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मंगलवार, 30 मार्च 2010

स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति - चर्चा

पिछली प्रविष्टि के क्रम में...
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Dr sahab, I know why you are writing ! I want to share with you an advise of a German writer to a new writer. Its totally new for me. The advisor says, " If you think you are capable of living without writing, do not write."

Yours
Abdul Hameed Khan, Mumbai
29 March 2010
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आदरणीय ऋषभदेव जी
आपका सन्देश देखा. बहुत संक्षेप में आपने अपने लेख का आशय प्रस्तुत कर दिया है. संगोष्ठी में आपकी सक्रिय और सार्थक भागीदारी केलिए हम आपके आभारी है. आपकी प्रस्तुति धारदार थी और बावजूद कुछ असहमतियों के संगोष्ठी को आगे बढाने में सहायक रही. स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति की सीमाओं और उसके व्यावहारिक पक्ष को आपने अपनी शैली में प्रस्तुत किया जो मेरी दृष्टि में महत्वपूर्ण है. खेद इस बात का रहा कि उस पर कोई चर्चा नहीं हुई और न ही अध्यक्ष महोदय ने कोई टिप्पणी की. मै बहुत जल्द एक रिपोर्ट बनाकर आपको भेजूँगा.

एम वेंकटेश्वर (प्रो. एम. वेंकटेश्वर, हैदराबाद)
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बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें .
बहुत अच्छा लगा कि आपने स्पष्ट किया कि स्त्री अपनी निरीहता (जितनी दिखाई जाती रही उतनी निरीह तो मुझे कभी नहीं लगी)से उबर कर सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय-सचेत हो गई है .
वह रपट पढ़ने की उत्सुकता है .

सादर ,
प्रतिभा. (डॉ. प्रतिभा सक्सेना, यूएसए )

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आदरणीय ,
बहुत सारी बधाइयां उम्दा जगह पर उच्च स्तरीय व्याख्यान के लिए. वेंकटेश जी तो वैसे भी निःस्वार्थ भाव से मित्र स्नेही हैं ही.
पूरा भाषण भी पोस्ट करेंगे तो अच्छा रहेगा. मेरे जैसे जो लोग जा नहीं सके कम से कम पढ़ तो लेंगे.

सादर,
आलोक (डॉ. आलोक पाण्डेय, हैदराबाद)
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रिद्दे (ऋ.दे.) कहीं हो और धारा के खिलाफ नहीं तैरे, ये कैसे हो सकता है.

अतुल कनक. कोटा
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प्रिय डॉ. ऋषभ देव, सस्नेह.
"स्त्री और उपभोक्ता-संस्कृति" विषयक संगोष्ठी में तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत थीसिस से मैं सहमत हूँ. निश्चय ही आज स्त्री उपभोक्ता वस्तु नहीं रही है, बल्कि स्त्री तो आज उपभोक्तावाद को प्रभावित करने वाली प्रमुख इकाई बन गई है. प्रो. म. वेंकटेश्वर जी को मेरा नमस्कार कहें. कभी हैदराबाद आने का मन है ताकी ऋषभ देव की प्रगति अपनी आँखों से देख सकूं. 20 से 23 मार्च तक रांची में फादर डॉ. कामिल बुल्के की जन्मशतवार्षिकी के अवसर पर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित संगोष्ठी में गया था, बहुत सुन्दर रही.

स्नेहाशीष सहित,
डॉ. अरुण (डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण', रुड़की)
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With all due respects and apologies I would beg to differ. Agreed 'upbhogtavad' and upbhogta sanskriti' are two different things but that is not the subject. It is 'stree and upbhogta sanskriti'. When we talk of women we do not talk of a particular class or segment but for women all over the country. True in metros a few women may have attained a special status but these are exceptions and do not prove the rule. Day in and day out we do hear, read and witness exploiation, rape, gang rape of women and it has become a part of our day to day life. What do we do after reading all this. We blame the present culture and forget about this and wait to read the same again next day.

As a matter of fact we have inherited the culture of sexually exploiting and slaving the women. A fast look to various traits of 'Indra' would clinch the issue. It is the king of 'swarga' who has raped Ahilya and goes scot-free. Ahilya's husband ( I do not recollect his name pronto) who is supposed to know all past, present and future does not rebuke Indra but banishes Ahilya in a most unhuman manner which does not behove a 'siddh rishi' of his stature. It is the same Indra who deputes 'Urvashi' to entice Rishi Vishwamitra by prostituting. Even Lord Krishna had 16,000 ranis. And as devout Hindus we all read and recite these very stories with utmost reverance. Oh: What a creed we are?.

With this background which we carry in our heart of hearts, I think, none of us is qualified to talk on the subject unless it is for self propagation.

I do not know whether I am a rebel or sadist but I have expressed what I feel on the subject.

With best of regards,
sincerely - g.d. agarwala (गुरु दयाल अग्रवाल, हैदराबाद)
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@ g.d. agarwala
आदरणीय अग्रवाल साहेब,
सादर नमन.
मुझे आपके विचार जानकर अच्छा लगा.
आपने तो एक प्रकार से मेरा समर्थन ही किया है क्योंकि आप कह रहे हैं कि स्त्री के प्रति जो भी अपराध हो रहे हैं उसके लिए भूमंडलीकरण और बाज़ार की आज की ताकतें भर ज़िम्मेदार नहीं है. ज़िम्मेदार वह भोगवाद है जो पुरुषसत्ता का अनिवार्य अंग है. मैं इसमें यह जोड़ना चाहता हूँ कि यदि स्त्री जागरूक और एकजुट होकर इस भोगवाद को चुनौती दे तो वह इसका प्रतिरोध करने की संस्कृति को मज़बूत कर सकती है. उपभोक्तावाद का प्रतिरोध कर सकने की ताकत अर्जित करने को मैंने उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पारिभाषित करने की कोशिश की है.

मुझे संतोष है कि आप सरीखे कई वरिष्ठ मित्रों ने मेरी बात पर ध्यान दिया है. असहमत होना लोकतांत्रिक है,मुझे उस पर कोई आपत्ति क्यों होने लगी. मैं जानता हूँ कि मेरी बात न तो पूर्ण है न अंतिम. यह तो विमर्श का एक कोण है..बस.

सादर आपका
ऋषभ
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