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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

(कविता का समकाल - 4) समकालीन कविता की जनपदीय चेतना


 समकालीन कविता की जनपदीय चेतना

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745


‘जनपद‘ शब्द को जहाँ प्राचीन भारत में राज्य व्यवस्था की एक इकाई के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता था और आजकल उत्तर प्रदेश में ‘जिले‘ के अर्थ में व्यवहृत किया जाता है, वहीं आंध्र प्रदेश में इसका ‘लोक‘ के व्यापक अर्थ में इस्तेमाल होता है। हिंदी कविता में ‘जनपद‘ की चर्चा इन संदर्भों के अलावा कभी किसी क्षेत्र विशेष और कभी किसी अंचल विशेष के रूप में भी पाई जाती है। कुछ पत्रिकाओं ने ऐसे कविता विशेषांक भी प्रकाशित किए हैं जो क्षेत्र विशेष, अंचल विशेष, जिला विशेष या प्रांत विशेष की रचनाधर्मिता को एकांततः समर्पित हैं।
               
‘जनपद‘ से आगे बढ़कर जब ‘जनपदीय चेतना‘ की चर्चा की जाए तो यह सोचना पड़ेगा कि क्या उसे जनपद की भौगोलिक सीमा तक संकीर्ण बनाया जाना चाहिए, अथवा इस शब्दयुग्म को किसी विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ से मंडित करना होगा? यदि जनपदीय चेतना को किसी भौगोलिक सीमा से आवृत्त किया जाएगा तो निश्चय ही एक भारतीय चेतना के भीतर पचीसों क्षेत्रीय चेतनाएँ या सैंकड़ों आंचलिक चेतनाएँ जनपदीय चेतना के नाम पर सिर उठाती दिखाई देंगी। विखंडनवादी उत्तरआधुनिकता को यह स्थिति भले ही प्रिय हो, साहित्य के अध्ययन विश्लेषण के लिए इसे काम्य प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता - और न ही जनपदीय चेतना का यह अर्थ होना भी चाहिए।
                
जनपदीय चेतना का काम्य अर्थ शक्ति और सत्ता के केंद्रों से परे उस भारतीय जन की जागरूकता में निहित है जो महानगरीय बोध के प्रदूषण से अछूता अभी तक अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रस ग्रहण करता हैं। जनपदीय चेतना की अवधारणा को आभिजात्य चेतना की विरोधी समांतरता में उभरते देखा जा सकता है। आभिजात्य चेतना विशिष्टतावाद का पोषण करती है जिसके विपरीत जनपदीय चेतना कथित भदेसपन के वरण से भी परहेज नहीं करती। समकालीन कविता के संदर्भ में जनपदीय चेतना का वैशिष्ट्य आभिजात्य चेतना की प्रतिचेतना के रूप में रेखांकित किया जाना प्रासंगिक है। यह चेतना कहीं से अचानक फूट पड़ी हो, ऐसा कतई नहीं है। बल्कि नई कविता अथवा उससे भी पहले की कविता के काल से यह एक सूक्ष्म अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित होती आई है। जैसे जैसे नई कविता का आभिजात्यवादी तिलिस्म टूटता है, वैसे वैसे समकालीन कविता में जनपदीय चेतना की धारा क्रमश: स्पष्ट और प्रखर होती जाती है। ‘स्थानिकता‘ से बंधे रहकर नहीं, बल्कि उसका अतिक्रमण करके ही श्रेष्ठ कविता संभव होती है। जनपदीय चेतना से संपन्न कविता के समक्ष यह चुनौती स्वाभाविक है कि वह ‘जनपद‘ को अपने आप पर झेले भी, अपने आप में समोए भी; और उसके पार जाकर व्यापक ‘लोक‘ से जुड़ जाए। कविता में जनपदीय चेतना के उभार को राजनीति में क्षेत्रीय भावनाओं के उभार तथा समाज में लंबे समय तक हाशिए पर रहे वर्गों के उभार के साथ जोड़कर भी देखा जा सकता है। उपेक्षित पड़ी अस्मिताएँ इस उभार के माध्यम से स्वयं को रेखांकित करती दिखाई देती है।
                
