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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

(कविता का समकाल -1) समकालीन काव्यचेतना: जीवनासक्ति के स्रोत

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745


समकालीन काव्यचेतना : जीवनासक्ति के स्रोत


काव्यचेतना की समकालीनता अपने समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की जागरूकता में निहित है। हमारे समय ने जो चुनौतियाँ कविकर्म के समक्ष उपस्थित की हैं उनका एक आयाम यदि विचारधारा के गुंजलक के आतंक के शिथिल होने की घटना से जुड़ता है, तो दूसरा आयाम विविध विधाओं और उपविधाओं के परस्पर फ्यूज़न की प्रक्रिया से जुड़ता है। हमारी काव्यचेतना की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इस शैथिल्य और फ्यूज़न के बावजूद उसमें किसी बड़ी अफ़रा-तफरी या कन्फूज़न के लक्षण दिखाई नहीं देते। मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी सजगता में कोई फर्क नहीं आया है और वह अपने‘बीते हुए कल’ को ‘आज’ के आइने में मूल्यांकित करते हुए ‘आनेवाले कल’ के स्वागत की तैयारी कर रही है। इस तैयारी की उसकी चार मुख्य दिशाएँ स्पष्ट लक्षित की जा सकती हैं। एक दिशा पारिवारिकता और प्रेम की है तो दूसरी दिशा प्रकृति और परिवेश की चिंताओं की है। तीसरी दिशा युद्ध और शांति की भूमंडलीय चिंता के बीच सही मनुष्य की अस्मिता और उसके जुझारूपन से संबंधित है, तो चौथी दिशा लोक और काव्य को निकट लाने के लिए नई काव्यभाषा की तलाश की दिशा है।

इसमें संदेह नहीं कि कविता की सतत यात्रा में ‘कल‘ और ‘आज‘ जैसे सोपान एक सीमा तक अमूर्त और रहस्यमय जैसे हैं। कविता के ‘कल‘ की व्याप्ति उसके जन्म से लेकर कविता के तथाकथित अंत तक हो सकती हैं और इसी प्रकार ‘आज‘का अर्थ पुनर्जागरण से जुड़ी आधुनिकता से लेकर कविता की तथाकथित वापसी की घोषणा, उत्तर आधुनिकता और उससे आगे - ठीक इस क्षण - तक हो सकता है। हिंदी कविता के ‘कल‘ और ‘आज‘ के मध्य विभाजक रेखा यदि किसी ऐसी तिथि से खींचना चाहें जहाँ उसके चरित्र में चेतनागत पूर्ण परिवर्तन परिलक्षित होता हो, तो थोड़ी कठिनाई हो सकती है,क्योंकि मनुष्य और शाश्वत मूल्यों के प्रति चिंता जैसे तत्वों की निरंतर उपस्थिति के कारण हिंदी कविता अतीत का अतिक्रमण करके वर्तमान में और वर्तमान का अतिक्रमण करके एक साथ अतीत और भविष्य में संक्रमण करने की शक्ति से संपन्न रही है। उसकी जीवनोन्मुखता ने हर संक्रमण काल में ऐसे वृत्तों की सृष्टि की है जो उसे कभी बीतने,मरने या चुकने नहीं देते। यों, ‘कल‘ और ‘आज‘ जैसे पद उसकी चेतना के विकास तथा काल सापेक्षता को समझने के विधेय अर्थ में ही ग्राह्य हैं, किसी सांप्रदायिक अर्थ में नहीं।

