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शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

'सवाल और सरोकार' की समीक्षा : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

 

पुस्तक समीक्षा

देश-दुनिया के 'सवाल' और पत्रकारिता के 'सरोकार'

-       डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा


समाचार पत्रों में सभी पृष्ठों का अपना-अपना महत्व होता है। पाठक अपनी रुचि के अनुरूप समाचार पत्र पढ़ता है। कुछ लोग आरंभ से लेकर अंत तक पढ़ जाते हैं, कुछ लोग खेल पृष्ठ पढ़ते हैं, तो कुछ लोग संपादकीय पृष्ठ। संपादकीय पृष्ठ अन्य पृष्ठों से अलग दिखाई देता है। इसका अलग महत्व है क्योंकि संपादकीय उस समाचार पत्र के ‘विज़न’ को रेखांकित करता है। ध्यान देने की बात है कि दैनिक समाचार पत्रों का संपादकीय समसामयिक विषयों पर केंद्रित रहता है। संक्षिप्तता संपादकीय का मुख्य गुण है। आदर्श संपादकीय उसे माना जाता है, जिसकी शब्द सीमा लगभग 300-600 शब्दों के बीच हो। संक्षिप्तता के चक्कर में तथ्यों को छोड़ना नहीं चाहिए। ऐसे ही 60 संक्षिप्त, सारगर्भित एवं रोचक समसामयिक संपादकीयों को ऋषभदेव शर्मा (1957) की सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘सवाल और सरोकार’ (2020) में देखा जा सकता है।

प्रसिद्ध तेवरीकार, कवि,  आलोचक और पत्रकार ऋषभदेव शर्मा की दैनिक संपादकीय टिप्पणियाँ पिछले कुछ वर्षों में काफी लोकप्रिय होकर कई अलग-अलग संकलनों के रूप में आ चुकी हैं। ऋषभदेव शर्मा के संपादकीयों में कहीं भी उबाऊपन नहीं होता। पठनीयता उनका विशेष गुण है। समाचार पत्र में प्रकाशित संपादकीय को पढ़ने और पुस्तकाकार  प्रकाशित संपादकीय को पढ़ने का अनुभव अलग-अलग होता  है। क्योंकि अब ये तात्कालिकता की सीमा पारकर अपनी उत्तरजीविता सिद्ध करते हैं। इससे पहले प्रकाशित उनके संपादकीयों के दो संकलन ‘संपादकीयम्’ (2019) और ‘समकाल से मुठभेड़’ (2019) की काफी चर्चा हुई है। उसी क्रम में ‘सवाल और सरोकार’ उनकी रोचक और चुटीली समसामयिक टिप्पणियों का तीसरा संग्रह है। वैसे ऑनलाइन तो उनके और भी दो संपादकीय-संकलन उपलब्ध हैं। अस्तु!

‘सवाल और सरोकार’ में अगस्त 2019 से दिसंबर 2019 के बीच समसामयिक विषयों पर लिखी टिप्पणियाँ संगृहीत हैं। इस पुस्तक की भूमिका में प्रो. गोपाल शर्मा ने यह स्पष्ट किया है कि ‘देश-दुनिया के सरोकारों को सवाल-जवाब की शक्ल देते हुए प्रस्तुत करना भी संपादकीय का दायित्व है।‘ इन संपादकीय टिप्पणियों में सामाजिक  से लेकर राजनैतिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक और आर्थिक सवालों तक पर  गंभीर विमर्श निहित है। इस विमर्श को लेखक ने कुल आठ खंडों में सहेजा है। इन खंडों के शीर्षक ध्यान आकृष्ट करते हैं - सियासत की बिसात, फिरदौस बर रूये ज़मीं अस्त, अगल-बगल, लोक बनाम तंत्र, मंडी की मार बुरी, समाज : आज, पृथ्वी की पुकार तथा प्रलय की छाया। ये शीर्षक लेखक के सरोकारों, पैनी दृष्टि और  लोकमंगल भावना को दर्शाते हैं।

