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रविवार, 4 मार्च 2012

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में दूरस्थ शिक्षा कार्यशाला उद्घाटित

हैदराबाद, 4 मार्च, 2012.

आज यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में चार दिवसीय दूरस्थ शिक्षा संबंधी पाठ्यक्रम संशोधन कार्यशाला का उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ. समारोह की अध्यक्षता करते हुए ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक डा.राधेश्याम शुक्ल कहा कि वर्तमान युग में शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हो चुका है. उन्होंने याद दिलाया कि प्राचीन भारत में विद्यार्थी पूर्णकालिक छात्र के रूप में गुरुकुल में जाकर शिक्षा प्राप्त करते थे जबकि आधुनिक युग में शिक्षा संस्थाओं की स्थापना होने पर उन्हें विद्यालयी शिक्षा की सुविधा प्राप्त हुई. इससे आगे बढ़कर दूरस्थ माध्यम ने यह बीड़ा उठाया कि शिक्षा को स्वयं छात्र के दरवाजे पर पहुंचाया जाए. डा.शुक्ल ने कहा कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने एक सीमा तक हिंदी प्रचार के लिए आरंभ से ही यह तरीका अपनाया तथा अब इक्कीसवीं सदी में यह संस्था दूरस्थ माध्यम द्वारा विभिन्न विषयों की शिक्षा के प्रसार में तेजी से अग्रसर है. उन्होंने सभा के विभिन्न पाठ्यक्रमों की पाठ सामग्री की स्तरीयता और गुणवत्ता की प्रशंसा करते हुए कहा कि तेजी से बदलती हुई परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक़ इसे अद्यतन करना वास्तव में सराहनीय कदम है.

वर्धमान महावीर मुक्त विश्वविद्यालय, कोटा से पधारी डा.मीता शर्मा ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है और पाठ्यक्रम तथा पाठ सामग्री का निर्माण और संशोधन भी एक निरंतर चलता रहने वाला काम है जिसके सहारे हम बदलते हुए समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाते हैं. उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों के लोकसाहित्य के अध्ययन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि ऐसा करके हम भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों को अपने छात्रों के मानस में स्थापित कर सकते हैं. नए विमर्शों, मीडिया और सिनेमा को भी विभिन्न स्तरों पर पाठ्यक्रम से जोड़ने की बात डा.मीता शर्मा ने कही.

विशेष अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के प्रो.जे.पी.डिमरी ने दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में रूसी भाषा संबंधी अपने व्यापक अनुभव की चर्चा करते हुए सुझाव दिया कि पाठ सामग्री को नियमित अंतराल पर खंगालते रहना और प्रश्नावली को बदलते रहना दूरस्थ माध्यम की शिक्षा प्रणाली की जीवंतता के लिए जरूरी है. उन्होंने वस्तुनिष्ठ और बहुविकल्पी प्रश्नों के सहारे विद्यार्थी के ज्ञान और कौशल की परीक्षा के तरीकों पर भी चर्चा की.

आरंभ में आंध्र सभा के सचिव डा.पी.ए.राधाकृष्णन ने अतिथियों का भावभीना स्वागत किया और प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने कार्यशाला के प्रयोजन पर प्रकाश डाला. चार दिन की इस कार्यशाला में विशेषज्ञ विद्वानों के रूप में भाग ले रहे डा.हीरालाल बाछोतिया, डा,रामजन्म शर्मा, डा.एम.वेंकटेश्वर, डा.शकीला खानम, डा.पी.राधिका, डा.एम.एम.मंगोडी, डा.जी.नीरजा, डा.संजय मादार, डा.मृत्युंजय सिंह, डा.प्रवीणा बाई, डा.साहिरा बानू, डा.रामनिवास साहू और डा.मंजुनाथ अम्बिग के अतिरिक्त डा.गोरखनाथ तिवारी, डा.बी.सत्यनाराण, संपत देवी मुरारका, डा.अहिल्या मिश्र, डा.लक्ष्मीकान्तं, वी.कृष्णाराव, संतोष काम्बले, ए.जी.श्रीराम, प्रमोद, अलीखान, गणपत राव, जखिया परवीन, के.नागेश्वर् राव, सुरेश कुमार, रामकृष्ण, बलराम, मुरली, केशव, शिवकुमार, कदीर, लेस्ली तथा संस्थान के विभिन्न विभागों के अध्यापकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. कार्यक्रम का संचालन दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के सहायक निदेशक डा.पेरिशेटटी श्रीनिवास राव ने किया.
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