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बुधवार, 25 मई 2022

आज़ादी आंदोलन : दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार और हिंदी पत्रकारिता

 


बीज व्याख्यान

आज़ादी आंदोलन : दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार और हिंदी पत्रकारिता

-        ऋषभदेव शर्मा

 

सबसे पहले तो आपको इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए इतना प्रासंगिक और विचारोत्तेजक विषय चुनने के लिए साधुवाद। इस विषय के स्पष्टतः तीन आयाम हैं। पहला आयाम है 'आजादी आंदोलन' दूसरा 'दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार' और तीसरा 'दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता'

मेरा विचार है कि 'आजादी आंदोलन' शब्द-युग्म बहुत सोच-समझ कर बनाया गया है। इसी प्रकार का प्रयोग है- 'आज़ादी का अमृत महोत्सव'  जब हमअमृत महोत्सवजैसे तत्सम शब्द-युग्म का प्रयोग कर रहे हैं तो 'स्वतंत्रता' का प्रयोग करके 'आज़ादी' को रखा गया है। इस मिश्रित शब्द-चयन की जड़ आज़ादी की लड़ाई के साथ-साथ विकसित हुए हिंदी आंदोलन के इतिहास में है। भाषा, पत्रकारिता, समाज और राजनीति के तत्कालीन चिंतकों ने यह महसूस किया कि अखिल भारतीय सार्वदेशिक संपर्क की भाषा से लेकर स्वाधीनता संग्राम की राष्ट्रभाषा तक के रूप में हिंदी की स्वीकार्यता तभी संभव है, जबकि वह संस्कृतनिष्ठ और अरबी-फारसीनिष्ठ होने के आग्रह से मुक्त रहे। इसीलिए भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महात्मा गांधी और प्रेमचंद तक ने जन-प्रचलित हिंदी के मध्यमार्ग को चुना। बाद में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 351 के तहत इसे ही भारत करे सामासिक संस्कृति के अनुरूप सब भाषाओं से शब्द और अभिव्यक्तियाँ लेते हुए इस तरह विकसित करने की बात कही गई कि हिंदी की प्रकृति सुरक्षित रहे। तो, मेरी समझ में 'आज़ादी आंदोलन' पद हिंदी प्रचार आंदोलन की इसी सर्वसमावेशी दृष्टि का प्रतीक है। इसी दृष्टि का परिणाम।है कि हमअमृत महोत्सवजैसा एक सांस्कृतिक या संस्कृतनिष्ठ पद लेकर आते हैं और उसके साथआजादीजोड़ते हैं। समन्वय की इस चेतना की आज बड़ी जरूरत है, क्योंकि कई तरह के शुद्धतावादी जड़ आग्रह परिवेश को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं।  इसीलिए मैं कहना चाहूँगा कि  आजादी आंदोलनशब्द-युग्म वास्तव में इस देश की बहुलतावादी और समन्वयवादी संस्कृति को प्रतिबिंबित करता है। जो हमारी सांस्कृतिक पुष्ट परंपरा है और जो दैशिक अथवा देशज परंपरा है, उन दोनों को परस्पर जोड़कर  इस राष्ट्र की सामासिक संस्कृति का निर्माण होता है। हमारी सामासिक संस्कृति की विशेषता है कि उसमें किसी प्रकार की हठधर्मिता और शुद्धतावाद के लिए जगह नहीं। बल्कि एक-दूसरे को ग्रहण करने की भावना, सर्वग्राह्यता या ग्राहकता अंतर्निहित है। भारतीय संस्कृति की जो ग्राहकता, समन्वयशीलता और  मिश्रणशीलता है, वह आजादी जैसे उर्दू या अरबी-फारसी मूल से आए शब्द और आंदोलन जैसे संस्कृत परंपरा से आए शब्द, इन दोनों, के गले मिलने से तैयार होती है।