सामाजिक कुरीतियों, दार्शनिक कट्टरपन, राजनैतिक पैंतरेबाजी, आतंकी हमलों जैसी तमाम घटनाओं और युद्ध की विभीषिका से लेखक का मन विचलित हो उठता है और वे आक्रोश से भर जाते हैं। उनका यह आक्रोश उनकी तेवरियों में तो मुखरित है ही, इन संपादकीयों में भी देखा जा सकता है। ऋषभदेव शर्मा भारत सरकार के इंटेलीजेंस ब्यूरो के खुफिया अधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने भारत-पाक सीमा पर अपनी नियुक्ति के दौरान सुरक्षाकर्मियों और सैनिकों के जीवन को भी नजदीक से देखा है। अतः जम्मू-कश्मीर  के बारामूला जिले में जो आतंकवादी हमला हुआ था, उसके विरुद्ध आवाज उठाते हुए वे सभी को चेताते हैं कि ‘आतंकी चोरी छिपे वारदातें करते हैं और बिलों में छिप जाते हैं। ऐसे में सुरक्षा बलों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।‘ (पृ 103)। वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि ‘कश्मीर घाटी से सुरक्षा बलों को हटाने की माँग करने वाले हमारे नेताओं को इन हालात के प्रति भी सचेत होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के चक्कर में वे अनजाने में आतंकियों को सहारा दे बैठें!’ (पृ 104)

पत्रकार के रूप में एक जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य निर्वाह करते हुए ऋषभदेव शर्मा ने बहुत बार समकालीन राजनीति की दुखती रगों पर भी उँगली रखी है। वे  सवाल उठाते हैं कि ‘क्यों नहीं पार्टियाँ अपने उच्छृंखल सदस्यों को तुरंत दंडित करतीं?’ इसका स्पष्टीकरण भी वे खुद ही करते हैं यह कहकर कि ‘नहीं करतीं, क्योंकि इन बिगड़े बच्चों की बिगड़ी हरकतें भी पार्टी को चर्चा में बनाए रखने की नीति हो सकती है!’ (पृ 10)। लेखक यह कहकर चुटकी लेते हैं कि ‘कोई छोटी-सी पाठशाला होती तो ऐसे बच्चों को कभी का निष्कासित कर दिया जाता और सदा के लिए एडमिशन पर रोक लगा दी जाती। लेकिन देश की सबसे बड़ी पंचायत को पंगु बनाने वालों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं हो सकती? ज्यादा से ज्यादा आप उन्हें मार्शलों की मदद से बाहर खदेड़ सकते हैं। पर इससे क्या फर्क पड़ता है? बिगड़े बच्चे अगली घंटी बजते ही फिर क्लास में आ धमकेंगे और मास्टर जी की नाक में दम करेंगे!’ (पृ 10)। लेखक जहाँ राजनैतिक पैंतरेबाजी और आतंक के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं, वहीं चिंदी-चिंदी होते पर्यावरण के प्रति चिंतित भी। अनेक स्थलों पर व्यंग्य और भाषा का खिलंदड़ापन पाठक को देर तक कभी कचोटता, तो कभी गुदगुदाता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इन 60 छोटी-छोटी सारगर्भित टिप्पणियों में देश और दुनिया के प्रति लेखक की चिंता और गंभीर चिंतन द्रष्टव्य है।

★★★         

समीक्षित पुस्तक : सवाल और सरोकार

लेखक : ऋषभदेव शर्मा

प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद

वितरक : श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद/ मो. 9849986346.

संस्करण : 2020

पृष्ठ : 128

मूल्य : रु 140/-

★★★★

समीक्षक:

गुर्रमकोंडा नीरजा,

सह संपादक- ‘स्रवंति’,

असिस्टेंट प्रोफेसर, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद- 500004.

