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शुक्रवार, 8 मई 2009

आदर्श नारी का मुखौटा नोंचकर चल पडूँ !*


इंदिरा शबनम ‘इंदु’ काफ़ी समय से सिंधी, उर्दू और हिंदी में कविताएँ और कहानियाँ लिखती रही हैं। उनकी ग्यारह पुस्तकें इन भाषाओं में प्रकाशित हैं, जिनमें से दस को किसी-न-किसी पुरस्कार या सम्मान से नवाज़ा गया है अभिप्राय यह है कि सिंधी भाषी हिंदी रचनाकार के रूप में उन्हें पर्याप्त स्वीकृति और प्रशंसा प्राप्त हुई है।

अपने नए कथा-संग्रह ‘ज़मीर अपना-अपना’ (2008) में इंदु ने तेरह कहानियाँ प्रस्तुत की हैं। इन कहानियों में उन्होंने समाज की ऐसी विकट और विद्रूप सूरत को बेपरदा किया है जिसके बारे में सोचकर भी साधारण पाठक की रूह काँप उठती है। लेखिका ने इन स्थितियों को वास्तविक जीवन की स्थितियाँ कहा है, लेकिन पाठक को अनेक स्थलों पर अतिरंजना का आभास हो सकता है।

अतिरंजित यथार्थ की दृष्टि से 'चंदू' शीर्षक कहानी का उल्लेख किया जा सकता है। इस कहानी को एक पचहत्तर वर्षीय वृद्ध की स्मृतियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कुछ ऐसी फ़िल्मी अथवा नाटकीय घटनाएँ संयोजित की गई हैं कि अपनी युवावस्था में इस भले आदमी ने जिस स्त्री के साथ चोरी छुपे प्रेम संबंध स्थापित किया, उसी की लड़की से विवाह करके संतानें पैदा की। अधेड़ उम्र में फिर उसी स्त्री अर्थात् सास के विधवा होने पर पुनः पुराने प्यार को दोहराया। इतना ही नहीं, पचहत्तर वर्ष की आयु में पत्नी की मौसी से भी इश्क फर्माया। इन सब हालात में पत्नी का तो स्वर्ग सिधार जाना स्वाभाविक ही था। लेकिन पाठक को लगता है कि वह स्वयं क्यों स्वर्ग नहीं सिधार गया। कहा जा सकता है कि ऐसी कहानी के माध्यम से समाज की और पुरुष मानसिकता की एक विकृति को उजागर किया गया है। लेकिन विकृति का यह चित्रण ऐसी मानसिकता के मूल में निहित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों की पड़ताल करता प्रतीत नहीं होता।

ऐसी ही भीषण विकृति का विस्तार ‘दो माँ’ शीर्षक कहानी में भी दिखाई देता है। येखड़ा जेल में उम्र कैद काट रही पार्वती दीदी का सात्विक चेहरा देखकर किसी को भी उनके अपराध की गंभीरता का एहसास नहीं होता। निर्दोष और पाप रहित चेहरा। बड़ी-बड़ी पाप मुक्त आँखें। लेकिन उन्होंने हत्या जैसा अपराध किया था। पाठक की अदालत में ऐसे अपराध को अपराध नहीं माना जाएगा। पार्वती का पति वासना लोलुप वहशी भेड़िया था जिसकी भूख पत्नी की देह से शांत नहीं होती थी। वह घर में अन्य स्त्री के साथ ही व्यभिचार नहीं करता था बल्कि अपनी पु़त्री जानकी से बलात्कार में भी लिप्त हो गया था। (पता नहीं क्यों बहुत सारे लेखक - लेखिका बलात्कार की शिकार महिलाओं का नाम जानकी या सीता रखते हैं जब कि इससे पाठकों की सांस्कृतिक भावना को ठेस पहुँचती है!) खैर ऐसे नर पशु की हत्या करके पार्वती ने कुछ बुरा नहीं किया था। काश उसने हत्या के इस मूल कारण को न्यायालय में उद्घाटित कर दिया होता तो भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत उसे अपराध मुक्त माना जा सकता था। लेकिन लेखिका ने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे परिवार की तथाकथित मर्यादा और बेटी के सम्मान की चिंता अधिक थी। शायद यही स्त्री जीवन की वह विडम्बना है जो पुरुष को और अधिक पशु बनने के लिए प्रेरित करती रहती है।

