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सोमवार, 25 मई 2009

आने वाला समय हिंदी का है*



बहुभाषिकता की दृष्टि से भारत संभवतः विश्व भर में सर्वाधिक विविधताओं और विचित्रताओं वाला देश है। हजारों मातृभाषाएँ यहाँ हजारों साल से बोली जाती हैं। भिन्न भाषा भाषियों के बीच परस्पर संवाद के लिए अलग-अलग स्तरों पर कोई-न-कोई भाषा संपर्क भाषा की जिम्मेदारी निभाती दिखाई देती है। विशाल आर्यावर्त की जिस धार्मिक और सांस्कृतिक एकता की प्रायः चर्चा की जाती है उसका आधार संभवतः ऐसी संपर्क भाषा रही होगी जिसके माध्यम से देश भर में पर्यटन, तीर्थाटन और व्यापार-व्यवसाय करनेवाले परस्पर विचार-विनिमय करते रहे होंगे। पहले संस्कृत और फिर हिंदी के जनपदसुखबोध्य रूप ने यह भूमिका निभाई।


भाषा-संपर्क और संपर्क-भाषा की यह प्रक्रिया बहु-भाषी समाज में हजारों-हजार वर्षों से सहज भाव से चल रही थी। जब-जब कोई भी जन जागरण आंदोलन छिड़ा या किसी भी धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक लोकनायक ने संपूर्ण देश को एक साथ संबोधित करना चाहा, तब-तब उन आंदोलनों और लोकनायकों ने उस काल की संपर्क भाषा को अपनाया। यही आवश्यकता 19वीं-20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों ने अनुभव की और निर्विवाद रूप से हिंदी को व्यापक जनसंपर्क के लिए सर्वाधिक समर्थ भाषा के रूप में पाया और स्वीकार किया। महात्मा गाँधी और उनके समकालीनों ने इसीलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की। बाद में भारतीय संविधान में भी भारत की बहुभाषिकता को आठवीं अनुसूची के माध्यम से स्वीकार करते हुए हिंदी को अनुच्छेद 343 से 351 तक के द्वारा सैद्धांतिक रूप से भारत संघ की राजभाषा माना गया। राजनैतिक कारणों से भले ही आज तक उन प्रावधानों को व्यावहारिक रूप न प्राप्त हो सका हो, इसमें संदेह नहीं कि संपूर्ण देश में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी सहजतापूर्वक व्यावहारिक स्तर पर प्रचलन में है, स्वीकृत है और नई-नई चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है।


बहुभाषिक समाज में किसी भाषा का संप्रेषण घनत्व सर्वत्र एक जैसा नहीं होता बल्कि एक भाषा क्षेत्र से दूसरे भाषा क्षेत्र के संपर्क में आने के क्षितिजों पर वह काफी बदलता है। फिर भी भारतीय भाषाओं के दो मुख्य परिवारों के जो अनेक रूप उत्तर और दक्षिण में प्रचलित हैं, भाषा संपर्क की प्रक्रिया में उनके बीच काफी लेन-देन होता रहा है। इतना ही नहीं, दोनों वर्गों में संस्कृत से आए अर्थात् सम-स्रोतीय शब्दों का प्रतिशत बहुत बड़ा है। सम-स्रोतीय शब्दावली का यह प्राचुर्य यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि मूलतः आर्य और द्रविड भाषाएँ सजातीय हैं। इस सजातीयता का एक प्रमाण इन सारी भाषाओं में वर्णमाला की लगभग समरूपता में निहित है। तमिल जैसी सबसे छोटी वर्णमाला में भी हिंदी की भाँति ही स्वर और व्यंजन समान क्रम में हैं तथा व्यंजनों को क, च, ट, त, प वर्गों के क्रम में रखा गया है - भले ही चार-चार ध्वनियों के लिए एक लिपि चिह्न हो। आधारभूत शब्दावली और वर्णमाला की इस समानता के कारण लंबे समय से एक संपर्क लिपि या राष्ट्र लिपि की भी आवश्यकता अनुभव की जाती रही है। जिस प्रकार सब भारतीय भाषाओं के अपनी-अपनी जगह सुरक्षित रहते हुए हिंदी उनके बीच संवाद के लिए संपर्क भाषा का काम करती है, उसी प्रकार इन सब भाषाओं की अपनी लिपियों को सुरक्षित रखते हुए यदि संपर्क की सुविधा को ध्यान में रखकर देवनागरी लिपि को भी स्वीकार कर लिए जाए तो अखिल भारतीय भाषिक संपर्क में अधिक घनिष्ठता आ सकती है। राष्ट्रीयता की भावना से पे्ररित भारतीय जनता व्यापक संपर्क की इन प्रणालियों (संपर्क भाषा और संपर्क लिपि) को सहजतापूर्वक स्वीकार कर सकती है, परंतु समय-असमय विकराल रूप में सामने आकर शुद्ध राजनैतिक स्वार्थ ऐसे तमाम प्रयासों में पलीता लगा देते हैं!


