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मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए उन्मुखीकरण


मैसूर.बारह से पंद्रह दिसंबर,२०११. क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण  परिषद् [नई दिल्ली] के तत्वावधान में चार दिन का उन्मुखीकरण कार्यक्रम था. यानी जिसे अंग्रेजी में ओरिएंटेशन  प्रोग्राम कहते हैं. कर्नाटक और केरल के  केंद्रीय विद्यालयों और जवाहर नवोदय विद्यालयों के हिंदी अध्यापक आए थे - करीब चालीस - जिन्हें हिंदी शिक्षण में नवाचार की ओर उन्मुख करना था. 

विशेषज्ञ  अथवा संसाधक की हैसियत से एनसीईआरटी  से कार्यक्रम संयोजक नरेश कोहली और प्रो. संध्या सिंह  आए थे. दोनों ने बड़े विस्तार से पाठ्यचर्या से लेकर सतत और समग्र मूल्यांकन तक पर खुल कर चर्चा की. देखने में आया कि अध्यापकवृंद अभी मूल्यांकन की नई पद्धति [सीसीई] को हज़म नहीं कर पाया है - भला ऐसे में उसे अभिभावकों के गले कैसे उतारा जा सकता है. किसी को लगता है कि उसे अध्यापक से पटवारी बना दिया गया है तो किसी को लगता है कि इससे छात्रों में गैर-ज़िम्मेदारी बढ़ रही है. यह भी पता चला कि शिक्षा के विकेंद्रीकरण के ये प्रयास कुछ स्थलों पर अधिकारियों की तानाशाही का आधार बन रहे हैं. कुल मिला कर ढेर सारा कन्फ्यूज़न!!!

हिंदू कॉलेज, सोनीपत के एसोशिएट प्रोफ़ेसर और हास्य कवि डॉ. अशोक बत्रा परिषद् के बाहर से आए विशेषज्ञों में थे, मेरे अलावा.  डॉ. बत्रा वर्तनी और व्याकरण के अधिकारी विद्वान् हैं - हर स्तर के लिए उन्होंने व्याकरण की किताबें लिखी हैं. सम्मोहक वक्ता हैं. उन्होंने चारों दिन वर्तनी को समर्पित किए तथा एक सर्वेक्षण भी कर डाला कि प्रतिभागी अध्यापक भ्रमात्मक वर्तनियों में किन रूपों को सही मानते हैं. बत्रा जी जीवंत बन्दे हैं. खूब हँसाते हैं. व्याकरण को प्रतीक बनाकर कई  कविताएं  भी उन्होंने लिख रखी हैं - मेरे आग्रह पर सुनाई भी. और हाँ, हममें वही पहले थे जो पहली ही शाम बाज़ार जाकर खूब सारी खरीदारी कर आए - मैसूर सिल्क. बोले वरना श्रीमती जी घुसने नहीं देंगी.

इस कार्यक्रम का एक लाभ यह हुआ कि दो वरिष्ठ भाषावैज्ञानिक विद्वानों को सुनने का अवसर मिल गया - प्रो.जे सी शर्मा और प्रो राजेश सचदेवा. दोनों मैसूर के भारतीय भाषा संस्थान से सम्बद्ध रहे हैं. उन्होंने विस्तार से समझाया कि अन्य भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाते समय व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से किस तरह मदद ली जानी चाहिए.

अब बचे अपुन. पहले दिन नरेश जी ने कहा कि द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की पीठिका बनाते हुए अन्य भाषा की अवधारणा पर चर्चा करूँ - कर दी. दूसरे दिन कथेतर गद्य विधाओं के शिक्षण पर बात करते हुए कक्षा आठ में शामिल सोमदत्त के पत्र  ''चिट्ठियों में यूरोप'' के भाषिक शिक्षण बिंदु निकाल कर दिखाए तो अध्यापकों को अच्छा लगा. तीसरे-चौथे दिन कविता शिक्षण की चर्चा में सोहन लाल द्विवेदी की 'ओस' और त्रिलोचन की 'उठ किसान ओ' के विश्लेषण में उन्होंने भी आगे बढ़कर हिस्सा लिया और जो लोग यह मान रहे थे कि भाषा की चिंदी-चिंदी करने से कविता का आनंद खो सकता है उन्हें भी लगने लगा कि पाठ के भीतर से ही कविता के मर्म तक पहुँचने का रास्ता बनाया जा सकता है. कुल मिलकर यह कि मज़ा आया.

वापसी में तीन दिन बेंगलूरू रुका - भतीजी के घर. सारे समय बालाजी और मैं प्रोफ़ेसर दिलीप सिंह जी के अभिनंदन ग्रंथ  के प्रूफ देखने में जुटे रहे; फिर भी नातिन परी के साथ खेलने का मौका मिल गया. उस शैतान की खाला  ने मुझे सारे खेलों में पीट दिया - बेहद सुखकर लगता है अपनी तीसरी पीढी के हाथों हारना! पर उसे इतने से चैन नहीं पडा. अपनी गुडिया के सिंगार का पिटारा निकाल लाई और मेरे दाएँ हाथ के पाँचों नाखून अलग-अलग रंग की पॉलिश से रंग डाले. अभी भी वह रंग उतरा नहीं है.....और कल मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय में शोधार्थियों को संबोधित करने जाना है. चलूँ, रंग-रिमूवर ढूँढ लूँ.

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