लेखिका ने आत्मकथ्य में साफ कहा है कि ‘‘मैं स्त्रीवादी होने में कतई विश्वास नहीं रखती पुरुष की बेहद इज़्ज़त तथा आधार विश्वास रखती हूँ। (शायद वाक्य में कुछ मुद्रण दोष है)| अपने भाइयों, पति, बेटे से बेहद प्यार, इज़्ज़त, इबादत की भावना है मेरे भीतर। हाँ, बचपन से लेकर स्वावलंबी, अपने मूल्यों पर और अपने अस्तित्व को कायम रखने का जज़्बा हूँ। (फिर मुद्रण दोष)। नारी केवल एक शरीर नहीं है,बहन, बेटी, और एक अच्छी दोस्त रह सकती है। स्त्री होना परेशानी, पशेमानी, शर्मसारी, अबला, बिचारी, अनचाहा बोझ नहीं है। गर्व, नाज़ की बात है। वैसा जीवन जीना चाहिए। स्त्री होने की सब मर्यादाएँ पालन करके, हो सके तो समस्त परिवार, समाज, विश्व को साथ लेकर चलने की शक्ति परमात्मा ने नारी को सौगात के रूप दी है। अपनी इस सौगात को शान से उपयोग करना चाहिए।’’

कहना न होगा कि स्त्री विमर्श की यह सीमित व्याख्या है और मर्यादा के पारंपरिक दबाव के समक्ष कुछ ज्यादा ही दब गई है। लेकिन पुरुष जाति के प्रति इतना सम्मान रखनेवाली लेखिका यदि व्यभिचारी और परस्त्रीगामी ही नहीं, माँ और बेटी जैसे संबंधों को कलंकित करनेवाले चरित्र रच रही है, तो यह निश्चत ही कहीं न कहीं पुरुष की तथाकथित महानता के प्रति मोहभंग का सूचक है।

जीवन के घात-प्रतिघात मनुष्य को अक्सर नियतिवादी बना देते है। इंदिरा इंदु के पात्र भी इसका अपवाद नहीं हैं। यही तो कारण है कि ‘दहलीज’ की ‘मैं’ कभी भी घर की चैखट न लांघ पाई थी। भले ही उसकी इच्छा बहुत बार हुई कि ‘‘आदर्श नारी का मुखौटा नोंचकर चल पडूँ | ऐसी डगर पर जहाँ मैं भी आजादी की चंद सांसें ले सकूँ।’’ पर ऐसा कभी हुआ नहीं। ‘विक्षिप्त’ मूल्यों की गलत समझ का नतीजा है जो संस्कारी पिता के पाप बोध से ग्रस्त बच्चे को छोटे बच्चों के बलात्कार और हत्या का अपराधी बना देता है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘ज़मीर अपना-अपना’ भी पारिवारिक रिश्तों के बिगड़ने की कहानी है। पे्रम और विवाह का द्वंद्व तथा उचित-अनुचित का अविवेक इस कहानी के केंद्र में है। इस कहानी की ‘मैं’ को अपने सही होने का पूरा यकीन है, भले ही उसे कोई गलत समझता रहे। वह अपनी अंतरात्मा की आवाज को सर्वोपरि मानती है। अब यह अलग बात है कि एक व्यक्ति की अंतरात्मा जिसे सही मानती है, दूसरे की अंतरात्मा को वही गलत लगता हो। यहीं प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में करणीय क्या है ? वह जो एक की अंतरात्मा का सत्य है और दूसरी का विरोधी, या कोई ऐसा धरातल भी हो सकता है जहाँ अंतरात्माओं का पारस्परिक विरोध थम जाए ? यदि सच में ऐसा कोई धरातल है तो वही करणीय है, धर्म है, क्योंकि सच्चा धर्म अविरोधी होता है।

अंततः यह कहना आवश्यक है कि लेखिका ने इन कहानियों के माध्यम से कुछ बेहद बुनियादी और इंसानी सवाल उठाए हैं| ‘बेघर’ के एक ऐसे ही अंश के साथ इस चर्चा को समेटा जा सकता है -

‘‘मेरे मन में अब बार-बार ही सवाल उठता है। क्या अब इस दुनिया में सच्चाई, भरोसा, रिश्ते, अपनापन कुछ भी नहीं बचा है ? अगर बचा है, तो यह एक अदद घर की तलाश इतने सारे लोगों में क्यों आ गई है ? कहीं वे अपना घर छोड़कर न जाने क्या पाने, क्या हासिल करने घरों से भागते हैं ? लुटते-लुटाते रहते हैं। यह एक बहुत ही, समाज का, ललकार से भरा हुआ प्रश्न मेरे मन के अंदर खलबली मचा रहा हैं। मैं इन सवालों के जवाब खुद ढूँढ़ने की कोशिश कर रही हूँ।’’

वस्तुतः लेखिका ने पाठकों को ऐसे सवालों से दो-चार कराने के लिए ही ये कथाएँ चुनी और बुनी हैं। आशा है, हिंदी जगत् इनकी ओर ध्यान देगा।

*ज़मीर अपना-अपना (कथा-संग्रह)/ इंदिरा शबनम् इंदु/ 9 ब ‘मयूरबन’ अपार्टमेंट, 1100 शिवाजीनगर, मॉडल कॉलोनी, पुणे - 411 016/ 2008/ मूल्य रु. 75/ पृष्ठ 86 (सजिल्द)|

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