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सोमवार, 19 जुलाई 2010

''पुस्तक चर्चा और लोकार्पण समारोह'' संपन्न


ज्योति नारायण की काव्यकृति 'ज्योति सागर' विमोचित

हैदराबाद, १८ जुलाई २०१० .

भारतीय भाषाओं और साहित्य की सेवा के लिए समर्पित नवगठित संस्था ''साहित्य मंथन'' के तत्वावधान में यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित समारोह में हैदराबाद की चर्चित कवयित्री ज्योति नारायण की चौथी कविता पुस्तक ''ज्योति सागर'' का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ .उल्लेखनीय है कि ज्योतिनारायण की अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं - 'प्रेम ज्योति का सूरज', 'चेतना ज्योति', ज्योति कलश' और 'ज्योति सागर' ;तथा वे देश-विदेश में काव्य पाठ कर चुकी हैं.



लोकार्पण करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने कहा कि 'ज्योति सागर' में ज्योति नारायण का अब तक का सर्वश्रेष्ठ सृजन संकलित है. उन्होंने कविताओं की चर्चा करते हुए कहा कि इनमें प्रेम की अभिव्यक्ति को संकोचहीन होकर ग्रहण करना आवश्यक है क्योंकि लौकिक प्रेम भी बड़े उदात्त भाव के साथ जुड़ा हुआ है. डॉ. शुक्ल ने आगे कहा कि राग ही मानव मन का एकमात्र स्थायी भाव है तथा दूसरे सब भाव और रस उसी से उपजते हैं.


इस अवसर पर ज्योति नारायण की अब तक प्रकाशित समस्त [कुल चार] काव्यकृतियों पर अलग अलग समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत किए गए.


''पुस्तक चर्चा'' के दौरान मुख्यवक्ता प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि ज्योति नारायण की काव्ययात्रा का मानचित्र आरंभिक दो पुस्तकों में क्षैतिज और सरलरेखीय रहने के बाद दो नई पुस्तकों में सहसा ऊर्ध्व दिशा की ओर गतिमान दिखाई देता है जो उनकी प्रगति और उन्नति का प्रमाण है. उल्लेखनीय है कि कवयित्री ने इस साहित्यिक कायाकल्प का श्रेय अपने गुरुजन को दिया है.


वरिष्ठ कवयित्री डॉ. अहिल्या मिश्र ने ज्योति नारायण के संघर्ष और साधना पर विचार प्रकट किए तथा कवि पत्रकार डॉ. राम जी सिंह उदयन ने उन्हें घर और आँगन की कवयित्री बताते हुए उनकी भावसमृद्धि की प्रशंसा की.

लोकार्पित कृति 'ज्योति सागर' पर केंद्रित आलेख में युवा समीक्षक डॉ. जी. नीरजा ने कहा कि कवयित्री का काव्यप्रयोजन जीवन की सच्चाइयों को खरी बात की तरह अभिव्यक्त करना है और वे सामाजिक विसंगतियों से उद्वेलित होकर ऐसे नए समाज की कल्पना करती हैं जिसमें न तो साम्प्रदायिकता हो ओर न शोषण . संकलन के मुक्तकों में मातृत्व के जीवंत पक्ष पर भी डॉ. नीरजा ने प्रकाश डाला.

शोधछात्रा अर्पणा दीप्ति ने अपने शोधपत्र में 'प्रेम ज्योति का सूरज' के मुख्य सरोकारों की पड़ताल करते हुए कहा कि गृहिणी होते हुए भी कवयित्री का काव्य संसार घर और चूल्हे तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समाज, राजनीति, जीवन और जगत के बारे में अपने स्वतंत्र विचार रखती हैं.

उर्दू विश्वविद्यालय के डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने 'चेतना ज्योति' शीर्षक पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा कि इसमें मुख्य रूप से देशप्रेम को सहज गीतात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की गई है जिसे प्रकृति और अध्यात्म के सन्दर्भों से नई चमक प्राप्त हुई है.