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

(रामायण संदर्शन_संपादकीय) मंगलभवन अमंगलहारी

 रामायण संदर्शन/संपादकीय

अक्टूबर 2020


मंगलभवन अमंगलहारी


प्रिय पाठकगण, 

नवरात्र पर्व और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें। यह काल समस्त भूमंडल के लिए अत्यंत विषम संकट काल है। सारा विश्व 'कोरोना' महामारी से विकल है। आशा है, यथाशीघ्र मनुष्यता इस महामारी का तोड़ खोज लेगी। लेकिन फिलहाल इसकी विकरालता और अपराजेयता दशग्रीव रावण की विकरालता और अपराजेयता की याद दिला रही है। विनाशकारी शक्तियाँ चाहे कितनी भी बलवान क्यों न हों, उन्हें अंततः रचनात्मक शक्तियों के आगे हारना ही पड़ता है। राम के हाथों रावण का वध इसी सनातन सत्य की रूपक-कथा है। रावण कल भी हारा था, आज भी हारेगा। रावण सृष्टि के लिए अमंगल का प्रतीक है, तो राम 'मंगल भवन अमंगल हारी' हैं। इसलिए मृत्यु पर जीवन की विजय में विश्वास रखें और आत्मविश्वास बनाए रखें। 


इस आत्मविश्वास का स्रोत हमारी यह आस्था है कि शरणागत पर किसी भी प्रकार के संकट और अमंगल की छाया पड़ने देना राम को स्वीकार नहीं। तभी तो वे युद्धभूमि में सुग्रीव और विभीषण की सुरक्षा के लिए सबसे अधिक चिंतित रहते हैं; और सक्रिय भी। युद्धभूमि में रावण ने क्रुद्ध होकर विभीषण को लक्ष्य करके प्रचंड शक्ति छोड़ी, जो यमराज के दंड के समान अचूक थी। बाबा तुलसीदास बताते हैं कि उस अत्यंत भयंकर शक्ति को आते देखकर श्रीराम ने विचार किया कि शरणागतों के दुख को नाश करना मेरा प्रण है - 'प्रणतारति भंजन पन मोरा।' बस फिर क्या था, राम स्वयं कूदकर विभीषण के सामने आ गए और उस प्राणघाती शक्ति को अपने वक्ष पर झेल लिया। रावण का यह हमला कितना खतरनाक था इसका अनुमान इस कथन से किया जा सकता है कि शक्ति लगने पर राम को थोड़ी देर के लिए मूर्छा आ गई - 'लागी सकति मुरुछा कछु भई।' 


अभिप्राय यह कि राम शरणागत वत्सल और लोकरक्षक हैं। वे किसी भी स्थिति में लोक को नष्ट नहीं होने दे सकते। लेकिन स्मरणीय यह भी है कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उन्हें मर्यादाओं का अतिक्रमण तनिक भी स्वीकार नहीं। इसलिए अगर राम की कृपा चाहिए, तो हमें लोक मर्यादा का पालन करना होगा। और इस समय लोक मर्यादा यही है कि जब तक कोरोना वायरस का सही तोड़ नहीं मिल जाता, तब तक 'सामाजिक दूरी' के नियमों का पालन करें!


