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सोमवार, 7 जुलाई 2014

बरषा काल मेघ नभ छाए





जुलाई का महीना काफी चढ़ गया है. सब ओर से मानसून की खबरें मिल रही हैं. कहीं बौछारें हैं तो कहीं मूसलाधार पानी गिर रहा है. पर हैदराबाद सूखा है. मानो बादल तेलंगाना से कन्नी काट गए हैं. दूर दूर तक फैले पत्थर के जंगल में दिन दिन भर आग बरसती है. पानी की कमी है, यों बिजली नहीं आती. आकाश वाली बिजली भी गायब है. बादल नहीं तो बिजली कहाँ से आए.

बादल और बिजली की जब भी बात चलती है ‘रामचरित मानस’ के किष्किंधा कांड का वह प्रसंग बरबस याद हो आता है जब प्रवर्षण पर्वत पर चौमासा बिताते राम आकाश में बादलों की घमंड भरी गर्जना सुनकर इसलिए डर से सिहर सिहर जाते थे कि जाने सीता कहाँ होंगी, कैसी होंगी, इस भीषण वर्षा में उन्हें कहीं कोई छप्पर  भी नसीब होगा कि नहीं, कहीं ऐसा न हो कि इस बार की यह निष्ठुर बरसात हमें सदा के लिए अलग कर दे. इस प्रसंग से पहली बार लगा कि राम भी डर सकते हैं. राम अपनी खातिर नहीं डरते. डरते हैं सीता की खातिर जिनकी रक्षा का दायित्व लिया था. 

तुलसी बाबा बड़े चतुर संप्रेषक हैं – बड़े गुनी गुरु. मौका निकालकर धीरे से उपदेश की घुट्टी पिला देते हैं और कवित्व की क्षति भी नहीं होने देते. वर्षा वर्णन के बहाने भी उन्होंने जीवन और जगत की अनेक मार्मिक सीखें हमें दी हैं. तुलसी सीधे सीधे शिक्षा पर उतर आते तो शायद हम अचकचाने लगते. पर उन्होंने राम का सहारा ले लिया. वर्षा काल के मेघ नभ में छा गए हैं. धारासार जल बरस रहा है. रास्ते जलमग्न हो गए हैं. जो जहाँ हैं मानो वहीं कैद हैं. राम और लक्ष्मण भी इसी कारण ठहर गए हैं. राम लक्ष्मण को अनेक कथाएँ सुनाते हैं – भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की कथाएँ. चौमासे का हमारी परंपरा में ऐसा ही विधान रहा है. 

राम वार्तालाप शुरू तो अपने मनोभाव के उद्घाटन के साथ करते हैं – प्रियाहीन डरपत मन मोरा. लेकिन क्रमशः एक एक सोपान वे एक एक सूक्ति वर्षा के बहाने गढ़ने लगते हैं. इन सूक्तियों में जीवन के खट्टे मीठे जाने कितने अनुभव तुलसी ने गूँथ दिए हैं. लक्ष्मण ने कहा होगा राम के मन को अन्यत्र ले जाने के लिए – भैया! वह देखो बिजली चमकी, और गुम भी हो गई. राम अपने में डूबे कहीं भीतर से बोले होंगे - हाँ लक्ष्मण, दुष्टों का प्रेम स्थायी नहीं होता – खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं. कुछ देर बाद लक्ष्मण ने फिर प्रयास किया होगा – देखिए न! उस ओर बादल धरती के कितने नजदीक आकर बरस रहे हैं. भले लोग विद्या पाकर और भी झुक जाते हैं – राम ने कहा होगा. तभी मोटी मोटी बूँदों की बौछार हुई होगी – टपाटप टपाटप. लक्ष्मण फिर मचले होंगे - कहाँ खोए हो भैया? उधर पर्वतों पर जैसे वर्षा ने आक्रमण ही कर दिया; झमाझम तीर से बरस रहे हैं पर्वतों पर आसमान से. राम ने गहरी सांस ली होगी - दुष्टों के वचन सज्जन इसी तरह सह जाते हैं जैसे ये पर्वत बूँदों के प्रहार झेल रहे हैं. गुफा से बाहर आ गए होंगे दोनों भाई. अनुज ने अग्रज को वह पहाड़ी नदी दिखाई होगी जो कल तक बिलकुल सूखी थी और अब किनारों को तोड़कर उमड़ी पड़ रही है – अब इस क्षुद्र नदी के उफान को देखकर आप यही कहेंगे न कि दुष्टों को थोड़ा सा भी कुछ मिल जाता है तो इतराकर चलने लगते हैं. राम अनुज की इस चतुराई पर ईषत् मुस्काए होंगे. तभी लक्ष्मण ने ध्यान दिलाया होगा कि इधर मिट्टी से मिलकर पानी कितना गँदला हो गया है. और राम को कहते देर न लगी होगी – माया से लिपटकर जीव का यही हाल होता है. साथ ही यह भी बता दिया होगा कि सारा जल सिमट सिमटकर तालाबों को भर रहा है. जैसे सद्गुण सिमट सिमटकर सज्जन व्यक्ति के पास आ जाते हैं; और उफनाती हुई ये नदियाँ समुद्र की ओर दौड़ रही हैं जैसे जागृत जीव अपने इष्ट की ओर दौड़ता है, वहीं उसे चिर शांति मिलती है. लक्ष्मण ने सोचा होगा कि राम अधिक गंभीर होते जा रहे हैं, तो फिर से उनका ध्यान पलटाने के लिए कह बैठे होंगे – बरसात में घास भी तो इतनी बड़ी हो गई है कि रास्ता ही नहीं सूझता. और तुलसी के राम ने झट से जड दिया होगा – पाखंड बढ़ने से सद्ग्रंथ छिप ही जाते हैं – जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सद्ग्रंथ. हम यहाँ कहना चाहते हैं कि पाखंड और भ्रष्टाचार की घास जब बहुत ऊँची हो जाती है तो न्याय और संविधान लुप्त हो ही जाते हैं. 

