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बुधवार, 1 अप्रैल 2009

हैदराबादी बिरयानी में मिथिला के मसाले*





कहानियाँ हमारे भीतर भी होती हैं और बाहर भी। सब तरफ जाने कितनी कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं! संवेदनशील रचनाकार इन कहानियों पर अपनी कल्पना का रंग चढ़ाकर इन्हें साहित्य का रूप दे देता है। सामाजिक संबंधों की विपुलता, अनुभवों की विशदता, अनुभूति की गहनता और अभिव्यक्ति की छटपटाहट से मिलकर बनती है कहानियाँ। जिसने जीवन को, समाज को, संसार को और सबसे महत्वपूर्ण है कि मनुष्य को जितने निकट से, जितने कोणों से और जितनी गहराई से देखा, जाना और परखा हो, वह उतनी ही तरह-तरह की कहानियाँ लिखने में सफल रहता है।


हैदराबाद की लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र (1948) भी एक ऐसी ही अनुभवों की धनी कलमकार हैं। उन्होंने अपने वैविध्यपूर्ण अनुभवों की थाती को कथारस में भिगोकर हिंदी साहित्य जगत् को ‘मेरी इक्यावन कहानियाँ’ (2009) समर्पित की हैं। एक कहानीकार के रूप में अहिल्या जी समकालीन कहानी की अनेक प्रवृत्तियों से असंतुष्ट और क्षुब्ध दिखाई देती हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि समकालीनता के नाम पर आजकल साहित्य में सामाजिक संघटन को विघटित करने, राष्ट्रीयता को ध्वस्त करने तथा देश के छोटे-से-छोटे गाँव से लेकर राजधानी तक को वर्ग, वर्ण, जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर लगभग गृहयुद्ध जैसी स्थिति में झोंकने का षडयंत्र चल रहा है। इससे साहित्य के मूल धर्म की क्षति उन्हें चिंतनीय प्रतीत होती है। कलमकारों का संस्कृति की रक्षा के स्थान पर उसके क्षरण में प्रवृत्त होना भी उन्होंने लक्षित किया है और यह चाहा है कि साहित्य लोकमंगल का पक्ष लेते हुए मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु समर्पित हो। इन मानवीय मूल्यों में सत्य, पे्रम, क्षमा, दया, करुणा, स्नेह, अनुराग, वात्सल्य, धीरता, वीरता, अहिंसा, औदार्य, मैत्री, सहयोग, संयम, कर्तव्यपालन, व्यवहार माधुर्य और सर्वभूत हितौषिता जैसे लोक हितकारी मनोभाव लक्षित किए जा सकते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ यथार्थ के धरातल पर स्थापित होने के बावजूद मनुष्य के विदू्रप स्वरूप के स्थान पर उसके आदर्श सौंदर्य को उकेरती हुई प्रतीत होती हैं।


अहिल्या मिश्र की कहानियों में गाँव और शहर का द्वंद्व परिवेश और मानसिकता दोनों ही स्तरों पर दिखाई देता है। उनका लेखकीय मन हैदराबाद जैसे महानगर में रहने के बाद भी मिथिलांचल के लिए तड़पता है। शहरी जीवन की आपाधापी, प्रदर्शनप्रियता और औपचारिकता पर उन्होंने अनेक स्थलों पर व्यंग्य किया है तथा सहज मानवीय संबंधों की सर्वोपरिता को बार-बार प्रतिपादित किया है। दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के व्यक्तिगत अहं के कारण पड़नेवाली दरार उनकी कई कहानियों में दिखाई देती है लेकिन अनेक स्वनामधन्य स्त्रीवादी लेखिकाओं से अहिल्या मिश्र इस अर्थ में भिन्न हंै कि वे इस अहं के विस्फोट में रिश्तों और घर को चकनाचूर नहीं करती बल्कि किसी-न-किसी संवेदन बिंदु से स्नेह की डोर को अटका देती हैं और स्त्री-पुरुष के मध्य संतुलन खोज लेती हैं।


अहिल्या मिश्र की कहानियाँ कल और आज में बहुत सहजता से आवाजाही करती प्रतीत होती हंै। स्मृतियों का उनके पास अकूत खजाना है। ये स्मृतियाँ उनके पात्रों के जीवन में रह-रहकर आती हैं और उनके मानस को कुरेदती हैं। यही कारण है कि अनेक पात्र अपने जीवन का पुनरवलोकन और मूल्यांकन करते प्रतीत होते हैं। ये स्मृतियाँ पात्रों के आत्मसाक्षात्कार का आधार भी बनी हैं और किसी प्रस्थानबिंदु पर निर्णय की पे्ररणा भी। जीवनानुभव के मंथन से ऐसे अवसरों पर उन्होंने महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी निकाले है। उदाहरण के लिए, पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा के नाम पर निश्छल पे्रम की बलि देकर पे्रमहीन गृहस्थ जीवन अपनाने को उन्होंने फाँसी का फंदा पहनने जैसी मूर्खता माना है। इससे यह भी पता चलता है कि परिवार व्यवस्था की समर्थक होते हुए भी वे उसके दोषों से आँख नहीं फेरतीं और ऐसे विवाह को अवैध मानती है जिसमें लड़की को जानवरों सा बाँध-छाँदकर सात फेरों में कैद कर दिया जाता है। इसके व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों और परिणामों की चर्चा उनकी कई सारी कहानियों में मिलती है।


