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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

हिंदी के हिंडोले में जरा तो बैठ जाइए



हिंदी भाषा ने अपनी हजार साल से ज्यादा की यात्रा में अभी तक अनेक पड़ाव पार किए हैं, उतार-चढ़ाव देखे हैं। उसकी इस विकासयात्रा की एक बड़ी विशेषता है कि वह सदा जन-मन की ओर प्रवाहित होती रही है। यदि यह कहा जाए कि हिंदी की ताकत उसके निरंतर जनभाषा होने में है, राजभाषा होने में नहीं, तो शायद कोई अतिशयोक्ति न होगी। अपभ्रंश के अनेक क्षेत्रीय रूपों से जब दूसरी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ रूपाकार ग्रहण कर रही थीं, उसी समय हिंदी ने भी अपने प्रारंभिक रूप की आहट दी। यह आहट सुनाई पड़ी अलग-अलग बोलियों और उपभाषाओं के रूप में। एक ओर इसका यह राजस्थानी रूप था -

कहिरे भरहेसर कुण कहीइ।

मइ सिउँ रणि सुरि असुरि न रहीइ॥

चक्रधरइ चक्रवर्ती विचार।

तउ अह्म पुरि कुंभार अपार॥

- भरतेश्वर बाहुबली रास

(भरतेश्वर की क्या कहते हो, मेरे सामने तो युद्ध में सुर-असुर भी नहीं ठहरते। यदि उस चक्रवर्ती को चक्रधारण का ही अधिक विचार हो गया है तो हमारे यहाँ तो एक नहीं, कई चक्रधारी कुम्हार हैं।)

यह थी 1184 ई. की हिंदी। पृथ्वीराज चौहान के समकालीन चंदबरदायी की कविता में1300-1400 ई. में इसका अलग पड़ाव दिखाई देता है -

मति घट्टी सामंत मरण हउ मोहि दिखावहु।

जम चीठी विणु कदन होइ जउ तुमउ बतावहु॥

- पृथ्वीराज रासो

(हे सामंत! क्या तुम्हारी मति घट गई है जो मुझे इस तरह मृत्यु का हौवा दिखा रहे हो। क्या यम के परवाने के बिना कभी मौत आ सकती है - तुम्हीं बताओ।)

दूसरी ओर इन दोनों के बीच अमीर खुसरो की रचनाओं में आरंभिक खड़ीबोली और ब्रजभाषा के रूप देखे जा सकते हैं -

"गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।

चल खुसरो घर आपणे, रैन भई चहुँ देस॥"

इसी प्रकार हिंदी का एक आरंभिक रूप यदि सरहपाद जैसे सिद्ध और गुरु गोरखनाथ जैसे नाथपंथी कवियों की भाषा में प्रकट हो रहा था, जिसका पौरुषपूर्ण संस्करण आगे चलकर कबीरदास जैसे कवि की भाषा में मुखर होकर संध्याभाषा, सधुक्कड़ी और खिचड़ी कहलाया तो एक अन्य रूप विद्यापति की पदावली में व्यक्त हो रहा था -

"नंदक नंदन कदंबक तरुतर

धिरे-धिरे मुरली बजाव।"

(नंद का पुत्र कदंब के वृक्ष तले धीरे-धीरे मुरली बजा रहा है।)

यह मुरली मैथिली में बजी, तो ब्रजी में गूँज उठी। इस तथ्य से हम सब भलीभांति परिचित हैं। राजस्थान से लेकर मिथिला तक, या कहें कि गुजरात से लगती सीमा से लेकर बंगाल से लगती सीमा तक व्याप्त विविध बोलियों के रूप में हिंदी भाषा ने अपनी आरंभिक उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद का अर्थात कबीरदास के समय से लेकर आज तक की हिंदी भाषा की यात्रा का पूरा इतिहास तो हमें मालूम है ही। लेकिन इस इतिहास को बार-बार दुहराने और समझने की आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरत है।

आज जब हिंदी ने अपने आपको साहित्य और संपर्क के परंपरागत प्रयोजन क्षेत्रों के साथ-साथ राजकाज, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, आधुनिक वाणिज्य-व्यवसाय तथा तकनीकी के लिए उपयुक्त भाषा के रूप में सब प्रकार सक्षम सिद्ध कर दिया है (भले ही अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी या गुलाम मानसिकता की हीनभावना के कारण हम इस सत्य को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने में हिचकते हों) तथा बाजार में और कंप्यूटर पर व्यापक प्रयोग की अपनी संभावनाओं को प्रकट कर दिया है, दुनिया की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली शीर्ष भाषाओं में शामिल होकर संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने की दावेदारी प्रस्तुत कर चुकी है। ऐस समय में हिंदी के इस बहुक्षेत्रीय और बहुबोलीय आधार की स्मृति बनाए रखना बेहद जरूरी है क्योंकि हिंदी केवल उतनी सी नहीं है, जितनी सी वह राजभाषा हिंदी या खड़ी बोली हिंदी या मानक हिंदी के रूप में दिखाई देती है।

