती है एक साथ मिल करके – उसके उद्देश्य भी बदले गए हैं पूरी तरह से.

• तो हमें इन सबको सोच करके यह ध्यान करना होगा – सबसे पहले यह तय करना होगा - कि शिक्षा के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गईं हैं, संस्कृति के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गईं हैं और साहित्य के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गई हैं 

• उदाहरण के लिए आज साहित्य खुद अपनी भाषा से सबसे अधिक जूझ रहा है और बहुत चालाकी से जो साहित्य के मरने की घोषणाएं की जाती रही हैं – साहित्य को उन घोषणाओं से भी जूझने को बाध्य होना पड़ रहा है 

• इस तरह, ये कुछ मुद्दे हैं साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के वर्त्तमान संदर्भ से जुड़े हुए; जिन पर विचार करके ही हमें मनुष्यता के भविष्य की रणनीति बनानी होगी और पुरानी चीजों को न दोहरा करके नई परिस्थितियों में ही इनकी नई भूमिका को देखना होगा.
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