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सोमवार, 26 दिसंबर 2011

तेलुगु समाज का दर्पण बनती लघुकथाएँ


लघुकथा उपन्यास और कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत नई विधा है, और कम चर्चित भी. सत्तरोत्तर काल में हिंदी में इस विधा की रचना ने आंदोलन का रूप ग्रहण किया. तब से वहाँ यह विधा खूब फल फूल रही है. यह जानना विस्मयकारी हो सकता है कि तेलुगु में अब भी लघुकथा आरंभिक अवस्था में ही है. विभिन्न भारतीय भाषाओं की लघुकथाओं के अध्येता बलराम अग्रवाल बताते हैं कि समकालीन तेलुगु कथा साहित्य में लघुकथा लेखन की स्थिति हिंदी, यहाँ तक कि मलयालम लघुकथा लेखन से भी नितांत भिन्न एवं कमजोर प्रतीत होती है. उनके अनुसार तेलुगु में लघुकथा की भाषा एवं कथ्य अभी भी कहानी से ही प्रभावित हैं. इसी कारण जब हम उनके द्वारा संपादित सोलह कथाकारों की 106 ‘तेलुगु की मानक लघुकथाएं’ (2010) देखते हैं जिनका अनुवाद पारनंदि निर्मला ने किया है तो साफ लगता है कि तेलुगु लघुकथा का कहानी के संस्कार से मुक्त होना अभी बाकी है – तभी उसमें झकझोरने और विचलित करने की व्यंजना शक्ति का विस्तार होगा.
यहाँ लघुकथा के संबंध में भूमिका (लघुकथा : आकार का अनुशासन) में व्यक्त बलराम अग्रवाल के ये विचार देखे जा सकते हैं – “मात्र आकार का ही छोटा या बड़ा होना किसी भी विधा के लिए मूल्य स्थापित नहीं कर सकता. लेकिन वही मूल्यवान-महत्वपूर्ण माना जाता रहा है जो अपने युगीन जनजीवन की परतें उघाड़, पाठकों को उसके नग्न यथार्थ से परिचित करवा सके; जो शोषक और शोषित – दोनों के मध्य पुल बन. उन्हें उनके उत्थान व पतन पर लगे प्रश्न चिह्नों से अवगत करा, ‘सही’ करने के प्रति उनमें चेतना जागृत करा सके; जो हर ‘गलत’ के विरुद्ध संघर्ष कर सकने वाली जुझारू भूमिका निभा सके तथा जो सामान्यजन के दुःख-दर्द को वहन कर उन्हें यथावत पाठकों तक संप्रेषित कर उन्हें कुछ सोचने पर बाध्य कर सके. चूंकि लघुकथा में इन क्षमताओं का अभाव नहीं है, इसीलिए वह मूल्यवान बनी है, मात्र आकार की लघुता के कारण ही नहीं. फिर भी, आकारीय लघुता इसकी एक विशेषता मानी गई है.” लघुकथा कों उन्होंने फ्लैश फिक्शन का समानार्थी मानते हुए कौंध कथा भी कहा है. 

इसमें संदेह नहीं कि कथ्य की जिन विशेषताओं की ओर ऊपर इशारा किया गया है तेलुगु की ये मानक लघुकथाएं उनसे संपन्न हैं. इनके सरोकारों में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण जीवन की परेशानियां, पुलिस और उग्रवादियों के दोहरे आतंक को झेलने की विवशता, धार्मिक कृत्यों के नाम पर पाखंड और अंधविश्वास की व्याप्ति, भारतीय लोकतंत्र की असफलता, लैंगिक भेदभाव झेलती लड़की की वेदना, गरीबी, भ्रष्टाचार, मूल्यह्रास, संबंधों का छीजते जाना और मध्य वर्ग के जीवन की यांत्रिकता आदि तमाम तरह की समकालीन चिंताएं शामिल हैं. शिल्प की दृष्टि से चुटीलापन कुछ कम देखने में आया है जो लघुकथा को वैचारिक हलचल का आधार बनाता है. 

तेलुगु की ये लघुकथाएं हिंदी पाठक को अपने सरोकारों के माध्यम से जहाँ उसकी पहले से परिचित कष्ट और वेदना से भरी हुई दुनिया का दर्शन कराती हैं वहीं उसके समक्ष तेलुगु लोक के अपेक्षाकृत अपरिचित जगत का झरोखा भी खोलती हैं. वह जान पाता है कि देवी माँ को तेलुगु प्रदेश में आदरपूर्वक 'अम्मावारू' कहा जाता है और किसी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक संबोधित करने के लिए हिंदी के ‘जी’ की भाँति ‘गारू’ का प्रयोग किया जाता है. देवी पूजा के अवसर पर पीले कपड़े पहन कर औरतें नीम की टहनियाँ हाथ में लेकर बाल बिखेर बिखेर कर उसी तरह तन्मय होकर नाचती हैं जिस तरह हिंदी प्रदेशों में देवी या भैरव के भक्त नाचते हैं. उन पर हल्दी मिले पानी के कलश उड़ेले जाते हैं. संक्रांति के तीसरे दिन ‘कनुमा’ के अवसर पर पुलिहोरा, बूरुलु, मीठे बडे, मीठे चीले और मुर्गी का मांस बनाया जाता है. लड़कियों को साड़ी ब्लाउज और दामादों को नए कपड़े दिए जाते हैं. किसी महिला के घर आने पर यहाँ उसे विदा करते समय साड़ी ब्लाउज, नारियल, केला, फूल, पान, हल्दी और कुमकुम देने की प्रथा है. लोक संबंधी इस प्रकार की अनेक जानकारियाँ हिंदी के पाठक को सांस्कृतिक स्तर पर संपन्नतर और समृद्धतर बनाती हैं. इस दृष्टि से यह चयन अत्यंत वैविध्यपूर्ण और उपादेय है तथा ये लघुकथाएं तेलुगु समाज का दर्पण कहे जाने की हक़दार हैं. 

इन लघुकथाओं का अनुवाद तेलुगु और हिंदी में एक समान गति रखनेवाली वरिष्ठ लेखिका पारनंदि निर्मला ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक इस प्रकार किया है कि पाठक को यह सामग्री अनूदित प्रतीत नहीं होती. भाषा शैली की यह प्रांजलता और प्रवाहशीलता अनुवादक के रूप में उनकी लंबी साधना का सुफल है, इसमें संदेह नहीं. 


चर्चित पुस्तक – तेलुगु की मानक लघुकथाएं 
अनुवादक – पारनंदि निर्मला  
संपादक – बलराम अग्रवाल
प्रकाशक- मित्तल एंड संस, विजय ब्लाक, लक्ष्मीनगर, दिल्ली – 110092  
संस्करण – प्रथम : 2010
पृष्ठ - 175
मूल्य – 300 रुपए
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