विजया दशमी की शुभकामनाओं सहित,

  • संपादक

सोमवार, 27 जुलाई 2020

(रामायण संदर्शन_संपादकीय)।।साधु ते होय न कारज हानी।।

संपादकीय
।।साधु ते होय न कारज हानी।।

लोक में विभीषण के प्रति भले ही थोड़ा-बहुत हिकारत का भाव दिखाई देता हो और उन्हें लंका ढहाने वाला घर का भेदी समझा जाता हो, तुलसी के लिए वे परम राम-भक्त और साधु हैं। सोचने वाली बात यह है कि आप राम और रावण में से किसे वरेण्य मानते हैं। रावण विभीषण का भाई है और अधर्म का पर्याय भी। विभीषण भ्रातृ-धर्म निभाते हुए उसे अधर्म से विरत करने का यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं। पर असफल होते हैं। तो क्या उन्हें रावण के साथ ही खड़े रहना चाहिए था? नहीं, तुलसी बाबा इस प्रश्न पर एकदम स्पष्ट हैं। उनकी तो घोषणा ही है कि जिसे राम-वैदेही से द्वेष हो, परम स्नेही हो तो भी उसे निस्संकोच त्याग देना चाहिए। राम से द्वेष किसी व्यक्ति से द्वेष नहीं है। वह तो धर्म से द्वेष है। राम साक्षात धर्म हैं न! साधु की पहचान ही है कि वह अधर्म और अनीति के साथ नहीं रह सकता। विभीषण को हनुमान राक्षस नहीं, साधु के रूप में पहचानते हैं - साधु ते होय न कारज हानी। विभीषण राम-काज की सिद्धि में माध्यम बनते हैं। भला सामने उपस्थित युद्ध के समय वे अधर्म के पक्ष में कैसे खड़े रह सकते थे। इसीलिए रावण द्वारा लात मार कर बाहर किए जाने पर वे राम की शरण में आ जाते हैं। खुलकर धर्म के साथ आ जाते हैं। स्वयं भगवान शिव यहाँ टिप्पणी करते हैं कि विभीषण जैसे साधु की अवज्ञा करने से उसी पल रावण का अमंगल सुनिश्चित हो गया; और उसके चाटुकारों की सभा आयुहीन हो गई। विभीषण ने अधर्म का समर्थन न करके धर्म अर्थात राम का वरण किया, इसीलिए वे परम भक्त हैं!
 -प्रधान संपादक

गुरुवार, 14 मई 2020

(पुस्तक) 'अभी न होगा मेरा अंत : निराला' का पुनर्पाठ

 पुस्तक समीक्षा :

