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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

जीवनेच्छा और लोक लगाव के गीतकार ईश्वर करुण

बिहार में जन्मे ईश्वर करुण (1957) लगभग तीस वर्ष से चेन्नै में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं. उन्होंने गीत और नवगीत की पुनः प्रतिष्ठा के लिए बहुत काम किया है और अपने गीतिकाव्य द्वारा साहित्यिक मंचों व पत्र-पत्रिकाओं में एक सुनिश्चित स्थान प्राप्त किया है. ईश्वर करुण के गीतों में वैयक्तिक अनुभूतियों की गहराई और जीवनराग के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना के स्वर मुखर हुए हैं. वे जनकल्याण में आस्था रखने वाले और वैश्विक मानवता की प्रतिष्ठा चाहने वाले ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने कॉरपोरेट जगत की चकाचौंध के पीछे दौड़ते उत्तरआधुनिक मनुष्य को साधारणत्व के सुख की महिमा बतानी चाही है और कहा है कि जब भी स्वार्थ का व्याकरण घायल करे तो तुम भूखे नंगे फकीरों को चूम लो. गलाकाट प्रतिस्पर्धा से भरे हुए धूर्त वातावरण की पहचान वे कटाक्ष और व्यंग्य के साथ करते हैं और ध्यान दिलाते हैं कि झूठ और सच, ज्योति और तम तथा दान और धन के बीच खतरनाक गठबंधन के युग में रिश्ते नाते हाथ से छूटते जा रहे हैं. परंतु अपराजेय जीवनेच्छा से भरा कवि इस सब के बीच जब यह कहता है कि ‘चलते चलते चरण जब भी घायल करें साथ के राहगीरों को तुम चूम लो’ तो सहज ही उसकी यह मुद्रा ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ का ही नया पाठ रचती प्रतीत होती है.

सहयात्रियों से प्रेम का यह दर्शन कवि करुण को प्रकृति और मनुष्य दोनों से गहरा लगाव देता है. उनके गीतों में एक खास तरह की सम्बोध्यता है जिसके तहत कवि एक हद तक फकीराना अंदाज में पाठक को सतर्क करता है कि नेह के नगर में विश्वास की धरोहर को लुटने से बचाना तुम्हारी अपनी जिम्मेदारी है. इस जिम्मेदारी के तहत रागात्मक संवेदनाओं का संरक्षण और संपोषण भी शामिल है. यह तभी संभव है जब हम लोक से जुड़े रहें. लोक का जुड़ाव करुण के गीतों में कहीं काँटों के सकुचाने, सन्नाटों के सोहर गाने, गुलमोहर और अमलतास द्वारा बंजरों में वसंत लाने के लिए उपासना करने के रूप में तो कहीं प्रेमिका के टेसू और प्रेमी के हरा आंवला बनने के रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त करता है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इन अभिव्यक्तियों में ताजगी और टटकापन है जो पाठक और श्रोता और बाँधने में समर्थ है. 

ताजगी और टटकापन करुण के गीतों में अभिनव प्रतीक योजना व शब्दों के नए सह-प्रयोगों द्वारा भी आता है. कई बार तो वे शरारतपूर्ण सह-संयोजन से ऐसा कटाक्ष करते हैं कि बस क्या कहिए! प्रेम की यात्रा का चाँद के पार तक जाना, परंपरा विहित प्रयोग हो सकता है, लेकिन जब कवि साँसों को अभियान देने की बात कहता है और अस्तित्व के कल्पना चावला की तरह विलीन होने की भविष्यवाणी करता है तो सारा शब्द व्यापार सही रूप में रमणीय अर्थ का प्रतिपादक बन जाता है. इसी प्रकार चंडीगढ़ और अबोहर के एक साथ प्रेम की हवा में जीने से जुड़ी ध्वनि का राजनैतिक प्रसंगगर्भत्व गीत के फलक को समकालीनता से जोड़ता है. इतना ही नहीं, विहंसते कल की उज्ज्वल संभावना को हर गाँव के मनोहर रामराज्य के स्वप्न के रूप में अंकित करते हुए करुण जी जब यह कहते हैं कि ‘पीढ़ियों के पुण्य को प्रपंच घेर पाए ना / कान्हा की बांसुरी को कंस टेर पाए ना’ – तो वे प्रकारांतर से जन-गण को जागरण और संघर्ष का सन्देश देते प्रतीत होते हैं. इस संदर्भ में कवि का यह मानुष अहं प्रत्येक सवतंत्रचेता नागरिक का प्रण होना चाहिए – ‘’ईश ने जीवन दिया जब,/ ताप मैंने वर लिया तब,/ घर्ष से उत्कर्ष लूंगा,/ मैं न कोई दान लूंगा.’’

ईश्वर करुण की रचनाएँ उनके ‘तूती चुप मत रहना’, ‘पंक्तियों में सिमट गया मन’, ‘एक और दृष्टि’, ‘ईश्वर करुण के लोकप्रिय गीत’ और ‘चुप नहीं है ईश्वर’ शीर्षक संग्रहों में सम्मिलित हैं. यहाँ हम ‘भास्वर भारत’ के पाठकों के लिए उनके कुछ चुनिंदा गीत प्रस्तुत कर रहे हैं.

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ *


प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया
डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया 

जन्म तिथि : 2.2.1926  ('अभिनव प्रसंगवश' के विशेषांक में डॉ. कमल सिंह ने सूचना दी है कि डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया की 86वीं वर्षगाँठ 2.2.2012 को मनाई गई)  अथवा 6.11.1927 (प्रमाणपत्रों में).

निधन  : 21.11.2013.
.
काव्यभाषा विषयक अध्येय ग्रंथ :
हिंदी काव्य भाषा की प्रवृत्तियाँ, कैलाश चंद्र भाटिया,
1983, तक्षशिला प्रकाशन
// कुल 22 निबंध//

प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया का भाषाचिंतन : काव्यभाषा का संदर्भ 

काव्यभाषा के अध्ययन का निजी मॉडल

आधार = अनुभूति और अभिव्यक्ति की अन्योन्याश्रयता
              ऐतिहासिक भाषाविज्ञान
              हिंदी भाषा का विकास : वर्तन बिंदु (turning points).
 वैशिष्ट्य :
1. साधारणता की ओर : तद्भवता और देशजता की प्रवृत्ति
2. हर निबंध में सूत्र रूप में निर्भ्रांत लेखकीय स्थापनाएँ  (शब्दों की मितव्ययिता)
3. काव्यभाषा में प्रतीक
4. काव्यभाषा में विशेषण
[1] हिंदी भाषा का विकास : तद्भवता / साधारणता की ओर प्रस्थान

काव्यभाषा के विकास में हिंदी के सभी उप-रूपों ने – खड़ीबोली, ब्रजभाषा, अवधी आदि – पूरा पूरा योग दिया है. काव्यभाषा के रूप में जनभाषा ही समय समय पर अपनाई गई जिसको अधिकांश कवियों ने ‘भाषा’ ही कहा. मध्यदेश के ही नहीं, भारतवर्ष के सभी अंचलों ने इसको आगे बढ़ाया है. (अपनी बात)
रोड़ा कृत राउलवेल :

निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पश्चिमी रूपों की बहुलता के कारण यह रचना पश्चिमी हिंदी का पूर्व रूप है जिस पर अन्य प्रादेशिक रूपों की यत्र तत्र छाया है. (11 वीं शती)

Ø प्राकृत अपभ्रंश काल में व्यंजनों का लोप
हंसगइ (हंसगति), सरउ-जलय (शरद-जलद), रोमराइ (रोमराजि), रयणि (रजनी),

Ø हकार का प्राधान्य
सोह (शोभा), नाह (नाथ), मुह (मुख), पहिरणु (परिधान)

पृथ्वीराज रासो :

13 वीं शती
तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी)

चंदायन :
पुरानी अवधी

विद्यापति :

पदावली की भाषा ‘देशी’ ठहरती है = मैथिली = तत्कालीन जनभाषा
विद्यापति की भाषा जन जन की भाषा थी. तब ही तो ‘देसिल बअना’ का प्रयोग किया गया जो उन दिनों लोकजीवन में प्रचलित जनसाधारण की भाषा थी और आज की हिंदी का आदि रूप.

