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मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

भारतीय परंपरा के उत्तराधिकारी कवि ओ.एन.वी.कुरुप

"उज्जयिनी नगर रत्‍नहारी था। कालिदास क्या उस सत्ता के छत्र चामर की वंदना करते हुए उनके आदेशानुसार काव्य सृजन करनेवाले कवि थे? क्या एक महान कवि सत्ता की शान भर बढ़ानेवाला अचेतन रत्‍न बना रह सकता है? ऐसे कविवर के विषय में हमारे जनश्रुति भंडार में कितने ही घृणित कथा बीज हैं। उज्जयिनी और कालिदास के परस्पर संबंध में प्रेम है, द्वेष भी। ‘उज्जयिनी’ एक दंभी तानाशाही है। कविता तो स्वच्छंद गति चाहनेवाली निरंकुशता है। सत्ता (शासक) हमेशा कवि को अपने मुकुट का मोरपंख बना लेना चाहती है। वह इच्छा असंभव प्रमाणित हो तो सत्ता कवि के चरित्र हनन की साजिश करती है। कालिदास की मृत्यु एक भवन में करनेवाली दंत कथा को और क्या कहा जा सकता है? आज भी सत्ताशाही का जो स्वरूप जारी है, ‘उज्जयिनी’ उसका प्रमाण है। सत्ता से राग-द्वेष का सम्मिश्र संबंध पालने का नसीब जिस किसी कवि के लिए बदा है, उसके आत्मसंघर्ष एवं संकट में कालिदास आज भी जिंदा हैं।"


ये विचार अभी हाल ही में 2007 के ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुने गए मलयालम साहित्यकार पद्‍मश्री ओ.एन.वी.कुरुप ने 1994 में प्रकाशित अपने दीर्घ काव्य ‘उज्जयिनी’ की भूमिका में व्यक्‍त किए हैं। सत्ता के साथ राग-द्वेष का द्वंद्वात्मक संबंध उनके इस काव्य की रीढ़ है और इसी के सहारे उन्होंने इतिहास और वर्तमान को जोड़ने का कवि कौशल सिद्ध किया है। वे संस्कृत भाषा और वाड.मय पर विशेष अधिकार रखने वाले ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अपनी समग्र प्रतिभा को अखिल मानवता के सरोकारों के नाम समर्पित कर दिया है। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जाना उन तमाम भारतीय साहित्य के अध्येताओं के लिए चरम हर्ष का विषय है जो साहित्य को भारतीयता की पहचान के रूप में देखना पसंद करते हैं। 

प्रो.ओ.एन.वी.कुरुप का जन्म केरल के कोल्लम जिले के चवरा गाँव में ओ.एन.कृष्‍ण कुरुप और के.लक्ष्मी कुट्टी अम्मा दंपति के घर 27 मई, 1931 को हुआ। ओ.एन.वी ने अर्थशास्त्र से बी.ए. और मलयालम साहित्य से एम.ए. करने के बाद 1957 से केरल के विभिन्न सरकारी कॉलेजों में अध्यापन किया। उन्होंने 1986 में सरकारी कॉलेज के मलयालम स्नातकोत्तर विभाग के प्रोफसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण किया। अनेक अकादमिक और साहित्यिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर रह चुके ओ.एन.वी. केरल कलामंडलम के भी अध्यक्ष रहे तथा इस प्रकार उन्होंने केवल लेखन तक अपने आपको सीमित न रखकर मलयालम भाषा और साहित्य के विस्तार केलिए भी निरंतर काम किया है।