अभी न होगा मेरा अंत : निराला का पुनर्पाठ


छायावादी कविता के प्रमुख उन्नायकों में एक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अपने काव्य की जटिलता और सरलता दोनों ही के कारण आलोचकों के लिए चुनौती रहे हैं – अपने समय में भी और आज भी। अगर यों कहा जाए कि निराला न तो छायावाद में पूरी तरह से अँटते हैं और न प्रगतिवाद में, तो भी कुछ गलत न होगा। इसके बावाज़ूद वे छायावादी भी हैं और प्रगतिवादी भी। छायावाद के उदय के सौ साल बाद आज के रचनाकार के लिए भी अगर निराला प्रेरणा पुंज बने हुए हैं, तो यह उनकी महाप्राणता और कालजयी प्रासंगिकता का प्रमाण है। यही कारण है कि पाठक और आलोचक बार-बार निराला और उनकी कविता के पास जाते हैं तथा नई प्राण शक्ति ग्रहण करते हैं। ऐसी प्राण शक्ति जिसमें नित नूतन वसंत का यह विश्वास निहित है कि ‘अभी न होगा मेरा अंत’। इसी क्रम में डॉ उषा रानी राव ने निराला के काव्य का पुनर्पाठ ‘अभी न होगा मेरा अंत : निराला’ (2020, जयपुर : बोधि प्रकाशन) प्रस्तुत किया है। 
कन्नड मातृभाषी, डॉ उषा रानी राव अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त हिंदी, संस्कृत और अँग्रेजी साहित्य की गहन अध्येता विदुषी हैं। संपादन, अनुवाद और स्तंभलेखन के साथ साथ उन्होंने काव्य सृजन और साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में विशेष पहचान अर्जित की है। उनकी यह कृति भी उनके गहन अध्ययन और चिंतन मनन का उत्कृष्ट परिणाम है। इस कृति में निराला के काव्य के पुनर्पाठ के मूल में लेखिका की समाजशास्त्रीय और मानववादी दृष्टि विशेष रूप से सक्रिय रही है। छायावाद को उन्होंने साहित्यिक के साथ साथ सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में व्याख्यायित करने का सफल प्रयास किया है। उनकी धारणा है कि छायावादी साहित्य एक ऐसी नवीन मानवीय दृष्टि से अनुप्राणित है, जिसमें रूढ़ियों का खंडन, औदात्य, विश्वबधुत्व और सांस्कृतिक एकता के भाव निहित हैं। छायावाद ने यह दृष्टि निजता के वैश्विक प्रसार द्वारा आयत्त की।  विशेषकर निराला ने तो वैयक्तिक चेतना के इतने फैलाव को संभव करके दिखाया कि वे स्वयं समाज की गीतिका बन गए। कौन नहीं जानता कि छायावाद के साथ तत्कालीन आलोचना ने पक्षपात और भेदभाव बरता। अपने अक्खड़ और फक्कड़ स्वभाव के कारण निराला विशेष रूप से आलोचकों के निशाने पर रहे। डॉ. उषा  ने उस सीमित दृष्टिकोण का त्याग करके यह व्यापक धारणा अपनाई है कि छायावादी आधुनिकता मानवीय मूल्यों को नवीनता के साथ उपस्थित करने के प्रयास का नाम है। उन्होंने इसकी स्वछंदता को खोए हुए व्यक्ति की खोज के रूप में रेखांकित किया है और यह दर्शाया है कि इस काव्य का मूल प्रयोजन प्रकृति, अध्यात्म और लोक कल्याण की तिहरी भित्ति पर आधारित है। इनमें से एक की भी उपेक्षा करके न तो छायावाद को, और न ही निराला को समग्रतः समझा जा सकता है। अगर इस प्रयोजन त्रयी को ध्यान में रखा जाए, तो सहज ही यह समझा  जा सकता है कि क्यों निराला के काव्य में सौन्दर्य, उल्लास और संघर्ष के बीच विरोध न होकर समंजस्य है। इसे लेखिका ने रचनाकार के आंतरिक संघर्ष और वैचारिक उदारता का सौंदर्य बोध कहा है जो उसकी अमरता का आधार है। 
निराला के काव्य की स्वछंदता की व्याख्या करते हुए लेखिका ने यह ध्यान दिलाया है कि समय-समय पर स्वछंदता नई सीमाओं और नई व्याख्याओं को लेकर प्रस्तुत होती है। वह रूढ़ि बन चुके विगत के विचारों से मुक्ति का प्रयत्न है। कहना न होगा कि निराला ने मुक्त छंद के रूप में अपने समय की काव्य रूढ़ियों के प्रति विद्रोह का शंखनाद किया, और काव्य वस्तु के स्तर पर रूढ जीवन मूल्यों के प्रति जागरूक बौद्धिक प्रतिक्रिया के रूप में एक क्रांति उपस्थित की। निराला जब मानवों की मुक्ति की भांति, कविता की मुक्ति की बात करते हैं, तो वे सही अर्थों में समस्त जड़ रूढ़ियों को ध्वस्त करके स्वच्छंदता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यही कारण है कि वे बीसवीं शताब्दी में कबीर के वंशधर प्रतीत होते हैं, जो अपना नया मार्ग प्रवर्तित करने के बावजूद किसी मत-वाद में बंधे हुए नहीं हैं। कबीर और निराला दोनों ही जीवन के अनुभव के साथ निरंतर पल्लवित और भलीभूत दर्शन के उद्गाता हैं। 
लेखिका ने अनेक अंतर्साक्ष्यों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि निराला की काव्यदृष्टि किसी भी कोण से एकांगी नहीं है। वे सही अर्थों में विश्वदृष्टि संपन्न कालजयी साहित्यकार हैं। उनकी उत्तरजीविता का आधार जग को ज्योतिर्मय कर द्देने की उनकी मंगलकामना में निहित है। वे जिस नूतन जीवन के निर्माण का स्वप्न देखते हैं, वह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सार्वजनीन है। यही कारण है कि लेखिका को निराला के जीवन का आदर्श स्वछंदता से प्रेरित होकर लोकमंगल की भावना में पर्यवसित होता प्रतीत होता है; जो सही भी है। इसी से तो मायामोह का परिष्कार होता है तथा आध्यात्मिक कोटि का उदात्त विश्वप्रेम संभव हो पाता है। यहाँ आकर निराला की ‘मैं’-शैली वैश्विक संवेदना का औदात्य प्राप्त करती दिखाई देती है। लेखिका की यह स्थापना पर्याप्त सुचिंतित प्रतीत होती है कि भारतीय परंपरा में जीवन, अध्यात्म से अलग नहीं है, और इस परंपरा  में मानवतावाद तथा विश्व कल्याण की भावना गहराई से गुंथी हुई है।  नि:संदेह निराला अपने समय में इसी अध्यात्म की पुनर्रचना कर रहे थे; और इसी कारण उनकी रचनाएँ भारतीय जीवन दर्शन की व्याख्या करती सी प्रतीत होती हैं। 