कबीर :

भाषा का अन्नकूट रूप – पूर्वी, खड़ीबोली, पंजाबी, ब्रजभाषा, राजस्थानी
वस्तुतः कबीर द्वारा प्रयुक्त पंचमेली सुधुक्कडीभाषा ही उस समय की जन जन की भाषा थी जिसमें पूर्वी रूपों की अपेक्षा पश्चिमी रूपों, ब्रजभाषा तथा खड़ीबोली की प्रधानता थी.

जायसी : पद्मावत :

ठेठ अवधी = जो बोली लोक में समझी जाती थी. (जनभाषा)
मानस की अवधी से भिन्न
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार

तुलसी :

मुख्य समस्या = संस्कृत बनाम लोकभाषा = दुशाला बनाम कमली
का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए सांच
काम जु आवे कामरी, का लै करिज कुमांच
सार्थक शब्द चयन :
हनुमान = वानर, मरकट, कपि, बंदर (उत्पात), मारुत सुत, पवन कुमार, पवन सुत (सम्मान), प्रभंजनजाया (पराक्रम की पराकाष्ठा)

सूर :

सूर शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता

किसी भाषा की श्रेष्ठता का मानदंड केवल यह है कि उस भाषा में हम सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को व्यक्त कर सकें
= सूर और सूर की ब्रजभाषा दोनों समर्थ

देखना क्रिया :

अंग्रेजी = see, behold, look, perceive, watch, take notice

सूर = देखि, विलोक, निरखि, पलक, भुलोन, चितवति, दृष्टि रही, देख्यो, नैन भुलाने, झांकति, दर्शन, झखति आदि + नैन व्यापार पर 250 मुहावरे

v लोकोक्ति, मुहावरे – सैंकडों
ऊधो अब कुछ कहत न आवे /
सिर पर सौति हमारे कुबिजा /
चाम के दाम चलावे.

मीराँ :

तद्भव शब्दावली – 70-75%
सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक शब्दावली

बिहारी :

सूर, नंददास आदि अष्टछाप के कवियों ने जिस ब्रजभाषा को काव्य में चलते रूप में प्रयुक्त किया उसे बिहारी ने सुष्ठु एवं परिमार्जित किया.

गुरु गोबिंद सिंह :

टकसाली ब्रजभाषा + शैलीगत भेद : पंजाबी की विशेष छटा
चंडीचरित्र में पंजाबीपन तो इतना नहीं है पर खड़ीबोली की झलक स्थान स्थान पर अवश्य है जिसे कवि ने ‘रेखती शैली’ नाम दिया.
भाखा सुभ समकर हो घरि हो कृत्ति में
(ऐसी भाषा जो सबके लिए शुभ हो - का प्रयोग मैं अपनी कृति में कर रहा हूँ)
भाषा/ भाखा का आधार तद्भव शब्दावली है – पुरख, कालुख, बरखा, सीख, सिख, पुरुखत कुरुखेत
लोकोक्ति, मुहावरे
युद्ध वर्णन में सूदन, भयानक व रौद्र में भूषण, लालित्य में देव, अनुप्रास में पद्माकर, अभिव्यक्ति में घनानंद की भाषा का सा आनंद.

घनानंद :

लाक्षणिक उक्तियों और अभिव्यंजना कौशल के कारण रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि
सूर ने जिस ब्रजभाषा को काव्य का माध्यम अपनाया उसी को घनानंद ने व्यवस्थित रूप दिया.

तद्भव प्रियता – अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं
लोक शब्दावली – घनानंद के हाथों में आकार साहित्यिक बन गई
§ सल (ज्ञान, मालूम), संजोअे (संध्या का अंतिम भाग), लघेरि (लपेटकर), उजैना (उद्यापन करना), न्यार (चारा), पैछर (पैर की आवाज), झारां (सब के सब), ओटपाय (उपद्रव), टेहुले (शुभावसर के अनुष्ठान), गरैंठी (पूरे भरे पात्र से कुछ कम) आदि

मुहावरे, कहावतें =जीवित भाषा के प्राण
घनानंद सिद्धहस्त उस्ताद हैं.

ब्रज की टकसाली भाषा के समर्थक.

मैथिलीशरण गुप्त :

आपने खड़ीबोली के खड़ेपन, कर्कशता तथा परुषत्व को दूर कर उसे मधुरता और कोमलता प्रदान की.
शुद्ध परिष्कृत काव्योचित  बनाया
बोलचाल की सामान्य शब्दावली के साथ संस्कृत शब्दावली अपनाकर काव्य भाषा को समृद्ध किया.
लड़खड़ाती भाषा मिली थी – सौष्ठवमय बना दिया

सियारामशरण गुप्त :

एक साथ पद्य तथा गद्य में समान अधिकार रखने वाले सियारामशरण जी जैसे साहित्यकार कम हैं.
गद्य साहित्य में भी उनका कवि रूप छलका है.

जयशंकर प्रसाद : 

तद्भव शब्दावली के प्रयोग से यदि भावाभिव्यक्ति में सरलता होती है तो आप तत्सम के स्थान पर तद्भव का प्रयोग ही अच्छा समझते थे.
परस (स्पर्श), नखत (नक्षत्र), किरन (किरण), पीर (पीड़ा), थिर (स्थिर), साँझ (संध्या), तीख (तीक्ष्ण), सपना (स्वप्न), निबल (निर्बल), सुहाग (सौभाग्य), रात (रात्रि), नाच (नृत्य) आदि

प्रारंभिक कृतियों में ब्रजभाषा
बाद में बनारसी प्रयोग अधिक.

निराला : 

भावानुसार भाषा
भाषा का चलता रूप

लोक प्रचलित मुहावरों से युक्त भाषा प्रयोग में उनका व्यक्तित्व झांकता है
निराला की भाषा एक आदर्श भाषा है जिसने हिंदी के परिनिष्ठित रूप के विकास में पर्याप्त योग दिया.

अज्ञेय : 

नई कविता की भाषा के लक्षण -
साधारण बोलचाल की भाषा
मुहावरे और पद विन्यास
सीधे जीवन से ली हुई तद्भव शब्दावली
देहात की भाषा का मुहावरा
तद्भव प्रयोग – दुःख सबको माँजता है (माँजना)

[2] निर्भ्रांत सूत्रात्मक लेखकीय स्थापनाएँ

रोडाकृत राउलवेल : शिलांकित काव्य – 11 वीं शती :
राजकुल विलास = राजभवन की रमणियों का वर्णन
हिंदी भाषा का विकास पथ और भी अधिक स्पष्ट करने में सहायक
विचारणीय प्रश्न = किस प्रदेश विशेष की भाषा
सर्वाधिक बाहुल्य पश्चिमी और मध्यवर्ती रूपों का. (पछाहीं अपभ्रंश का प्रभाव – शिवप्रसाद सिंह)

चंदवरदाई : पृथ्वीराज रासो – 13 वीं शती :

 तत्कालीन ब्रजभाषा (पश्चिमी हिंदी) = प्राचीन ब्रजभाषा = पिंगल
प्राचीन प्राकृताभास शब्दों की बहुलता + अरबी फारसी का मिश्रण

मौलाना दाऊद चंदायन - 14 वीं शती :

पाठ संपादन से जुड़े रहे
चंदायन की भाषा पुरानी अवधी है जिस पर पश्चिमी हिंदी का प्रभाव है.