इसी प्रकार जब हम कहते हैं कि हिंदी का प्रयोग देश भर में किया जाता है या जब इस बात पर गर्व करते हैं कि हिंदी बोलने/जानने वाले विश्वभर में हैं, तो इसका अर्थ है कि हिंदी का प्रयोग करने वाला भाषा-समाज अनेक भाषा-कोडों का प्रयोग करता है। ये भाषा-कोड एक ओर तो उसकी तमाम बोलियों से आए हैं, दूसरी ओर इनका विकास हिंदी की इन बोलियों के विविध भाषाओं के साथ संपर्क से हुआ है। हाँ, जहाँ यह संपर्क अत्यंत घनिष्ठ है, वहाँ हिंदी के विविध रूपों का संप्रेषण घनत्व भी अधिक है तथा जहाँ संपर्क में उतनी घनिष्ठता नहीं है, वहाँ संप्रेषण में भी उतना घनत्व नहीं है। इन स्थितियों में ही हिंदी के बंबइया, हैदराबादी, मद्रासी आदि संस्करण विकसित हुए हैं। इसी प्रकार भारतवंशियों द्वारा आबाद किए गए देशों में भी हिंदी का अपना-अपना रूप है। अंग्रेजी मिश्रण से विकसित संस्करण को भी नकारा नहीं जा सकता। हमें आज हिंदी के विकास की अनेक दिशाओं के रूप में इन सब संस्करणों को स्वीकृत और सम्मानित करना होगा। तभी जनभाषा को विश्वभाषा की प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

हमें इस प्रवृत्ति के बारे में गंभीरता से सोचना होगा कि हिंदी परिवार की बोलियाँ/भाषाएँ मूलत: परस्पर नाभिनालबद्ध हैं और किसी तात्कालिक लाभ के लिए उनकी यह परस्पर एकता खंडित नहीं की जानी चाहिए। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसी संस्थाओं से लेकर सरकारी योजनाओं तक के नियामकों को इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि इन समस्त बोलियों/भाषाओं से संबलित हिंदी भाषा समाज का विस्तार भौगोलिक और सांख्यिकीय दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। अत: जब अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी को रखा जाए तो उसके इस विस्तार के अनुरूप विविध योजनाओं में उचित अनुपात में भागीदारी प्रदान की जाए। लोकतंत्र के इस साधारण से सिद्धांत की उपेक्षा का अर्थ है - हिंदी भाषा के व्यापक बोलीय आधार की उपेक्षा। इससे असंतोष पैदा होता है और अलग-अलग बोलियों के प्रयोक्ता समाज में तात्कालिक लाभों के लिए अलग से सूचीबद्ध किए जाने का मोह जागता है। यदि इस प्रवृत्ति पर रोक न लगी, तो सब बोलियाँ खिसक जाएँगी और हिंदी के समक्ष खुद अपनी पहचान का संकट खड़ा हो सकता है। हिंदी की सारी बोलियाँ मिलकर ही हिंदी भाषा रूपी रथ की संज्ञा प्राप्त करती हैं। यदि रथ के घोड़े, पहिए और आसन आदि को एक-एक कर अलग करते जाएँ तो रथ कहाँ बचेगा! अत: हिंदी की बोलियों की एकजुटता में ही हिंदी का अस्तित्व है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें हिंदी के रथ को बिखरने से बचाना होगा।

यहाँ हम यह भी उल्लेख करना जरूरी समझते हैं कि हिंदी जिस प्रकार बोलीगत विभेदों से भरी-पूरी संपूर्ण भाषा है, उसी प्रकार वह शैलीगत भेदों से भी परिपूरित है। हजार साल से ज्यादा की अपनी विकास यात्रा में हिंदी ने विभिन्न भाषाओं के संपर्क और ऐतिहासिक सामाजिक दबावों के परिणामस्वरूप अपने इन शैलीगत भेदों को निर्मित किया है। ध्यान में रखना होगा कि जिस प्रकार बोलीगत भेद एक दूसरे के सहयोगी हैं, उसी प्रकार हिंदी के शैलीगत भेद भी एक दूसरे के पूरक हैं। यहाँ हम खासकर दक्खिनी हिंदी और उर्दू के प्रदेय की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। इन दोनों शैलियों के बिना हिंदी का इतिहास अधूरा है। उसे भी हिंदी साहित्य के अंग के रूप में ग्रहण करना अपनी विरासत को पहचानने और उससे जुड़ने के लिए आवश्यक है।