जनपदीय चेतना को समकालीन कवियों ने लोकजीवन के दैनिक संघर्ष के रूप में आत्मसात किया है और उस संघर्ष को अभिव्यक्त करने के लिए भाषाई आभिजात्य को सचेतन रूप में खंडित किया है। काव्यभाषा में जनपद की उपस्थिति आकस्मिक नहीं, बल्कि सुचिंतित है जो महानगरीय बोध को मुँह चिढ़ाती है। चूल्हा, पतीली, बाल्टी, चौका, सोहर, गोबर, बघार, डाँगर, हँसिया, भैंसा, बैल, बकरी, कुल्हड़, पत्तल और बीड़ी से लेकर छुआछुई, चोरसिपाही और राजारानी तक ऐसे शब्दों का चयन इस चेतना से संपन्न कविता में हुआ है जिनके माध्यम से काव्यनायक के रूप में आम भारतीय चेहरा उभर कर सामने आता है और कविता के लगाव के सही बिंदु पकड़ में आ पाते हैं। लोकचेतन कविता के लगाव के ये बिंदु लोक के उस दैनिक संघर्ष के बिंदु है जिसके तहत -

‘‘औरत
गवें-गवें उठती है-गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है
उसे कठवत में झाड़ती है
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं।
पतरमुँही सरर-फरर बोलती है और बोलती रहती है
बच्चे आँगन में
आँगड़-बाँगड़ खेलते हैं
घोड़ा-हाथी खेलते हैं
चोर-साव खेलते हैं
राजा-रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं।‘‘ 