रत्नाकर : उद्धव शतक :
भाषा की कारीगरी

जयशंकर प्रसाद : 

निराला के गीत संग्रह ‘गीतिका’ के प्रारंभ में प्रसाद ने काव्यभाषा की चार विशेषताएँ बताईं –
(1) नई पद योजना = वर्णों का भास्वर प्रयोग
(2) नई शैली = मूर्तिमती व्यंजना + नए प्रतीक
(3) नया वाक्य विन्यास = अपूर्ण वाक्य
(4) आभ्यंतर भावों के लिए शब्दों की नई भंगिमा - 
शब्दों के नवीन सार्थक प्रयोग
अनेकार्थवाची शब्दों में से समुचित शब्द का प्रयोग
शब्दों के सटीक प्रयोग – संज्ञा, विशेषण, क्रिया आदि.
छायामयी वक्रता के लिए ‘सर्वनाम’ का प्रयोग
समुचित उपनामों का प्रयोग
वैदग्ध्यमयी वाग्भंगी जिसके द्वारा अर्थवैचित्र्य और चमत्कार की सृष्टि की जाती है.

निराला : 

संस्कृत की तत्समप्रियता
सभी प्रकार की शैली में काव्य प्रणयन का अभ्यास
अनुप्रासमयता
चित्रमयता
ध्वन्यात्मकता

पंत : 

भाषा में स्वरों का महत्व
स्वर = काव्य संगीत का मूल तंतु

पर्याय चयन
पहली बार बड़ी गंभीरता से पंत जी ने पर्यायों की अर्थछटाओं पर विचार किया
भ्रू = क्रोध की वक्रता
भ्रकुटि = कटाक्ष की चंचलता
भौंह = स्वाभाविक प्रसन्नता, ऋजुता 
अनिल = कोमल शीतल वायु
वायु = निर्मल हवा
पवन, प्रभंजन = तेज हवा

प्रमुख विशेषता : समुचित शब्द चयन
पंत जी को खड़ीबोली अव्यवस्थित, क्षीण और दुर्बल रूप में मिली.
उन्होंने खड़ीबोली को संस्कृत के शब्द देकर खड़ा किया

खड़ीबोली काव्यभाषा को आर्द्रता, कोमलता, स्निग्धता, प्रांजलता, सहजता, मधुरता, रागात्मकता प्रदान करने का श्रेय पंत को है.

महादेवी : 

खड़ीबोली हिंदी के स्पष्ट दो रूप –
(1) संस्कृतनिष्ठ हिंदी – प्रिय प्रवास,
(2) संस्कृत के शब्दों से युक्त होते हुए भी बड़े बड़े संधि समास से मुक्त रूप जिसमें समुचित तद्भव शब्दावली का प्रयोग भी = छायावादी युग की काव्यभाषा

छायावादी युग में सूक्ष्म एवं अमूर्त की अभिव्यंजना के साथ शैली अवश्य दुरूह हो गई
पर भाषा की शक्ति और सौंदर्य में विकास हुआ.

प्रतीकात्मकता
मुक्त प्रयोग
विविधता
अनेकार्थता
भाषा को सौष्ठव, साथ ही गांभीर्य प्रदान करने की दृष्टि से महादेवी जी का विशेष महत्व है.

दिनकर : 

प्रारंभ से ही भाषा के प्रति सतर्क
छायावादी युग के प्रयोगों से शिक्षा
आक्रोश के लिए बलयुक्त भाषा
बलाघात के लिए ‘ही’ का प्रयोग -
मैं ही न हाय पहचान सकी
यह बात प्रभु पहले से ही कहते हैं
तुम्हें देखते ही मुझ में अजब भाव जगता
हम ही तुम्हें साकार नहीं तो छिपे हुए हैं
भाषा उनका चरम लक्ष्य था

अज्ञेय : 

संस्कारी भाषा के पोषक
अर्थवान शब्द की समस्या

कवि उसी भाषा का प्रयोग करता है जिसे वह रोज जीता है. जब हम बोलचाल में संकर भाषा का प्रयोग करते हैं, सारा समाज संकर भाषा में जीता है तब कविता में उसे क्यों प्रवेश नहीं मिलेगा (जोग लिखी)

सांस्कृतिक बिंब-
दिन का आरंभ = द्वार पर पड़े हल्दी रंगे पत्र
धरती = सवत्सा काम धेनु
संध्या के बादल = कपूर और सिंदूर की गाँठ
भोर की पुकार = रात के रहस्यमय स्पंदित तिमिर की भेदती कटार-सी
नदियाँ = रंभाती हुई धेनुएँ

आज के युग की देन – विसंगति, अकेलापन, कुंठा, यांत्रिक जीवन आदि -
के अनुकूल भाषा तैयार करने में जहां अज्ञेय सफल रहे हैं
वहाँ प्रतीकों, बिंबों, अभिप्रायों आदि को प्रस्तुत करने में अद्वितीय.

[3] काव्यभाषा में प्रतीक विधान

कबीर :

प्रतीकात्मक भाषा : जनभाषा : लोक प्रचलित प्रतीकों का प्रयोग
चरखा = जो चरखा जरि जाय बड़ेया ना मरे/ मैं कातों सूत हजार चर्खुला जिन जरे
कुम्हार और मिट्टी
कुंआ और पनिहारिन
कोई शब्द निरर्थक नहीं : नाम के साथ विशेषण का प्रयोग : प्रतीक
हंस कबीर = मुक्तावस्था,
कह कबीर = स्वोक्ति,
कहै कबीर = अन्य व्यक्ति की उक्ति,
दास कबीर = ईश्वर का उपासक,
कबीरा = अज्ञानी
जयशंकर प्रसाद :
ज्योत्स्ना = प्रफुल्लता
स्वच्छंद सुमन = आकंक्षा, उन्मुक्त अभिलाषा
किरण = उत्साह, स्फूर्ति
बासी फूल = म्लान भाव
रजनी का पिछला प्रहर = किशोरावस्था के बाद का समय
मतवाली कोयल = हृदय का उल्लास
कलियाँ = नवीन भाव
ऊषा की लाली = यौवन
सोने के सपने = आनंदमय जीवन
ज्योत्स्ना निर्झर = अपार सौंदर्य
झंझा/ आंधी = हलचल/ क्षोभ
मरु ज्वाला = अनंत पीड़ा
पंत : 
ऊषा = दिव्य माधुर्य
कली = नारी का बाल्यकाल
रजत = रूप, चंचलता/ चपलता
द्रौपदी के दुकूल = विरह की अनन्तता
घन = चिंताएं
गर्जन = वेदना
प्रभात = शैशव
बसंत = सुख
स्वर्ण = दीप्तिमान मानसिक सत्ता
गुलाब = जीवन एवं जगत
संध्या उषा = दुःख-सुख
दोपहर = यौवन
चांदनी = शीतलता

