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शनिवार, 17 जुलाई 2010

देश को जगाओ

भूमिका

"देश को जगाओ" डॉ.गौनि अंजन भगवान दास गौड़ की उद्‍बोधनात्मक कविताओं का संकलन है। भगवान दास जी ने कविता को सामाजिक और राजनैतिक चेतना जगाने का माध्यम बनाया है। उनका कवि मन इस बात से क्षुब्ध है कि स्वतंत्रता प्राप्‍ति के बाद इतने वर्ष बीत जाने पर भी न तो भारत को सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव हो सका है और न ही लोकतंत्र के माध्यम से वह कल्याणकारी व्यवस्था स्थापित हो सकी है जिसकी कल्पना रामराज्य के आदर्श के रूप में की गई थी। इसके लिए वे जनता की अचेतनता और जन प्रतिनिधियों की अवसरवादिता को उत्तरदायी मानते हैं तथा एक ऐसी क्रांति की कामना करते हैं जो शोषण की व्यवस्था को ध्वस्त करके नए मानवतावादी समाज की स्थापना कर सके। समाजसुधार की दृष्‍टि से लिखी गई इन कविताओं में भाषा और शिल्प संबंधी अनगढ़ता के बावजूद पाठक को चेताने की ताकत है जो कि इनकी संबोधन मुद्रा के कारण संभव हुआ है। कवि कहीं भी एकांत में बड़बड़ाता दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत उसके समक्ष अपना पाठक/श्रोता सदा उपस्थित है। इस संबोध्यता ने ही निबंध जैसे विषयों के प्रतिपादन में कवितात्मकता का आभास ला दिया है।

कवि का उद्देश्य एकदम साफ है - देश को जगाओ। देश को जगाना है तो मंदिर, मस्जिद और समाधिस्थलों पर घंटे, अज़ान और अगरबत्तियों वाले अनुष्‍ठान करने के बजाय देश और मनुष्य की पूजा करनी होगी। आए दिन हर शहर में यातायात की सुविधा को बाधित करनेवाली ऐसी समाधियों को लेकर विवाद उठते हैं जो सड़क के बीचोंबीच ठाठ के साथ जमी हुई हैं (समाधि रे महान)। ऐसे सांप्रदायिक और राजनैतिक पाखंड को कवि भगवान दास ने निर्जीव की आराधना माना है। वे इसे वोट के लिए किया गया राजनीतिज्ञों का अलोकतांत्रिक आचरण मानते हैं। दरअसल लोकतंत्र की विफलता कवि को अत्यंत विचलित करती है। उन्हें लगता है कि अब सब ओर गुंडाराज कायम है और चुनाव रूपी पर्व लोकतंत्र को हर्षित करने के बजाय तड़पाता है (चुनाव पर्व)। चुनाव के समय नेता वोट की भीख मांगने आते हैं और बाद में अपने दुष्कर्म द्वारा जनता को भिक्षुक बनाते हैं (आज के नेता)। कवि प्रश्‍न करता है कि इस व्यवस्था में समता, सौजन्य और मानवता जैसे मूल्य कहाँ हैं ।और जब उत्तर मिलता है _ कहीं नहीं, तो वह जनता को एक ऐसे महासंग्राम के शंखनाद के लिए आहूत करता है जिसके द्वारा मानव मूल्यों को जगाया जा सके (समता का महासंग्राम)।

लोकतंत्र की विफलता का एक बड़ा उदाहरण तेलंगाना समस्या है। भगवान दास जी तेलुगुभाषी हैं और तेलंगानावासी। इसलिए तेलंगाना की दुर्दशा पर उनका क्षोभ स्वाभाविक है। वे मानते हैं कि तेलंगाना की जनता अभी तक न तो स्वतंत्र है और न सुखी, इसीलिए महान तेलंगाना समरांगण बना हुआ है (तेलंगाना रे महान)। इसी प्रकार वर्ग भेद, जाति भेद तथा पिछडे/दलित/आदिवासी समुदायों के प्रति उच्च वर्ग, उच्च वर्ण और प्रभुसत्ता द्वारा भेदभाव ने भी कवि को भीतर तक झकझोरा है। वे इस भेदभाव को जनता के सजीव दहन की राजनीति मानते हैं और सवर्णों के जातिअभिमान को अधार्मिक और अमानुषिक घोषित करते हुए निम्न वर्ग की एकता का आह्‍वान करते हैं ताकि अग्र वर्ण के अहंकार का ध्वंस किया जा सके (जात-पाँत)।

प्रेम और मानवता को सर्वोपरि माननेवाले कवि भगवान दास ने पर्यावरण संरक्षण, नेत्र दान, रक्‍तदान, कन्या विक्रय विरोध, कन्या भ्रूण हत्या विरोध, शहीदों के सम्मान, स्त्री की मर्यादा, अंध आधुनिकीकरण के दुष्परिणाम , युवा शक्‍ति की दुर्निवारता, क्रांति की अपरिहार्यता जैसे विषयों पर प्रचार शैली में काफी कविताएँ लिखी हैं जिनकी कुछ पंक्‍तियाँ तो सामाजिक आंदोलनों में नारों की तरह इस्तेमाल करने लायक हैं। कवि की नज़र से न तो कौवा बचा है न चींटी। पेड़ के माध्यम से भी उन्होंने शिक्षा दी हैं। भीख माँगते बच्चे भी उन्हें द्रवित करते हैं। इन तमाम विषयों की अभिव्यक्ति में रामकथा और कृष्णकथा से लिए गए मिथकों का सटीक प्रयोग खास तौर पर ध्यान खींचता है | ये सारी चीजें उनकी राष्‍ट्रीय और सामाजिक चेतना को पुष्‍ट करती हैं। यही चेतना उन्हें भारत की अखंड़ता और एकता के लिए भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिंदी का प्रबल पक्षधर बनाती है। उन्हें गर्व है कि तेलुगु उनकी मातृभाषा है। उसमें उन्हें माँ की ममता मिलती है। वह उनके लिए श्रीचंदन और मातृत्व का मधुर बंधन है (तेलुगु की तेजस्विता)। लेकिन उनका यह तेलुगु प्रेम किसी भी प्रकार संकीर्ण नहीं है। वे जानते हैं और मानते हैं कि हिंदी की सार्वदेशिक स्वीकृति इस देश का सांस्कृतिक एकता का आधार है अत: उसकी उपेक्षा करना देशद्रोह है। उनका हिंदी प्रेम इतना सघन है कि राष्‍ट्रभाषा का तिरस्कार करने वालों केलिए वे मृत्युदंड का विधान चाहते हैं -
"दंड दो/ मृत्यु दंड दो/ बीच बाजार में / जनता के सामने/ पथभ्रष्‍ट कर्तव्यहीन नेताओं को/ देश के अंग्रेजी प्रबल समर्थकों को/ निरभिमानियों को/ मातृद्रोही व्यक्‍तियों को।/ हम सब हिन्दुस्तानी हैं/ आपस में भाई-भाई हैं/ अलग नहीं आपस में हम/ अखंड भारत के प्रतीक हैं हम/ हिंदी के प्रतिपादक हैं हम/ राष्‍ट्रीय अखंडता के गायक हैं हम।"(देश की आशा - स्वभाषा)।

आशा की जानी चाहिए कि हिंदी जगत इस तेलुगुभाषी रचनाकार की इन कवितात्मक अभिव्यक्‍तियों का उदार मन से स्वागत करेगा।

- ऋषभदेव शर्मा
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