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शनिवार, 16 मई 2009

वे अंतर्द्वंद्वों से अधिक अंतर्संबंधों में यकीन रखते थे



वे अंतर्द्वंद्वों से अधिक अंतर्संबंधों में यकीन रखते थे


"साहित्य संस्कृति का वहन भी करता है | चित्रकला में, शिल्पकला में, मूर्तिकला में, संगीत में (संस्कृति) उतनी मुखर हो कर नहीं आती जितनी साहित्य में | संस्कृति जो भी दिखाई पड़ती है साहित्य में ही मुखर हो कर दिखाई पड़ती है | क्योंकि सब लोग शब्द समझते हैं | सभी लोग रंगों के संकेत नहीं समझते, सभी लोग संगीत के सूक्ष्म संकेत नहीं समझते | लेकिन शब्द के संकेत अधिकतर लोग समझ जाते हैं | इसलिए संस्कृति सब से अधिक साहित्य के माध्यम से आती है | यह संस्कृति के लिए अनिवार्य है और भाषा मात्र जो है, संस्कृति है | भाषा जिस से व्यवहार है | व्यवहार के पीछे कौनसी प्रेरणा है ? छोटे-छोटे व्यवहार के पीछे कौनसी प्रेरणा है ? हम कहाँ से गिनती शुरू करते हैं ? (बाएँ अंगूठे से बाँई कनिष्ठा को स्पर्श करते हुए) यहाँ से गिनती शुरू करते हैं | उसके पीछे कोई न कोई हमारा एक भीतरी संकल्प है | मान लीजिये महत्वपूर्ण यानी सबसे छोटा है महत्त्वपूर्ण | और चाहे जापान देखिये , जर्मनी देखिये, वे सब यहाँ से (तर्जनी से मध्यमा का क्रम दिखाते हुए)शुरू करते हैं | .... तो छोटे से छोटे व्यवहार में भी जब संस्कृति आती है तो भाषा व्यवहार में तो आएगी ही |" ये विचार पंडित विद्यानिवास मिश्र के हैं जो उन्होंने २२ सितम्बर २००२ को लखनऊ में एक साक्षात्कार के दौरान व्यक्त किये थे | साक्षात्कार कर्ता हैं डॉ. कविता वाचक्नवी | यह लंबा साक्षात्कार तब से अप्रकाशित था | अब इसे 'हिंदुस्तानी त्रैमासिक' के पंडित विद्यानिवास मिश्र स्मृति विशेषांक(जुलाई-सितम्बर २००९) में प्रकाशित किया गया है | 'हिन्दुस्तानी' का यह विशेषांक पंडित विद्यानिवास मिश्र पर एक समग्र और प्रामाणिक पुस्तक की भांति संजों कर रखने लायक है तथा अक्षर पुरुष पंडित विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को सम्पूर्णता के साथ सामने रखता है | पंडित जी पर जो नए पुराने प्रकाशित-अप्रकाशित आलेख यहाँ प्रस्तुत हैं | उनमें स्मृति और समीक्षा दोनों के गहरे रंग शामिल हैं | ' जातीय स्मृति की धूपछाँह' में निर्मल वर्मा ने याद दिलाया है कि कुछ लेखकों का कृतित्व अंतर्द्वंद्वों की तपन से ऊर्जा प्राप्त करता है परन्तु विद्यानिवास जी ऐसे लेखक नहीं हैं क्योंकि वे अंतर्द्वंद्वों से अधिक अंतर्संबंधों में यकीन रखते थे | उन्होंने उनके निबंधों की काव्यात्मकता और रसमयता के साथ उनकी उदासी के तरफ भी ध्यान दिलाया है जिसपर काफी शोध हो सकता है |

डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी ने संस्कृत अंग्रेजी पर अधिकार और अपनी बोली भोजपुरी से सहज लगाव के बावजूद परिनिष्ठित हिंदी के प्रति विद्यानिवास मिश्र की निष्ठां को उनकी चारित्रिक दृद्धता का स्रोत माना है तो डॉ.रामनरेश त्रिपाठी ने उनके साथ बिताये वक्त को ही याद नहीं किया है उनकी जन्मकुंडली भी पेश करदी है | इस संस्मरण से यह भी पता चलता है की अंतिम समय तक कर्मक्षेत्र में डटे रहे विद्यानिवास जी पत्नी के निधन के बाद काफी टूट गए थे |

डॉ.एस के पाण्डेय ने पंडित विद्यानिवास मिश्र को संस्कृति पुरुष की संज्ञा देते हुए अन्य चर्चाओं के साथ-साथ उनकी कुछ सूक्तियों को भी सूचीबद्ध किया है जैसे "पारिवारिक साहचर्य भाव ही हमारे साहित्य की सबसे बड़ी थाती है |"(आँगन का पंछी) |

'शास्त्र और लोक के बीच' में अशोक वाजपयी ने कहा है और सही ही कहा है कि हिंदी में शास्त्रीय परंपरा का जैसा अधीत और आधुनिक अवगाहन जैसा विद्यानिवास जी ने किया वैसा किसी और ने नहीं | उन्होंने बताया है कि पंडित जी ने महाभारत, कालिदास और जयदेव पर जो लिखा है वह हिंदी आलोचना को सिर्फ हिंदी की ही नहीं समूची भारतीय परंपरा को देख समझ सकने की एक विधा बनता है | इसमें संदेह नहीं की पंडित जी की इस परंपरा को आगे विकसित किये बिना हिंदी आलोचना को समग्र भारतीय संस्कार का प्रतिनिधित्व करने की मान्यता नहीं मिल सकती |