हिंदी जैसी व्यापक और अक्षेत्रीय--सार्वदेशिक और अंतरराष्ट्रीय--भाषा के लिए यह सदा स्मरण रखना आवश्यक है कि भाषा 'बहता नीर' है। इस बहते नीर की घाट-घाट पर अलग-अलग रंगत है। इस पर तथाकथित शुद्धतावाद नहीं थोपा जाना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि हमें जीवन के समस्त विविध प्रयोजनों और भाषा प्रयोक्ता समाज के वैविध्यों के अनुरूप जहाँ एक ओर उच्च हिंदी पर गर्व है, वहीं उसके हिंदुस्तानी/गंगाजमुनी रूप पर भी नाज है तथा उर्दू रूप पर भी फ़ख्र है। इतना ही नहीं, अंग्रेजी के मिश्रण से बने गए भाषा रूप से भी हमें उतना ही प्रेम होना चाहिए जितना दूसरे भाषा रूपों से। हम किसी भाषा रूप को हिकारत की नज़र से देखेंगे तो यह उचित नहीं होगा। मीडिया के विविध प्रकार के प्रकाशनों और प्रसारणों के कारण जो इन विविध भाषा रूपों का विकास हो रहा है, वह भी प्रशंसनीय है।

14 सितंबर को जब-जब हम हिंदी दिवस मनाएँ तो भारत के संविधान के अनुच्छेद-343से अनुच्छेद-351 तथा अनुसूची-8 के प्रावधानों का तो खयाल रखें ही, यह भी खयाल रखें कि राजभाषा की यह सारी व्यवस्था भारत की जातीय अस्मिता और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा विकसित करने के उद्देश्य से की गई है। इसे केवल सरकारी कामकाज की भाषा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। बल्कि सच तो यह है कि अनुच्छेद-351 के निर्देश के अनुरूप हिंदी का सामासिक स्वरूप राजभाषा की अपेक्षा व्यापक जनसंपर्क, साहित्य, मीडिया, वाणिज्य-व्यवसाय, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी की भाषा के रूप में हिंदी के व्यापक व्यवहार से ही संभव है। यदि हम - हमारी सरकारें - सचमुच हिंदी को विश्वभाषा के पद पर आसीन देखना चाहती हैं तो उसका जो संवैधानिक अधिकार लंबे अरसे से लंबिंत/स्थगित पड़ा है, उसे तुरंत बहाल किया जाए। सभी भारतीय भाषाओं को इससे बल मिलेगा तथा परस्पर अनुवाद द्वारा उनके माध्यम से हिंदी भी बल प्राप्त करेगी। अनुवाद ही वह माध्यम है जो हिंदी को समूचे भूमंडलीय ज्ञान की खिड़की बना सकता है, अत: इस दिशा में भी ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है। मौलिक लेखन और अनुवाद दोनों मिलकर हिंदी के इस सामासिक और वैश्विक स्वरूप का पुनर्गठन करेंगे - इसी शुभकामना के साथ हम सर्वभाषाभाषी समाजों को हिंदी के हिंडोले में झूलने के लिए आमंत्रित करते हैं, जैसाकि किसी कवि का सहज आह्वान है :-

बिहरो 'बिहारी' की बिहार वाटिका में चाहे

'सूर' की कुटी में अड़ आसन जमाइए।

'केशव' के कुंज में किलोल केलि कीजिए या

'तुलसी' के मानस में डुबकी लगाइए॥

'देव' की दरी में दुरी दिव्यता निहारिए या

'भूषण' की सेना के सिपाही बन जाइए।

अन्यभाषाभाषियों मिलेगा मनमाना सुख

हिंदी के हिंडोले में ज़रा तो बैठ जाइए॥

जल-स्पृहा लाने के निमित्त



समकालीन तेलुगु कवियों में अग्रगण्य डाì.एन.गोपी (1950) ने "जलगीत' (2005) में पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश दिया है। यह धारणा 27 गीतों वाली इस लंबी कविता की मूल प्रेरणा है कि आधुनिक सभ्यता ने पृथ्वी पर जल संकट पैदा किया है, Êजसका मूल कारण जनसंख्या-वृÊद्ध के साथ-साथ प्रदूषण-वृÊद्ध है। कवि ने इस वैज्ञानिक तथ्य को अपना प्रस्थान Ëबदु बनाया है कि बर्फ भूगोल के संतुलन का एक आधार है, Êजस पर पर्यावरण-प्रदूÊषत से दबाव बढ़ता है। वह बर्फ पिघल गया तो जलप्लावन होगा और धरती का अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसलिए कवि ने "काìस्मिक जल' से "प्रदूषण जल' तक की यात्रा करते हुए जल की आत्मा का आविष्कार करने का प्रयास किया है। वे पाठकों में जलस्पृहा लाना चाहते हैं।