यही वह हिंदुस्तानी परंपरा है जो हमें यह बताती है किआजादी आंदोलनहमारे 'नवजागरण आंदोलन' का विस्तार है। नवजागरण आंदोलन     को  राजा राममोहन राय या आर्य समाज या ब्रह्म समाज या नारायण गुरु या रवींद्रनाथ या भारतेंदु हरिश्चंद्र या गुरजाड़ा अप्पाराव से लेकर सुब्रह्मण्य भारती तक ने अपने-अपने ढंग से नेतृत्व प्रदान किया।  वह एक प्रकार से इस देश को जड़ रूढ़ियों से मुक्त करने का आंदोलन था। सोए हुए राष्ट्रीय-सांस्कृतिक गौरव को जगाने का आंदोलन था।    स्वाभिमान जागने पर गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होने की चेतना तो बाद में आई।  पहले तो हमारी जो सामाजिक रूढ़ियाँ थीं, जड़ रूढ़ियाँ थीं, जो अशिक्षा के कारण या कहें मध्यकालीन चेतना के परलोकवाद, पुनर्जन्मवाद इत्यादि के हमारे मानस पर हावी होने के कारण हमारी गुलामी का मूल कारण बनी हुईं थीं, उन बेड़ियों को तोड़ने और काटने का काम नवजागरण आंदोलन कर रहा था।  उस नवजागरण आंदोलन के बीचोंबीच 1857 का हमारा प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष उपस्थित होता है। इसके बाद कंपनी के हाथ से विक्टोरिया के हाथ में भारत की बागडोर चली जाती है और उपनिवेशवाद या औपनिवेशिक शासन अपना नंगा नाच दिखाना शुरू करता है। तो हमाराआजादी आंदोलनआगे चलकर औपनिवेशिक शासन के विरोध के लिए उठ खड़ा होता है। इसीलिए आजादी आंदोलन के  एक पक्ष को मैं नवजागरण आंदोलन के विस्तार के रूप मे आपके सामने रखना चाहता हूँ। साथ ही यह कि औपनिवेशिक शासन और औपनिवेशिक मानसिकता के विरोध की चेतना जगाने में स्वभाषा और पत्रकारिता आंदोलन ने भी केंद्रीय भूमिका निभाई। हमारे आज़ादी आंदोलन का सबसे बड़ा श्रेय यही है कि हमारे देश को हमारे इस आंदोलन ने 'भयमुक्त' कर दिया। हमारे पास दुनिया की सबसे विराट औपनिवेशिक सत्ता से टकराने के लिए गोला-बारूद नहीं था। गोला-बारूद की ताकत पर लड़ते, तो इतिहास कुछ और होता। ठीक है, वैसे भी लड़े हैं।  लेकिन गोला-बारूद से ज्यादा महत्वपूर्ण था, हमारा सिर उठाकर खड़े होना। जब कोई गुलाम सिर उठाकर खड़ा होता है किसी मालिक के सामने; उसकी आँखों मे आँखें डालकर बात करता है तो सामने वाला क्रोध में, अपमान में, प्रतिहिंसा में तिलमिला उठता है। आपको कुछ करने की जरूरत नहीं ! सबसे बड़ी चीज यही है कि कोई जेलेंस्की किसी पुतिन के सामने आँख दिखाकर खड़ा हो जाए। दुनिया भर में यही होता है हमेशा। आक्रमणकारी हों, उपनिवेशवादी हों, साम्राज्यवादी हों- वे सारी ताक़तें जिस एक बात से क्रोध में आती हैं, वह है आपका स्वाभिमान। तो, हमारे आजादी आंदोलन ने इस देश के आबाल-वृद्ध-नर-नारी को भयमुक्त कर दिया। एक वैदिक उद्घोष हैयतेमहि स्वराजये अर्थात हम स्वराज के लिए सदा यत्न करें। यह एक प्रतिज्ञा नवजागरण के आंदोलन से आगे बढ़कर आजादी के आंदोलन ने इस देश के प्रत्येक नागरिक के मन में प्रतिष्ठित कर दी।  स्वतंत्रता की इस चेतना को गांधीजी या उनसे पहले तिलक ने इस देश की नसों में प्रवाहित किया। उनसे भी पहले हिंदी नवजागरण की हम बात करें  या दूसरे प्रांतों के जागरण की बात करें; बंगाल से लेकर के केरल और तमिलनाडु तक सर्वत्र स्वदेशी, स्वराज्य और स्वभाषा- इन तीनस्वकी चेतना को नवजागरण आंदोलन ने पूरी तरह से जगा दिया था। यह काम उस समय का साहित्य और उस समय की पत्रकारिता कर रही थी।

अब थोड़ी चर्चादक्षिण भारत में हिंदी प्रचारकी। दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार की क्या आवश्यकता थी, इस प्रश्न का उत्तर भी आज़ादी आंदोलन के इतिहास में ही छिपा है।  1857 के स्वतंत्रता संग्राम के असफल होने (या कुचल दिए जाने) के कारणों में एक बड़ा कारणसंप्रेषण की कमीथा। क्योंकि हम अलग-अलग भाषाओं में अपने-अपने क्षेत्रों में तो आंदोलन का संचालन कर रहे थे, लेकिन सारे देश का- सारे प्रांतों का जो कोऑर्डिनेशन होना चाहिए था, उस समन्वय की कमी के कारण, संप्रेषण की कमजोरी के कारण, हमारा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम असफल हुआ। अन्य कारण और भी हैं। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि पूरे देश में चिंगारी अलग-अलग रूप में फूटी। ये सारी की सारी चिंगारियाँ एकान्वित नहीं हो सकीं। ये गजल के अलग-अलग शेरों की तरह बिखरा हुआ प्रभाव उत्पन्न कर सकीं। गीत के एक सूत्र में पिरोए अलग-अलग बंधों की तरह मिला हुआ एकान्वित प्रभाव ये चिंगारियाँ उत्पन्न नहीं कर सकीं। इसका कारण था - संप्रेषण की कमी। इसीलिए यह महसूस किया गया कि आज़ादी आंदोलन के लिए एक राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। इसका चरम हमें महात्मा गांधी के उन भाषणों में देखने को मिलता है जो कर्नाटक, इंदौर और भरूच में उन्होंने दिए। अखबारों के माध्यम से भी उन्होंने इस विषय पर व्यापक विमर्श किया कि - इस देश की राष्ट्रभाषा क्या होनी चाहिए?  उसमें कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए? इसके लिए उन्होंने पाँच सूत्र भी दिए। तब एक साल के मंथन के बाद चाहे वे कांग्रेस के अधिवेशन रहे हों, चाहे हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन रहे हों; उनमें यह स्वीकार किया गया कि इस देश की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी किसी भी प्रकार हो ही नहीं सकती क्योंकि उसमें वे पाँचों ही विशेषताएँ नहीं पाई जातीं। दूसरे कि, जो हमारी भारतीय भाषाएँ हैं, उनमें ही वह सामर्थ्य है कि वे इस देश के हर प्रांत के लोगों को जोड़नेवाली भाषा की भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन उनमें भी स्वतंत्रता आंदोलन के बीच में हमें जब यह काम करना है कि सारे भारतवासियों को आपस में जोड़ सकें, उसके लिए हमें एक ऐसी भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में चाहिए थी जिसे अमलदारों के लिए सीखना आसान हो, जिसे अधिक से अधिक लोगों (हिंदीतर भाषियों को) को कम से कम समय में सिखाया जा सके, जिसके लिए किसी प्रकार का तात्कालिक स्वार्थ ध्यान में रखा जाए और जिसके माध्यम से इस देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की ज्ञान-संपदा को, सभी प्रकार की चेतना को अभिव्यक्त किया जा सके। यह भी ज़रूरी समझा गया कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों, ताकि कम लोगों को उसे आरंभ से सीखने की ज़रूरत हो। और तब पाया गया कि हिंदी इन सब दृष्टियों से भारत के लिए सबसे अधिक समर्थ राष्ट्रभाषा हो सकती है। इस तरह राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्वीकार करने के बाद 1918 मेंदक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभाकी स्थापना हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय के रूप में की गई। आगे चलकर इसेदक्षिण भारत हिंदुस्तानी प्रचार सभाकहा गया। बाद में 'हिंदुस्तानी' को 'हिंदी' कर दिया गया। मैंने जानबूझ कर आरंभ में जोआजादी आंदोलनशब्द-युग्म की बात उठाई थी, उसका आशय इस ओर इशारा करना था कि महात्मा गांधी 'दक्षिण भारत हिंदुस्तानी प्रचार सभा' कहने के पक्षधर थे। अर्थात उन्हें हिंदी का वह रूप राष्ट्रभाषा के रूप में ज़्यादा पसंद था जिसमें तो उर्दू यानी  फारसी-अरबी के प्रति आग्रह हो, संस्कृत के प्रति आग्रह हो, बल्कि जो बोलचाल के उस मार्ग को स्वीकार करे जिसे आमफहम भाषा कहा जाता है।