समारोह के संयोजक डॉ. बी. बालाजी ने 'ज्योति कलश : चेतना और शिल्प' विषयक अपने शोधपूर्ण विस्तृत आलेख में कहा कि इस संग्रह [ ज्योति कलश] के पहले आठ गीत राष्ट्रीय चेतना से संपन्न हैं जबकि शेष ३२ गीत प्रेम की विविध मनोदशाओं का खुलासा करने वाले हैं तथा तीसों गज़लें पर्याप्त कसी हुई हैं.उन्होंने यह भी दर्शाया कि वस्तु और शिल्प में कुछ रचनाएं हिंदी-उर्दू के कई प्रसिद्ध रचनाकारों से प्रभावित प्रतीत होती हैं.

अध्यक्षासन से संबोधित करते हुए प्रो. टी. मोहन सिंह ने कहा कि कवयित्री के मन और काव्य दोनों में एक आदर्श भारातीय समाज की परिकल्पना है, वे अपने साहित्य के द्वारा भारत एवं विश्व के कल्याण की कामना व्यक्त करती हैं तथा हिन्दी के प्रति उनका प्रेम प्रशंसनीय है.

आरम्भ में अतिथियों ने सरस्वती-दीप प्रज्वलित किया और के. नागेश्वर राव ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की . इस अवसर पर कवयित्री ज्योति नारायण का सारस्वत सम्मान 'साहित्य मंथन' द्वारा किया गया तथा कवयित्री ने अपनी कुछ प्रतिनिधि कविताएँ भी सुनाईं.


कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ.किशोरी लाल व्यास,डॉ.गोरखनाथ तिवारी,डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. पी. श्रीनिवास राव, डॉ.मृत्युंजय सिंह, प्रेम शंकर नारायण, रामकृष्णा, धन्वन्तरी ,गिरिजेश त्रिपाठी ,मोहन कुमार ,प्रवीण शर्मा ,विष्णु प्रिया,मधु , एकता नारायण,

माला गुरुबानी,संपत देवी मुरारका, डॉ. अर्चना झा,डॉ. मिथलेश सागर,गुरु दयाल अग्रवाल,प्रदीप नानावती, नीलम नानावती, मुरारीलाल,मधु गौड़, एस.सुजाता , वी. वरलक्ष्मी , विनीता शर्मा, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, जी.परमेश्वर, सूरज प्रसाद सोनी, विशेष वर राज,पवित्रा अग्रवाल , अनीता श्रीवास्तव, रवि श्रीवास्तव, शांति अग्रवाल, सरिता सुराना जैन, मीना खोंड, जुगल बंग जुगल, मुहम्मद सिकंदर अली, पुष्पा वर्मा, अनुषा नारायण, सुभाष कुमार शर्मा, शशि कोठारी,विनायक खोंड, एस.के. कोठारी, अशोक कुमार तिवारी, सीमा मिश्र, वी. अनिल राव, रेखा मिश्र, साधना शंकर, शोभा श्रीनिवास देशपांडे,बुद्ध प्रकाश सागर, डॉ.शक्ति द्विवेदी,डॉ. देवेन्द्र शर्मा, डॉ. पी मानिक्याम्बा, सविता सोनी, प्रवीन प्रकाश,मोहन, सुषमा बैद , वीर प्रकाश लाहोटी 'सावन' तथा वेणु गोपाल भट्टड़ आदि कवियों, विद्वानों और साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति का महत्वपूर्ण योगदान रहा.


'जन गण मन' के साथ समारोह का समापन हुआ.

~~प्रस्तुति : डॉ. बी. बालाजी [ संस्थापक-संयोजक , साहित्य मंथन ],१३-२/१/ए, गुप्ता गार्डन,रामंतापुर, हैदराबाद - ५०००१३~~

3 टिप्‍पणियां:

Anand ने कहा…

Jyoti Narain ki kavitaiyein bahut hi hriday sparshi hotein hain. Meri unko bahut sari subhkamnayein.
Anand

बेनामी ने कहा…

Jyoti ji,
Badhai!Aap pragati path par isi tarah agrasar rahen.
Dr.Israr 'Gunesh'
Sansthapak-Adhyaksha,"HIMAKSHARA"

himakshara ने कहा…

Jyoti ji,
Himakshara Pariwar ki ore se aapko aur aapke samast sahyogiyon ko,Badhai!
"HIMAKSHARA RASHTRIYA SAHITYA PARISHAD'