ओ.एन.वी.कुरुप मूलतः कवि हैं और उन्होंने 25 से अधिक काव्यों की रचना की हैं जिनमें बाल गीतों से लेकर दीर्घ प्रबंध काव्य तक सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्‍त उनकी 6 गद्‍य कृतियाँ भी प्रकाशित हैं जिनमें उनका समीक्षक व्यक्‍तित्व दृष्‍टिगोचर होता है। उनकी विख्यात कृतियों में ‘उप्पु’(नमक), ‘करुतु पक्षियुटे पाट्टु" (काली चिड़िया का गीत) ‘भूमिक्क ओरु चरम गीतम्‌’ (पृथ्वी का शोक गीत), ‘अग्निशलभंगल’ (अग्निशलभ) ‘मृगया’, ‘उज्जयिनी’ और ‘स्वयंवरम्‌’ सम्मिलित हैं। उल्लेखनीय है कि कुरुप के ‘उज्जयिनी’ और ‘स्वयंवरम्‌’ शीर्षक काव्यों को हिंदी जगत में अत्यंत लोकप्रियता प्राप्‍त है। इन दोनों काव्यों का हिंदी अनुवाद क्रमशः डॉ.एन.ई.विश्वनाथ अय्यर और डॉ.एस.तंकमणि अम्मा ने किया है। इनके अतिरिक्‍त कुरुप के एक गीत संग्रह का अनुवाद हिंदी जगत को डॉ.कुट्टन पिल्लै के माध्यम से उपल्ब्ध हो चुका है। साम्य ने ‘ओ एन वी की मलयालम कविताएँ ’ शीर्षक से तथा भारतीय ज्ञानपीठ ने ’दर्शन’ शीर्षक से उनकी कविताओं के हिंदी अनुवाद प्रकाशित किए हैं। कुरुप की कृतियाँ कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। 

उल्लेखनीय है कि आठ वर्ष की आयु में ही कुरुप ने अपने पिता को खो दिया था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा गाँव के सरकारी स्कूल में ही हुई। उन्होंने स्कूल काल में ही कविताएँ रचना आरंभ कर दिया था। पंद्रह वर्ष की आयु में उनकी पहली कविता ‘मुन्नोत्तु’(अग्रसर) एक स्थानीय साप्‍ताहिक में प्रकाशित हुई तथा पहला कविता संग्रह अठारह वर्ष की आयु में ‘पोरुतुन्ना सौंदर्यम्‌’(प्रतीक्षारत सौंदर्य) शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उनकी प्रारंभिक कविताओं का संग्रह ‘दाहिकुन्ना पानपात्रं’(प्यासा प्याला) शार्षक से प्रकाशित हो चुका है जिसमें 1946-1956 काल की कविताएँ संकलित हैं। 

महान साहित्यकार कुरुप को मलयलाम सिनेमा, नाटक और एलबम क्षेत्र के शीर्षस्थ गीतकारों में गिना जाता है। केरल के क्रांतिकारी आंदोलन को स्वर प्रदान करने वाले केरल जन कला मंच से उनका लंबा जुड़ाव रहा है। 1956 में ‘कालम्‌ मरुन्नु’(समय बदलेगा) नामक फिल्म के माध्यम से मलयालम फिल्म प्रेमियों ने उन्हें पहली बार जाना। तब से अब तक वे 232 फिल्मों के लिए 900 से अधिक गीत लिखकर अप्रतिम लोकप्रियता अर्जित कर चुके हैं। उन्हें सलिल चौधरी, एम.बी.श्रीनिवासन, जी.देवराजन, वी.दक्षिणामूर्ति, एम.एस.बाबूराय, येशुदास आदि अनेक नामी गिरामी फिल्मी हस्तियों के साथ काम करने का मौका मिला। 

आरंभ से ही ओ.एन.वी.कुरुप का रुझान प्रगतिशील आंदोलन की ओर रहा। उनका यह रुझान केवल बौद्धिकता और लेखन तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक - राजनैतिक क्षेत्र में भी उन्होंने पर्याप्‍त सक्रियता का परिचय दिया है। उन्होंने 1989 में तिरुवनंतपुरम्‌ से ‘लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट’ के प्रत्याशी के रूप में लोक सभा चुनाव भी लड़ा। 

साहित्य और कला जगत में कुरुप को पर्याप्‍त ख्याति और सम्मान प्राप्‍त है। उन्हें केरल की साहित्य अकादमी ने 1971 में और केंद्रीय साहित्य अकादमी ने 1975 में पुरस्कृत किया। 1998 में उन्हें ‘पद्‍मश्री’ से अलंकृत किया गया। अब तक 13 बार वे केरल राज्य के सर्वश्रेष्‍ठ फिल्म गीतकार का पुरस्कार प्राप्‍त कर चुके हैं। 1981 में ‘उप्पु’ (नमक) पर उन्हें सोवियत  लैंड नेहरू पुरस्कार मिला। इसके अलावा अन्य अनेक पुरस्कार, सम्मान और उपाधियाँ उन्होंने अर्जित की हैं। और अब भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ 2007 केलिए उन्हें दिए जाने की घोषणा की गई है।

जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कुरुप के दीर्घ काव्य ‘उज्जयिनी’ ने विभिन्न भाषाओं के साहित्य रसिकों का ध्‍यान विशेष रूप से आकर्षित किया। कालिदास और उनके समय को केंद्र में रखकर रचित अखिल भारतीय महत्‍व के इस दीर्घ काव्य की लोकप्रिता का अनुमान इस तथ्‍य से किया जा सकता है कि प्रकाशन के प्रारंभिक तीन वर्षों में इसके छह संस्करण निकल गए थे। प्रगतिशीलता का अंतरराष्‍ट्रीय मानवतावाद में पर्यवसान करनेवाले कुरुप संगीत और ताल पर अद्‍भुत अधिकार रखते हैं। ‘उज्जयिनी’ में उनकी यह प्रतिभा शिखर पर है। अनुवादक प्रो.एन.ई.विश्वनाथ  अय्यर ने इस छंदोबद्ध तथा द्राविड संगीत व ताल लय के धनी काव्य का अनुवाद करते समय यह स्वीकार किया है कि इसका समांतर रूप हिंदी में प्रस्तुत करना कठिन है। सत्ता और कवि के द्वंद्वात्मक संबंधों पर केंद्रित इस काव्य की रचना में कवि को कई वर्ष लगे। इस दौरान उन्होंने उज्जैन की यात्रा भी की और विभिन्न स्रोतों से आधार सामग्री भी संकलित की। कालिदास के साहित्य में प्राप्‍त अंतःसाक्ष्यों के आधार पर रचित इस काव्य को निःसंकोच कालिदास का ग्रंथावतार कहा जा सकता है। इसे कवि ने 14 सर्गों में विभक्‍त किया है - एकांत का कारावास, प्रथम अंकुर, नीड़ पक्षी का दुःख नहीं जानता, काव्य पथिक के दृश्‍य मंड़ल, देवतात्मा की गोद में, फिर से मालव को, उज्जयिनी को, रंगोत्सव का ध्वजारोहण, श्याम याम, रत्‍न परीक्षा, उज्जयिनी से विदा, कश्‍चित्‌ कांताविरहगुरुणा, फिर से उज्जयिनी को और शिबिका की गाथा। 

‘उज्जयिनी’ काव्य की प्रसंगगर्भिता इसे विशेष मार्मिकता प्रदान करती है। यह कालिदास के बहाने भारतीय साहित्य और संस्कृति का पुनर्पाठ है। इसमें कहीं रघुवंश और अभिज्ञान शाकुंतल तो कहीं कुमारसंभव और मेघदूत की ध्वनियों को बजते हुए सुना जा सकता है। और साथ ही इतिहास तथा दंतकथाओं का पुनराख्यान भी - 

" सम्राट विक्रमादित्य आज इस निर्धन कवि को भी
मित्र नरेशों के स्तर का सम्मान दे रहे हैं।
इससे बढ़कर धन्यता क्या हो सकती है?
इससे बढ़कर पुरस्कार अभिनंदन का कैसा हो?
मगर हर्ष की चाँदनी कवि के मुखमंडल पर
क्यों नहीं खिली?
मुख पर स्वाभिमान के आक्रोश की लाली निखरती
कवि अपनी हैसियत भूले बिना मौन रहे।
वे विश्राम नहीं कर रहे हैं
मन के तनाव को दबा रहे हैं
हृदय सागर की तरंगों को
शांत करती आत्मशांति को
प्राणों से फूँक-फूँक उज्ज्‍वल बना रहे हैं।"