इस प्रकार, 1857 से सीख लेकर और महात्मा गांधी के पाँच सूत्रों से अनुप्राणित होकर के 'सभा' की स्थापना की गई। एक प्रकार से दक्षिम भारत में हिंदी प्रचार को 'रचनात्मक कार्य' का अनिवार्य अंग बना दिया गया। महात्मा गांधी ने रचनात्मक कार्य के जो 'एकादश व्रत' स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़कर के दिए थे; उन 11 व्रतों में एक है- ‘स्वदेशीस्वदेशी' और 'स्वराज्यदोनों की सिद्धि के उन्होंनेस्वभाषाको अपनाने पर ज़ोर दिया। कहा जा सकता है कि हिंदी प्रचार आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए गांधी-खादी-हिंदी - ये सब एक तरह से पर्याय थे; भारतीय राष्ट्रीयता के अनन्य प्रतीक थे।  1918 से चला यह हिंदी प्रचार का रथ संपूर्ण दक्षिणावर्त की यात्रा करता हुआ आज भी निरंतर गतिमान है और भारत जननी को एक-हृदय बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा रहा है - एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एक-हृदय हो भारत जननी!

विचारणीय विषय का तीसरा पक्ष है हिंदी पत्रकारिता। नहीं; इसे पूर्वपक्ष के साथ जोड़कर देखना होगा। अर्थातदक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता’! गौरतलब है कि 2021, 2022 या आनेवाला 2023 जो भी वर्ष कह लेंयह पूरा समय दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी का वर्ष है। इसका मध्य बिंदु 2022 हाने से इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में आज़ादी आंदोलन और हिंदी प्रचार के संदर्भ में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता पर विमर्श बेहद प्रासंगिक है। यहाँ से यह संदेश भी पूरे देश में जाना चाहिए कि "इस वर्ष को भारत भर में 'दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता की शताब्दी' के रूप में मनाया जाए!"

स्मरणीय है कि हिंदी पत्रकारिता का आरंभ भले हम 'उदंत मार्तंड' से स्वीकार करें या उससे भी पहले असम से प्रकाशित एक ईसाई मत प्रचारक अल्पज्ञान हिंदी पत्र से मानें। लेकिन दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में  हिंदी पत्रकारिता का वास्तविक उद्भव और विकास हिंदी प्रचार आंदोलन के आरंभ होने के बाद ही हुआ। इस लिहाज से 1921 और 1922 की अवधि दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता का आरंभ-बिंदु है।

आप जानते हैं कि पूरे हिंदी क्षेत्र में आजादी और नवजागरण की चेतना को जगाने का भारतेंदु मंडल ने कार्य किया।  भारतेंदु मंडल के तमाम रचनाकार पत्रकार भी थे। हिंदी पत्रकारिता का जन्म ऐसे समय हुआ जब देश में स्वतंत्रता की चिंगारी जाग रही थी और ऐसे समय में हिंदी पत्रकारिता को निखरने का स्वर्णिम अवसर उस आंदोलन के बीच में मिल गया। इधर दक्षिण में 1918 में हिंदी आंदोलन का उदय हो रहा था और उसे गति देने के लिए हिंदी पत्रकारिता की आवश्यकता थी। यह अलग बात है कि जब हम हैदराबाद या तेलंगाना-आंध्रप्रदेश की बात करें तो यहाँ निजाम शासन काल में जो दमन था उसका विरोध करने के लिए हिंदी पत्रकारिता ने एक विद्रोही तेवर स्वीकार किया। यहाँ तक कि भूमिगत पत्रिकाएँ यहाँ से निकलीं। लेकिन विशेष रूप से तमिलनाडु से जो हिंदी पत्रकारिता आरंभ होती है, वह हिंदी प्रचार के निमित्त ही आरंभ हुई थी।| तिलक युग और गांधी युग जिन्हें हम हिंदी पत्रकारिता ही नहीं, भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण युग मानते हैं, उनके बीच में यह दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता तमिल क्षेत्र में निखरकर सामने आई। यहाँ अत्यंत वरिष्ठ अथवा प्रथम पंक्ति के हिंदी प्रचारक आर. सारंगपाणि के ऐतिहासिक महत्व के आलेखदक्षिण की हिंदी पत्र-पत्रिकाएँका हवाला ज़रूरी है।  मैं इसके कुछ अंशों को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जिससे दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के शताब्दी वर्ष का औचित्य और हमारे आज के विषय की प्रासंगिकता दोनों स्पष्ट होंगे।