महादेवी : 
अँधेरा (विषाद),
वर्षा (करुणा),
ग्रीष्म (क्रोध),
वसंत (आनंद),
पतझर (निराशा),
मकरंद (आँसू),
मधुशाला (विश्व),
लू (प्रेम का अंत),
बुद्बुद(क्षण)

[4] काव्य भाषा में विशेषण प्रयोग

घनानंद

विशेषण का सम्यक प्रयोग.
नेत्र व्यापर की विभिन्न अवस्थाएँ
छके दृग = प्रेम के मद से मस्त
ललित लाल चख = प्रेम के मद से मस्त होने के कारण लाल नेत्र
तृषित चखन = रूप जल के प्यासे नेत्र
अंखियानी निपेटिन की = पेटू या अत्यधिक खाने वाली!
                                      रूपरस माधुर्य का पान करने की अत्यधिक अभिलाषी आँखें
अन्य :
‘आँखिन बानि अनोखी,
प्रीति पगी अंखियानि,
अँखिया दुखियानि कुबानि परी,
दीठि थकी अनुराग छकी,
लाजनि लपेटी चितवनि भेद भय भरि’ आदि

पंत : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
उन्मन गुंजन,
महासंगीत
वन अकलुष,
अमृत सत्य
स्वप्निल मन,
अमृत प्रीति
तंद्रिल तन
श्यामल छवि
नील = नील विहग, नील गगन, नील जलज
मधु = मधु पत्र, मधुक्षण, मधुरस
स्वर्ण = स्वर्ण किरण, स्वर्णहंस, स्वर्णिम स्पर्श

दिनकर : 

विशेषणों का सटीक प्रयोग / शोध की संभावना
भीगी तान, दहकती वायु, मीठी उमंग, चकित पुकार, तरंगित यौवन, अस्फुट यौवन, मीठी धूप, शीतल सुधा, शुचि स्मिति, मृदु स्मिति
रंग विशेषण –
शुभ्रमेघ, श्वेत फूल, सफ़ेद किरण,
नीलांतरिक्ष, नीले अँधियाले, नील कुसुम
विशेषण पदबंध –
इच्छा बहरे नयन,
कजरारे लोचन,
गले पिघले अनल,
व्यग्र व्याकुल प्राण,
अगम उत्ताल उच्छल सागर,

अज्ञेय : 

विशेषणों का सम्यक प्रयोग -
तारों सजा फूहड़ निलज आकाश (इत्यलम)
लंबी अंधियाली किसी घाटी में (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
फुटकी की लहरिल उड़ान (इंद्रधनु रौंदे हुए ये)
मरोड़ी हुई देह वल्ली (आँगन के पार द्वार)
छरहरे पेड़ की नई रंगीली फुनगी (आँगन के पार द्वार)
लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की (हरी घास पर क्षण भर).

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* हम अपने ही भंडार से अवगत नहीं हैं.
आज आवश्यकता है कि हम साहित्य और लोक में बिखरे भाषा संबंधी इस खजाने को पहचानें. [सूर]

* तुलसी की भाषा का रूप समन्वयात्मक है.
कहीं उसे किसी शब्द से घृणा नहीं.
आज के लिए अनुकरणीय. [तुलसी]
* मौन तथा व्यंजना  - 
मौन भी अभिव्यंजना है:/ जितना तुम्हारा सच है/ उतना ही कहो. [अज्ञेय]'
O

* 29-30 मार्च 2014 को बेलगाम (कर्नाटक) में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी 'पुण्य स्मरण' में  दूसरे  दिन डॉ. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में संपन्न डॉ. कैलाश चंद्र भाटिया पर केंद्रित विचार सत्र में प्रस्तुत डॉ. ऋषभ देव शर्मा के व्याख्यान की आधार-सामग्री. 

गुरुवार, 27 मार्च 2014

हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध

20-21 मार्च  2014 को शोलापुर [महाराष्ट्र] में ''संत काव्य के धरातल पर हिंदी और भारतीय भाषाओं का अंतःसंबंध [ मराठी, कन्नड़ और तेलुगु के विशेष सन्दर्भ में]'' विषय पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन था. शोलापुर विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति डॉ. इरेश स्वामी जी के सौजन्यपूर्ण आतिथ्य और महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी के डॉ. दामोदर खडसे [पुणे] व डॉ. त्रिभुवन राय [मुंबई] के सान्निध्य में शोलापुर प्रवास सुखद एवं स्मरणीय रहा. अक्कलकोट [स्वामी समर्थ], पंढरपुर [श्रीकृष्ण-रुक्मिणी] और तुलजापुर [तुलजा भवानी] के दर्शनों का धर्म-संस्कृति-लाभ भी डॉ. त्रिभुवन राय [मुंबई] के अप्रतिहत और प्रणम्य उत्साहवश मिल गया - वरना मैं तो ठहरा सहज आलसी व यात्रा भीरु प्राणी. पर अपने भाग्य पर इतराने का मन तो तब हुआ जब उन्हीं की कृपा से शोलापुर के दो धार्मिक स्थलों पर अयाचित सत्कार मिला.

संगोष्ठी का एक सत्र ''हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध'' पर केंद्रित था. इसकी अध्यक्षता का दायित्व मुझ पर था.  प्रवर्तन व्याख्यान डॉ. जी. नीरजा (हैदराबाद) ने दिया. चार आलेख विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्रतिनिधियों ने पढ़े. चर्चा भी अच्छी-खासी हुई - सौहार्दपूर्ण.  अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी यहाँ चेप दे रहा हूँ - शायद कभी इन बिन्दुओं के आधार पर पूर्णाकार लेख बन जाए. वरना इतना तो है ही ---------

राष्ट्रीय संगोष्ठी : शोलापुर : 20 मार्च 2014 : अध्यक्षीय भाषण
हिंदी तथा तेलुगु के प्रमुख संतों की रचनाओं में अंतःसंबंध
-    प्रो. ऋषभ देव शर्मा