एन.गोपी के तेलुगु "जलगीत' को हिंदी में उपलब्ध कराया है अनुवादक प्रो. मÊण (पी.माÊणक्यांबा) ने। शब्द चयन से लेकर अनूदित पाठ की लय और गति तक से यह प्रकट होता है कि अनुवादक ने हिंदी भाषा के मुहावरे को पकड़ने में सफलता प्राप्त की है। संस्कृत साहित्य के संस्कार ने भी अनुवाद को औदात्य प्रदान किया है।

पानी की महत्ता के समक्ष कवि नतमस्तक है। पानी उनके लिए मानो ब्रह्म के सदृश है। पानी का नाम सुनते ही सरबसर भीग जाते हैं। पानी कहते ही तर जाते हैं। पनियारे प्राणी नित नए पानी से प्रतिभाÊसत हो जाते हैं। कवि को लगता है पानी के रूप में तीन परमाणुओं से मनहर मोती आंगन में झर आया है और हथेली में अनंत जलराÊश लहरों की हलचल के उछाह में Êगर पड़ी है। (वैसे पुस्तक में लहरों के हलचल "की' उछाह छपा है, Êजसे सुधारकर पढ़ा जा सकता है)।

आकाश और पृथ्वी के आद्यËबब और मिथक के एक भाग के रूप में जल मनुष्य की स्मृति का अंग रहा है। जल बरसता है तो धरती हरी-भरी फसलों से संपन्न होकर मातृत्व का सुख प्राप्त करती है। जल की बूंद जीवन की बूंद है। कवि उसे टेरता है -

"तुम्हारे स्पशÇ मात्र से
वसुंधरा बनी नित्य सद्य प्रसूता
तुम जहाÄ भर गए
वह हर जलाशय
एक गर्भाशय हो गया है
किन सुदूर गगनों ने भेजा
उपहार प्रकाश के रूप में तुम्हें?'' (पृष्ठ - 14)


जल वर्षा के रूप में आता है और धरती की आयु में इजाफा कर जाता है। समुद्र की रस भरी गगरी नित्य गर्भवती-सी है। समुद्र कवि को सदानीरा नदियों की प्रतीक्षा करने वाले योगी जैसा प्रतीत होता है, Êजसका द्रव सीमा तोड़ने पर उपद्रव कर देता है। पर्वतों, बादलों, नदियों और समुद्रों से एक निरंतर जल-चक्र बनता है, सूर्य का ज्वाला नेत्र Êजसका साक्षी है।


जल को कवि ने अजर-अमर माना है। उसके अनेक मुखौटे हैं, वह कभी मरता नहीं। पैर कटने पर जम जाता है, तो हिम बन जाता है। जल पंचभूत के संतुलन का आधार है। मनुष्य जब इस संतुलन का अतिक्रमण करता है, तो जल जल नहीं रहता और आग आग नहीं रहती। कवि जल को स्त्री रूप में संबोधित करता है -

"ज्वालाओं को
अपने पेट में Êछपाये
हे जल! तुम अब भी
ममतामयी माÄ-सी हो
इसलिए तुममें इतनी दीप्ति है
अग्नि अपने उग्र रूप में
Êशखाएं खोलकर
जीभ फैलाकर नृत्य करे तो
करुणा की कोरों से बचाने .....
अग्नि की जोड़ीदार वायु
पानी में मग्न हो गई।'' (पृष्ठ - 25)।


कवि ने यह स्पष्ट किया है कि "जलगीत' कोई वैज्ञानिक रचना नहीं है, बल्कि विज्ञान की भूमिका पर अंकुरित दाशÇनिकता एवं मानवता से समन्वित कविता है। इसीलिए वे पानी को दो पदार्थों का कसा हुआ आËलगन मानते हैं। बूंद के मन की गहराई और आंसू की रासायनिक प्रÊक्रया सभी में पानी की माया है। सागर को पलकों से बांध दें तो आंसू बन जाता है। जल-संकट के समय आंसुओं को प्रयोगशाला में भेजना होगा और पसीने की बूंदों से अÊभष्ोक करना होगा। वस्तुत: पानी आत्मप्रक्षालन करने वाला प्रबोध गुरु है। उसकी अनेक भाषाएं हैं -

""नमी उसकी गोदी है
नमी का दुपट्टा ओढ़ने पर
धूप का दिल थोड़ा नरम हो जाता है।'' (पृष्ठ - 39)।

Êजस घड़े में पानी भरा जाता है, उसे नमी का दान नीर से ही मिलता है। कवि ने साहित्य और दशÇन की सारी संभावनाएÄ पानी में साकार होती देखी हैं। पानी को जानना ही स्वयं को जानना है (पृष्ठ - 45), लेकिन मनुष्य इस जानने के क्रम में ही बादलों के थनों से धार बन बरसते क्षीर में विष घोल रहा है। प्रगति के बहाने मनुष्य ने पानी को दुगÈध और गंदलेपन से भर दिया है तथा समस्त सृष्टि के संगीत को बेसुरा कर दिया है। नि¶चय ही -

