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गुरुवार, 11 जुलाई 2019

(भूमिका) "अनामिका : समकालीन स्त्री विमर्श" - चंदन कुमारी

अनामिका: समकालीन स्त्री विमर्श/
डॉ. चंदन कुमारी/2019/
 विद्या प्रकाशन, कानपुर/
176 पृष्ठ, सजिल्द/ 500 रुपये 



अभिमत 

डॉ. चंदन कुमारी की इस समीक्षा-कृति “अनामिका: समकालीन स्त्री विमर्श” की पांडुलिपि का पारायण करते समय बार-बार मुझे एक ओर चंदन कुमारी का जिज्ञासा और उत्सुकता से दीप्त चेहरा याद आता रहा और दूसरी ओर वैदुष्य तथा सृजनात्मकता से परिपूर्ण अनामिका की साहित्यकार छवि मानस-गोचर होती रही। ऐसा लगा कि चंदन ने अनामिका को और उनके साहित्यकार को बखूबी समझा ही नहीं है, प्रत्युत अपने आप में चरितार्थ भी किया है। इस विद्वत्तापूर्ण और सब प्रकार से प्रासंगिक पुस्तक के प्रकाशन पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। 

मानव सभ्यता का इतिहास इस विडंबनापूर्ण सत्य का साक्षी है कि दुनिया भर के समाजों में स्त्री को केवल इसलिए बंधक जीवन जीना पड़ता रहा है कि उसने स्त्री के रूप में जन्म लिया है। प्रकृति ने भले ही स्त्री और पुरुष को बराबर बनाया हो, समाज ने उन्हें मालिक और गुलाम के रिश्ते में ढाल कर स्त्री के विरुद्ध भीषण षडयंत्र ही नहीं, घोर अपराध किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अपने योगदान द्वारा जीवन और समाज के केंद्र में रहने की अधिकारी होने के बावजूद स्त्री को सदा मुखपृष्ठ से अनुपस्थित और अपदस्थ रखा गया। शायद सभ्यता के आरंभिक युगों में उसे बराबरी या उससे भी अधिक का सम्मान मिला हो, लेकिन कालांतर में उसे भोग्य वस्तु, पण्य पदार्थ और संतान जनने के यंत्र में तब्दील करके पुरुष ने हर प्रकार उसका दोहन और शोषण किया। ऊपर से तुर्रा यह कि तमाम मूल्यों और संस्कृति की रक्षा का भार भी उसी के मत्थे मढ़ दिया गया। एक ऐसी छवि गढ़ दी गई जो ममता, करुणा, प्रेम, समर्पण, बलिदान और निरीहता की प्रतीक थी। खासकर भारतीय स्त्री हजारों साल से ऐसी छवि में कैद रहकर छली जाती रही; और इस छले जाने पर भी गौरव का अनुभव करती रही। स्त्री के इर्द-गिर्द तरह-तरह के मिथ बुने गए और उसे अपने स्त्रीत्व तक के लिए लज्जित होना सिखाया गया। पिछले सौ-दोसौ वर्षों में धीरे-धीरे शिक्षा और लोकतंत्र के सहारे भारतीय स्त्री ने अपने चारों ओर खींची गई तथाकथित मर्यादाओं को उलाँघना आरंभ किया। इसका दंड भी भोगा। आज भी यह पुरुष-केंद्रित समाज उसे इस अपराध के लिए दंडित करने में किसी प्रकार की ढील नहीं करता। इसके बावजूद स्त्री है कि अपने अस्तित्व को प्रमाणित कर रही है; अपनी अस्मिता को उजागर कर रही है। इतना ही नहीं, स्त्री ही स्त्री की विरोधी होती है अथवा स्त्री तो कोमलता की प्रतिमा होने के कारण जीवन-संघर्षों में सदा पुरुष की मुखापेक्षी बनी रहने के लिए मजबूर होती है - जैसे थोपे गए मिथों को आज की भारतीय स्त्री ने खंडित और ध्वस्त कर दिया है। वह पुरुष-सभ्यता द्वारा विकसित परंपरागत शोषणकारी नारी-संहिता को ही अस्वीकार नहीं करती, वरन स्त्री-बहनापे की भी नई मिसाल पैदा करती है। वह सामाजिक-राजनैतिक हलकों में भी अपनी उपस्थिति द्वारा सार्वजनिक जीवन को दिशा प्रदान कर अपना सामर्थ्य सिद्ध करती है। इस नई स्त्री ने पुरुष-केंद्रित भाषा तक को चुनौती देना शुरू कर दिया है तथा अब यह समाज, संस्कृति, विज्ञान और अध्यात्म से लेकर भाषा और साहित्य तक का स्त्री-पाठ रचने में संलग्न है। यह समर्थ स्त्री शक्ति और सत्ता ही नहीं, यौन और नैतिकता को भी स्त्री-कोण से अपनी समग्र निजता के साथ परिभाषित करती दिखाई दे रही है। 

अनामिका अपने समग्र साहित्य में इसी स्त्री को कभी खोजती हैं, कभी सँवारती हैं और कभी सिरजती हैं। चंदन ने अनामिका की इस स्त्री के साथ गहरा अपनापा बना लिया है - उनकी यह कृति इस तथ्य को प्रमाणित करती है। 

मुझे दृढ़ विश्वास है कि स्त्री विमर्श विषयक डॉ. चंदन कुमारी की यह कृति सुधी पाठकों का हृदयहार बनेगी और इस क्षेत्र में आगे अध्ययन करने वाले जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन भी करेगी। 

अनंत आशीष और समस्त मंगलकामनाओं सहित, 

- ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद 
मोबाइल : 807474 2572

 


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