  • संत –
‘संत’ शब्द का प्रयोग साधारणतः किसी भी पवित्रात्मा और सदाचारी पुरुष के लिए किया जाता है. और कभी कभी यह साधु एवं महात्मा शब्दों का पर्याय भी समझ लिया जाता है. किंतु संत मत शब्द में आ जाने पर इसका एक पारिभाषिक अर्थ भी हो सकता है जिसके अनुसार यह उस व्यक्ति का बोध कराता है जिसने सत् रूपी परम तत्व का अनुभव कर लिया हो और जो इस प्रकार अपने व्यक्तित्व से ऊपर उठकर उसके साथ तद् रूप हो गया हो. अतएव विशिष्ट लक्षणों के अनुसार संत शब्द का व्यवहार केवल उन आदर्श महापुरुषों के लिए ही किया जा सकता है जो पूर्णतया आत्मनिष्ठ होने के अतिरिक्त समाज में रहते हुए निःस्वार्थ भाव से विश्वकल्याण में प्रवृत्त रहा करते हैं. इसके अलावा यह शब्द अपने रूढ़िगत अर्थ में उन ज्ञानेश्वर आदि निर्गुण भक्तों के लिए भी प्रयुक्त होता आया है जो दक्षिण के विट्ठल व वारकरी संप्रदाय के प्रचारक थे और कदाचित अनेक बातों में उन्हीं के समान होने के कारण उत्तरी भारत के कबीर आदि के लिए भी इसका प्रयोग होने लगा है. (परशुराम चतुर्वेदी)
  • निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह/ विषया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग एह (कबीर, साधा का अंग)
  • संतों की परंपरा में पहली और महत्वपूर्ण बात है : आत्मज्ञान की उपलब्धि
  • दो अभिप्राय – 1. किसी में आत्मज्ञान की जागृति का उसकी जाति-पांति से कोई संबंध नहीं है. 2. जब आत्मज्ञान जागृत होता है तो वह समाज के सारे बंधनों को तोड़कर वैश्विक एकता को स्थापित करने की ओर बढ़ता है. संत का सबसे बड़ा लक्षण - विश्वात्मा में विश्वास
  • संत : महत्वपूर्ण लक्षण, समर्पण भाव संत काव्य की परंपरा तत्वतः उस काव्य रचना पद्धति की ओर संकेत करती है जो मानव समाज की मूल प्रवृत्तियों पर आश्रित है.
  • धीरे धीर संत शब्द का प्रयोग सामान्यतः निर्गुणोपासकों के लिए ही व्यवहृत होने लगा. निर्गुण साधकों की आचारपरक एक विशिष्ट दृष्टि : कबीर, दादू, नानक आदि
  • संत :  सत्-चित-आनंद रूप ब्रह्म की उपासना में सतत संलग्न
  • स्व-पर-भेद से रहित
  • श्वास-प्रश्वास में लोक कल्याण की भावना ही प्रवाहित
मध्य युग के संतों का सामान्य विश्वास – (हजारी प्रसाद द्विवेदी) हिंदी साहित्य की भूमिका
सबसे पहली बात जो इस संपूर्ण साहित्य के मूल में है, यह है कि भक्त का भगवान के साथ एक व्यक्तिगत संबंध है. भगवान या ईश्वर इन भक्तों की दृष्टि में कोई शक्ति या सत्तामात्र नहीं है बल्कि एक सर्वशक्तिमान व्यक्ति है, जो कृपा कर सकता है, प्रेम कर सकता है, उद्धार कर सकता है, अवतार ले सकता है.
  • हरि जननी, मैं बालक तेरा. काहे न औगुन बगसहु मोरा.
कहे कबीर एक बुद्धि बिचारी. बालक दुखी दुखी महतारी. (कबीर)
आप अपरछन होइ रहे, हम क्यों रैन बिहाइ.
दादू दरसन कारने, तलफि तलफि जिय जाइ. (दादू)
·  भागवत : अखंडानंद स्वरूप तत्व के तीन रूप हैं –  ब्रह्म (ज्ञानाश्रयी भक्त), परमात्मा (योगी) भगवान (भक्त).
·       प्रेम ही परम पुरुषार्थ है मोक्ष नहीं – प्रेमा पुमर्थो महान
·       दरसन दे, दरसन देहौं तो तेरा मुकति न माँगों रे.
सिधि ना माँगों रिधि ना माँगों तुम्हहीं माँगों गोविंदा.
जोग न माँगों भोग न माँगों तुम्हहीं माँगों रामजी.
घर नहीं माँगों वन नहिं माँगों तुम्हहीं माँगों देवजी.
‘दादू’ तुम्ह बिन और न जानै दरसन माँगों देह जी. – (दादू दयाल)
·         वे दिन आवेंगे माइ./ जा कारिन हम देह धरी है मिलिबौ अंगि लगाइ. – (कबीर)
·      मध्य युग के भक्ति आंदोलन की एक बड़ी विशेषता यह है कि भक्त और भगवान को समान बताया गया है. प्रेम का आधार ही समानता है. गुरु को भगवान का रूप बताया गया है.
·      नाम बिन भाव करम न छूटै./ साधु संग और राम भजन बिन काल निरंतर लूटै. – (दरिया साहब)