महात्मा गांधी का, हिंदी आंदोलन का और स्वतंत्रता आंदोलन का संबंध कैसे है यह इस आलेख के पहले ही वाक्य से व्यक्त हो जाता है।महात्मा गांधी द्वारा प्रवर्तित हिंदी प्रचार आंदोलन जब दक्षिण में जोर पकड़ने लगा तब उस आंदोलन के अग्रणियों को सहज ही आनंद होने लगा। उन्होंने अपने आनंद का अनुभव समस्त दक्षिण में फैले हुए अपने अन्यान्य साथियों और सहयोगियों के साथ ही करना चाहा। प्रचारकों ने चाहा कि विभिन्न केंद्रों में प्रचार की परिस्थितियों, प्रगति के विवरणों और अपने-अपने अनुभवों के संबंध में वे आपस में चर्चा करें और आगे का कार्यक्रम बनाने में उससे लाभ उठाएँ।यानी हिंदी पत्रकारिता की जरूरत क्यों महसूस हुई दक्षिण में, वह यहाँ बताया जा रहा है।हिंदी सीखने वाले लोगों ने चाहा कि अपनी पाठ्य-पुस्तकों के अलावा हिंदी की कुछ पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ें और अपनी हिंदी योग्यता बढ़ा लें। प्रचार आंदोलन के संचालकों ने अपनी सेवाओं को कुछ व्यापक, सबल और सामान्य रूप देने का एक सक्षम साधन चाहा बस। सबों की इच्छाओं और माँगों की पूर्त्ति करते हुके प्रचार आंदोलन को व्यापक एवं सामान्य रूप देकर पुष्ट करने के उद्देश्य से मद्रास से एक हिंदी पत्रिका चलाने पर सब जगह ज़ोर दिया जाने लगा। किसी आंदोलन की सिद्धियों पर उत्सव मनाना, प्रगति के विवरण प्रकाशित कर लोगों को प्रोत्साहित करना, खुले तौर पर उसकी समस्याओं की चर्चा करना, सामान्य रूप देकर व्यापक बना देना- ये सब सभा के प्रचार तंत्र के ही भिन्न-भिन्न पहलू होते हैं।  इसीलिए उन्होंने बहुत दूरदर्शिता के साथ निश्चय किया कि दक्षिण मेंहिंदी प्रचार आंदोलनके पोषण के लिए मद्रास से कोई पत्रिका चलाई जाये। फलस्वरूप संवत 1979 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन जनवरी 1923 में मद्रास मेंहिंदी प्रचारकका जन्म हुआ। बाद में यह पत्रिका बंद हो गई और फिरहिंदी प्रचार समाचारके नाम से यह पत्रिका आज तक प्रकाशित होती है। इसलिए जनवरी 1923 हमारे दक्षिण भारत के हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में मील का पत्थर है। और अब हम उसके शताब्दी वर्ष में गए हैं। वैसे तोहिंदी प्रचारक को दक्षिण से निकली पहली हिंदी पत्रिका नहीं कहा जा सकता। उसके जन्म से करीब तीन साल पहले ही हिंदुस्तानी सेवा दल की तरफ से डॉ. एन. एस. हार्निकर के संपादकत्व मेंस्वयंसेवकनामक हिंदी-अंग्रेजी पत्रिका हुबली से निकलने लग गई थी, जो करीब 10 साल तक निकली थी। फिर उसी समय मद्रास के साहूकार पेट से कांग्रेस प्रचार के लिए उत्साही हिंदी विद्वान श्री क्षेमानंद राहत के संपादकत्व में निकले हिंदी साप्ताहिकतिलकका भी उल्लेख होना चाहिए|’

इस प्रकारस्वयंसेवक', 'तिलक' और 'हिंदी प्रचारक’- ये पत्रिकाएँ 1921 से 1923 की कालावधि में ही आरंभ हुईं। इसीलिए 2022 को दक्षिण भारत के हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के शताब्दी संदर्भ का केंद्रीय वर्ष कहा जा सकता है| आप इसके एक वर्ष पहले भी जा सकते हैं और एक वर्ष आगे भी जा सकते हैं। (कोरोना के कारण सब कार्य बाधित हुए होते, तो इस शताब्दी समारोह का समारंभ संभवत: 2021 में ही होना पूर्णतः सटीक होता!)