भारतीय बहुभाषिकता के संदर्भ में उपस्थित होनेवाले इन सब मुद्दों पर डॉ. राजेंद्र मिश्र ने अपनी कृति ‘संपर्क भाषा और लिपि’ (2008) में विस्तार से चर्चा की हैं। डॉ. राजेंद्र मिश्र कवि, कथाकार, समालोचक और शिक्षक के रूप में समादृत हैं और उनकी 45 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे हिंदी भाषा चिंतन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की योजना में वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण भारत के उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों की यात्रा भी कर चुके हैं। साथ ही अखिल भारतीय नागरी लिपि परिषद् से वे सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। प्रस्तुत पुस्तक उनके व्यापक अनुभव और चिंतन का परिणाम है; और प्रमाण भी।


‘संपर्क भाषा और लिपि’ में संकलित 21 निबंधों में भाषा और लिपि के संबंध में लेखक की विचारधारा भली प्रकार मुखरित हुई है। उनका मानना है कि भारत की भाषा समस्या इतनी उलझ गई है कि भाषा का सवाल भी अब राजनीति से नहीं एक जन चेतना से ही हल हो सकता है। ध्यान देने की बात यह है कि कुछ लोग आज भी यह सोचते हैं कि अंग्रेज़ी ही भारत की संपर्क भाषा हो सकती है। उन्हें यह जान लेना होगा कि कोई भी विदेशी भाषा हमारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संपदा की सुरक्षा के लिए हमें अपनी भाषाओं के साथ ही एक संपर्क भाषा का भी विकास करना होगा। यह भाषा हिंदी ही हो सकती है। प्रायः यह कहा जाता है कि भूमंडलीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारण दुनिया के उन मुल्कों में भी अंग्रेज़ी का महत्व बढ़ रहा है जहाँ दो दशक पहले तक उसका प्रयोग नहीं होता था। लेकिन ध्यान देने की जरूरत है कि ऐसे देशों में उनकी अपनी भाषाओं को उचित स्थान प्राप्त है। इसलिए वहाँ की भाषाओं को अंग्रेज़ी से कोई खतरा नहीं है। वैसे भी किसी अन्य देश की तुलना भारत के बहुभाषिक परिदृश्य से नहीं की जा सकती। डॉ। राजेंद्र मिश्र याद दिलाते हैं कि बहुभाषिक यथार्थ का एक अकाट्य सत्य यह है कि भारत में हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसे बहुसंख्यक भारतवासी बोलते हैं, समझते हैं। वही एक से अधिक प्रांतों की भाषा है। आजादी के बाद हिंदी का साहित्य बढ़ा है। उसके कोशों का विस्तार हुआ है। उसमें नए शब्दों का निर्माण हुआ है। आज वह संसार में सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा है। उसका अंतरभारतीय स्वरूप ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय रूप भी विकसित हुआ है। एशिया ही नहीं यूरोप और अमेरिका के देशों में भी हिंदी समझनेवाले लोग हैं। भारत के विशाल बाज़ार में प्रवेश के लिए उसे जनसंचार माध्यमों में अपनाया गया है। विज्ञापनों से लेकर अंग्रेज़ी के प्रसारणों तक को व्यापक जनता तक पहुँचाने के लिए हिंदी में ‘डब’ किया जाता है। प्रायः कहा जाता है कि आनेवाले समय में वही भाषाएँ जीवित रहेंगी जो बाज़ार की भाषाएँ होंगी। इस कसौटी पर हिंदी दुनिया के सबसे बड़े बाज़ार की संपर्क भाषा है। अतः उसका भविष्य सुरक्षित है।