छायावाद को अतीतजीवी और पलायनवादी कहने वाले प्रायः उसके युग बोध और राष्ट्रीय चेतना की जानबूझ कर उपेक्षा करते हैं। इसके विपरीत डॉ. उषा रानी राव ने निराला के छायावादी काव्य को राष्ट्रीय जागरण के साथ जोड़ कर देखने की वकालत की है। वे मानती हैं कि राष्ट्रीय जागरण के उन दिनों में यह विचार प्रबल रूप से समाज में स्वीकृत था कि वर्ण व्यवस्था मिट  गई तो समाज मर्यादाविहीन हो जाएगा, किंतु निराला ने इस जीर्ण शीर्ण व्यवस्था के निर्मूलन के लिए अपने व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों के माध्यम से प्रेरक भूमिका निभाई औए इस तरह उनका अपना काव्य सत्य तत्कालीन समाज के समूहिक सत्य के साथ एकाकार हो गया। निराला प्राचीन रूढ़ियों और सामाजिक परंपराओं के विरोध के प्रतीक बन गए। वे समाज के आमूल परिवर्तन की पुकार ही नहीं लगाते, अपने जीवन में उसे साकार भी करते हैं। लेखिका ने निराला के इस आग्रह को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के 1924 के इस कथन से प्रेरित माना है कि ‘’इस दुनिया की सृष्टि एक ऐसे ईश्वर ने की है, जिसकी कोई जाति नहीं है, जो नीच-ऊँच का कायल नहीं, जो ब्राह्मण तथा कीड़े-मकोड़े तक में अपनी सत्ता प्रकट करता है।‘’ कहना न होगा कि हर प्रकार के जातिभेद और वर्णवाद का विरोध करने वाले निराला इसी विचार को आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। यही तो स्वच्छंदता  का सही पाठ है। वैसे निराला में कभी-कभी एक उच्छृंखलता का पुट भी दिखाई देता है, लेकिन जैसा कि लेखिका ने लक्षित किया है, यह उनके चरित्र का मूल भाव नहीं है। 
निराला के सामाजिक सरोकार को रेखांकित करते हुए लेखिका ने विशेष रूप से यह ध्यान दिलाया है कि गरीबों की पुकार पर ठिठक कर रुकने वाले सहृदय कवि को शेर का जीवन काम्य है। वे शेर की माँद में पनपते सियारों को देख कर क्षुब्ध हो उठते हैं। शेर की तरह दहाड़ भी उठते हैं। क्योंकि उनकी वाणी गरीबों की पुकार से प्रेरित है। कवि को उस शेरनी की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है, जिसके बच्चों को किसी ने छीन लिया है। उस दहाड़ से प्रेरित कवि उस बच्चे को बचाने के लिए काल के घर जाने को भी तैयार है। वंचित, पददलित और शोषित जन की आवाज़ लेकर कवि सब झेलने के लिए तैयार है। लेखिका का मानना है कि यह समदर्शी जीवन व्यवहार निराला के व्यक्तित्व की छाप है। 
निराला इस अर्थ में भी आगे के कवियों के लिए मार्गदर्शक रहे हैं कि उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता को व्यंग्य की धार दी। उन्होंने समाज में सदियों से होने वाले अत्याचार पर व्यंग्य किया, ऐसे स्थलों पर जन समाज के साथ उनकी हमदर्दी के अलावा लोकमंगल का भाव खासतौर पर अग्रप्रस्तुत हो उठता है। यहाँ वे फिर भारतीय विश्वदृष्टि के प्रस्तोता प्रतीत होते हैं, क्योंकि मानवता के नाम से जिस आदर्श को सदियों से सम्मान मिलता रहा है, निराला ने उसी मानवता की दुहाई देकर पीड़ित और दुखी जनता का चित्र खींचा है। यही नहीं, वे सामाजिक यथार्थ के साथ साथ संहार में छिपी सृजन की संभावनाओं को भी भली प्रकार देख और दिखा पाते हैं, तो वह भी अंधकार पर प्रकाश की सदा विजय के भारतीय विश्वास की ही देन है। यही कारण है कि उनके यहाँ बादल किसानों में जीवन की आशा और आकांक्षा  का संचार करने के साथ साथ क्रांति के भी दूत बन कर आते हैं। साथ ही लेखिका ने यह लक्षित किया है कि बिल्लेसुर बकरिहा तथा कुल्ली भाट जैसी गद्य रचनाओं और बेला, नए पत्ते, कुकुरमुत्ता, दान तथा अपरा में निराला ने समाज के प्रति अपने आक्रोश को पैने व्यंग्य के रूप में ढालने में सफलता पाई है। ऐसी रचनाओं  में तत्कालीन समाज के बौद्धिक विघटन पर गहन चिंता दिखाई देती है। 
कुल मिलाकर, लेखिका डॉ. उषा रानी राव ने निराला की उत्तरजीविता का स्रोत उनकी उस मुखर सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना और प्रशस्त मानववादी विश्वदृष्टि में निहित माना है, जो उन्हें नवजागरणकालीन और स्वाधीनता आंदोलन से अनुप्राणित बीसवीं शती के हिंदी साहित्य में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का उत्तराधिकारी सिद्ध करती है।      
अंततः यह कहना ज़रूरी है कि ‘अभी न होगा मेरा अंत : निराला’ अत्यंत तर्कपूर्ण और तत्वान्वेषी अध्ययन है, जिसे निराला और उनके युग को समझने के लिए ध्यानपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। यदि उद्धरणों के साथ पाद टिप्पणी में  स्रोतों का भी उल्लेख कर दिया गया होता, तो सोने में सुहागा हो जाता। 
लेखिका और प्रकाशक को बधाइयाँ और साधुवाद। 000 
  • ऋषभदेव शर्मा, पूर्व आचार्य और अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा। आवास: 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद-500013. मो.8074742572. rishabhadeosharma@yahoo,com 
द्रष्टव्य- साहित्य कुंज
http://sahityakunj.net/entries/view/abhi-n-hoga-mera-ant-nirala-ka-punrpaath