आर. सारंगपाणि ने आगे बताया है कि 'हिंदी प्रचारक' के संपादक हुआ करते थे ऋषिकेश शर्मा 'तैलंगऔर इसके प्रकाशक के रूप में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रचार कार्यालय, ट्रिप्लीकेन, मद्रास का इसके ऊपर उल्लेख था। आवरण के भीतरी पृष्ठ पर 'हिंदी प्रचारक' के तीन मुख्य उद्देश्य अंकित थे-

पहला उद्देश्य था- दक्षिण भारत में राष्ट्रभाषा हिंदी-हिंदुस्तानी का प्रचार करना।  ध्यान रखें आज जब आप हिंदी आंदोलन की बात करते हैं, हिंदी-हिंदुस्तानी प्रचार की बात करते हैं, जन-गण-मन की बात करते हैं या वंदे मातरम की बात करते हैं- इनका उल्लेख करना भी उस जमाने में 'राजद्रोह' हुआ करता था। यह कोई साधारण काम नहीं था, स्वतंत्रता आंदोलन का एक अंग था और इसके लिए हिंदी प्रचारकों को ब्रिटिश शासन द्वारा प्रताड़ित भी किया जाता था।

दूसरा उद्देश्य था- दक्षिण के आंध्र-तमिलनाडु-केरल और कर्नाटक इन प्रांतों में 'ज़ोर-शोर से शांतिपूर्वक' हिंदी प्रचार का आंदोलन और संगठन करना। याद रहे कि गांधीजी का निर्देश था कि हिंदी प्रचारकों को जेल जाने से बचना है। स्वतंत्रता आंदोलन के पहली पंक्ति के लोग सत्याग्रहों के कारण जब जेल में हुआ करते थे,  तब ये हिंदी प्रचारक बाहर रह करके पूरा भूमिगत स्वतंत्रता आंदोलन अपने कंधों पर संभालते थे। इसीलिए मैंने पहले ही कहा है कि हिंदी आंदोलन दक्षिण में वास्तव में आजादी आंदोलन का एक अनिवार्य और अभाज्य अंग रहा है और उसका मूलमंत्र यही रहा है कि अपना काम 'ज़ोर-शोर' से करो लेकिन 'शांतिपूर्वक करो', उग्रता के साथ नहीं। गिरफ्तार होने से बचना ज़रूरी था, ताकि आंदोलन चलता रहे!

तीसरा उद्देश्य था इस पत्रिका का-  दक्षिण भारत के सरकारी तथा देशी राज्यों के स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और जातीय संस्थाओं  के समाजों के (प्रांतीय कार्यों को छोड़कर) देशव्यापी कार्यों में हिंदी-हिंदुस्तानी को उचित स्थान दिलाना। कहना होगा कि भारत की जो राजभाषा नीति बाद में निर्मित हुई, उसका मूल यहाँ पर ही है।  गांधी की नीति में उसका मूल है- आपको राज्यों के लिए अलग-अलग राजभाषा चाहिए, लेकिन एक सार्वदेशिक भाषा (पूरे देश के लिए एक भाषा) चाहिए थी, जिसे राष्ट्रभाषा कहा गया। अतः हिंदी का काम करते हुए प्रांतीय भाषाओं का संरक्षण भी इस पत्र का एक उद्देश्य था। आज भी दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विविध पाठ्यक्रमों में प्रांतीय भाषा का पर्चा इसीलिए शामिल है। इस पूरे आंदोलन का ध्येय दक्षिण में हिंदी को रोपना रहा है; थोपना नहीं!

पत्रिका (हिंदी प्रचारक) के उस प्रथम अंक में प्रकाशित अपने शुभ संदेश में साहित्य सम्मेलन प्रयाग के तब के प्रधानमंत्री श्री ब्रजराज ने दक्षिण के प्रचारकों से अपील की थी कि उतना शक्तिशाली काम करें कि शीघ्र ही सम्मेलन को दक्षिण भारत में अपना काम समाप्त कर उन-उन प्रांतवासियों के हाथ में हिंदी प्रचार का कार्य सौंपने का सुअवसर प्राप्त हो।' यह बड़ा महत्वपूर्ण था। वे लोग जानते थे कि कल को कुछ लोग कहेंगे कि हिंदी अपना साम्राज्यवाद थोप रही है; इसलिए उन्होंने कहा कि  प्रयाग का कार्यालय अपना काम समेटकर प्रयाग जाये और दक्षिण में हिंदी आंदोलन का कार्य स्वयं दक्षिण के हिंदी प्रचारक सँभाले। बाद में ऐसा ही हुआ भी।  दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने  ऐसे अनेक समर्थ हिंदी प्रचारकों का निर्माण किया और इसमें हिंदी पत्रकारिता का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा कि वे अपनी अखिल भारतीय पहचान निर्मित कर सके।

कुल मिलाकर, दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के शताब्दी वर्ष में या आजादी आंदोलन के अमृत वर्ष में आज  फिर  उसी 'ज़ोर-शोर' और 'शांति' के साथ पूरे भारत में नए सिरे से एक और हिंदी आंदोलन की ज़रूरत है। यह भी कि आज दक्षिण की तुलना में उत्तर को हिंदी आंदोलन की अधिक आवश्यकता है, ताकि लोगों के मन-मस्तिष्क में जमे बैठे हुए भाषायी उपनिवेशवाद को  खुरच-खुरच कर निकाला जा सके। 000

(24 से 27 मार्च, 2022 तक पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया गया ऑनलाइन बीज व्याख्यान।

रिकॉर्डिंग के आधार पर लिप्यंकन : डॉ. चंदन कुमारी। संपर्क: chandan82hindi@gmail.com)

रविवार, 17 अप्रैल 2022

… नित प्रति धोक हमारा हो!

 


… नित प्रति धोक हमारा हो!