वर्षा के इस वर्णन को आगे बढ़ाते हुए तुलसी ने मेंढ़कों की टर्र टर्र की तुलना वेद पढ़ते बटु समुदाय से की है. हमें लगता है, इसमें व्यंग्य है. परंपरा की रटंत शिक्षा मेंढ़कों की टर्राहट भर है – भले ही वह वेद क्यों न हो! इस ओर भी ध्यान दिलाया है उन्होंने कि वर्षा में वृक्ष नए पल्लवों से लद गए हैं, जैसे सच्चे साधकों को विवेक मिल गया हो. लेकिन वे यह भी बताते हैं कि अर्क और जवास भरी बरसात में पत्रहीन नग्न गाछ हैं. इसके लिए बहुत सुंदर उत्प्रेक्षा लाए हैं तुलसी. आक और जवास बिना पत्ते के हो गए हैं जैसे सुराज में दुष्ट जन बेरोजगार हो जाते हैं – जस सुराज खल उद्यम गयेऊ. धूल तो इस तरह गायब हो गई है जैसे क्रोध आने पर धर्म गायब हो जाता है. उपकारी की संपत्ति के समान शस्य श्यामला भूमि सुशोभित हो रही है. और हाँ, घने अंधेरे में रात भर जुगनू चमकते हुए भला कैसे लगते हैं? जैसे दंभियों का समाज आ जुड़ा हो और अपनी अपनी झूठी प्रशंसा कर रहा हो. 

आगे एक बड़ी पते की बात तुलसी बाबा कह गए हैं जो कम से कम हमारे तो दिल में चुभती है. भारी वर्षा के कारण खेतों की मेडें अर्थहीन हो गई हैं, निस्सीम पानी क्यारियों की सीमाएँ तोड़कर भरता चला जा रहा है – सब ओर पानी ही पानी है. और इसे देखकर तुलसी के राम को स्वतंत्र होने पर स्त्रियों का बिगड़ जाना याद आता है. 

बाबा तुलसी! आप तो ऐसे न थे! आप तो राम से पहले सीता को पूजते आए हैं. आपने तो अग्निपरीक्षा को भी पूर्व नियोजित नाटक की तरह प्रस्तुत किया है. और तो और, सीता परित्याग का जिक्र तक नहीं किया ‘मानस’ में. उधर बालकांड में ही उमा की विदाई के समय व्यथित माँ के मुँह से नारी जीवन के इस यथार्थ को कहलवा आए – ब्रह्मा ने सृष्टि में स्त्रियों को बनाया ही क्यों जबकि वे सर्वत्र पराधीन हैं और सपने में भी सुख नहीं पातीं? तब हे बाबा! आज इतने निष्ठुर कैसे हो गए स्त्री के प्रति कि उसकी स्वतंत्रता आपको भ्रष्टता दिखने लगी! ‘ताडन के अधिकारी’ वाली बात आपने खल रावण के पड़ोसी समुद्र के मुँह से कहलवाई थी इसलिए हम उसका बचाव करते रहे. पर यहाँ आपने राम के मुँह से कहलवा दिया. लगता है, रत्नावली के कॉप्लेक्स से आप कभी मुक्त नहीं हो पाए. वैसे अगर यहाँ स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना है, मर्यादाहीन होना है, अनुशासन का अतिक्रमण करना है तो ऐसा करने से तो कोई भी बिगड़ता है – नर हो या नारी. इसलिए यह लैंगिक भेदभाव आपको शोभा नहीं देता. वैसे हमारा कवि मन तो यही कह रहा है कि रचना की तरंग में ‘कियारी’ का तुक ‘नारी’ से मिला दिया होगा. पर ऐसे बेतुके तुक अनर्थ भी कर सकते हैं – और वह भी तब जब वे तुलसी जैसे कविर्मनीषीपरिभूःस्वयंभू के मुँह से निकले हों. क्षमा करना बाबा! आपके राम ऐसा वाक्य नहीं कह सकते! 

तुलसी के राम न्याय का सदा ध्यान रखते हैं. इसीलिए जब वे देखते हैं कि दूर दूर तक चक्रवाक का नामोनिशान नहीं है तो लक्ष्मण से कहते हैं – अन्याय का युग आने पर न्याय इसी तरह भाग जाता है. लेकिन फिर जब वे देखते हैं कि नाना प्रकार के जंतु समूह से पृथ्वी सुशोभित हो उठी है तो उन्हें याद आता है कि सुराज्य मिलने पर जनता इसी प्रकार समृद्ध होती है – प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा. 

तो हे आदरणीय पाठकगण! हम इस बरसात में यही कामना करते हैं कि देश में सुराज्य स्थापित हो और जनता की समृद्धि और संपन्नता में निरंतर इज़ाफ़ा हो. 

- ऋषभ देव शर्मा
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