इसी प्रकार ‘स्वयंवरम्‌’ भी भारतीय साहित्य के अध्येताओं के बीच अतिचर्चित काव्य रहा है। इस मिथकीय काव्य रचना में गालव और माधवी की महाभारतीय कथा के माध्यम से नारी हृदय की वेदना का मर्मस्पर्शी पाठ रचा गया है। जैसा कि डॉ.के.श्रीलता विष्‍णु कहती हैं, "चिरंतनकाल से अपनी अंतर्व्यथाओं को पूरी निःशब्दता से भोगने और पुरुष की स्वार्थ भूमिका को सजाने के लिए भारतीय नारी मानो बदी हुई है। उसके पक्ष में खड़े होने और उसकी अंतर्वृत्तियों में झाँककर उनके मूलवर्ती कारणों की छानबीन करने का काम बहुत कम कवियों ने किया है। यदि वे करते तो उनकी आर्द्र मानवीयता और ज्वलंत मन्यु भावना अवश्‍य जाग्रत होती और आगे चलकर वह नारी की विह्‍वलताओं को एक हद तक कम करने में सहायक भी होती। ओ.एन.वी. द्वरा उसके लिए महाभारत से स्वीकृत स्त्री पात्र है माधवी जो महाभारत की नाति प्रशस्त किंवा अप्रशस्त गालव कथा की नायिका है।" ओ.एन.वी. ने ‘उज्जयिनी’ की भाँति ‘स्वयंवर’ में भी अनेक नवीन उद्‍भावनाएँ की हैं। दस सर्गों के इस काव्य के आरंभ में ही कवि ने जो अर्धनारीश्वर शिव तथा द्रौपदी की लाज बचानेवाले कृष्‍ण के साथ महाभारत के विभिन्न नारी चरित्रों का स्मरण किया है। इससे कवि के स्त्री विमर्श के वैशिष्‍ट्‍य को समझा जा सकता है - "भारतं पूजिच्चु वंचिच्चु निन्दिच्चो -/ रायिरं नारिमारक्केन्‌ तिरुवाष्‌त्तुकल।" 

माधवी ययाति की पुत्री है। ययाति से गालव अपने गुरु को दक्षिणा देने केलिए आठ श्‍यामकर्ण घोड़े माँगता है। सर्वस्व दान कर चुके ययाति उसे अपनी बेटी सौंप देते हैं। तीन राजाओं के पास एक एक वर्ष केलिए माधवी को रखा जाता है। बदले में गालव को हर एक से दो सौ घोड़े मिल जाते हैं। हर राजा माधवी के गर्भ से एक एक पुत्र पाता है। तीन वर्ष बाद उसे लेकर गालव अपने गुरु के पास पहुँचता है। शेष दो सौ घोड़ों के बदले वह एक वर्ष गुरु की भी अंकशायिनी बनती है और उसका भी एक बच्चा जनती है। ऋण मुक्‍त होने पर वह अंततः गालव को प्राप्‍त होती है जो उसे ययाति को लौटा देता है और ययाति उसके स्वयंवर का पाखंड रचता है। स्वयंवर में सारे पूर्व पति भी आते हैं, लेकिन माधवी किसी का भी वरण न करके जंगल की राह पकड़ लेती है। कवि ने अनेक स्थलों पर माधवी के क्षोभ को व्यक्‍त किया है। ऐसा लगता है कि माधवी द्वारा जंगल का वरण करना इस सत्य की घोषणा है कि शिष्‍ट और सुसंस्कृत कहे जानेवाले भद्रलोक में ही वे सारे जंगली जानवर बसते हैं जो स्त्री का हर प्रकार से रक्‍तपान करते हैं और इस भद्रलोक की अपेक्षा वन स्त्री केलिए अधिक सुरक्षित है - 

" हे विश्‍वपालको! विदा!
मेरा स्वयंवर हो गया निर्णीत
मैं करती हूँ वरण इस वन का।
- माधवी चल पड़ी
जैसे कोई सम्राट
विजेता होकर
लौट रहा हो रणभूमि से।"

इसमें संदेह नहीं कि ओ.एन.वी.कुरुप सही अर्थों में भारतीय परंपरा के कवि हैं, व्यास और कालिदास के उत्तराधिकारी हैं, भारतीय कवि हैं। आशा की जानी चाहिए कि उनकी सभी श्रेष्‍ठ रचनाएँ अनुवाद के माध्यम से हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के पाठकों तक पहुँचेंगी और भारत की सामासिक संस्कृति की पुष्टि करेंगी। 






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