  • ऋषभदेव शर्मा


"पंच परमेष्ठी, गुरुवर शि. प्र. सिंह, आ. ह. प्र. द्विवेदी एवं अन्य सभी मेरे नमनीय अथ च प्रिय बने, सभी का स्मरण व नमन कर लिया है। 


-दास कबीर जतन ते ओढ़ी, जस की तस धर दीनी चदरिया-  लेकिन मेरी चादर बहुत मैली है-  इसमें मेरा दोष नहीं, फिर भी रखनी है ही। निराशा नहीं है- आशा है। यह तो लिख दिया है; चूँकि भविष्य समय के हाथ है। वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्ख शतान्यपि- सो मेरे पास है। मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ।


स हि गगनविहारी ज्योतिषां मध्यचारी।

दशशतकरधारी कल्मषध्वंसकारी।।

विधुरपि विधियोगात् ग्रस्यते राहुणासौ। 

लिखितमपि ललाटे प्रोज्झितं कः समर्थः।।


देवराज! ऋषभ!

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित्दुःख भाग भवेत् ।।

(आशा है, स्वस्थ होगे।)


सन्तानवत् शिष्य-शिष्याएँ एवं सन्तान प्रगतिपथ पर बढ़ें! भवितव्यता बलवती होती है। भ्रातृज-परिवार श्रेष्ठ है। मनोनुकूल है। हिमांशु, श्रद्धा साहस से काम लेना है। आशीष!


प्रिय गजेन्द्र-हेम-शिशु; प्रिय पूनम एवं अन्य सभी-सभी आगन्तुकों-शुभेच्छुओ को बहुत-बहुत आभार। 


दिनांक 23 सितम्बर, 2001:

2 बजकर 6 मिनट।"


      (डॉ. प्रेमचंद्र जैन, हम तो कबहुँ न निज घर आये: 2007, पृष्ठ 54)


… अर्थात, पूज्य गुरुदेव डॉक्टर प्रेमचंद्र जैन को ओपन हार्ट बायपास सर्जरी के लिए जाते समय अपनी आत्मज संतानों के साथ ही अपने शिष्यों का भी पूरा पूरा खयाल था। सर्जरी सफल रही। गुरुदेव स्वस्थ होकर घर आए। पूरे दो दशक उसके बाद वे प्रत्यक्ष रूप से हमें आशीर्वाद देते रहे। लेकिन एक दैनिक समाचार पत्र के हाशिये पर, नर्स से लिए बॉलपेन से   अंकित, इस ऑपरेशन से पूर्व का उनका यह बयान उनके हृदय की विशालता का ही प्रतीक नहीं, हमारे (खास तौर से मेरे!) प्रति उनके अहेतुक स्नेह का घोषणापत्र भी है। ठीक है कि उन्होंने उस क्षण में डॉक्टर देवराज को याद किया। देवराज और पीसी जैन एक जमाने में पर्याय की तरह जाने जाते थे न! लेकिन मुझ अकिंचन का स्मरण क्यों किया होगा, यह समझने में मैं असमर्थ हूँ। मैं तो प्रायः उन्हें बस दूर- दूर से देखते रहने वाला चकोर भर था! प्रोफेसर देवराज अगर यह पुस्तक (हम तो कबहुँ न निज घर आये, 2007, रुड़की: सिद्धांताचार्य पंडित फूलचंद्र शास्त्री फाउंडेशन) मुझे न भेजते और भाई दानिश जी ने कुछ लिखने को बार-बार न कहा होता, तो शायद इस प्रसंग से में अनजान ही रह जाता। गुरुदेव ने इस कथन को इस पुस्तक में 'मृत्यु-पूर्व सही होश-ओ-हवास में दिए गए लिखित बयान' के रूप में उद्धृत किया है। इसके पुनरवलोकन को उन्होंने 'आत्म-परीक्षण करने का सुअवसर'  माना है। इससे उन्हें 'संस्कारों को शाणित करने का भरपूर सुयोग'  मिला और वे जीवन और मृत्यु के द्वंद्व से ऊपर उठ सके। आयु के अंतिम दो दशक उनके भीतर दिव्य आभा के प्राकट्य के वर्ष थे। इस अवधि में वे सचमुच 'प्रेम' का सर्वसुखकर 'चंद्र' बन गए थे। राहु भी अब उन्हें नहीं ग्रस सकता था- विधुरपि विधियोगात् ग्रस्यते राहुणासौ! 'हम तो कबहुँ न निज घर आए' इसी आत्म-परीक्षण और दिव्यता के अवतरण का साक्ष्य है। इस कृति के बहाने संत वाणी के निरंतर चिंतन-मनन-कीर्तन से वे समस्त कषायों और कल्मषों से मुक्त हो गए। यह कृति उनके पवित्र और निष्कलुष हृदय की वाणी है। बालपने से ही अपने अत्यंत प्रिय कविवर दौलतराम जी की रचनाओं के सहारे इस कृति में उन्होंने अपनी अध्यात्म यात्रा में भी पाठकों को शामिल होने का शुभ अवसर दिया है। ऐसी गहन अनुभूतिप्रवण रचना पर कुछ कहने-लिखने की अपनी अपात्रता से मैं परिचित हूँ, इसीलिए टाल रहा था। लेकिन अग्रजों के आदेश का पालन न करूँ तो अपराध होगा, इसलिए ये कुछ शब्द …! 