मनुष्य के प्रति चिंता हिंदी काव्यचेतना में सदा वर्तमान रही है परंतु उसकी अवधारणा और परमतत्व के साथ उसके संबंध में कई बार परिवर्तन आए हैं। जहाँ आदिकालीन कविता ‘मनुष्य का ईश्वर की महिमा से युक्त रूप में वर्णन‘ करती है, वहीं भक्तिकालीन कविता ‘ईश्वर का मनुष्य के रूप में चित्रण‘ करती है तथा उत्तरमध्यकालीन कविता ‘ईश्वर और मनुष्य दोनों का मनुष्य रूप में चित्रण’ करती है। आधुनिक काल में एक चारित्रिक परिवर्तन इस अर्थ में घटित होता है कि यहाँ आकर ‘‘मनुष्य सारे चिंतन का केंद्र बनता है और ईश्वर की धारणा व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है, साहित्य या कि कलाओं में उसका चित्रण प्रासंगिक नहीं रह जाता।‘‘ (डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 93)। इसके परिणामस्वरूप आधुनिक कविता में लौकिक और अलौकिक का अंतर महत्वपूर्ण नहीं रहा तथा पुनर्जागरणकालीन कविता से लेकर नई कविता के उन्मेष तक प्रेमी और परमतत्व एक दूसरे में विलीन होते चले गए। एक समय ऐसा भी आया जब इन दोनों का उल्लेख करना भी अपराध माना जाने लगा, पर कविता ने हर बार यह जता दिया कि कविता को कविता बनाए रखने के लिए जीवनासक्ति अर्थात प्रेम के खाँटी रूप की स्वीकृति आवश्यक है। प्रेम के इस खाँटी रूप तक पहुँचने के लिए कविता ने वायवीय और अतींद्रिय लोकों की यात्रा भी की है और सड़कों-खेतों-खलिहानों की खाक़ भी छानी है, यौन कुंठाओं के विवर्त भी झेले हैं और रस-लंपट उन्मुक्ति के खतरे का भी सामना किया है। इस यात्रा में उसने ‘रूमानियत और वर्जना को चुनौती‘ देने वाले देहकेंद्रित केलिसुख को भी प्राप्त किया है और

‘‘तुम हरी घास हो, मैं उड़ती हुई ओस xxx
मुझे एक ज़रा सी नोंक दे दो, जहाँ मैं विलीन होने के पहले ठहर सकूँ‘‘
(अशोक वाजपेयी, थोड़ी सी जगह)

की नीरस बौद्धिकता का अतिक्रमण भी किया है। समकालीन कविता में जीवनासक्ति के दो रूप दिखाई पड़ते हैं। इनमें एक रूप वह है जो स्वयं को इससे पहले की सारी प्रेम कविता से जानबूझकर अलग स्थापित करना चाहता है। ऐसे कवि‘कविता में प्रेम‘ करते हैं। कविता ही वह ‘थोड़ी सी जगह‘ है जहाँ प्रेम संभव हैं। ‘जिंदगी में प्रेम‘ से अलग है कविता में प्रेम। ''जिंदगी का ‘प्रेम‘ (उनके लिए) प्रतिनिधि नहीं हो सकता कविता में हो सकने वाले प्रेम का।‘‘ (सुधीश पचौरी, उत्तर आधुनिक साहित्यिक विमर्श, पृ. 167)। केलिसुख की ऐंद्रिक अभिव्यक्ति वाला यह प्रेम अपने कुलीन आभिजात्य में कैद कवि की समस्या तो बेशक है, परंतु लोक के रस से सदा अपनी जड़ सींचते रहने वाली उस कविता की चेतना यह कदापि नहीं है जिसने जिंदगी में प्रेम की उपस्थिति को अनेक रिश्तों के रूप में पूरी उष्णता के साथ निकटता से महसूस किया है और इसी उष्णता ने रचा है प्रेम का वह खाँटी रूप जिसमें विघटन के कगार पर खड़े उपभोक्तावादी उत्तर आधुनिक समाज को पुनः पारिवारिकता में बाँधने की ताकत है। पिछले कुछ वर्षों में लिखी जा रही कविता ने बहुत सचेत होकर प्रेम और पारिवारिकता की पुनः खोज की है और यह खोज उसके कालसापेक्ष व्यक्तित्व की एक अलग विशेषता है। ‘‘इस कविता में माँ और पत्नी इतने ठोस आधारों पर स्थापित हुई हैं कि आनेवाले दशकों के लिए उनका नकार असंभव होगा।‘‘ (डॉ.  देवराज, उन्नयन-11, पृ. 102)। आज की कविता जानती है कि

‘‘माँ
एक अनुभव का नाम है
जिसे हर पत्ता जानता है 
अपनी जड़ों में झाँकते ही 
जो सबसे पहले दिखता है 
वह माँ होती है 
माँ की शिराओं से 
नए पौधे 
हरीतिमा चुराते 
माँ की हड्डियों से 
आनेवाली ताकत वसूलते हैं 
माँ 
बड़े होते पेड़ों को 
अपने दूध से सींचती है।‘‘ 
(अक्षय उपाध्याय, चाक पर रखी धरती, पृ. 94)।