(धूमिल: किस्सा जनतंत्र)।

ये औरतें और बच्चे उस चेतना के वाहक हैं जो महानगरीय आपाधापी से भरी कृत्रिम जिंदगी और उसकी कविता में खोजे भी नहीं मिलती। वास्तविक जीवन के संस्पर्श की ऊष्मा उस हताशा को काटती है जिसका प्रचार लंबे समय से शहरी आधुनिकता कुंठा और मृत्युबोध के नाम पर करती रही है। मृत्युबोध की ओढ़ी हुई मानसिकता को काटने के लिए कविता में जनपद, अथवा अधिक व्यापक शब्दों में कहें तो लोक, का होना अनिवार्य है। कविता और संस्कृति - दोनों ही - को यदि जड़ता और मृत्यु से बचना है तो उधार की विचारधाराओं का मोह छोड़कर लोक की जीवनीशक्ति को पहचानना और उससे जुड़ना बेहद ज़रूरी है। ऐसी लोक-सजग कविता के प्रति समकालीन कवियों ने अपने रुझान को अलग-अलग रूपों में व्यंजित किया है। जहाँ अवधारणात्मक कविताओं की बहुलता के कारण हिंदी कविता की काव्यात्मकता में चिंतनीय स्तर तक कमी आई, वहीं जिन कवियों ने अवधारणा का उल्था करने के बजाय भारतीय देहातों और कस्बों की जीवनशैली को नजदीक से देखकर और झेलकर परिचित संदर्भों का सहारा लिया, उनकी कविता सादगी और काव्यात्मकता से एक साथ भरकर चमक उठी है। खिड़की, रोशनी, राखी, मनीआर्डर और चिट्ठी के मर्मस्पर्शी संदर्भों से जुड़कर आर्थिक तंगी और विपन्नता का बोध गहन हो उठता है और लोकचेतना के ये तत्व वर्गचेतना के सहज उभार को संप्रेषित करने लगते हैं -
‘‘जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
वहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा-
कुछ इस तरह से होती है
जिस तरह राखी के कुछ दिनों के बाद
घर के सामने से
पोस्टमैन के गुजर जाने के बाद
माँ पहले पोस्टमैन को कोसती है
बाद में रसोई में जाकर
अपने भाई की मजबूरी को समझकर
बहुत रोती है।‘‘
(कुमार विकल: खिड़कियाँ)।               
आभिजात्य सौंदर्यबोध प्रकृति को विलासिता की दृष्टि से देखता है और उसके इस हद तक दोहन में विश्वास रखता है कि प्रकृति का स्थान विकृति ले ले। यही कारण है कि आभिजात्यवादी कविता एक सीमा के बाद केवल विद्रूप और अवसाद की कविता बनकर रह जाती है। प्रकृति का सौंदर्य और उल्लास एकरसता को ही अपना जीवन बना चुके नगरीय व्यक्ति को रास भी नहीं आता। परंतु तमाम असुविधाअें के बीच जीता हुआ जनपद स्वभाव से उत्सवधर्मी है। उसकी इस उत्सवधर्मिता का अतिक्रमण पिछले दशकों में नगरों ने बड़ी तेजी से किया है और गाँव, कस्बे तथा छोटे शहर तेजी से उस ज़हर की ज़द में आते जा रहे हैं जो विद्रूप, अवसाद और परिणामतः मृत्यु का संचार करने वाली उपभोक्ता संस्कृति की देन है। इसी का असर है कि युगों से मौसम के आसरे खेती करने वाला भारतीय किसान आज चरम हताशा और आत्महत्या के दौर से गुज़र रहा है। लोक-सजग कविता इस खतरे से सदा से परिचित रही है और इसीलिए उसने जनपदीय चेतना के ऊर्जास्रोतों को बार-बार रेखांकित किया है। जीवन संघर्ष की प्रेरणा सदा से इस देहाती जन को प्रकृति के सौंदर्य और उल्लास से मिलती रही है। कविता इस उल्लास और उत्सवी मानसिकता को बचाकर रखना चाहती है ताकि लोक आत्महत्या को मजबूर न हो। जनपदीय चेतना प्रकृति के दोहन में नहीं, बल्कि उसके साथ जीने में विश्वास रखती है -
‘‘वह एक अद्भुत दृश्य था
मेह बरसकर खुल चुका था
खेत जुतने को तैयार थे
एक टूटा हुआ हल मेड़ पर पड़ा था
और एक चिड़िया बार-बार, बार-बार
उसे अपनी चोंच से
उठाने की कोशीश कर रही थी
मैंने देखा
और मैं लौट आया
क्योंकि मुझे लगा वहाँ होना
जन हित के उस काम में
दखल देना होता।‘‘
(केदारनाथ सिंह: जनहित का काम)।              
जनपदीय चेतना से संपन्न कवि प्रकृति और जीवन को अलग-अलग करके न तो ग्रहण करता है, और न अभिव्यक्त। उसके लिए तो प्रकृति और जीवन के अद्वैत में से ही प्रेम और जिजीविषा के स्रोत फूट पड़ते हैं। वह मनुष्य को यौन वर्जनाओं के पुंज के रूप में नहीं वरन सहज प्रकृत आनंद की संभावनाओं के रूप में चित्रित करता है -
‘‘देखता हूँ मैं: स्वयंवर हो रहा है
प्रकृति का अनुराण अंचल हिल रहा है
इस विजन में,
दूर व्यापारिक नगर से
प्रेम की प्रियभूमि उपजाऊ अधिक है।‘‘
(केदारनाथ अग्रवाल: चंद्रगहना से लौटती बेर)।
इस प्रेम की उपजाऊ भूमि में, वातानुकूलित कक्षों में बैठकर, मौसम को झुठलाने के बजाय कवि उसे अपने आप पर झेलता है। उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों का जनपद-सचेतन कवि अरहर की यौवनोन्मादित पत्तियों के साथ आइस-पाइस खेलती ज्योत्स्ना के उल्लास में शामिल होकर ताली बजाता है। शिवालिक की पहाड़ियों को अपने भीतर जीने वाला कवि चीड़वन की ढोलक पर हिमालय को रिझाने के लिए रंग भरे लोकगीतों की तान छेड़ता है। उधर मध्यप्रदेश का बस्तर जनपद जब उसकी कविता में धड़कता है तो भीलों की तान से जंगल-भर झूम उठता है जिसका भरपूर साथ वनपाखी नाच-नाच कर देते हैं। वे पर्वतीय जनपद भी कवि को झिंझोड़ते हैं जहाँ एक ओर तो बड़े-बड़े बांध बनाने का विरोध करने वाली जनता पर व्यवस्था गोलियाँ बरसा रही है और दूसरी ओर -


