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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

कैलाशगिरि : वागर्थाविव संपृक्तौ


कैलाशगिरि : वागर्थाविव संपृक्तौ

कैसा लगता होगा आदमी को तब जब वह गंभीर और प्रौढ़ दिखना चाहे लेकिन परिस्थिति उसे बचपने पर मजबूर कर दे! सोचा था भले आदमियों के परिवार में टिका हूँ, बनमानुष जैसी हरकतें नहीं करूँगा. गंभीर रहूँगा. भला मानुस दिखूँगा . पर गृह-स्वामी स्वयं साढ़े दस बजे रात में पूछे कि- समुद्र किनारे घूमने चलेंगे ? तो क्या किया जाए. ना नुकुर की तो पट्ठा यूनस बोला - 'बुड्ढे हो गए ?' और अपनी दो दशक पुरानी शरारतभरी हँसी हँसा, जब वह मेरा एम.फिल. का छात्र था और हम आधी रात में मद्रास की सड़कों पर घूमने निकलते थे. 'ऐसी बात है तो चलो', कह दिया मैंने. विशाखापट्टनम की सड़कों पर उसने अपना दुपहिया सरपट दौड़ाया. रात का समुद्र दिखाया. शिलाओं को चूम चूम लौटता समुद्र देख एक क्षण को बच्चन जी के गीत की पंक्ति याद आई- ''सुनसान रात गुपचुप तारे , एकांत चंद्र नभ मूक आप / सागर लहरों को बिठा गोद , मुख चूम उमंगें रहा माप''. पर नहीं, यहाँ लहरों को नहीं चूम रहा था सागर, लहरों से चूम रहा था तट को . और अचानक कौंध गया मन में सोम ठाकुर का वह प्रसिद्ध गीत - ''सागर चरण पखारे, गंगा शीश चढ़ावे नीर / मेरे भारत की माटी है चंदन और अबीर''. देर तक हम भारतमाता के चरण पखारते समुद्र के बिंब को अपने प्राणों में भरते रहे. और जब लौटे तो अपना गला गली बन चुका था.

अगले दिन दोपहर के भोजन पर संतोष अलेक्स ने बुला रखा था, पुराने दोस्त हैं अपने. बहुत सम्मान करते हैं, अच्छे बहुभाषाविद अनुवादक हैं. ख़ासतौर से हम लोगों के लिए श्रीमती अलेक्स ने रोटियाँ बनाईं. डॉ. अमिताभ जी और अग्रवाल दंपति तीन ही दिन में चावलों से चीं बोल चुके थे, फुलके देखे तो फूल गए. भोजन तो स्वादिष्ट था ही , उन लोगों की आत्मीयता परम स्वादिष्ट थी. उन्हें 'अन्नदाता सुखी भव' का आशीष देकर यूनिवर्सिटी परिसर में लौटे कि एक शोधछात्रा लंबी सी प्रश्नावली के साथ नमूदार हो गईं. मैंने वरिष्ठता के हवाले से डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ को उनके हवाले कर दिया. अभी दो ही सवाल हुए थे कि जनाब यूनस अली रज़ा हाज़िर - 'कैलाशगिरि चलेंगे.' 'एक घंटे बाद चलें?' ' ना ; अँधेरा हो जाएगा'. 'अरे भई, देखते नहीं ,इंटरव्यू चल रहा है'. एक क्षण रुक कर प्रत्युत्पन्न उत्तर - 'इंटरव्यू कार में हो जाएगा'. फटाफट निकल लिए हमलोग. मैं रास्ते भर हरियाली और रास्ता, पानी और पहाड़ देखता रहा. अमिताभ जी प्रश्नोत्तर में मगन रहे. और इस तरह सूरज छिपने से पहले कैलाशगिरि की पहाड़ी पर पहुँच गए.

शिव-पार्वती की श्वेतवर्णी विशाल प्रतिमाएँ सांध्य आकाश को छूती हुईं आशीष बरसाती लगीं. सहज ही अपने संस्कार वश हम दोनों (अमिताभजी और मैं) के कंठ से वंदना के स्वर फूट पड़े. ''वागार्थाविव संपृक्तौ वागर्थः प्रतिपत्तये / जगतः पितरौ वंदे पार्वतीपरमेश्वरौ.'' देर तक हम उस औदात्य और सौंदर्य को पीते रहे. अच्छा पिकनिक स्थल बना है, साफ़-सुथरा है, व्यवस्थित भी (फिर भी कई जगह कचरे के ढेर व्यवस्था को मुँह चिढ़ाते लगे). लोग रोप-वे से झौरि झौरि दौरि दौरि आ रहे थे - खिलखिला रहे थे. खिलखिलाने के मौके अब हमने छोड़े ही कितने हैं!

सूर्यास्त को चित्रस्थ करके लौटने लगे तो डॉ. मेजर स्वामी का फ़ोन आ गया. मैं तो भूल ही गया था कि आज दिनछिपे तो हमें पारनंदी निर्मला जी के यहाँ जाना है! 'ओह. बस पहुँचते ही हैं'. सब मिलकर निर्मला जी के आवास पहुँचे. अध्यापन की नौकरी से स्वेच्छा से विश्राम लेकर आजकल पारनंदी निर्मला जी तेलुगु से हिंदी अनुवाद के काम में लगी हुई हैं. बरसों पहले कभी मुलाक़ात हुई थी ; तभी से पत्राचार है. उनके पति गणित के प्रोफेसर हैं - अब अवकाश प्राप्त. बच्चे विदेश में हैं. ये दोनों यहाँ भाषा और साहित्य की सेवा में लगे हैं. शुगर आदि रोगों का वरदान प्राप्त निर्मला जी जाने मुझे क्या समझतीं रहीं हैं. मैंने सोचा भी नहीं था कि मुझे देख कर वे इतनी प्रमुदित, गद्गद , प्रफुल्लित और उतेजित हो जाएँगी. साथ गए सभी मित्र इस विदुषी लेखिका के भोलेपन पर निछावर थे . और मैं? मैं तो डूब ही गया था. उनके निकट फर्श पर बैठ गया मैं ; और वे अपनी अनूदित प्रकाशित और अप्रकाशित चीज़ें छोटे बच्चे की तरह निकाल निकाल कर, उलट पलट कर ,बीच बीच से खोल कर , पढ़ कर, मुझे देर तक दिखाती रहीं. बड़ा काम किया है उन्होंने. साठ से अधिक जिल्दों का अनुवाद किया है; मौलिक लेखन भी किया है हिंदी और तेलुगु दोनों में. रेखाचित्र भी बनाती हैं. एक बार उन्होंने मुझे सरस्वती की अनुकृति भेजी थी और आज महाभारत लिखते हुए गणेश जी का रेखाचित्र भेंट करना चाहती थीं. पति-पत्नी ने भीतर जाकर कुछ बात की और हाथोंहाथ उस चित्र की कई जीरोक्स प्रतियाँ कराके मंगाईं. सबको उनका यह स्नेह प्राप्त करने का सौभाग्य मिला.
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