स्त्री के प्रति इस कविता का रुख पूर्वाग्रहों से मुक्त है -

‘‘हम औरतें
रक्त से भरा तसला है
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में 
हम हैं सूजे हुए पपोटे 
प्यार किए जाने की अभिलाषा 
हम नींद में भी दरवाजे पर लगा हुआ कान हैं 
हम हैं इच्छा मृग 
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो 
चौकड़ियाँ मार लेने दो हमें, कमबख्तो।‘‘ 
(वीरेन डंगवाल, हम औरतें)।

आज की कविता औरत को मात्र आंचल, स्नेह और देह के रूप में ही नहीं, विवशता के विकल्प के खोजी व्यक्तित्व के रूप में भी देखती है -

‘‘मारिया, सच कहता हूँ
रोंगटे खड़े हो जाते हैं हमारे
जब तुम्हारे नोचे खसोटे जाने की 
परिकल्पना करता हूँ 
कल्पना करता हूँ 
बेला के नए खिले फूल के 
रौंदे जाने की 
मिट्टी के कच्चे दीए के 
पैरों से तोड़े जाने की 
उठो मारिया, उठो 
स्वयं जला लो मोमबत्ती 
इस प्रकाश में तुम खिल उठो उसी तरह 
जिस तरह खिलते हैं चाँदनी में 
बेला के फूल 
और रोशनी में नहा जाती है माता मरियम।‘‘ 
(सुरेंद्र स्निग्ध, मिस मारिया)।

स्त्री के इस संघर्षी व्यक्तित्व की तलाश स्वयं आज की कविता के व्यक्तित्व का भी एक आयाम है।

आज की कविता की चेतना और जीवनासक्ति का प्रेम और पारिवारिकता के बाद दूसरा महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है प्रकृति। आज के कवि के लिए प्रकृति केवल आलंबन और उद्दीपन मात्र नहीं, बल्कि उसकी चिंता का विषय भी है। इसी कारण प्रकृति आज अनेक रूपों में व्यक्त हो रही है। इसमें प्रकृति की ओर वापसी का रूमानी आग्रह नहीं, वरन उसे जीवन की सहधर्मिणी के रूप में स्वीकारने की समझ विद्यमान है। ‘इधर प्रकृति का मानवीयकरण नहीं है, मानव का प्रकृतिकरण है‘और आज का कवि इस विषय में चिंतित है कि ‘किस तरह मनुष्य को उसकी प्रकृति में स्थापित किया जाए।’ (सुधीश पचौरी, उत्तर आधुनिक साहित्यिक विमर्श, पृ. 174)। इसे कविता में ‘प्रकृति और पर्यावरण की वापसी‘ के रूप में भी देखा गया है हालांकि प्रकृति कविता से कभी पूरी तरह निष्कासित नहीं हुई क्योंकि ‘हिंदी कविता का मूल मिजाज प्रकृति केंद्रित रहा है‘ (वही)। आज की कविता प्रकृति को मनुष्य, उसकी जिजीविषा और उसके संघर्ष के रूप में ग्रहण करती है -

‘‘यह जो फूटा पड़ता है
हरा, पत्तों से
धूप के आर पार 
वही फूट आता है 
किसी और जगह 
किसी और सुबह 
भरोसा है तो 
इसी हरे का।‘‘ 
(प्रयाग शुक्ल, यह जो हरा है)।

यह कविता पर्यावरण और मनुष्य जाति के अस्तित्व को जोड़कर देखती है और इस खतरे से आगह करती है कि -

‘‘वे पेड़ों को काटना नहीं चाहते
उनका हरापन चूस लेना चाहते हैं
वे पहाड़ों को रौंदना नहीं चाहते 
उनकी दृढ़ता निचोड़ लेना चाहते हैं 
अगर पूरी हो गई उनकी चाहतें 
तो जाने कैसी लगेगी दुनिया।‘‘ 
(मदन कश्यप, उन्नयन-17, पृ. 114)।