           ‘‘कुछ लोग
     बाढ़ में गले-गले डूब
     रस्सियों के सहारे
     छप्परों को हवा में उछाले रखने की
     कोशिश कर रहे हैं
और बूढ़ी महिलाएँ
और गर्भवती स्त्रियाँ
और दूध पीते बच्चे
हाड़ उभरी भैंसों की पीठ पर
और पेड़ों की टहनियों पर
पूरी ताकत से
छिपकली से चिपके
डूबते-उतराते
दहाड़ मारती जलराशि के साथ
समुद्र की ओर जा रहे हैं।‘‘
(देवराज: चिनार)।              
इस तमाम विनाशलीला के लिए उपभोक्तावादी आभिजात्य चेतना का मायावी प्रसार जिम्मेदार है जिसने हमारे समय को हिंसा और असंवेदनशीलता से भर दिया है। जनपद का आज का नागरिक भी इस हिंसा और असंवेदनशीलता से बचा नहीं है। इसके विपरीत तेजी से वह भी शहरी खलनायक में तब्दील होता जा रहा है। ऐसे में कवि का मूल जनपदीय संस्कार उसे इस प्रवृत्ति पर प्रहार करने को प्रेरित करता है और वह पुनः संवेदनशीलता की तलाश करते हुए पारिवारिकता की शरण में जाता है। जिस समय में तमाम तरह की आधुनिकताओं और उत्तरआधुनिकताओं ने समस्त संबंधों की हत्या कर दी हो, ऐसे में परिवार, रिश्ते नाते और कोमल संवेदनाओं की कविताओं का बड़ी संख्या में रचा जाना केवल सांयोगिक नहीं है, वरन वह संबंधित रचनाकारों के भीतर विद्यमान जनपद चेतना की अभिव्यक्ति है। नागार्जुन, त्रिलोचन, सर्वेश्वर और केदारनाथ अग्रवाल से लेकर उदयप्रकाश, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, कुमार विकल, महेंद्र कार्तिकेय, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रताप सिंह तथा राजेंद्र उपाध्याय आदि की कविताओं में मानवीय संबंधों और पारिवारिक रिश्तों की खोज को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऐसी कविताएँ उस आभिजात्य विशिष्टतावाद का विकल्प रचने का प्रयास कर रही हैं जिसने मनुष्य और प्रकृति दोनों को बिकाऊ माल बनाकर छोड़ दिया है।
                
