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रविवार, 14 जुलाई 2013

अनिर्वचनीय है परमप्रेम

[भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारदीय भक्तिसूत्र का 'तदीय सर्वस्व' नाम से 1874 में अनुवाद और भाष्य किया था. उसी के कतिपय अंश........]

ॐ अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः
[अब हम यहाँ से भक्ति की व्याख्या करते हैं].
सा कस्मै परम प्रेम रूपा/ अमृत स्वरूपा च 
[वह ईश्वर से परम प्रेम रूपा है/ और अमृत स्वरूप है].
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति  अमृतो भवति  तृप्तो भवति
[जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध होता है, अमृत होता है और तृप्त होता है].

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ॐ अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपं
[प्रेम का स्वरूप कहा नहीं जा सकता].
मूकास्वादनवत्
[गूंगे के स्वाद की भाँति].
प्रकाशते क्कापि पात्रे
[(तथापि) कभी किसी पात्र (अधिकारी) में स्वयं प्रकाश पाता है].
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्द्धमानम् अविच्छिन्नम् सूक्ष्मतरम् अनुभवरूपं
[(प्रेम का स्वरूप) गुणों से रहित, कामनाओं से रहित, प्रतिक्षण में वृद्धिगत, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर केवल अनुभवरूप है].
तम्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति
[उसको पाकर उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी को बोलता है और उसी का चिंतन करता है].

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