कहूँ तो ज़्यादती नहीं होगी कि इस पुस्तक के हर पन्ने से गुरुदेव झाँक रहे हैं और हर शब्द में सीधे हमसे बतिया रहे हैं। उन्हें 'निज घर' न पहुँच पाने की कवि दौलतराम की पश्चात्ताप-जनित छटपटाहट और मर्मांतक वेदना अपनी वेदना महसूस होती है। यही वेदना अंततः उन्हें वेदना से मुक्ति के उस आकाश तक ले गई, जहाँ मुक्त आत्माओं का 'निज घर' है। अंतर्वेदना के समान धरातल को पाने के लिए वे बार-बार अतीत में गोता लगाते हैं और संतवाणी का कोई ऐसा सुथरा मोती खोज लाते हैं जिसकी आब में परमतत्व के चिन्मय आलोक की मृदु-मधुर अनुभूति मिलती है। यह ऐसी भाव दशा है जब साधक 'भवसागर के मिथ्या दुःखों-सुखों को छोड़कर सच्चे सुख को भक्ति के माध्यम से प्राप्त करने का लक्ष्य' साध लेता है। अपनी इस उपलब्धि को इस कृति के माध्यम से वे हम सबको (लोक को) सौंप गए हैं। 


तीर्थंकरों, संतों और भक्त कवियों के हवाले से इस कृति में लेखक ने 'निज घर' तक पहुँचने की राह में महाठगनी माया से बचने और पिंड छुड़ाने का सीधा सा तरीका गब्बर सिंह के स्टाइल में बताया है- 'जो सम्यग् रत्न त्रय के दुर्गम पथ पर निडर होकर  बढ़ गया, वह तर गया।' (वरना तो, जो डर गया, समझो, मर गया!) दर्शन-ज्ञान-चरित्र के इस सम्यग् मार्ग का प्रतिपादन करते हुए लेखके ने सर्वत्र स्वानुभव पर ज़ोर दिया है और गतानुगतिकता से बचने की सलाह दी है। वे मानते हैं कि किसी विशेष तापमान की अग्नि में तपने के बाद स्वर्ण कुंदन बनता है, तो किसी विशेष दबाव के कारण कोयला हीरा बन जाता है। इसी तरह अध्यात्म के शिखर पर अवस्थित 'निज घर' तक आने के लिए 'पर घर' तो छोड़ना ही पड़ेगा। तप-साधना-आराधना के बिना आत्म-कल्याण संभव नहीं। यहीं डॉ. प्रेमचंद्र जैन यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि 'निज घर' की तलाश में निकलने वाले को पाखंडों के पचड़े से भी बचना होगा। वे बताते हैं, "जैन दर्शन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण में मेरी आस्था है। पाखंड, द्वेष, मतवाद, जाति-वर्णवाद के पचड़ों में मेरा विश्वास नहीं है।… निर्ग्रंथ गुरु एवं देव-शास्त्र मेरे उपास्य हैं। अनेकांतवाद का दृष्टिकोण शिरोधार्य है।" यही कारण है कि दौलतराम के काव्य-स्फटिक में उन्हें मानव संस्कृति की तमाम उदात्त छवियाँ अलौकिक नृत्य करती दिखाई देती हैं। कोई आग्रह-पूर्वाग्रह-दुराग्रह नहीं। ज़ोर है तो बस अनुभव पर- "जीवन में अनुभव इसलिए भी सार तत्व हैं, क्योंकि इन्हीं से स्वयं आत्मा से आत्मा की पहचान और उसी आत्मा में परमात्म-तत्व की व्याप्ति दिखाई देती है।" तभी तो किसी कबीर को वह सबसे न्यारा निज घर मिलता है जहाँ 'पूरन पुरुष हमारा' निवास करता है! गुरुदेव अपने पाठकों को उस घर का बोध कराना चाहते हैं- 'जहँ नहिं सुख-दुख साँच-झूठ नहिं, पाप न पुन्न पसारा!'


'निज घर' न आने का सीधा सा कारण है, 'पर घर' में भरम जाना, रम जाना। इसी का नाम आत्म-विस्मृति है। लेखक ने कई रोचक दृष्टांत देकर जीव के स्मृति-लोप के इस रोग की पहचान कराई है। पहचान होगी, तभी तो इलाज किया जा सकेगा। रोग बड़ा गहरा है। तन या मन नहीं, आत्मा का। "संसार का यही खेल है। जीव को आत्म-जागीर प्राप्त हुई है। वह सांसारिक बंधनों के कारण मोह-नींद से नहीं जाग पाता। उसकी सारी की सारी आत्म-जागीर आत्म-विस्मृति रूपी बकरी चट कर जाती है।  विषय-वासनाओं के रूप में बकरियों का दल अपने पीछे दौड़ता रहता है। हमारी मोह-नींद नहीं टूटती। आत्म-विस्मृति के कारण ही यह जीव अनादिकाल से भटक रहा है।" जीव अगर यमराज के भयावह नगाड़ों की गर्जना सुन ले, तो संसार की असारता और अपनी भ्रम-नींद का बोध हो जाए। बुद्ध और सिद्ध बनने की राह इसी बोध से जाती है। लेखक कविवर दौलतराम की आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाकर चेताते हैं- 


जम के रव बाजते, सुभैरव अति गाजते।

अनेक प्रान त्यागते, सुनै कहा न भाई।।


'बोध' प्राप्त होने पर 'बुद्धिमान' (धी-धारी)जीव संसार की नश्वरता और मोहजाल में न फँसकर  मोक्ष-मार्ग के राही बन जाते हैं। पेंच यहीं तो फँसा है। किसी के चेताने से कहीं बोध होता है? नहीं। वह तो खुद के जागने से संभव है। इसीलिए पांडित्य का अर्थ बोध नहीं है। वह तो बोझ भर है। पंडित सकल शास्त्र की व्याख्या भले कर लें, अगर नहीं जानते कि देह में ही बुद्ध का वास है, तो आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते। निर्वाण के लिए पांडित्य नहीं, वह बोध ज़रूरी है जो कर्म-निर्जरा का आधार बन सके। यह तब तक संभव नहीं, जब तक जीव 'पर घर' को 'निज घर' 'माने बैठा' है। कवि दौलतराम का यह अमर गीत अगर एक बार भी 'अनुभव' में आ जाए, तो यह 'मान' बैठने की जड़ता टूट सकती है- 