आभिजात्य महानगरीय संस्कार तथा खाँटी जनपदीय संस्कार के संघर्ष की परिणति को लोकसचेतन कविता के शब्द और वस्तु के चयन में ही नहीं, उसके शैली शिल्प में भी परिलक्षित किया जा सकता है। जनपदीय चेतना को काव्य में ढालने के लिए जिस सहज शिल्प की जरूरत पड़ती है, वह बड़बोली, अवधारणात्मक तथा गद्यप्रधान कृत्रिम कविता के शिल्प से भिन्न है। कविता की मुक्ति के उद्देश्य को लेकर जब छंदों के बंध तोड़े गए थे, तो यह पता न था कि वह मुक्ति भी आगे चलकर काव्यरूढ़ि को जन्म देगी और कविता तथा गद्य का भेद मिट जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ क्योंकि स्वातंत्र्योत्तर काल में कविता को बलपूर्वक उसकी अपनी हजारों साल पुरानी वाचिक परंपरा से काट दिया गया। आभिजात्य चेतना से संपन्न कविता किसी अनुपस्थित अमूर्त पाठक को संबोधित होने के कारण दुरूह, जटिल और कृत्रिम है तथा अपने लिए विशिष्ट संस्कारवाले पाठक की अपेक्षा करती है। इसके विपरीत जनपदीय चेतना से संपन्न कविता का आग्रह कविता को पुनः वाचिक बनाने का है क्योंकि उसके समक्ष अपना श्रोता है जो रचनाकार के कवित्व को हर पल सहज संप्रेषणीयता की माँग करते हुए ललकारता है और अपने जीवन में भागीदारी का न्यौता भी देता है। इस ललकार और न्यौते के प्रति ईमानदार होने के लिए कविता को पुनः छंद और गेयता की ओर लौटना पड़ रहा है। यह जनपदीय चेतना का ही दबाव है कि आज गीतों, गज़लों, दोहों और पदों का प्रचलन पुनः हो रहा है। नवगीत, गज़ल और तेवरी आंदोलन के बाद ‘दोहा‘ और हाइकू भी आजकल आंदोलन के स्तर पर विकसित हो रहे हैं। अन्य भी जिन छंदों को आज का कवि अपना रहा है, उनमें शास्त्रीयता की अपेक्षा लौकिकता की प्रमुखता दिखाई देती है। दोहे और पद की लोकप्रियता का कारण लोक परंपरा में निरंतर उनकी विद्यमानता में निहित है। इन छंदों में आज का कवि जनपद-चेतना को पिरोते समय कबीर से चली आ रही काव्य परंपरा से बल प्राप्त करता है और आभिजात्य शिल्प के समक्ष लोक शिल्प की चुनौती खड़ी करता है -
‘‘कविजन खोज रहे अमराई।
जनता मरे मिटे या डूबे, इनने ख्याति कमाई।।
शब्दों का माठा मथ मथकर, कविता को खट्टाते।
और प्रशंसा के मक्खन कवि, चाट-चाट रह जाते।।
सोख रहीं गहरी मुशकइलें, डाँड हो रहा पानी।
गेहूँ के पौधे मुरझाते हैं अधबीच जवानी।।
बचा-खुचा भी चर लेते हैं, नील गाय के झंड।
ऊपर से हगनी-मुतनी में, खेत बन रहे कुंड।।
कुहरे में रोता है सूरज, केवल आँसू-आँसू।
कविजन उसे रक्त कहकहकर कविता लिखते धाँसू।।‘‘
(अष्टभुजा शुक्ल: पद-कुपद)।            
तथाकथित धाँसू किस्म की आभिजात्यवादी कविताओं के विकल्प के रूप में ही जनपद-सचेतन कविता सामने आ रही है तथा वस्तु, शैली और शिल्प के विविध स्तरों पर अपनी मिट्टी की महक को आत्मसात कर सुवासित हो रही है। कविता में किस्सागोई तथा बातचीत की लय का समावेश भी इसी चेतना की देन है -
‘‘चाँद में चरखा
चरखा में पोनी
पोनी में कतती
चाँदनी।
चाँदनी में क्या?
चाँदनी में पेड़
पेड़ पर चिड़िया 
चिड़ियों की चोंच में
संदेशा ऋतु का।
ऋतु में क्या?‘‘
(राजेश जोशी : तितलियाँ)।
मैं जोड़ना चाहूँगा:
ऋतु में कविता/ कविता के भीतर/ चेतना जनपद की;/ जनपद में क्या? .......


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