अन्नमाचार्य
  • जन्म : मई 1408
  • जाति, मत, कुल आदि मूर्खों के द्वारा स्थापित अवरोध की दीवारें हैं.
  • शठकोपयति = गुरुदेव
  • शठकोपयति - सच्चे वैष्णव की परिभाषा दी – मदमत्सरमु लेका मनसु पेदैपो वदलिना यासनवाडु वो वैष्णवुडु. सहज वैष्णवाचार वर्तनुलु सहवास में मा संध्या. (मद-मत्सर को छोड़कर, मन को सरल रखने वाला ही वैष्णव (संत) कहलाता है. निर्मल वैष्णव आचारों से युक्त व्यक्ति का साथ ही हम चाहते हैं. (कबीरा सांगत साधु की)
  • रामानुजाचार्य के विधानों को, वेदांत देशिकों की स्फूर्ति को, शठकोपयति के आदेशों को अन्नामाचार्य ने अपने संकीर्तनों के माध्यम से आंध्र भर में प्रचारित किया
  • एकमात्र लक्ष्य : लोग परोपकार की भावना रखते हुए, सब प्राणियों के प्रति दया दिखाते हुए सरल जीवन व्यतीत करते हुए परमात्मा के सायुज्य को प्राप्त करे.
  • रामानुजाचार्य अन्नामाचार्य के आदर्श थे : गुरु के मंत्रों को गुप्त रूप में रखने के लिए कहने पर भी, रामानुजाचार्य ने मानव कल्याण के लिए श्रीरंग का गोपुर चढ़कर ऊँची आवाज में शरणागत के मन्त्र सब लोगों को सुनाए थे.
  • मधुरा भक्ति
  • रायल से कहा) मुकुंद की स्तुति करने वाली इस जीभ से तुम्हारी स्तुति नहीं की जा सकती : बंदी बनाकर बंदीखाने में रख दिया - रायल का मुकुट और शृंखलाओं का बंधन टूटकर आचार्य के चरणों पर गिर पड़े.
  • जाति भेद नहीं. हरि ज्ञान दासत्व ही उत्तम जाति. वह किसी कुल से संबंधित क्यों न हो, कोई भी क्यों न हो, हरि को जानने वाला ही उत्तम कुल का होता है.
  • यह संसार परब्रह्मत्व से भरा हुआ है. निम्न, उच्च का भेद उसमें नहीं है. इसके लिए जाति, कुल, वर्ग से कोई संबंध नहीं है. सब के लिए श्री हरि ही अंतरात्मा है. राजा की नींद और सेवक की नींद एक ही होती है. ब्राह्मण और चांडाल के लिए भूमि एक ही होती है. देवताओं के लिए या पशु पक्षियों के काम सुख एक ही होता है. दिन और रात धनवान या निर्धन के लिए एक ही होते हैं. धनवान और गरीब की भूख भी एक ही होती है. दुर्गंध और सुगंध पर बहने वाली वायु एक होती है. हाथी और कुत्ते पर पड़ने वाली धूप एक ही होती है. पुण्य पुरुष हो या पापी हो, दोनों की समान रूप से रक्षा करने वाला श्री वेंकटेश्वर नाम भी एक होता है. (एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परयौ/ यह अंतर पारस नहिं जानत, कंचन करत खरयौ (सूरदास)  
  • अन्नमाचार्य ने मन को समझाया – हे मन! तुम नट रूपी भ्रम में मत पड़ो. यह संसार एक मोहित करने वाली हथिनी है. यहाँ धोखे सच दीख पड़ते हैं. अगले दिन वे हिम के समान गल जाते हैं. यही माया है. इसके लिए एकमात्र पर्दा वेंकटेश तत्व का अनुभव ही होता है. ९माया महा ठगिनी हम जानी, यह संसार कागद की पुड़िया बूंद पड़े गल जाना है/ पानी करा बुदबुदा, अस मानुस की जात – कबीर)
  • समुद्र में लहरों के रुकने पर ही हम स्नान करेंगे. ऐसी भावना वैसी ही है जैसे मन की सभी इच्छाएँ समाप्त होने के बाद ही हम भगवान के बारे में सोचेंगे. वास्तव में समुद्र में न लहरें रुकती हैं न मन में इच्छाएँ कभी समाप्त होती हैं. अगर हम यह समझेंगे कि इंद्रियों की प्यास बुझाने के बाद ही हम तत्व को जानेंगे, यह तो साध्य होने वाला काम तो नहीं है. यह प्यास न बुझने वाली है, न तत्व जानने वाला होता है. देह के रहने तक पदार्थों के प्रति मोह दूर नहीं होता. अंतरंग और बहिरंग दोनों में शुद्धि होने पर ही माया हटकर यथार्थ प्रकाशित होता है. यह दिन का प्रकाश है. इसे प्राप्त करना आसान है.
  • इस जीवन यान में मैं बहुत थक गया हूँ. तुम्हारे दर्शन के लिए मेरा हृदय संतप्त है. अब तो तुम ही मेरे लिए एकमात्र रक्षक हो. मैं तुम्हारी शरण में हूँ.
  • वैष्णव भक्त प्रेम से तुम्हें विष्णु कहकर सेवा करते हैं तो शैव भक्त शिव कहकर तुम्हारी उपासना करते हैं. कापालिक तुम्हें आदिभैरव कहकर स्तुति करते हैं तो शक्य लोग तुम्हें शक्ति स्वरूप कहते हैं.
  • अन्नमाचार्य का जीवन लक्ष्य एक महान सामाजिक प्रयोजन है. उसे स्वयम अपना उद्धार करना नहीं, इसके साथ मानव समाज का भी उद्धार करना है.
  • अन्नमाचार्य की समस्याएँ एक या दो नहीं अनेक थीं. पंडित परिषद ने यह प्रस्ताव किया कि पदकर्ता नीति बाह्य है तो गायक पंक्ति बाह्य है.
  • अन्नामाचार्य एक प्रकार से अपने समय के राजनीतिक, सामाजिक विप्लवों से ऊब गया था. संगम वंश के विरूपाक्षराय का वध, उसके भाई दूसरा विरूपाक्षराय ने किया. तो उसे सेनापति साल्व नर्सिंग राय ने राज्य से भगाकर विजयनगर संहासन पर बैठ गया. उस समय सांप्रदायिक दंगे अधिक हो रहे थे. दिन दहाड़े स्त्री का मानभंग, पति के देखते पत्नी पर अत्याचार होता था. बूढ़ी कूबड़ी के सिर उठाकर देखने तक उसके पुत्र का सिर काट दिया जाता था. मंदिर ढह दिए जाते थे. भगवान की देख-रेख करने वाले कोई नहीं थे. कलिमाया अधिक हो गई थी. लोग भाई-बहन रिश्ते के संबंध पर ध्यान न देकर विवाह कर रहे थे.
  • यति मुनि धनवान हो गए थे. प्रतिव्रता स्त्रियाँ अधिकारियों की रखेल बन गई थीं. ब्राह्मण युवतियों ने किरातों से विवाह कर आग में कूदकर प्राण त्यग दिए थे. राजा की पत्नियां वेश्या बन गई थी. इस प्रकार के सांप्रदायिक, राजनैतिक, सामाजिक आंदोलनों में किसी ने अन्नमाचार्य की पूजा की मूर्तियों का अपहरण किया था.
  • अन्नमाचार्य के तेलुगु के शब्द व्यावहारिक हैं, शब्द कोश का नहीं है.
भक्त रामदास
  • यह सारा संसार राममय है. सूरज, चंदा, देवता, नक्षत्र, सागर, वृक्ष, अंड-पिंड-ब्रहमांड, ब्रहम, नदी, जंगल, मृग सब में राम ही दिखाई पड़ रहा है.
  • रामदास की भक्ति से संबंधित जितनी कहानियाँ संसार में प्रचलित हैं उतनी कहानियाँ अन्य किसी कवि के लिए नहीं. इनकी भक्ति भावना का यही एक मात्र दृष्टांत है. पुत्र के मांड के कडाह में गिरने पर राम की कृपा से उसे फिर से जीवित करना, स्वयं भगवान राम द्वारा तानाशाह के बंदीखाने से, पीड़ाओं से, मुक्त करना, पुष्पक विमान पर चढ़कर वैकुंठ जाना, कुछ लोगों के मत के अनुसार अद्भुत कल्पनाएँ हैं.
  • कहा जाता है कि आनंदभैरव राग का प्रारंभ भी इन्होंने किया था.
  • मुझे तारक मंत्र मिल गया है. इसलिए मेरा जीवन धन्य हो गया है. हर एक के अंतरंग में भगवान स्थित है. इसलिए तीर्थ यात्रा के नाम से 108 तिरुपतियों में बर्मन करने की आवश्यकता नहीं है. पुन्य नदियों में डुबकी लगाना भी व्यर्थ है. कितने जन्म लेने पर भी नारायण तो एक ही है. मानव जन्म उत्तम और अंतिम जन्म है. रामचंद्र को विश्वास के साथ अपने हृदय मंदिर में रख लेना है.
भक्त क्षेत्रय्या
  • क्षेत्रय्या ई सन 1595 से 1660 के मध्य
  • क्षेत्रय्या ने अपनी आँखों खोल दी तो उसने देखा 1500 पद उसके सामने थे.
  • उनके अधिक पद अभिनय के उद्देश्य से ही लिखे गए हैं. घुटनों से ले का प्रदर्शन करना संप्रदाय है.
  • इस पूर्वार्द्ध में वह चापलचित्त था.
  • एक स्त्री के त्यागफल के कारण
  • उसके जीवन को एक नया मोड़ प्रदान किया.
  • कलाभिज्ञ के रूप में, संगीत, साहित्य और अभिनय के कोविद के रूप में, मुव्व गोपाल के चरण सेवक के रूप में, पदकर्ता के रूप में. अद्वैत योगी के रूप कें, विरागी के रूप में, गुरु के रूप में, स्थिर चित्त के रूप में, मधुरा भक्ति के रूप में, प्रबोधक के रूप में, जाज्वल्य के रूप में, जाति के गर्व के रूप में, उसका जीवन प्रकाशित होकर परमात्मा में एकाकार होया गया.   
वेमना
  • 15 वीं शती – भतृहरी के समान जीवन
  • कबीर, तुलसी और रहीम से तुलनीय
  • समन्वय और लोकमंगल के अग्रदूत
  • श्रेष्ठता की पहचान – जन्म और जाति के आधार पर नहीं गुण के आधार पर
  • अज्ञान ही शूद्रता है और सुज्ञान ब्रह्मत्व
  • दूध से धो धो कर भी क्या कभी कोयले को गोरे रंग का बनाया जा सकता है.
  • दंभी विद्वान सुगंध धोने वाला गधा है. रहे तो गधे ही परिमल भी धोया तो क्या?
  • जिसे चमड़े का जूता चबाने की आदत हो उसे गन्ने का रस क्या मालूम
  • बंदर का राज तिलक करके/ ठहल करते मरकट घेर करके
  • वह लड़ाका कैसा जो संकट पड़ने पर मैदान छोड़ जाए
  • पशु-वर्ण जुदा, दूध का न जुदा,/ पुष्प-जाति जुदा, पूजा न जुदा./ रूप हैं बहुत, एक ही देव तो,/ विश्वदाभिराम सुन रे वेमा
कवयित्री मोल्ला
  • गंगा देवी तिरुमलाम्बा, मधुरवाणी आदि कवयित्रियों ने संस्कृत में काव्यों की रचना कर बड़ा नाम प्राप्त किया है तो उसी प्रकार तेलुगु में भी मोल्ला, रंगाजम्मा, मुद्दुपलनी, तरिगोंडा वेंगमांबा आदि ने देशी, मार्ग रीतियों में काव्यों की रचना की है.
  • मोल्ला कहती हैं – मैं पढ़ना-लिखना कुछ नहीं जानती. मैंने केवल श्रीकंठ मल्लेश्वर के वरप्रसाद से ही कविता लिखना सीखा है.
  • जन सामान्य में मोल्ला और तेनाली रामकृष्ण के समकालीन होने से संबंधित कितनी ही कहानियाँ प्रचलन में हैं.
  • 16 वीं शताब्दी की पूर्वार्द्ध
  • मोल्ला ने तिक्कना सोमयाजी के वरप्रसाद से वचन रामायण ग्रंथ लिखकर उसे काकतीय राजा प्रतापरुद्र को समर्पित करने के लिए राजा के दरबार में चली गई थी. राजदरबार के विद्वानों ने उसे शूद्र कवित्व बताकर उसे स्वीकार करने से मना किया.
तरिगोंडा वेंगमांबा

