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गुरुवार, 26 मार्च 2009

हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक




पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा

हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक






यह संभव है कि विश्व की रचना किसी ईश्वर ने की हो , फिर भी यह तयशुदा है कि इसमें निहित वस्तुओं को नाम हम मनुष्यों ने दिए हैं और इसी से ये वस्तुएं हमारी चेतना का अंग बन पाई हैं. अलग अलग शब्दों में भारतीय भाषा चिंतन में यह दोहराया गया है कि हमारी शब्दावली को हमारे बाहरी और भीतरी विकास के साथ कदम से कदम मिला कर चलना पड़ता है. ऐसा न होने पर हमारी संकल्पनात्मक शक्ति धुंधली और अस्पष्ट होने लगती है.इस बात को आधुनिक भाषा चिंतकों ने भी माना है कि किसी समाज की प्रगति उसकी भाषा के आधुनिकीकरण से ही निर्धारित और निर्दिष्ट होती है. इसलिए भाषा विकास की यात्रा में हमें अपनी विरासत को संभालते हुए नै चुनौतियों के अनुरूप परिवर्तनों को आत्मसात करते चलना पड़ता है. हिन्दी इन दोनों पक्षों का संतुलन साधने में सक्षम होने के कारण ही स्थानीयता और वैश्विकता की शर्तों को एक साथ पूरा कर रही है..इसके लिए वह एक ओर जहाँ सस्कृत और लोकभाषा में निहित अपनी जड़ों से जुडी हुई है ,वहीं दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान विज्ञान और व्यापार वाणिज्य के निमित्त अन्य देशी विदेशी भाषाओँ से भी शब्द ग्रहण करने में परहेज़ नहीं करती.


प्रो. दिलीप सिंह [१९५१] ने अपने ग्रन्थ ''हिन्दी भाषा चिंतन'' में हिन्दी भाषा के इस सतत विकासमान स्वरूप का सम्यक भाषावैज्ञानिक विवेचन किया है.


ग्रन्थ के पहले खंड 'धरोहर' में हिंदी के शब्द संसार की व्यापकता और शक्ति को डॉ. रघुवीर के कोष पर पुनर्विचार के सहारे रेखांकित करने के बाद हिन्दी व्याकरण के तीनों कालों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया है. विषद व्याकरण की ज़रुरत बताते हुए लेखक ने सावधान किया है कि हमें एक तो केवल स्थितियों को नियंत्रित करनेवाले भाषा के कामचलाऊ स्टार से बचना होगा तथा दूसरे,सामर्थ्यहीन, बनावटी, निर्जीव और संकीर्ण भाषा और शुद्धतावादी दृष्टिकोण के प्रति भी सावधान रहना होगा. ठीक भी है , वरना भाषा तो अपनी गति से प्रगति करती पहेगी और व्याकरण जड़ होकर पिछड़ जाएगा. यहीं लिखत और मौखिक भाषारूपों की भी चर्चा की गई है. इस खंड की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में हिन्दीभाषा विज्ञान में महिलाओं के योगदान के मूल्यांकन की चर्चा की जा सकती है.एक सुलझे हुए समाजभाषावैज्ञानिक के रूप में लेखक ने इस मूल्यांकन द्वारा स्त्री-विमर्श को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा है।


दूसरे खंड में समाज भाषा विज्ञान के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए भाषा प्रयोग की दिशाओं का जायजा लिया गया है. तीसरा खंड मानकीकरण को समर्पित है जबकि चौथे खंड में हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दो मुद्दे उठाए गए हैं.यहाँ लेखक ने ''दक्खिनी'' को हिंदी के विकास की मजबूत कड़ी के रूप में प्रस्तावित किया है और हिंदी तथा उर्दू के विवाद को बेमानी माना है.पांचवें खंड में स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में भाषा नियोजन का पक्ष विवेचित है. लेखक ने प्रयोजनमूलक हिंदी के नए नए रूपों के विस्तार को भी नियोजन का व्यावहारिक आयाम मानते हुए विविध ज्ञान शाखाओं और रोजगारपरक क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषारूपों को भाषा की संप्रेषण शक्ति और जिजीविषा का प्रतीक माना है.इसीलिये हिन्दी की प्रयोजन मूलक शैलियों की विस्तृत चर्चा करते हुए छठे खंड में जहाँ व्यावसायिक हिंदी के विविध रूप वर्णित हैं , वहीं पत्रकारिता और साहित्य समीक्षा की भाषा के साथ पहली बार पाक-विधि की भाषा का सोदाहरण विवेचन करते हुए आधुनिक हिंदी के अभिव्यक्ति-सामर्थ्य का दृढ़ता पूर्वक प्रतिपादन किया गया है.


सातवें और अंतिम खंड ''हिंदी का विस्तार'' में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान का तटस्थ मूल्यांकन करने के साथ हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर विचार किया गया है. इस प्रकार यहाँ हिंदी के स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक सभी सन्दर्भ विविध पक्षों के साथ उभर कर सामने आ सके हैं. इस प्रकार यह कृति इस तथ्य को भली भाँति असंदिग्ध रूप में प्रतिपादित करती है कि -


''हिंदी भाषा मात्र एक व्याकरणिक व्यवस्था नहीं है, वह हिंदी भाषा समुदाय में व्यवस्थाओं की व्यवस्था के रूप में प्रचलित और प्रयुक्त है ; इस तथ्य के प्रकाश में निर्मित हिंदी-व्याकरण ही भाषा के उन उपेक्षित धरातलों पर विचार कर सकेगा जो वास्तव में भाषा प्रयोक्ता के भाषाई कोष की धरोहर हैं. कोई भी जीवंत शब्द और जीवंत भाषा एक नदी की तरह विभिन्न क्षेत्रों से गुजरती और अनेक रंग-गंध वाली मिटटी को समेटती आगे बढ़ती है. हिंदी भी एक ऐसी ही जीती जागती भाषा है. इसके व्यावहारिक विकल्पों को व्याकरण में उभारना, यही एक तरीका है कि हम हिंदी को उसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय भूमिका में आगे ले जा सकते हैं.''




हिंदी भाषा चिंतन / प्रो. दिलीप सिंह /
वाणी प्रकाशन,
२१-ऐ, दरियागंज , नई
दिल्ली - ११०००२ /
२००९ / ४०० रुपये /
२८८ पृष्ठ -सजिल्द।



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Posted By कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee to "हिन्दी भारत" at 3/25/2009 08:22:00 PM
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