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सोमवार, 21 जुलाई 2014

चलाचली की बेला में

पुस्तक चर्चा: ऋषभ देव शर्मा
चलाचली की बेला में
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त्रिकाल संध्या/ परमजीत स. जज्ज (उपन्यास)/ पृष्ठ – 136/ मूल्य – रु. 250/ 2014/ राजकमल प्रकाशन, दिल्ली
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पंजाबी भाषा के समर्थ उपन्यासकार परमजीत स. जज्ज (1955) ने अपने उपन्यास ‘त्रिकाल संध्या’ (2014) में हमारी शताब्दी की एक अत्यंत ज्वलंत समस्या को सहानुभूतिपूर्वक विश्लेषित किया है. इस समस्या का संबंध वृद्धों के पुनर्वास से है. वृद्धावस्था विमर्श को समर्पित इस कथाकृति में ठहराव और गति का वह तनाव बेहद तल्ख़ अंदाज में व्यंजित हुआ है जो जीवन की संध्या को उपलब्ध हो चुके वृद्धों के समय और उत्तरआधुनिकता को उपलब्ध कर रहे युवतर समय के परस्पर घात-प्रतिघात से उभरता है. ठहराव और गत्वरता का यह द्वंद्व नीम के पेड़ और नजदीक से गुजरती ट्रेन के प्रतीकों के माध्यम से गहराता है.
वृद्धावस्था केवल जीवन का ठहर जाना ही नहीं मृत्यु की प्रतीक्षा भी है – इस कुरूप यथार्थ को यह कृति भली प्रकार उभारती है. सुंदर सिंह की आत्महत्या इस प्रतीक्षा की क्रूर परिणति है क्योंकि जीवन और जगत के खुले पृष्ठ पर जब व्यक्ति को अपना अस्तित्व इतना निरर्थक लगने लगे कि उसके लिए हाशिए पर भी जगह न हो तो रंगमंच से हट जाने के अलावा उसके समक्ष अन्य विकल्प बचता भी क्या है?
इसके बावजूद उपन्यास में वृद्धों के पुनर्वास के अत्यंत संभावनापूर्ण क्षेत्र के रूप में अपने परिवेश की गतिविधियों से जुड़ाव को प्रस्तावित किया गया है. यह प्रस्ताव मुख्य पात्र इंदर के माध्यम से मूर्तिमान होता है.
चक दौलतराम एक गाँव का नाम है और ‘त्रिकाल संध्या’ इस गाँव के एक दिन की गाथा है जो 3 मई 1997 को प्रातःकाल 5 बजे शुरू होती है और रात घिरने पर सुंदर सिंह की आत्महत्या के साथ पूरी होती है. यह दिन गाँव के वृद्धों का दिन है. यह लग सकता है कि ये वृद्ध जो कभी गाँव की और अपने परिवारों की पूरी व्यवस्था की धुरी हुआ करते थे अब उस व्यवस्था के बाहर आ पड़े हैं और उनका दिन बेहद फालतू है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये वृद्ध न रहें तो गाँव की जीवनधारा सूख जाएगी क्योंकि ये ही तो उन सामाजिक संबंधों को अपने भीतर सहेजे हुए हैं जहाँ से आत्मीयता के स्रोत फूटते हैं. कथाकार ने मास्टर रौनक सिंह, कॉमरेड खेमचंद और कवि प्रताप के माध्यम से यह संकेत दिया है कि सहजता, प्रेम और सम्मान के सहारे एक ऐसे समाज की रचना की जा सकती है जहाँ किसी इंदर को अफीम की शरण न लेनी पड़े और किसी सुंदर को आत्महत्या न करनी पड़े.  


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