रविवार, 19 अप्रैल 2020

(रामायण संदर्शन_संपादकीय) परमात्मा का प्राकट्य


संपादकीय
परमात्मा का प्राकट्य

प्रिय पाठको!
आज सारा विश्व एक नई और विचित्र महामारी की चपेट में आया हुआ है। कोविड-19 या कोरोना नाम के विषाणु से फैलने वाली इस महामारी की मनुष्य जाति के पास न तो अभी तक कोई कारगर औषधि है और न ही कोई रोकथाम कर सकने वाली वैक्सीन ही खोजी जा सकी है। ऐसी स्थिति में मनुष्य जाति अपने आप को असहाय और किंकर्तव्यविमूढ़ महसूस कर रही है। इस वैश्विक संकट से अपने आप को और अपने समाज को बचाने के लिए  एकांत सेवन और सामाजिक दूरी के नए नियमों का पालन करने की सलाह दी जा रही है। 

इसमें संदेह नहीं कि मानव मेधा आज नहीं तो कल इस महामारी का कोई न कोई समाधान अवश्य खोज लेगी। लेकिन इस समय की वास्तविकता यह है कि अतिशय महाबली राष्ट्रों से लेकर अत्यंत साधारण व्यक्ति तक सभी अपने आप को एक ऐसे प्रकृति प्रदत्त दुष्चक्र में फँसा हुआ अनुभव कर रहे हैं, जिससे निकलने में तमाम तरह की भौतिक कोशिशों के बावजूद सफलता नहीं मिल पा रही है। यदि यह कहा जाए कि कोरोना विषाणु ने भौतिक हानि की तुलना में वर्तमान पीढ़ी के मनुष्य की मानसिक और आत्मिक क्षति अधिक की है, तो शायद गलत न होगा। महामारी और मृत्यु के समक्ष अपनी तुच्छता और भंगुरता के बोध ने मनुष्यों के मानसिक बल और आत्म शक्ति को कमजोर बनाया है। इसका परिणाम एक ऐसी नकारात्मकता के रूप में सामने आ रहा है, जहाँ मनुष्य और मनुष्य के बीच एक नई तरह की संशय पूर्ण स्थिति और अवांछित छुआछूत जन्म ले रही है। यही नहीं, तमाम तरह की तार्किकताओं और वैज्ञानिक समझदारियों को अंगूठा दिखाते हुए, इस विषाणु के कारण नई तरह के अंधविश्वास और घृणा के भाव भी समाज के बीच उभर रहे हैं।

