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रविवार, 28 जुलाई 2013

दादू दर्शन बिन क्यों जीवै.....

पुस्तक : दादू पंथ : साहित्य और समाज दर्शन, 
लेखक : डॉ.ओकेन लेगो, 
संस्करण : 2013, 
प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, 
1/10753, गली नं. 3, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा,
कीर्ति मंदिर के पास, दिल्ली – 110032,
पृष्ठ : 199, 
मूल्य : रु. 495 (हार्डबाउंड).
 डॉ.ओकेन लेगो (1976) मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के गंभीर अध्येता हैं. साथ ही अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय जीवन, समाज, संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं. वे अरुणाचल के उन प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापन और शोध को नई दिशा दी है. ‘दादू पंथ : साहित्य और समाज दर्शन’ (2013) उनका अत्यंत परिश्रमपूर्वक तैयार किया गया ग्रंथ है. अपने अध्ययन को प्रामाणिक बनाने के लिए उन्होंने दादूपंथ से जुड़े तमाम स्थानों का भ्रमण और सर्वेक्षण करके यह प्रतिपादित किया है कि दादू और दादूपंथी संतों ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान और धर्म साधना के क्षेत्र में पर्याप्त मौलिक योगदान किया है. 

यह ग्रंथ इस तथ्य को रेखांकित करने में पूर्ण समर्थ है कि दादू भारतीय समाज के उस जागरण के प्रतिनिधि हैं जिसे सच्चे अर्थों में भारतीय जागरण माना जाता है. भले ही यह जागरण मध्यकाल में आया और भले ही इस जागरण की ओर अध्येताओं का ध्यान अच्छी तरह न गया हो, किंतु इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वही भारतवर्ष का प्रथम जागरण है और उसी में आधुनिक भारत की नींव के तत्व छिपे हुए हैं. वास्तविकता यह है कि जिसे हम मध्यकाल अथवा हिंदी साहित्य की दृष्टि से भक्तिकाल कहते हैं, वह गहरे अर्थ में समाज के उठ खड़े होने का समय है. विशेष रूप से इस काल में वह समाज अपने पैरों पर उठकर खड़ा होना शुरू हुआ, जिसे अनेक शताब्दियों से पददलित और शोषित बनाया हुआ था. इतना ही नहीं, इस समाज को सामंती तथा अभिजात शक्तियों ने पूरी तरह कुचलने का षड्यंत्र किया था. यह षड्यंत्र इतना भयानक था कि अगर सफल हो जाता तो आधुनिक भारत की एक विद्रूप तस्वीर हमारे सामने होती. शायद हम विश्व समाज के समक्ष गर्व के साथ सिर उठाकर खड़े होने लायक न रहते.

साहित्य की जड़ मनोवृत्तियों और प्रतिगामी प्रवृत्तियों का प्रश्न भी इसी के साथ जुड़ा है. मध्यकाल में साहित्य की जड़ता और रचनापरक आभिजात्य पर सोचा-समझा आक्रमण किया गया. यह आक्रमण उन संतों और भक्तों ने किया, जो सीधे जमीन से जीवन ग्रहण करके तत्कालीन समाज को बदलने के मार्ग पर चले थे. ये संत और भक्त सामाजिक क्रांतिकारी थे. इनके मन में मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्थापित करने की साध थी. ये संस्कृति को शास्त्र की पकड़ से बाहर निकालना चाहते थे और उस साधारण जन से जोड़ना चाहते थे, जिसके जीवन में यह संस्कृति अपने सही अर्थ में विकसित होती है, किंतु जिसे हर युग में निहित स्वार्थी शक्तियाँ अपने कब्जे में कर लेती हैं और अपने इशारों पर नचाने में लग जाती हैं. संतों और भक्तों ने इस सत्य को समझा तथा अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य और जन का ऐसा गहरा संबंध निर्मित किया कि जो अंत में संस्कृति और जीवन दोनों को रूढ़ियों से मुक्त करता है और निर्माण के स्वाधीन मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. 

दादू के समाज दर्शन का यह एक केंद्रीय बिंदु है और डॉ.ओकेन लेगो ने अपने अध्ययन में इसे भली प्रकार रेखांकित किया है. लेखक ने निर्गुण संत साहित्य के वैभव पर विस्तृत चर्चा करते हुए दादू वाणी के विविध अंगों का गहन विवेचन किया है. कबीर की भाँति दादू की रचनावली में भी साखियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में पद सम्मिलित हैं. लेखक ने इनका विवेचन करते हुए दादू के भक्त हृदय की अच्छी पहचान कराई है. यहाँ दादू ऐसी वियोगिनी बन गए हैं जो विरह में शरीर को भी नहीं संभाल पा रही है. प्रिय दर्शन के लिए रात-दिन तड़पती है. विविध उपाय करती है. बैचैन रहती है. नाम पुकारती है. राह जोहती है. विरह के बाण से घायल वह स्वयं अपनी दशा को भी नहीं समझ पाती – 
“फिरे उदास चहुँ दिशि चितवत, नैन नीर भर आवै.
राम वियोग विरह की जारी, और न कोई भावै.
व्याकुल भई शरीर न समझै, विषम बाण हरि मारै.
दादू दर्शन बिन क्यों जीवै, राम सनेही हमारै.”

आगे दादूपंथी संतों की रचनाशीलता का विवेचन किया गया है. दादू के 52 प्रमुख शिष्य माने जाते हैं. यहाँ गरीबदास, सुंदरदास (छोटे), रज्जबदास, जगजीवनदास, जगन्नाथदास, बखना, वाजिंद, निश्चलदास, खेमदास और राघवदास पर अच्छी चर्चा की गई है. साथ ही संत साहित्य की संग्रहपद्धति और दादूपंथ की शाखाओं पर भी विस्तृत चर्चा है. अंत में दादूपंथ के संतों के अभिव्यक्ति कौशल का भी विवेचन किया गया है. संत साहित्य की सामाजिक दृष्टि को समझने के लिए अत्यंत उपादेय ग्रंथ. 


भास्वर भारत/ जुलाई 2013/ पृष्ठ 51.


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