"यह प्रदूषण शताब्दी है
यह शताब्दी है जल के दंश की।'' (पृष्ठ - 48)।


वस्तुत: यही आधुनिक मनुष्य की त्रासदी है और "जलगीत' इसी के निराकरण का काव्यात्मक अÊभयान है। कवि को लगता है कि -


"धरती मां मौत की चारपाई पर अंतिम सांसें Êगन रही है,
जमीन पर घास ही नहीं उगती तो काNाWाों पर कविता कहां से आएगी?'' (पृष्ठ - 51)।


इससे आरंभ होता है वास्तविक संकट क्योंकि -

"जलहीनता
जन्म देती है योद्धाओं को
जलहीनता
क्रूरता में प्राण फूंकती है
जलहीनता
आश्रयदाता के प्राणों को डस लेती है।'' (पृष्ठ - 53) ।


ऐसी स्थिति में पानी आग में बदल जाता है। कवि जल की राजनीति की भत्र्सना करते हैं। जल का स्वामित्व किस प्रकार युद्धों का कारण बनता है, इसे भी कवि ने समझा और समझाया है। पानी की अनंत शÊक्त को जो देश अपने कब्जे में करना चाहते हैं, वे अस्तित्व मात्र के शत्रु हैं। मानव निर्मित इस संकट का ही परिणाम है कि गंगा जलशय्या पर नीरस पड़ी हुई है। तालाब कंकाल बन गए हैं। कवि का प्र¶न है -तालाबों को किसने चुरा लिया? जल-संकट से उबरने के लिए वे एक उदार नीति का प्रस्ताव रखते हैं -

"आओ
नदियों के दिलों को मिलाए
तालाबों की शालों को ओढ़ाकर।'' (पृष्ठ -78) ।


कवि को यह मालूम है कि संस्कृति को सारी दिशाओं में प्रसारित करने वाला समुद्र विश्व-राजदूत है। लेकिन प्र¶न यह है कि आज समुद्र दु:खी क्यों है? उसकी नींद उड़ाने वाला कौन है? सीमारहित असीम जल-राÊश को सीमाएं बनाकर कौन प्रदूÊषत कर रहा है? पानी पर आधिपत्य जमाने वाली इन सौदागर ताकतों का सामना करना है तो पूरी धरती को जंगलों की हरी-भरी छतरियों से ढाÄपना होगा। वृक्ष जल के अकाल से मनुष्य को बचा सकते हैं, क्योंकि -

"कोई भी साथ नहीं देता,
अंत के तुलसी जल के अलावा
विदाई का जल शायद यही है,
नश्वर जीवन में
अनश्वर ऐश्वर्य नीर ही है
जंगलों में Êछपा पानी
आड़े दिनों में काम में आता।''


आज फिर कवि को भगीरथ की प्रतीक्षा है। यह भगीरथ जल के मंदिर बनाएगा और पानी के सौदागरों की साÊजश को नाकाम कर देगा। कवि को यह बर्दा¶त नहीं है कि पानी को पैसों में Êगना जाए, लेकिन दुनिया भर में ऐसा ही हो रहा है। समुद्रों, नदियों, झीलों, झरनों, तालाबों, कुओं और वनों के होते हुए भी हम पीने के पानी का अकाल झेल रहे हैं और मुनाफाखोर ताकतें पानी बेचकर अपनी पूंजी बढ़ा रही हैं। कवि दÊक्षण अमेरिका के छोटे से देश बोलिविया का उदाहरण देते हुए चेताते हैं कि जल को दीवारों में बांधा तो जन का तापमान बढ़ जाएगा।


अंतिम गीत में स्वयं जल बोलता है। जल को क्षोभ है, क्योंकि अमृत के बंटवारे के दिन से ही वह पक्षपात की राजनीति का Êशकार हो गया था। आज भी बुÊद्धमान मनुष्य की स्वार्थपरता जल के टुकड़े-टुकड़े कर रही है। जल बहुत दु:खी है, क्योंकि मनुष्य ने उसके साथ भीषण दुव्र्यवहार किया है। जल नदी बनकर पैर टूटने तक दौड़ा, लेकिन मनुष्यों ने उसके सभी अंगों पर आधिपत्य कर नगर बसा दिए और जंगलों की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। जल का विनाश ही मानो मानवीय विकास का भूषण बन गया। जल आर्तनाद करता है -


"मेरा मूल्य जानो! मेरी कीमत समझो
मुझे प्रदूÊषत करते
फिर शुद्ध करते
फिर शुद्ध करते, मुझे
दुकान का सौदा मत बनाओ
पहले अपने हृदयों को
शुद्ध करो।'' (पृष्ठ - 103)।