‘मेरी इक्यावन कहानियाँ’ पर यदि इस दृष्टि से विचार किया जाए कि किस कहानी के लिए लेखिका ने अपने आस-पास की किस स्त्री या किस घटना से पे्ररणा प्राप्त भी है, तो काफी रोचक जानकारियाँ सामने आ सकती हैं। ऐसा कहने का आधार यह है कि इन कहानियों को पढ़ते समय कई परिचित चेहरे और जीवन स्मृतियों में चक्कर मारने लगते हैं। स्मृतियों के साथ अहिल्या जी ने विस्मृति के दलदल को भी बखूबी समेटा है। हैदराबाद की एक व्यस्त सड़क पर गाउन पहने, गले में दुपट्टा डाले तेजी से चली जा रही प्रो. मति को कहानी का पात्र होते हुए भी सहज ही पहचाना जा सकता है। यह पहचान तब और भी गहरी हो जाती है जब जया सत्या को बताती है कि ‘‘अगर तुम इनकी आवाज सुन लोगी तो मंत्रमुग्ध हो जाओगी। मधुरवाणी इनके व्यक्तित्व का मुख्य अंग है। मीठी आवाज इनकी पहचान है। हँसमुख चेहरा लिए सभी से प्यार से मिलना इनकी आदत है।’’ प्रो. मति के मित्र और छात्र इतने से परिचय से उन्हें साफ पहचान लेंगे। उनका दोहन करनेवाले साहित्य जगत् के ठेकेदार प्रीत की गतिविधियाँ भी हैदराबाद के हिंदी जगत् की रोज की देखी भाली गतिविधियाँ हैं। प्रो. मति अब इस स्वार्थी संसार में नहीं हंै। पता नहीं, उन्हें पता भी है कि नहीं कि किसी ने उन्हें कहानी बना दिया!

डॉ. अहिल्या मिश्र की इन कहानियों की विषयवस्तु जिस तरह दैनंदिन जीवन से उठाई गई है, परिवेश और भाषा भी बड़ी सीमा तक वहीं से गृहीत है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, मिथिलांचल लेखिका का पीछा नहीं छोड़ता - पीहर ने कभी किसी स्त्री का पीछा छोड़ा है! यही कारण है कि वे अनेक स्थलों पर अपनी कहानियों में मैथिल परंपरा और मान्यताओं पर विस्तार से प्रकाश डालती हंै और मैथिली भाषा के संवाद रचती है। इससे इन कहानियों को वास्तव में वैशिष्ट्य प्राप्त हुआ है। अधिक कुछ कहने की अपेक्षा पाठकों को मैथिली भाषा के संवादों का आस्वादन कराना उचित होगा -


1. ‘‘हे चौदहवीं का चान। अहाँ के पाविक हम धन्य भेलहुँ। जतेक अहाँ के रूप क चर्चा सुनल हूँ। ताहि से कही बेशी अहाँ सुनर छी। सभा गाछी में नई जइतहुँ न एहन कमलक फूल कहाँ पवितहूँ।’’


2. ‘‘कि भेलैया से हमारा नई बूझि परइत अछि, लेकिन बद्री कोनो उत्पात मचैने छै। ओकर सब दिन के ई आदैत छै। कि करवा तो जाक आराम कर, बड़की दुल्हिन छथिन ने ऊ बात सम्हाइर लेथिन्ह।’’


3. ‘‘अरे कोई है ब्ई कि नई, कनि देखियऊ बच्ची कियक कानि रहल छैक। ऐन साब कोई कियक छोड़ि दैते जाई छैयक। कतेक जुगुत जतन सँ भगवान ई दिन देखैलैथ अछि। बचिया कनैइत कनैइत अपसियाँत भेल है, आ केकरो कान पर जूँ नहीं रेंग रहल आछि। हे गंभारीवाली ई सब छोरि क देखहक त बचिया के। कने ओकरा एने उठैने आबा।’’


निस्संदेह लोकसंस्कृति और जनभाषा के प्रयोग ने अहिल्या मिश्र की कहानियों को मौलिक व्यक्तित्व प्रदान किया है। हिंदी जगत में इनका स्वागत होगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

* मेरी इक्यावन कहानियाँ / डॉ. अहिल्या मिश्र / गीता प्रकाशन ,हैदराबाद / २००९ / ५०० रुपए / २९६ पृष्ठ.

5 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

अच्छी जान्कारी दी है।आभार।

संगीता पुरी ने कहा…

सुंदर जानकारी दी आपने ... धन्‍यवाद।

अनाम ने कहा…

rishabhdev ji namaskar, plz apna address khushboo2007@raddif.com per dijiye, pushpam patram bhijwana hai.

Kavita Vachaknavee ने कहा…

अच्छा पुस्तक परिचय।
लेखिका को बधाई!

मैथिल मसालों वाली बिरयानी की `khushboo' यहाँ तक आ रही है।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी की ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ के बाद अब डॊ. अहिल्या मिश्र की ‘मेरी इक्यावन कहानियां’ ...भई वाह!!!!....धन्यवाद डॊ. ऋषभदेव शर्मा जी, इस अनमोल पुस्तक से परिचय कराने का।