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गुरुवार, 29 जुलाई 2010

मानव संबंधों की सहज सौम्य कहानियाँ : 'उजाले दूर नहीं'*



'उजाले दूर नहीं’ [२०१०] हैदराबाद की वरिष्ठ कहानीकार पवित्रा अग्रवाल [१९५२] की कहानियों का नया संकलन है। पवित्रा अग्रवाल ने बहुत अधिक नहीं लिखा है लेकिन जितना लिखा है, सोद्देश्य लिखा है। वे समसामयिक समाज की गतिविधियों, मध्यवर्गीय परिवारों की आंतरिक उथल पुथल और मानव मन के अंतर्द्वंद्व पर पैनी नज़र रखती हैं। मनुष्य स्वभाव की उन्हें गहरी परख है। इस पैनी नज़र और गहरी परख के सहारे वे अपने सामाजिक सरोकारों को कहानियों के ताने बाने में बुनती हैं। बुनावट उनकी एकदम सहज है। शायद इसीलिए पाठक को ये कहानियाँ अपने आसपास की, अपने पड़ोस की, कहानियाँ लगती हैं। मनुष्यता के सुंदर भविष्य के प्रति लेखिका का विश्वास इस संकलन के शीर्षक से ही ध्वनित हो जाता है। हताशापूर्ण मारकाट के युग में मानवीय आस्था को प्रकाशित करनेवाली ये कहानियाँ पढ़ना पाठकों के लिए सचमुच सुखकर और प्रीतिकर अनुभव होगा।

लेखिका ने ‘पुराना प्रेमी’ में जहाँ एक ओर पति पत्नी संबंधों में खुलेपन और सहज विश्वास की आवश्यकता का प्रतिपादन किया है, वहीं पुरुष की संदेहशील वृत्ति और दोहरे आचरण की ओर भी इशारा किया है। उन्होंने मैत्री और प्रेम में किसी भी प्रकार के दुराव को छल और धोखा माना है, भले ही उसके पीछे कोई गंभीर दुर्भावना निहित न हो।

‘समझौता’ में पारिवारिक सद्भाव को नष्ट करने में स्त्री के अहं की भूमिका को बिना लागलपेट के उधेड़ा गया है। पुरुष की विवेकशून्यता किस प्रकार उसे ऐसी स्त्री की कठपुतली बना सकती है, यह भी यहाँ उभर कर सामने आया है। बदली हुई परिस्थिति में स्त्री जब समझौता करती है तो लेखिका इसे हृदय परिवर्तन का नाम नहीं देतीं, बल्कि इसे भी वे उसी प्रकार अभिनय ही बताती हैं जिस प्रकार ‘पुराना प्रेमी’ में पति के आचरण को अभिनय बताया था। साफ है कि लेखिका स्त्री या पुरुष में किसी एक ही को सदा सर्वदा खलपात्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले विमर्श के दायरे में कैद नहीं हैं। इसके विपरीत उनके लिए पारिवारिक और सामाजिक आचरण की पारदर्शिता तथा मानवीय मूल्य अधिक महत्वपूर्ण हैं।

स्त्री सशक्तीकरण के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्त्री शिक्षा की आवश्यकता , उसके विवेक के सम्मान और आत्मनिर्णय के अधिकार को कई छोटे छोटे उपकथासूत्रों की सहायता से ‘शुभचिंतक’ में बखूबी रेखांकित किया गया है। अर्थपिशाच व्यक्ति किस प्रकार परिवार को स्त्री के लिए यातनाशिविर बना सकता है, यह भी उभर कर आया है। निकट संबंधियों की परिवारतोड़क भूमिका के प्रति सावधान करती यह कहानी अर्थ और प्रेम के द्वंद्व के बहाने पुरुष के कुचक्री, शोषक तथा कामुक रूप को बेनकाब करते हुए सास बहू के संबंध में संभावित स्त्री बहनापे का भली प्रकार प्रतिपादन करती है। स्पष्ट है कि यदि स्त्री स्त्री का साथ दे तो ही पुरुषवर्चस्व को तोड़ा जा सकता है।