मानव हृदय को शुद्ध करने का संदेश देने वाली यह कविता जहाÄ एक ओर उत्तर आधुनिक भूमंडलीकृत परिवेश के वास्तविक संकट को काव्य-चेतना के केंद्र में प्रतिष्ठित करती है, वही दूसरी ओर मानवीय संवेदना और खांटी लोक की रागात्मकता के स्त्रोतों को भी पुनराविष्कृत करती है। लोक संस्कार और जनांदोलन के बल पर ही "जल गीत' "जन गीत' के रूप में बदल सकता है। नि¶चय ही एन.गोपी का "जल गीत' आज की कविता की बदलती हुई चिंता का प्रतीक है। कवि का सौंदर्यबोध इस चिंता को कवित्व प्रदान करता है -

"आसमान का मन रेÊगस्तान में क्यों बदल गया ?
आसमान भी
बादल-वचन देकर
क्यों मुकुर गया?
मेघों की भी - इतनी उपेक्षा
पहाड़ों के वक्षस्थल पर झुक
Êजम्मेदारी ही भूल गए!
देखिए, उधर!
पानी कहीं
प्यास कहीं।''

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जल गीत (लंबी कविता)/तेलुगु मूल : डाì. एन. गोपी/अनुवाद : डाì. माÊणक्यांबा/प्रकाशक संस्थान, 4715/21, दयानंद मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली - 110 002/प्रथम संस्करण : 2005/मूल्य : 100/- / पृष्ठ - 104


हिंदी, प्रौद्योगिकी, बाजार और अनुवाद





बहुभाषिकता भारतीय समाज का यथार्थ है तथा भूमंडलीकृत विश्व में संचार और संप्रेषण के लिए बहुभाषिकता अत्यंत सबल माध्यम है। बहुभाषिक समाजों के बीच संप्रेषण के लिए अनुवाद सदा से प्रयुक्त होता आया है। आज की दुनिया में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के डॉ.रायवरपु श्री सर्राजु (1958) ने इससे जुड़े विविध पक्षों पर 'आज की हिंदी और अनुवाद की समस्याएँ' (2007) पुस्तक में पर्याप्त गहन सैद्धांतिक और व्यावहारिक चर्चा की है। विषय का प्रतिपादन शोध पत्रों की शैली में उद्धरणों और उदाहरणों के साथ किया गया है।

लेखक ने वर्तमान में हिंदी भाषा प्रयोग के यथार्थ के तीन आयाम माने हैं - 1. बहुभाषिक भारतीय समाज में हिंदी का विकास हो रहा है।2. हिंदी भाषाई समाज में सिर्फ़ हिंदी भाषी लोग और अंग्रेज़ी के साथ हिंदी भाषा के प्रयोग करने वाले लोगों के सामाजिक स्तर अलग अलग हैं।3. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ समान रूप से विदेशी स्रोतों और भाषाओं से प्रभावित हो रही हैं।
इस संदर्भ में उन्होंने ज्ञान के अंतरण और भाषा प्रयोग के नए परिप्रेक्ष्य में भाषा मिश्रण और भाषा परिवर्तन के अनुवाद पर पड़ने वाले प्रभाव की भी चर्चा की है और माना है कि अनुवाद अब संप्रेषण का एक नया माध्यम बन रहा है। निस्संदेह अनुवाद सदा संप्रेषण का माध्यम रहा है लेकिन आज भिन्न -भिन्न सामाजिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले समाजों के बीच द्रुतगति से संचार के लिए उसका महत्व पहले से अधिक दिखाई देने लगा है।

लेखक ने पहले तो आज की हिंदी के संदर्भ में अनुवाद की समस्याओं को उठाया है और फिर अलग-अलग क्षेत्र के तकनीकी प्रकृति के पाठों के अनुवाद की समस्याओं पर प्रकाश डाला है। यह इस पुस्तक की विशेषता मानी जाएगी कि इसमें साहित्यिक पाठों की अपेक्षा तकनीकी पाठ पर अधिक बल दिया गया है। प्रौद्योगिकी की तीव्रगति के युग में हिंदी में ऐसी पुस्तकों की सचमुच आवश्यकता है।

यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 'आज की हिंदी' पद का अर्थ क्या है ? लेखक ने यह माना है कि आज की मानक हिंदी वास्तव में आजादी के बाद के भारत में विकसित भारतीय मध्यवर्ग और शिक्षित वर्ग की भाषा है जो किसी एक ऐसी जाति या जातीय समूह तक सीमित नहीं है जो किसी एक परंपरागत संस्कृति का संवहन करती हो बल्कि हिंदी के प्रयोक्ता समाज में भारतीय संस्कृति के कई सांस्कृतिक उपस्तर दिखाई देते हैं। लेखक ने राजस्थान की संस्कृति और बिहार की संस्कृति को ऐसे ही एक दूसरे से भिन्न उपस्तर माना है जो विवादास्पद है। इस तरह के स्तरीकरण का ही परिणाम है कि भाषा और बोली के नाम पर भारतभर में आजादी के बाद से ही तलवारें खिची हुई हैं। इस तथ्य का आभास भी लेखक को है इसलिए वह यह स्पष्ट करने में नहीं चूकता कि इस भाषा के प्रयोक्ता मध्य वर्गीय समाज के चरित्र में प्रादेशिक, सांस्कृतिक, बोलीगत भिन्नताओं के बावजूद एक तरह की राष्ट्रीय एकरूपता दिखाई देती है जो खड़ीबोली की मानक हिंदी के रूप में प्रतिष्ठा का आधार है। इसी के साथ नए परिप्रेक्ष्य में हिंदी की विभिन्न प्रयोजन मूलक प्रयुक्तियों के विकास के लिए गठित शब्दावली की एक बड़ी सीमा की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि इससे हिंदी का चरित्र अनुवादपरक ही रह गया। इसमें संदेह नहीं कि नए संदर्भों में संस्कृत की शब्दावली को आधुनिक अर्थों से मंडित किया गया और काफी हद तक अंग्रेज़ी अभिव्यक्तियों के शाब्दिक अनुवाद से गढी गई भाषा हिंदी के मुहावरे को आत्मसात करने में पीछे रह गई। यहाँ इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि हिंदी के चरित्र को सामासिक संस्कृति का प्रतिरूप बनाने के चक्कर में जहाँ सरकारी भाषा आम भाषा से दूर हो गई, वहीं पत्र-पत्रिकाओं, फिल्म, रेडियो और टेलीविज़न ने लक्ष्य पाठक - श्रोता समुदाय के स्वरूप को ध्यान में रखकर विभिन्न विषयों की जिस भाषा का विकास किया है वह सरकारी भाषा की अपेक्षा सहज और संप्रेषणीय है। इसमें संदेह नहीं कि इन दोनों ही धाराओं ने अनुवाद का सहारा लिया। लेकिन जहॉं एक ने पाठधर्मी अनुवाद की तकनीक अपनाई वहीं दूसरे ने प्रभावधर्मी।

पुस्तक में इस तथ्य को उचित ही रेखांकित किया गया है कि हाल के वषों में हिंदी का शब्द-भंडार बहुत तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि भूमंडलीकरण ने और बाज़ार की व्यवस्था ने दुनिया भर में अपने पैर फैलाए हैं, और भारतीय समाज भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह गया है। इस व्यवस्था की ज़रूरतों के अनुसार भारत में ज्ञान-आधारित समाज का विकास हो रहा है, और इस विकास के अनुरूप हिंदी में भी नए-नए प्रयोजनमूलक रूपों (प्रयुक्तियों) का विकास हो रहा है। इस आधार पर आज हिंदी भाषा समाज के कोड मैट्रिक्स में स्थानीय बोली, क्षेत्रीय बोली, मानक हिंदी और अंग्रेज़ी शामिल मानी जा सकती है।

बोलियों, भारतीय भाषाओं तथा देशी और विदेशी भाषाओं के बीच संपर्क भाषा, शिक्षा के माध्यम और कार्यालय की भाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा का कार्य अभी तक अधूरा है। क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और राजनैतिक दुराग्रहों ने हिंदी का सचमुच बहुत बड़ा अहित किया है तथापि केंद्र से परिधि की ओर सहज भाव से फैलने की अपनी प्रवृत्ति और ग्रहणशीलता की अपनी शक्ति के कारण हिंदी सब तरह के विरोधों और षड्यंत्रों को धता बताती हुई आधुनिक प्रौद्योगिकी और बाज़ार में अपनी क्षमता को प्रमाणित करने में लगी हुई है। इसमें अनुवाद ने बड़ी भूमिका निभाई है और हिंदी में अनुवाद की जो नई पद्धतियाँ सामने आ रही हैं उनमें विषय के वास्तविक संप्रेषण पर जोर होने के कारण इसे बहुत बल मिला है। इधर कंप्यूटर के प्रयोग से अनुवाद के जो नए आयाम सामने आए हैं वे यह आश्वासन देने में समर्थ हैं कि आने वाले समय में हमारा डाटा बेस किसी भी भाषा से पीछे नहीं रहेगा।

