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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

‘नागार्जुन के काव्य में जीवन मूल्य’ और ‘लिफाफा’ लोकार्पित



चित्र परिचय -
'साहित्य मंथन' द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आयोजित 'नागार्जुन के काव्य में जीवन मूल्य' और 'लिफाफा' के लोकार्पण समारोह में (बाएं से) भगवान दास जोपट, एस.के.हलेमनी, डा.राधेश्याम शुक्ल, डा.त्रिवेणी झा, डा.ऋषभ देव शर्मा, प्रो.एन.गोपि एवं डा.जी.नीरजा. 

हैदराबाद, 22 जनवरी, 2012.

‘साहित्य मनोरंजन की वस्तु नहीं बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाने की सतत साधना का नाम है. यही कारण है कि उसे कभी मनुष्यता की मातृभाषा तो कभी मनुष्यता की सुरक्षा चट्टान कहा जाता है. अपने इस व्यापक प्रयोजन की सिद्धि के लिए साहित्य जीवन मूल्यों का सहारा लेता है. नागार्जुन का साहित्य भी इसका अपवाद नहीं है. उन्होंने अपने अनुभव और जन की पीर की अनुभूति के आधार पर अपनी मूल्यदृष्टि निर्मित की थी. वे मानवीय जीवन मूल्यों की कसौटी पर खरे उतरने वाले कवि हैं. इतना ही नहीं उनकी जनपक्षीय मूल्यदृष्टि का उपयोग किसी भी साहित्यकार के मूल्यांकन के लिए कसौटी के रूप में किया जा सकता है.’

ये विचार उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने ‘साहित्य मंथन’ द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए. इस अवसर पर सुप्रसिद्ध तेलुगु साहित्यकार प्रो.एन.गोपि ने डा.त्रिवेणी झा के सद्यःप्रकाशित शोधग्रंथ ‘नागार्जुन के काव्य में जीवन मूल्य’ का तथा ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक डा.राधेश्याम शुक्ल ने डा.त्रिवेणी झा के ही कहानी संग्रह ‘लिफाफा’ का लोकार्पण किया.  
लोकार्पण वक्तव्य देते हुए प्रो.एन.गोपि ने नागार्जुन की तुलना तेलुगु साहित्यकार कालोजी और जनगायक गद्दर से करते हुए लोकार्पित शोधप्रबंध को गहन अध्ययन का परिणाम बताया. प्रो.गोपि ने इस अवसर पर नागार्जुन की दो कविताओं का तेलुगु अनुवाद प्रस्तुत करके श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.

कहानी संग्रह ‘लिफाफा’ का लोकार्पण करते हुए डा.राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि साहित्य में मूल्यों का स्रोत साहित्यकार का अपना जीवन होता है. यदि रचनाकार मूल्यनिष्ठ है तो उसकी रचना भी मूल्यों से संपृक्त होगी. उन्होंने कहा कि तुलसी, निराला और नागार्जुन ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी मूल्यनिष्ठा को लोकहित में काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की हैं. विमोचित पुस्तकों के लेखक को बधाई देते हुए डा.शुक्ल ने वर्तमान समय में ऐसे साहित्य की आवश्यकता बताई जो मूल्यमूढ़ता का निवारण कर सके.

विमोचित कृतियों पर व्यंग्यकार भगवान दास जोपट और डा.जी.नीरजा ने समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत किए तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के संपर्क अधिकारी एस.के.हलेमनी ने शुभकामना संदेश दिया.

लोकार्पण समारोह में डा.अहिल्या मिश्र, डा.पी.श्रीनिवास राव, डा.अविनाश जायसवाल, डा.करणसिंह ऊटवाल, डा.देवेंद्र शर्मा, डा.अर्चना झा, डा.सीमा मिश्रा, मनोज कुमार, देवकुमार पुखराज, विजय कुमार, अप्पल नायुडु, बृजवासी गुप्ता, के.नागेश्वर राव, अवनीश झा, शेख बाजी हुसैन, वी.कृष्णा राव, निर्मल कुमार बैद, सुषमा बैद, विभा भारती, श्रुतिकांत भारती, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, पवित्रा अग्रवाल, विनीता शर्मा, सुलेखा झा, श्वेता कुमारी, अशोक कुमार तिवारी, हेमंत सिंह, विनोद मिश्र, परमानंद शर्मा, अंसारी और राधाकृष्ण मिरियाला आदि हिंदी प्रेमी और साहित्यकार उपस्थित रहे. संचालन डा.बी.बालाजी ने किया. 

सभी चित्र : राधाकृष्ण मिरियाला 



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