पवित्रा अग्रवाल ने अपने स्वतंत्रतासेनानी और आर्यसमाजी परिवार के संस्कारों को जीवन और लेखन में उतारने का यथासंभव ईमानदार प्रयास किया है। उन्हें व्यवहार के दोगलेपन तथा अंधविश्वासों से चिढ़ है। वे हर घटना की तर्कपूर्ण व्याख्या खोजने का प्रयास करती हैं तथा चमत्कार और श्रद्धावाद को स्वीकार नहीं करतीं। ‘चमत्कार का इंतजार’ में उन्होंने अध्यात्म का व्यवसाय करने वालों पर मीठी चोट की है। माताजी के आशीर्वाद से तथाकथित गर्भ धारण करने वाली स्त्री की अवसादग्रस्तता इसी ओर इशारा करती है। लेखिका ने संतानहीन दंपति के लिए सुझाव भी दिए हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन में पीढ़ी-अंतराल के कारण आने वाली बाधा से भी मुँह नहीं फेरा है। ध्यान देने की बात है कि लेखिका जहाँ यह अपेक्षा करती हैं कि पुरानी पीढ़ी अपने जड़ सोच से बाहर आए, वहीं नई पीढ़ी की स्त्री से वे दृढ़ता, संयम और आत्मनिर्णय के अपने अधिकार के उपयोग की भी अपेक्षा करती है। यह कहना अनुचित न होगा कि उनकी कहानियों में हमें ऐसी आत्मविश्वासी सशक्त स्त्री उभरती हुई दिखाई देती है जो अबला छवि को ध्वस्त कर सकती है।

स्त्री जितनी ही सशक्त होती जा रही है, दुर्भाग्य का विषय है कि पुरुष द्वारा उसके शोषण के नए नए तरीके भी उतनी ही शिद्दत से ईजाद किए जा रहे हैं। अब इसे क्या कहेंगे कि कोई पुरुष स्वयं माँगकर किसी युवती से विवाह करे और बाद में पता चले कि वह पंद्रह दिन पहले एक और विवाह कर चुका है। विवाह और तलाक का खेल खेलने के ऐसे कई मामले पिछले दिनों प्रकाश में आ चुके हैं। पवित्रा ने ‘छल’ में उन्हें ही आधार बनाया है लेकिन मामले को किसी मीडियाकर्मी या वकील की तरह संवेदनहीन होकर नहीं देखा है, बल्कि पुरुष के पक्ष को भी सहानुभूति से सामने रखा है और यह दर्शाया है कि सामान्य रूप से जो व्यक्ति विश्वासघाती दिखाई दे रहा है, हो सकता है कि वह स्वयं अन्य किसी प्रकार के छल का शिकार हो। प्रकारांतर से यह भी कहा गया है कि नारीस्वतंत्रता और नारीन्याय को पूरी सामाजिक सच्चाई के संदर्भ में व्याख्यायित किया जाना चाहिए अन्यथा वह भी अन्याय का हेतु बन सकता है।

पीढ़ी अंतराल का मुद्दा ‘अंतिम फैसला’ में भी दिखाई देता है। कन्याभ्रूणहत्या के लिए असहमत बहू की दृढ़ता के साथ ही यहाँ पति और सास का हृदय परिवर्तन भी दिखाया गया है जो इस तथ्य का सूचक है कि नहीं; प्रेम अभी मरा नहीं है। प्रेम, लेकिन यदि , आंख बंद करके किया जाए और उसके लिए झूठ पर झूठ बोलने पड़ें तो वह गले की फाँस बन जाता है। ‘एक और अदालत’ में प्रेम विवाह की ऐसी ही परिणति चित्रित है। इसका अर्थ यह नहीं कि लेखिका स्त्री के प्रेम करने के अधिकार को अस्वीकार करती हैं, बल्कि यह है कि यदि इसे साहसपूर्वक समाज के समक्ष स्वीकार नहीं किया जाता तो यह आपराधिक कृत्य, ब्लैकमेलिंग तथा आजीवन पीड़ा देने वाला दंश बन सकता है। प्रेम और अवैध संबंध के फर्क को मिटाया नहीं जा सकता - यह एक सामाजिक सच्चाई है।

रामायण और महाभारत के युग से आज तक स्त्री से सहज ही यह प्रश्न पूछा जाता रहा है कि उसकी संतान का पिता कौन है। पवित्रा की कहानियों में भी यह सवाल घूमफिरकर कई बार आता है। इस सवाल के डर से जाने कितने बच्चे नदी में बहाए गए होंगे हौर जाने कितनी स्त्रियाँ धरती माता की गोद में समा गई होंगी। लेकिन ‘अधिकार के लिए’ की स्त्री इन रास्तों पर नहीं जाती और अपने बच्चे को पिता का नाम दिलाने के लिए लोकतांत्रिक ढंग से संघर्ष करती है।

वृद्धावस्थाजनित असुरक्षाभाव के बावजूद ‘मैं भगोड़ी नहीं’ की वृद्धा अपना गाँव छोड़कर बेटे के साथ शहर जाकर नहीं बसना चाहती। लेखिका ने उसके मनोविज्ञान और ग्रामीण संस्कार को बखूबी किस्से की तरह बखाना है। अपने संघर्षमय अतीत से दीप्त यह वृद्धा तनिक भी विचलित नहीं दीखती।