भारत की व्यापक बहुभाषिकता और सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखते हुए हिंदी की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक शब्दावली में जहाँ एक ओर अंतरराष्ट्रीय शब्दावली (अंग्रेज़ी) को व्यापक स्वीकृति प्रदान की गई है, वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय शब्दावली तथा क्षेत्रीय शब्दावली की भी उपेक्षा नहीं की गई है। लक्ष्य पाठक - श्रोता समुदाय की प्रकृति और आवश्यकता के अनुरूप वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक विषय के पाठ को पारिभाषिक अथवा सहज बोधगम्य बनाने पर बल दिया जाना जरूरी है। इसका अर्थ है कि जहाँ तकनीकी भाषा की आवश्यकता न हो वहाँ आम फहम शब्दावली से काम चलाया जाए तो वैज्ञानिक पाठ को जटिल होने से बचाया जा सकता है। अनेक प्रकार के ज्ञान विज्ञान संबंधी चैनलों के कार्यक्रमों में प्रयुक्त हिंदी इसका सुंदर उदाहरण है जहाँ जटिल और क्लिष्ट पारिभाषिकों के बिना सारी बात सुबोध शैली में संप्रेषित हो जाती है। इसके बावजूद लेखक की इस धारणा में दम है कि प्रौद्योगिकी की भाषा अपेक्षाकृत क्रमबद्ध और घनीभूत होती है तथा वस्तुनिष्ठता और सुस्पष्टता उसकी मुख्य विशेषता होती है। इसीलिए यह भी ध्यान में रखना जरूरी होता है कि किन शब्दों का अनुवाद नहीं हो सकता - ऐसे शब्दों को प्राय: ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया जाता है।

दूरसंचार की हिंदी की चर्चा करते हुए टेलिफोन निर्देशिका से पुस्तक में कुछ ऐसे अंशों को उद्धृत किया गया है जो अर्थग्रहण और संप्रेषण ही नहीं भाषा प्रयोग के स्तर पर भी असहज और कृत्रिम लगते हैं। ऐसे अनुवादों ने ही अनुवादकों को बदनाम किया है। लेखक का यह सुझाव ठीक प्रतीत होता है कि अनुवाद को सरल बनाने के लिए कभी-कभी कठिन तकनीकी शब्दावली के स्थान पर प्रचलित सामान्य शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि अनुवाद का अर्थ मक्षिका स्थाने मक्षिका न्याय नहीं है बल्कि प्रयोजनपरक भाषा रूपों की दृष्टि से मूल पाठ और अनूदित पाठ की अर्थगत या संदेशगत समतुल्यता प्राप्त करना अनुवादक का लक्ष्य होना चाहिए। बात साफ है कि समतुल्यता की कसौटी पाठ नहीं, प्रयोजन है।

प्रौद्योगिकी से संबंधित सामग्री का अनुवाद करते समय जहाँ उस विषय क्षेत्र की प्रयुक्ति को ध्यान में रखना जरूरी है, वहीं दर्शन जैसे विषयों का अनुवाद प्रोक्ति के स्तर पर किया जाना बेहतर माना जाता है। इस तरह के प्रोक्तिस्तरीय अनुवाद में स्रोत भाषा के वक्ता के प्रकरण युक्त पूर्ण मंतव्य या विचारों का अनुवाद लक्ष्य भाषा में होता है। ऐसी स्थिति में अर्थ ग्रहण के संदर्भ में अनुवादक की सार्मथ्य महत्वपूर्ण हो जाती है। पाठ में निहित संस्कृतिगत अर्थ को समझे बिना शब्दानुवाद करने के हास्यास्पद उदाहरणों में उपनिषदों के मैक्समूलर कृत अंग्रेज़ी अनुवाद की चर्चा की जा सकती है। भला परमार्थ, अनित्य और वैश्वानर के सटीक अंग्रेज़ी पर्याय ढूँढ़ना कहीं संभव है क्या?

लेखक ने आशु अनुवाद की समस्याओं पर भी विस्तृत चर्चा की है क्योंकि आधुनिक राजनैतिक और वाणिज्यिक विश्व में आशु अनुवादकों की माँग बढ़ती जा रही है। यहाँ भी भावानुवाद और सारानुवाद की तकनीक अपनाने पर ही जोर दिया गया है। अनुवादकों के लिए शब्दाकोश निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डालने के साथ-साथ पुस्तक में कंप्यूटर की सहायता से शब्दानुक्रमणी बनाने की पद्धति को भी स्पष्ट किया गया है।

खास बात यह उभर कर आती है कि तकनीकी और प्रौद्योगिकी विषयों के अनुवाद का शब्द प्रति-शब्द पाठधर्मी होना आवश्यक नहीं है, बल्कि प्रभाव और प्रयोजन को ध्यान में रखा जाना अधिक जरूरी है। इसके लिए अनुवादुक को दो भाषाओं का ज्ञान होना मात्र काफी नहीं है बल्कि उसे संबंधित विषय क्षेत्र की मूलभूत अवधारणाओं की भी जानकारी होनी चाहिए। अनुवाद मूल्यांकन की चर्चा में भी अनुवाद के इसी प्रयोजन परक स्वरूप पर बल दिया गया है।

आशा है, इस पुस्तक को अनुवाद विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों और अनुवादकों के बीच पर्याप्त स्नेह और सम्मान प्राप्त होगा।
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*आज की हिंदी और अनुवाद की समस्याएँ/डॉ. रायवरपु श्री सर्राजु/मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/2007/पृ.150/रु. 200.00