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मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मूल्यांकित शोधपत्रिका 'समुच्चय' का प्रवेशांक लोकार्पित

हैदराबाद, ८ नवम्बर २०१०.

आज यहाँ अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग  (अंतरअनुशासनिक अध्ययन संकाय) की 'भाषा, साहित्य एवं संस्कृति की मूल्यांकित शोधपत्रिका' ''समुच्चय'' के प्रवेशांक का  लोकार्पण विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.अभय मौर्य के हाथों संपन्न हुआ. दरअसल यह शोधपत्रिका उन्हीं का मानसशिशु है. उन्होंने कहा भी कि  'समुच्चय' के रूप में विभाग के अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने उनके एक स्वप्न को साकार किया है. शायद यही कारण रहा हो कि जब समारोह के अंत में प्रो.मौर्य के प्रति आभार व्यक्त किया जा रहा था तो वे भावुक हो आए थे. 

संकाय के अधिष्ठाता प्रो.एम. माधव प्रसाद की अध्यक्षता में संपन्न इस समारोह में 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने ''शोध पत्रकारिता'' पर विशेष व्याख्यान दिया. 'समुच्चय' के प्रवेशांक की समीक्षा  प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने अपुन को सौंपी थी; सो दी गई भूमिका निभाते हुए अपुन ने लोकार्पित अंक को १० में से ८ अंक दिए - २ अंक एक बेहद महत्वपूर्ण निबंध की अतिशयतापूर्ण वाक् स्फीति के काटने पड़े, अन्यथा सारी सामग्री संपादकीय में निर्धारित उद्देश्यों के पूर्णतः अनुरूप है.

 निश्चय ही इस महत्वाकांक्षी प्रकाशन के लिए विभाग के सभी सदस्य - डॉ . रसाल सिंह, डॉ.टी जे रेखारानी , डॉ. प्रोमिला, डॉ. अभिषेक रौशन, डॉ. प्रियदर्शिनी और डॉ. श्यामराव राठौड़ - भी धन्यवाद के पात्र हैं.

दूसरे सत्र में कवि सम्मलेन जमा - नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भट्टड़ , लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, भंवरलाल उपाध्याय,ऋषभदेव शर्मा और रामकृष्ण पांडेय के अलावा परिसर के छात्रकवियों ने भी काव्यपाठ किया . ऐसा समां बँधा  कि वेंकटेश्वर जी ने निकट भविष्य में रात भर का कवि सम्मलेन करवाने की घोषणा कर डाली. आमंत्रित कविगण उस क्षण गद्गद हो उठे जब उन सबके सम्मान में भरे सदन ने खड़े होकर तालियाँ बजाईं.

पुनश्च-

'समुच्चय' के प्रवेशांक में जगदीश्वर चतुर्वेदी, रमणिका गुप्ता, दिलीप सिंह, प्रज्ञा, शकुंतला मिश्र, शैलजा, अमिष वर्मा, दिविक रमेश, भूषण चंद्र पाठक और हीरालाल नागर के वैदुष्यपूर्ण और  विचारोत्तेजक निबंधों के साथ सौभाग्यवश अपना भी एक आलेख (स्त्री और उपभोक्ता संस्कृति) प्रकाशित हुआ है. उसे यहाँ सहेजा  जा रहा है - शायद कभी काम आ जाए. 

हाँ, उम्मीद की जानी चाहिए कि 'समुच्चय' शीघ्र ही ब्लॉगपत्रिका के रूप में ऑनलाइन  भी उपलब्ध होगी.            




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