संतानहीनता के समाधान के रूप में लेखिका ने एक से अधिक कहानियों में अनाथालय से बच्चा गोद लेने का सुझाव दिया है। ‘यह सब किसलिए’ में यह सुझाव पुरानी पीढ़ी की ओर से आया है। वैसे यह कहानी श्राद्ध के औचित्य पर सीधे सवाल उठाती है और वृद्ध मातापिता को उनके जीवित रहते श्रद्धा व सम्मान देने की प्रेरणा देती है। श्राद्ध की ही भांति जन्मदिन को भी समाज सेवा के कार्य के साथ जोड़ा जा सकता है। ‘दूसरा बेटा’ इसका उदाहरण है।

सफेद दाग के साथ जुड़े हुए अंधविश्वासों का खंडन ‘एक दूजे के लिए’ में किया गया है और यहाँ भी निस्संतान दंपति को अनाथालय से बच्चा गोद लेने की सलाह दी गई है। ‘कितना करूँ इंतजार’ रूढ़िभंजन को समर्पित कहानी है। इसमें प्रेम में मुक्ति की कामना और संस्कार के द्वंद्व को भी उभरने का मौका मिला है। स्त्री की दृढ़ता यहाँ भी दिखाई गई है। ‘दुविधा के बादल’ में लेखिका ने वास्तुशास्त्र की प्रासंगिकता पर विचार किया है और यह दर्शाया है कि शुभ अशुभ और सुख दुःख का वास्तु से कुछ लेना देना नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध अंधविश्वास है।

पवित्रा अग्रवाल की अधिकतर कहानियों में दांपत्य से जुड़ी अलग-अलग प्रकार की समस्याएँ दिखाई देती हैं जिनका संबंध अगर एक ओर आर्थिक स्थिति और पीढ़ी अंतराल से है तो दूसरी ओर परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच असामंजस्य से है। पारिवारिक दायित्व के प्रति उपेक्षा भाव, पारस्परिक ईर्ष्या और अहंकार को लेखिका ने परिवार व्यवस्था की जड़ पर आघात करनेवाले विषाणु माना है। ऐसे अवसर पर वे स्त्री से उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा करती हैं। स्त्री विमर्शकों को पसंद हो या न हो पर ‘कहीं देर न हो जाए’ की रुष्ट स्त्री ज्ञानोदय होने पर पति के बुलावे की प्रतीक्षा नहीं करती और स्वयं उसके पास लौटने का निश्चय कर लेती है।

मानवीय संवेदना का विस्तार अंगदान के रूप में प्राणदान तक संभव है, इस संभावना को ‘एक कोशिश ’ में देखा जा सकता है। यह तथ्य भी ध्यान आकर्षित करता है कि पवित्रा अग्रवाल समस्यासंकुल जीवन को भावुकता की दृष्टि से नहीं संवेदना की दृष्टि से देखती है। उनका यह दृष्टिकोण ही ‘दूसरा बेटा’ की युवा विधवा को पुनर्विवाह करने के बावजूद पहले पति के परिवार के प्रति भी अपने दायित्व का निर्वाह करने के लिए प्रेरित करता है। ‘किसी से न कहना वरना’ में धीर गंभीर पवित्रा जी का हँसमुख चेहरा दिखाई देता है तो ‘जिजीविषा’ में उन्होंने जहाँ एक ओर यह दर्शाया है कि बीमारी आदमी को किस कदर तोड़ देती है वहीं यह भी दर्शाया है कि प्रेम और विश्वास के बल पर उससे किस प्रकार लड़ा जा सकता है।

‘काश ऐसा ही हो’ में अति भावुक और एकपक्षीय प्रेम से उत्पन्न मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्याओं की तरफ ध्यान खींचा गया है। यहाँ भी दांपत्य संबंधों को विषाक्त करने में संदेह की घातक भूमिका को दर्शाया गया है - संदेह का यह रोग पुरुष को भी हो सकता है और स्त्री को भी। हीन भावना और असुरक्षा भाव इन संदेहों की जड़ में रहते हैं।

कुल मिलाकर अगर यह कहा जाए कि पवित्रा अग्रवाल मानव संबंधों की ऐसी कहानीकार हैं जिनकी दृष्टि इन संबंधों को मधुमय और विषमय बनानेवाले कारणों पर केंद्रित रहती है, तो गलत न होगा। लेखिका का मनुष्य की सर्वोपरिता में विश्वास है , इसीलिए वे अपनी हर कहानी के माध्यम से मनुष्य जीवन को सुंदर और बेहतर बनाने के सपने को रूपायित करती दिखाई देती हैं। विभिन्न प्रकार के विमर्शों की नारेबाजी के बीच उनकी यह सहज सौम्य अभिव्यक्ति सहृदय पाठकों का मन मोह लेने में समर्थ है।0


*उजाले दूर नहीं / कहानी संग्रह / पवित्रा अग्रवाल / गीता प्रकाशन,हैदराबाद / २०१० / पृष्ठ १६० / १२५ रूपए


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