डॉ.रामकमल राय ने पंडित जी को विद्या और विनय के संश्लेष के लिए याद किया है , तो मृदुला सिन्हा ने उनके बहाने भारतीय चिंतन और व्यवहार में नारी की स्थिति पर चर्चा की है और याद दिलाया है कि पंडित जी ने नारी जीवन की तुलना नदी से करते हुए नदी हो जाने में ही नारी जीवन की पूर्ण सार्थकता मानी है | यह भी स्मरणीय है की पंडित जी ने नदी, नारी और संस्कृति तीनों ही के प्रदूषित होने पर चिंता प्रकट की थी| वे सारे प्रदुषण के पीछे इस प्रदूषित दृष्टि को सक्रिय मानते थे कि नारी सहधर्मचारिणी न रहकर केवल शयनीय होती जा रही है |

प्रो.सिद्धेश्वर प्रसाद ने विद्यानिवास जी के भावलोक की यात्रा कराई है और प्रतिपादित किया है की उसमें गलदश्रु भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि यह पाखण्ड, ढोंग या अंधविश्वास का ही दूसरा पक्ष होता है | ध्यान रहे की अंधविश्वास केवल परंपरा के ही नहीं होते आधुनिकता के भी होते हैं | इसीलिए पंडित जी परंपरा और आधुनिकता दोनों से जुड़े अंधविश्वासों के विरुद्ध थे |

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने पंडित जी को हिंदी व लोक संस्कृति के अनन्य उपासक के रूप में देखा है और उनकी कई पुस्तकों के हवाले से यह प्रतिपादित किया है कि उनकी रचनाएं अपनी माटी केप्रति आगाध श्रद्धा, सच्ची सेवा भावना तथा अपनी संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा से ओत प्रोत हैं |

डॉ.सत्यदेव त्रिपाठी ने 'लागौ रंग हरी' व 'बूँद मिले सागर में' के आधार पर विद्यानिवास मिश्र के भक्तिकालीन रसबोध की विवेचना की है तो डॉ.मधुसुधन पाटिल ने मिश्र जी को मिश्र संस्कृति और लोक चेतना के चितेरे के रूप में व्याख्यित किया है | डॉ. सरोज सिंह ने उनके निबंधों में संस्कृति तत्व खोजा है तो प्रेमशंकर के आलेख में उनकी परंपरा विषयक दृष्टि की सूक्ष्म पड़ताल की गयी है | वागीश शुक्ल के आलेख 'पाणिनि की वर्णना की वर्णना' में यह बताया है कि मिश्र जी के अनुसार पाणिनीय व्यकारण की एक व्यवस्था पुनः निर्मित की जा सकती है | इसी क्रम में राजेश्वर प्रसाद ने पंडित जी के संस्मरणों को लेखनी बद्ध किया है तथा डॉ.आशा उपाध्याय ने उनकी सांस्कृतिक चेतना के विविध पक्ष उजागर किये हैं | परंपरा और इतिहास विषयक उनकी दृष्टि का विश्लेषण डॉ.क्षमाशंकर पाण्डेय ने किया है जबकि डॉ.कमलेश कुमार सिंह ने स्वयं को छितवन की छाँह तक सीमित रखा है | और इसमें निहित प्रेम के राग का परिचय दिया है |

पंडित विद्यानिवास मिश्र प्रकृति और संस्कृति में कोई मूलभूत भेद नहीं मानते थे यही कारण है की उनका तमाम संस्कृति चिंतन प्रकृति चिंतन से जुदा हुआ है | इस सन्दर्भ में डॉ. किरण शर्मा ने उनके निबंधों में वनस्पतियों के सन्दर्भों को भली प्रकार रेखांकित किया है |

विशेषांक में विदेश से प्रयाग के सुप्रसिद्ध भाषा विज्ञानी डॉ.उदेनारायण तिवारी के नाम भेजे गए मिश्र जी के चार पत्र भी शामिल हैं | इनमें से ४ दिसम्बर १९६७ को सिएटल से लिखे पत्र में उन्होंने यह बहुत महत्त्वपूर्ण सुझाव दिया था कि क्योंकि भाषा विज्ञान के क्षेत्र में इस समय सबसे ज्यादा हलचल युरोप में है इसलिए कुछ लोगों को भारत से वहां भेजना चाहिए तथा कुछ लोगों को भारत आमंत्रित करना चाहिए | इस पत्र में उन्होंने यह इच्छा भी प्रकट की थी कि उत्तर भारत में भाषा विज्ञान का अच्छा केंद्र स्थापित होना चाहिए | इसी प्रकार २७ फ़रवरी १९६८ के पत्र में उन्होंने दो काम करने की चाह जताई थी - एक तो पाणिनीय पद्धति के प्रयोग का काम भारतीय भाषाओँ के भाषांतर व्याकरण पर किया जाए और दुसरे हिंदी का जनपदीय कोष प्रस्तुत किया जाए | निश्चय ही , यदि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और हिंदी जगत उनके इन दो सपनों को पूरा करने की दिशा में कुछ करके दिखाए, तब तो लगेगा कि हाँ इन्होनें पंडित जी की इच्छाओं का मान रखा है !O
हिन्दुस्तानी (त्रैमासिक) पंडित विद्यानिवास मिश्र स्मृति विशेषांक / जुलाई-सितम्बर २००९ / सम्पादक : डॉ..एस.के.पाण्डेय / हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद / मूल्य - ३० रुपये / पृष्ठ : ११२

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