वस्तुतः प्रेम और प्रकृति वे स्रोत हैं जिनसे आज की कविता चेतना, प्रेरणा और ऊर्जा ग्रहण करती है और इनसे प्राप्त शक्ति को पूरी समझ के साथ उस आदमी की रक्षा के लिए इस्तेमाल करना चाहती है जिसे तोड़ने की ख़ातिर दुनिया भर की मानवविरोधी बाजार व्यवस्था की ताकतें एकजुट हो गई हैं-

‘‘फूलों की खुशबू
और हवा की ताजगी
अपनी जगह है 
मगर जो कविता लहू का दरिया तैरकर आती है 
साथ-साथ 
लहू की ऊष्मा भी साथ लिए रहती है 
मनुष्य के बीच 
यही उसकी सबसे बड़ी सार्थकता है।‘‘ 
(कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, बबुरीवन)।

यह कविता उस खतरे को बखूबी पहचानती है जो युद्ध के रूप में निरंतर सारी की सारी पृथ्वी को अपने गुंजलक में लपेटे हुए है। तमाम राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं के क्रमशः तानाशाही में परिवर्तित होते चले जाने को पिछली शताब्दी की सबसे भीषण त्रासदी कहा जा सकता है। आज की कविता राजनीतिज्ञों और पूंजीपतियों की महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित खतरों के बीच मनुष्य को निरंतर संघर्ष की, जूझ की, शक्ति प्रदान करना चाहती है। प्रेम और प्रकृति के आधारबिंदुओं पर खड़े आज की कविता के त्रिभुज का शीर्ष बिंदु उसकी समझ बूझकर जूझने की मुद्रा में स्थित है -

‘‘ये सारी औरतें
चीखते चीखते
आवाज़ों के लावे में ढलती जा रही हैं 
और लावा 
नारों के मफ्लर की राख बनाता हुआ 
कानों में प्रवेश कर रहा है 
मेरे अंदर धीरे-धीरे 
एक लंबे नाखूनों वाला बच्चा 
आकार लेने लगा है 
जो चिंगारीदार आँखों वाली 
बिल्ली के दाँत 
तोड़ डालने की 
तैयारी करता दिखता है।‘‘ 
(डॉ.देवराज, चिनार, पृ. 77)।

हर प्रकार की तानाशाही के खि़लाफ मोर्चाबंदी करती हुई आज की कविता की जूझ उसे कालसापेक्ष सार्थकता से युक्त करती है।

एक ख़ास बात कविता की भाषा-भंगिमा के बारे में जोड़ी जा सकती है कि चूँकि ‘कल‘ की कविता शाश्वतता के प्रति चिंतित थी और ‘आज‘ की कविता समकालीन प्रासंगिकता के प्रति जागरूक है इसलिए उसकी भाषा में एक निश्चित चारित्रिक अंतर दिखाई देता है। ‘आज‘ का कवि अकुंठ भाव से स्वीकार करता है-

''मैंने ऐसा कुछ नहीं किया
जिसे तुम याद रखो
संगमरमर में जड़ाने लायक शब्द मैंने नहीं रचे 
मैंने उस भाषा में नहीं लिखा 
जिस भाषा में लिखे जाते हैं संविधान और वेद की ऋचाएँ 
जिस भाषा में लिखे जाते हैं स्तुतिगीत राजा के आसीन होने पर 
मैंने उस भाषा में नहीं लिखा. 
मैंने उस भाषा में लिखा 
जिस भाषा में एक भूखा आदमी रोटी माँगता है 
जिस भाषा में कोई मजदूर अपनी पगार माँगता है 
जिस भाषा में कोई माँ अपने कत्ल कर दिए गए बेटे के लिए 
बस्ती में गुहार करती है।‘‘ 
(राजेंद्र उपाध्याय, खिड़की के टूटे शीशे में, पृ. 79)।

इससे भी आगे बढ़कर आज की कविता ऐसी भाषा को गढ़ती है जो आज के आदमी की ‘जूझ‘ को संपूर्ण मारकता के साथ व्यंजित करने में समर्थ है-

‘‘समय है कि तुम अब भी
अपनी चीख को
एक ख़तरनाक छलांग में बदल डालो।‘‘ 
(कुमार विमल, रंग खतरे में हैं, पृ.25)।
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