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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

रही भीलनी देखती बिखरे जूठे बेर


12 फरवरी 2012, रविवार.
आज डॉ. देवराज हैदराबाद आए. 
कुछ ही घंटे रुके. मुंबई से आए थे और विशाखापट्टनम जाना था.
सूचना पाते ही कई आत्मीय जन मिलने आ जुटे.
चार घंटे की अच्छी संगोष्ठी सी ही हो गई घर पर.
प्रो. एन. गोपि, डॉ. राधेश्याम शुक्ल, डॉ. रंगय्या, डॉ.जी. नीरजा दम्पति, डॉ.बी. बालाजी दम्पति, सीमा मिश्र दम्पति तो थे ही, द्वारका प्रसाद मायछ भी पत्नी और पुत्र के साथ आ धमके. 
इंटरव्यू, कविता पाठ और परिचर्चा .......खूब समां बंधा. संभव हुआ तो रिकॉर्डिंग कभी ज़रूर साझा करूँगा.
डॉ. एम वेंकटेश्वर जी नहीं आ सके......कहीं फँस गए थे.
अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी भी कसमसाकर रह गए......तीन दिन से अस्वस्थ हैं.
पूनम [डॉ. देवराज जी डॉ. पूर्णिमा जी (श्रीमती ऋषभ) को इसी तरह बुलाते हैं] और मनी [बिटिया] को डॉ. देवराज के आने से अपार प्रसन्नता हुई. मनी के लेखन और फोटोग्राफी के काम को देखकर डॉ. साहब रोमांचित और गद्गद हो उठे. कढी और सूखी मटर का भी कई बार गुणगान किया.
और मैं.......मन ही मन बस कभी शायद आज ही के लिए कहा दोहा दुहराता रह गया .....
पाहुन तुम आए गए   रुके न थोड़ी देर 
रही भीलनी देखती      बिखरे जूठे बेर 


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