"हम तो कबहुँ न निज घर आये।

पर घर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये।।

पर पद निज पद मानि मगन ह्वै, पर परनति लपटाये।

शुद्ध बुद्ध सुख कंद मनोहर, चेतन भाव न भाये।।

.......

यह बहु भूल भई हमरी फिर, कहा काज पछताये।

'दौल' तजौ अजहुँ विषयन को, सतगुरु वचन सुहाये।।

हम तो कबहुँ न निज घर आये।"


गुरुदेव जैन-दर्शन की बारीकियों की सरल व्याख्या करने के बाद दौलत-वाणी का मर्म समझाते हैं - दूसरों के घरों में घूमते-घूमते हमने अनंत काल बिता दिया। वहाँ-वहाँ न जाने कैसे-कैसे नाम रखे गए। हम अपने घर कभी नहीं आए। अध्यात्मपरक भाव यह है कि कवि निरंतर आत्मा में पछताता है और व्यग्र होता है कि यह भूल क्यों हो गई कि मैं अपने स्वरूप को न पहचानने के कारण अनादि काल से ही भटकता फिर रहा हूँ। फिर भी आत्म- परिणति प्राप्त नहीं कर सका। पर-परिणतियों में ही घूमते हुए न जाने कितने भव व्यतीत हो गए, फिर भी निज घर नहीं आया! साथ ही यह बोध भी कि इसी भूल ने हमारा विनाश किया है। अब यह समझ में आने के बाद पछताते हुए हाथ पर हाथ रखे बैठने से भी क्या लाभ? जितनी वेदना झेलनी थी, कहीं  उससे अधिक पापड़ बेल चुके। हम अपने सतगुरु के उपदेश पर विश्वास करते हुए आज भी विषयों को त्याग कर सांसारिक आसक्ति-मोह आदि पर-पदार्थों से दूर हो लें, तो कोई कारण नहीं कि हमारी इस भूल में सुधार न हो। हमें निराश होने का कोई कारण नहीं है। लेकिन जागना तो हमीं को पड़ेगा। किसी और के जागे हमारी मुक्ति न होगी। यहाँ आकर डॉ.  प्रेमचंद जैन  कविवर दौलतराम को गोस्वामी तुलसीदास की वाणी में इस तरह पहचानते हैं-  अब लौं नसानी, अब न नसैहौं।/  राम-कृपा भव-निशा सिरानी, उर-कर तैं न खसैंहौं।। 


अंततः इतना ही कि इस आत्मबोध की सिद्धि और मृत्युभय पर विजय के बाद उपलब्ध 'ऋषित्व' का प्रसाद है गुरुदेव की यह कृति- 'हम तो कबहुँ न निज घर आये'। उन्होंने स्वानुभूति से, आत्मानुभव से 'निज घर' को भली प्रकार चीन्ह लिया था। एक बार पहचान हो गई, तो 'धी-धारी' इस जगत में न 'राचता' है, न 'नाचता' है। वह आत्मा-राम ही तो अनासक्त भाव से कर्म-निर्जरा और जीवन्मुक्ति को उपलब्ध हो पाता है! यह ग्रंथ गुरुदेव  के जीते-जी  'निज घर' आने की 'साखी' है। कविवर दौलतराम के शब्दों में-


'दौलत' ऐसे जैन जतिन को,

नित प्रति धोक (नमन) हमारा हो! 000


  • ऋषभदेव शर्मा

208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद- 500013. मो. 8074742572. rishabhadeosharma@yahoo.com 

इतिहास हुआ एक अध्यापक/ संपादक- दानिश सैफ़ी/ अविचल प्रकाशन, ऊँचा पुल हल्द्वानी-263139/ 2022/ कुल पृष्ठ 414 / द्रष्टव्य पृ.143-147.


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

पुस्तक: खींचो न कमानों को


'खींचो न कमानों को' 6 सितंबर, 2021 से 20 जनवरी, 2022 तक की अवधि में ज्वलंत समसामयिक मुद्दों पर लिखी मेरी दैनिक वैचारिक टिप्पणियों में से चयित सत्तर का संकलन है। इससे पहले इस शृंखला के 5 संकलन आ चुके हैं- संपादकीयम्, समकाल से मुठभेड़, सवाल और सरोकार, लोकतंत्र के घाट पर (इलेक्शन गाथा), कोरोना काल की डायरी। आशा है, उनकी तरह इसे भी सुधी पाठकों का स्नेह मिलेगा।


इन टिप्पणियों को हैदराबाद से प्रकाशित प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'डेली हिंदी मिलाप' ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर स्थान दिया, इस हेतु मैं समस्त 'डेली हिंदी मिलाप' परिवार के प्रति कृतज्ञ हूँ। उन सब सयानों के प्रति तो आभारी हूँ ही जिनका विचार-ऋण मुझ पर है। प्रेम बना रहे! साभार…

  • ऋषभ

वसंत पंचमी

5 फरवरी, 2022.

लिंक: खींचो न कमानों को