कनफ्यूशियस ने शताब्दियों पहले कहा था कि यदि मुझे बिगड़ी हुई चीजों को सुधारना हो तो सबसे पहले मैं भाषा को सुधारूँगा क्योंकि इसके बिना मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। राजेंद्र मिश्र भी यही मानते हैं और उन्हें भी अनेक भाषा पे्रमियों की तरह यह लगता है कि आज का मीडिया, खासकर टेलीविजन, भाषा को बिगाड़ रहा है। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी को अंधाधुंध अंग्रेज़ीमय बनाने की मुहिम हिंदी को कमजोर बनाती है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम बहुभाषिक समाज के सामाजिक यथार्थ से आँख मूँद लें और भाषा संपर्क के परिणामस्वरूप होनेवाले भाषा विकास का मार्ग अवरुद्ध कर दें। भाषा मिश्रण और भाषा परिवर्तन की अपनी शर्तें हैं। यदि उन शर्तों के अनुरूप हिंदी में अंग्रेज़ी का मिश्रण हो रहा है तो यह स्वागत के योग्य है क्योंकि इससे उसकी अपने लक्ष्य भाषा उपभोक्ता वर्ग के बीच संपे्रषणीयता बढ़ रही है। भाषा के आधुनिकीकरण को शुद्धतावाद के नाम पर रोका जाना श्रेयस्कर नहीं होगा।


डॉ. राजेंद्र मिश्र ने भारत की भाषा समस्या के विविध पक्षों पर विचार करते हुए भाषाई अस्मिता का सवाल भी उठाया है और प्रयोजनीयता का भी। संपर्क लिपि के रूप में उन्होंने देवनागरी की जमकर वकालत की है और अखिल भारतीय स्तर पर सर्वमान्य नीति के विकास की जरूरत बताई है। लिपि प्रौद्योगिकी के संदर्भ में कंप्यूटर पर हिंदी और देवनागरी के प्रयोग की आवश्यकता, संभावना और सीमा का भी खुलासा किया गया है। ध्यान रहे कि पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी से परिवर्तन हुए हैं तथा कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग तीव्र गति से बढ़ा है। अब तो कंप्यूटर को निर्देश देने और ब्राउज़र तक की सुविधा हिंदी में उपलब्ध है। विभिन्न विषयों का ज्ञान-विज्ञान डिजिटल रूप में हिंदी में आ रहा है। भारत में जब व्यापक रूप में कंप्यूटर आरंभ किया गया उस समय सरकार की जल्दीबाजी के कारण भारतीय भाषाओं के लिए अपने फांट की प्रतीक्षा नहीं की गई जिसके कारण काफी अराजकता कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग में देखी जाती है। परंतु अब यूनिकोड की उपलब्धता और कोड परिवर्तकों की खोज ने इस समस्या को बड़ी सीमा तक सुलझा दिया है। इसका अभिप्राय है कि कंप्यूटर पर हिंदी के प्रयोग के लिए अब आसमान दूर-दूर तक खुला है। यहाँ फिर दोहरना होगा कि भविष्य की विश्व भाषाओं के लिए यह भी एक शर्त समझी जाती है कि वे कंप्यूटर की भाषा हों। हिंदी इस कसौटी पर भी खरी उतर रही है। इसलिए आनेवाला समय हिंदी का समय है।


डॉ. राजेंद्र मिश्र ने हिंदी के कल, आज और कल से जुड़े प्रश्नों पर अपनी दो टूक राय ‘'संपर्क भाषा और लिपि’' में लिपिबद्ध की है। उनका यह चिंतन मनन भारत की भाषा समस्या के रूप में फैल धुंधलके को काटने का सार्थक प्रयास है। हिंदी जगत इस कृति का स्वागत करेगा, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।

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* संपर्कभाषा और लिपि / डॉ। राजेन्द्र मिश्र / २००८ / दिशा प्रकाशन ,१३८/१६, त्रिनगर , दिल्ली - ११००३५ / १५० रुपये / १३६ पृष्ठ [ सजिल्द]
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