  • 18 वीं शताब्दी के प्रारंभ में
  • सन 1730 में
  • हे पागल! क्या तुम भ्रांति में हो? क्या तुम नहीं जानते कि मेरा प्राण नायक, पति, प्रभु श्री वेंकटेश्वर है. मेरे पिटा माया में पड़कर ज्ञान शून्य होकर मेरा विवाह तुम्हारे साथ किया है. इसलिए मेरे निकट मत आओ. मेरे निकट आकार स्पर्श करने मात्र से तुम्हारे सर के हजार टुकड़े हो जाएँगे.
  • मैं तो नित्य सौभाग्यवती स्त्री हूँ. नित्य मंगल श्री वेंकटेश्वर ही मेरे पति के रूप में मेरे हृदय में विराजमान हैं. उस परमेश्वर की आराधना करना मेरा परम धर्म है. तुम्हारी आज्ञा के अनुसार मैं केशों को अन्हीन हटाती.
  • वेंगाम्मा अपने हृदय में वेंकटेश्वर को स्थिर रूप में रखकर, उसकी पूजा करती हुई आनंद से चारों तरफ घूमती रही.
  • तुम्हारे यथार्थ को मैं अच्छी तरह जानती हूँ. तुम आदिमध्यांत रहित हो. तुम स्वयं प्रकाश हो. जगदीश्वर हो. ज्ञान स्वरूप हो. तुम परमज्योति नारायण हो. हे सर्वेश्वर! तुम मेरे पास स्थिर रूप से रहने पर भी समस्त ब्रहमांड में हर एक परमाणु में भरे हुए व्याप्त हो.
  • मुत्याला आरती - आज भी .

रविवार, 16 मार्च 2014

प्रयोजन प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप शृंखला : 'साहित्यकारों के साथ संवाद'


भास्वर भारत/  मार्च 2014/ पृष्ठ 54-55.

साक्षात्कार इस अर्थ में अत्यंत रुचिकर विधा है कि उसमें वार्तालाप, संवाद और नाटकीयता जैसे पाठकों को बाँधकर रखने वाले तत्व गंभीर वैचारिकता, सिद्धांत निरूपण, बहस और खंडन-मंडन के साथ जुड़े होते हैं. साक्षात्कार के माध्यम से पाठक इसके लेने वाले और देने वाले दोनों के व्यक्तित्व, वैचारिकता, भावप्रवणता, शक्ति और दुर्बलता को पहचान सकता है. दृश्य माध्यमों ने इसे और भी लोकप्रियता और जीवंतता प्रदान की है. इस रोचक विधा के लिए साक्षात्कार लेने वाले की जितनी अच्छी तैयारी होगी वह जितना अधीत और प्रत्युत्पन्नमति होगा, साक्षात्कारदाता के मानस को उतनी ही गहराई से मथ कर सुविचार के मोती निकाल लाएगा. इसके विपरीत यदि गोताखोर ही डूबने से डरेगा तो किनारे बैठकर लहरें भर गिनता रहेगा और साक्षात्कार उतना ही उथला रह जाएगा. कहने का अभिप्राय यह है कि कोई इस विधा को बच्चों का खेल न समझे. यह बहुत तैयारी माँगने वाली विधा है – बाद में प्रस्तुतीकरण के स्तर पर भी परिश्रम चाहती है, सृजनात्मकता भी. 

साक्षात्कार को ‘प्रयोजन प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप’ मानने वाले डॉ. त्रिभुवन राय इसकी सार्थकता ‘वृहत्तर पाठक समुदाय’ तक पहुँचने में मानते हैं तथा इसी संकल्पना के तहत उन्होंने समय समय पर लिए गए साहित्यकारों के साक्षात्कार ‘साहित्यकारों के साथ संवाद’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रस्तुत किए हैं. स्मरणीय है कि डॉ. त्रिभुवन राय समीक्षा के क्षेत्र में भारतीय और पाश्चात्य चिंतन के समन्वय की दिशा में क्रियाशील, संतुलित दृष्टि संपन्न, विचारशील सहृदय समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं. उनकी समीक्षात्मक कृतियों में - मनुष्य के रूप : अध्ययन की दिशाएँ, ध्वनि सिद्धांत और हिंदी के प्रमुख आचार्य, भारतीय समीक्षा सिद्धांत और हिंदी समीक्षक, ध्वन्यालोक और आनंदवर्धन, ध्वनि सिद्धांत : प्रतिपक्ष और विकास, इन्होंने कहा–1, काव्य चिंतन : विविध आयाम, समकालीन काव्यबोध आदि के साथ विवेच्य कृति शामिल है. 

आचार्य त्रिभुवन राय ने अपने साहित्य, शोध और पत्रकारिता के लंबे अनुभव के दौरान अनेक विभूतियों से प्रयोजन-प्रेरित रचनात्मक वार्तालाप किया है. उसी में से यहाँ आठ विभूतियों के नौ साक्षात्कार संकलित है. इस ग्रंथ की महत्ता इन विभूतियों के नामोल्लेख मात्र से ही सिद्ध हो जाती है – यशपाल, इस्मत चुगताई, डॉ. महावीर अधिकारी, डॉ. आनंद प्रकाश जैन, डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित, विवेकी राय, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय और डॉ. रामविलास शर्मा. 

साक्षात्कारों की विषय वस्तु के संबंध में ‘पूर्व संवाद’ में जो बातें कही गई हैं ये उन पर पूरी तरह सटीक उतरते हैं. यथा – (1) साहित्य-समीक्षा के ज्वलंत संदर्भों पर सोचने के लिए विवश करने वाली स्थितियाँ तो यहाँ साक्षात्कृत हुई ही हैं, समसामयिक परिवेश के तीखे सच भी उजागर हुए हैं. (2) नारी-मुक्ति आंदोलन से लेकर सेक्स, प्रेम-विवाह, शिक्षा का मौजूद सच, लेखक और भाषा के रिश्ते, तथ्याभासी छद्म और सच्चे साहित्य को अलग करने वाले तत्वों के साथ वर्तमान सांस्कृतिक परिदृश्य, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते दबाव के सम्मुख साहित्य के सिकुड़ते संसार पर यहाँ बेबाक चर्चा हुई है. (3) साहित्य-समीक्षा एवं विचारधारा के संदर्भ में समकालीनता और शाश्वतता, स्वायत्तता, संबद्धता और उत्तर आधुनिकता जैसी प्रवृत्तियों के भीतर पैठकर उनकी परिणतियों को आकलित करने का सफल प्रयास भी यहाँ द्रष्टव्य है.