इस तमाम नकारात्मकता के निवारण और सकारात्मकता की पुनर्रचना के लिए ज्ञान, कर्म और इच्छा के समन्वय की बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को अपने आत्मबल को जगाना होगा। आत्मबल का यह जागरण कई प्रकार संभव है, जिनमें एक मार्ग भक्ति का भी है।  अनासक्त भाव से कर्म करते हुए, लोक कल्याण की भावना के साथ जीवन यापन करते हुए यदि हम अपने आराध्य के प्रति एकनिष्ठ विश्वास रखेंगे, तो अवश्य ही हमारे भीतर आत्मबल के रूप में स्वयं परमात्मा प्रकट होंगे।  

परमात्मा का प्राकट्य ऐसे हर क्षण में होता है, जब हम अपने आप को असहाय, निरीह और निरूपाय  पाते है। ऐसे हर क्षण नें परमात्मा नई संभावनाओं के रूप में अवतरित होते हैं। इस जगत का इतिहास साक्षी है कि जब जब नकारात्मकता का वैश्विक प्रसार हुआ है, तब तब परमात्मा ने किसी न किसी रूप में सकारात्मकता का अवतार धारण किया है। भगवान राम का प्राकट्य भी मनुष्य के भीतर आत्मबल और सकारात्मकता  के ही उदय होने का प्रतीकात्मक आख्यान है। भगवान राम के प्राकट्य के लिए प्रकृति की समस्त शक्तियाँ देवताओं के रूप में प्रजापति ब्रह्मा के नेतृत्व में जो प्रार्थना करती हैं, वह वास्तव में लोक रक्षण के निमित्त आत्मबल के जागरण की साधना ही तो है! 

संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में इस प्रार्थना अथवा स्तुति में स्वयं परब्रह्म स्वरूप परम सत्ता का गुणगान करते हुए उन्हें जन सुखदाता, प्रणतपाल, समस्त शक्तियों के स्वामी, अविनाशी, सब घट वासी, व्यापक और परमानंद  बताते हुए यह कहा है कि वही सृष्टि के रचनाकार हैं और उन्हें सदा इस सृष्टि की चिंता है। इसी आत्मविश्वास के बल पर हम आज भी नकारात्मकता से के विरुद्ध सकारात्मक शक्तियों का जागरण कर सकते हैं क्योंकि असत, अंधकार और मृत्यु अंतिम सत्य नहीं हैं।  परम सत्य तो सत, प्रकाश और अमरत्व हैं तथा हम उसी अमृत की संतानें हैं। 

तो आइए, इसी आत्मविश्वास को लेकर हम भी आज के इस संकटकाल में अपने भीतर छिपे हुए राम रूपी अमरत्व के उदय के शुभ संकल्प के साथ अपने आराध्य की अभ्यर्थना करें! शुभमस्तु!
  • संपादक

जय जय सुरनायक!

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता,
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता,
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोइ,
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोइ,

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा,
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा,
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा,
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा,
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा,
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा,
मन बच क्रम बानी छाङि सयानी सरन सकल सूरजूथा,

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना,
जेहिं दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवहु सो श्रीभगवउाना,
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा,
मुनि सिध्द सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा,

जानि सभय सुरभूमि सुनि, बचन समेत सनेह,
गगनगिरा गंभीर भइ, हरनि सोक संदेह,
 (रामचरितमानस, बालकांड)