संस्मरण और प्रश्नोत्तर मिश्रित शैली में रचित इन साक्षात्कारों में आरंभ में संबंधित विभूति का संक्षिप्त वृत्त दिया गया है. आलेखों में यथावसर परिवेश, प्रयोजन और परिस्थितियों का संकेत इन्हें किंचित कथात्मकता भी प्रदान करता है. बीच बीच में डॉ. राय ने अपनी राय भी दर्ज की है - स्वगत कथनों के रूप में. पहला आलेख ‘साहित्य में मानवीय उद्देश्य ही प्रधान होता है’ यशपाल का 27 मई 1972 का साक्षात्कार है जो कुछ कुछ संस्मरण और रेखाचित्र की तरह आरंभ होता है. कलम से चित्र बनाने की डॉ. राय की कला यहाँ दिखाई देती है – ‘लकदक सफ़ेद कुर्ता-पाजामा में मझले कद का दुबला-पतला गेहुआँ रंग का एक ऐसा व्यक्ति, जीवन की उनहत्तर गर्मियों की तपन भी जिसके चेहरे की चमक और रौब को कम नहीं कर पाई है. प्रशस्त कसा हुआ कपाल, उभरी हुई ठोड़ी, नुकीली नाक, गहरी आँख पर सघन-सफ़ेद भौहें. चेहरे पर एक प्रकार की तटस्थता.’ बिलकुल सीधे सवाल. एकदम सटीक जवाब. 

दूसरा साक्षात्कार इस्मत चुगताई का है. गंभीर चर्चा के बीच डॉ. राय हलके-फुलके सवाल भी पूछते चलते हैं जिनके जवाब में कई रोचक जानकारियाँ मिल जाती हैं. जैसे, इस्मत आपा बताती हैं – मैं अपने पलंग पर लेटकर लिखना पसंद करती हूँ और अक्सर रात को लिखना शुरू करके सुबह समाप्त करती हूँ. स्त्री-पुरुष संबंध पर उनकी राय है कि विवाह को मैं जरूरी नहीं मानती और कि विवाह संस्था असल में आर्थिक सुरक्षा के लोभ का नतीजा है. अंतिम अनुच्छेद में साक्षात्कारकर्ता का यह मंतव्य द्रष्टव्य है कि यह महिला क्या इतनी बोल्ड इसलिए है कि बचपन से ही इसमें यह जिद रही है कि वह औरत तो क्या मर्दों से किसी माने में कम नहीं है. 

डॉ. महावीर अधिकारी से राजनीति और साहित्य के संबंधों और जीवन मूल्यों पर केंद्रित चर्चा है. सौंदर्यसृष्टि विषयक प्रश्न के उत्तर में डॉ. अधिकारी कहते हैं – साहित्य में ऐसे सौंदर्य की सृष्टि होनी चाहिए जो आत्मा में रम जाए और उस पर जमे हुए मैल को धो डाले. वे आधुनिक जीवन में व्याप्त स्वार्थपरता और झूठ से विचलित दिखाई देते हैं – ‘अपने हित को प्राथमिकता देना, आज बुद्धिमता का परिचायक माना जा रहा है. मैंने लेखक, कवि, कलाकार, घर के बुजुर्गों, नेता, शिक्षक और धर्मधुरीणों तक को झूठ बोलते देखा और सुना है. ऐसा आचरण तो घोर पतनशीलता का द्योतक है. बेबस, बेसहारा लोगों की तरफ देखने पर तो दोगुना दुःख होता है. वे सत्य पर आरूढ़ रहना चाहते हैं, परंतु उनकी कोई सराहना नहीं होती. लोग निजी लाभ के लिए पार्टियाँ बदलते हैं, विचार भी बदल देते हैं. कौन क्या है, पता ही नहीं लगता! आज के आदमी की आधी शक्ति झूठ के जंगल से बचने में ही खर्च हो जाती है.’

‘दायित्व प्रतिबद्धता की उपज है’ - यह आनंद प्रकाश जैन के साक्षात्कार का केंद्रीयबिंदु भी है और शीर्षक भी. लेखक के लिए आवश्यक गुणों से संबंधित सवाल का जवाब चिंतन करने योग्य है – सबसे बड़ी आवश्यकता आत्मविश्वास और निर्भयता की है तथा ईमानदार निर्भयता साहित्यकार का श्रेष्ठ गुण है. इस साक्षात्कार से प्राप्त होने वाली यह जानकारी चौंकाने वाली लग सकती है कि आनंद प्रकाश जैन ने चंदर के छद्म नाम से – कथित रूप से अपनी सहचरी के सहयोग से लगभग 70-80 उपन्यास लिखे और वे पॉकेट बुक्स में प्रकाशित हुए. 

वरिष्ठ समीक्षक डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित का साक्षात्कार आलोचना पर केंद्रित है. उनकी स्थापना है कि आलोचना एक प्रकार का संवाद है : रचनाकार और उसके आलोचक के बीच. जहाँ तक विचारधारा का प्रश्न है उसका स्थूल और साग्रह प्रयोग न रचना के लिए हितकर है और न आलोचना के लिए. उन्होंने आज के काव्य साहित्य की सबसे बड़ी दुर्बलता के रूप में ‘किसी विराट सोच का अभाव’ को रेखांकित किया है. 

छठा साक्षात्कार विरल ग्रामगंधी चेतना के समर्पित साहित्यकार विवेकी राय का है जो लेखकीय निष्ठा को ही संतुष्टि का स्रोत मानते हैं. उन्होंने यह विचार व्यक्त किया है कि साहित्य और जीवन मूल्यों का अन्योन्याश्रित संबंध है तथा युगीन दबावों से मुक्ति की चुनौती ही आज के सर्जक के सामने प्रमुख चुनौती है. 

‘लेखन आत्महनन है’ - यह शीर्षक है डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के साक्षात्कार का. वे आलोचक से यह अपेक्षा रखते हैं कि इस राजनैतिक युग में वह विचारधारात्मक संघर्ष करे ताकि वर्ग-वर्ण हीन समाज की रचना के समर्थक और शत्रु साहित्य को पृथक कर सके. वे इस विषय पर भी चिंता प्रकट करते हैं कि आज संचार माध्यमों द्वारा उत्तर आधुनिक कला में प्रपंच या छल का आधिपत्य स्थापित किया जा रहा है तथा व्यक्ति की छवि या इमेज व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है – छल ही बल है और छल ही सत्य!

अंत में दो साक्षात्कार डॉ. रामविलास शर्मा के हैं – ‘देश का दूरगामी भविष्य उज्ज्वल है’ तथा ‘बदलाव के लिए बहुत बड़ी क्रांति की जरूरत होगी’. ऋग्वेद, भारतीय सौंदर्यबोध, मनुस्मृति, शिव, कृष्ण, कौटिल्य, भरत मुनि और गांधी से लेकर परमाणु विस्फोट, उदारीकरण और भाषानीति जैसे अनेक विषयों पर व्यापक चर्चा. 

कुल मिलाकर, रोचक, पठनीय, मननीय एवं संग्रहणीय ग्रंथ.   
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 साहित्यकारों के साथ संवाद/ 
डॉ. त्रिभुवन राय/
राज पब्लिशिंग हाउस, जयपुर/ 
2012/ 
पृष्ठ – 159/ 
मूल्य – रु. 695/-