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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

काव्यशास्त्र और अनुवाद समीक्षा


डॉ.शकीला ख़ानम (1965) कई भाषाओं की जानकार हैं और लंबे समय से काव्यशास्त्र, अनुवाद, भाषा शिक्षण, तुलनात्मक साहित्य, राजभाषा, दूरस्थ शिक्षा, स्त्री विमर्श और ई-लर्निंग संबंधी शोध कार्यों से जुड़ी रही हैं. उनके वैदुष्‍य को उजागर करनेवाली दो पुस्तकें गत दिनों सामने आई हैं - 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' (2010) एवं 'काव्यानुवाद की समस्याएँ' (2010). ये दोनों ही कृतियाँ अत्यंत अध्‍यवसायपूर्ण गहन अध्ययन और सुलझी हुई शोधदृष्‍टि का परिणाम हैं. इनसे लेखिका के बहुपठ होने का भी पता चलता है. 




इनमें से आलोचना सिद्धांतों से संबंधित पुस्तक भारतीय और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र और आलोचना की परंपरा का विवेचन करते हुए आधुनिक काल में हिंदी और तेलुगु के आलोचना साहित्य की काव्यशास्त्रीय अथवा सैद्धांतिक उपलब्धियों का तुलनात्मक आकलन करती है. लेखिका ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि इन दोनों भाषाओं का आधुनिक आलोचना साहित्य पूर्वी और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र से किस रूप में प्रभावित हुआ है और आधुनिक आलोचकों ने कौन सी मौलिक स्थापनाएँ की हैं. 


हिंदी आलोचना की चर्चा करते हुए लेखिका ने इसके प्रवर्तन का श्रेय भारतेंदु हरिश्‍चंद्र को उचित ही दिया है, जिन्होंने हिंदी में साहित्य की आत्मा का सवाल पहले पहल उठाया था. डॉ.शकीला का विचार है कि भारतेंदुकालीन आलोचना यूरोप की पुनर्जागरणकालीन आलोचना के समकक्ष है. इसी प्रकार उन्हें द्विवेदी युग की मान्यताएँ पश्‍चिमी दर्शनवादी युग की शास्त्रीयता संबंधी मान्यताओं के समकक्ष प्रतीत होती हैं. इसके समांतर हिंदी पाठकों के लिए यह जानकारी अत्यंत रोचक हो सकती है कि आधुनिक तेलुगु साहित्य में विभिन्न आलोचना सिद्धांतों का विकास आंदोलन के रूप में हुआ है. कंदुकूरि वीरेशलिंगम्‌ पंतुलु (1848 - 1919) को इसका प्रवर्तक माना जाता है. आगे विश्‍वनाथ सत्यनारायण ने इसे नई दिशा दी जिसे 'काव्यशिल्पानुशीलन युग' के रूप में जाना जाता है. आगे समन्‍वय युग में समन्वयात्मक, विश्‍लेषणात्मक और तुलनात्मक आलोचना का विकास हुआ और 1970 के बाद विभिन्न वादों और विमर्शों से प्रभावित समीक्षा युग का उन्मेष हुआ. तेलुगु आलोचना के ये विभिन्न युग हिंदी आलोचना के लगभग समसामयिक ही हैं और भारतीय साहित्य की एक जैसी प्रवृत्ति्यों के द्‍योतक हैं. 

डॉ.शकीला ख़ानम ने 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' में दोनों भाषाओं में आलोचना के उद्‍भव और विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करने के उपरांत यह दर्शाया है कि इन दोनों ने भारतीय काव्यशास्त्र के रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, औचित्य तथा वक्रोक्‍ति जैसे सिद्धांतों को ग्रहण करते हुए उनका कुछ न कुछ विकास किया है. इसी प्रकार दोनों ने ही प्लेटो, अरस्तु, लांजाइनस, होरेस और दांते जैसे पश्‍चिमी काव्यशास्त्रियों के सिद्धांतों को ग्रहण किया है और अभिव्यंजनावाद, काल्पनिकवाद, हेतुवाद, मार्क्सवाद, मानवतावाद, बिंबवाद, प्रतीकवाद, अस्तित्ववाद, अनुभूतिवाद और विप्‍लववाद आदि का विकास किया है. लेखिका ने ग्रहण और विकास के विभिन्न बिंदुओं का निर्धारण करते हुए इन सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में सफलतापूर्वक आधुनिक हिंदी और तेलुगु आलोचना के सत्व का निरूपण किया है. हिंदी पाठकों के लिए यह जानना रोचक होगा कि तेलुगु में रस सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या करते हुए डॉ.जी.वी.सुब्रह्‍मण्यम्‌ ने यह प्रतिपादित किया है कि धर्मवीर रस सर्वोपरि रस है और रामायण तथा महाभारत दोनों का अंगीरस धर्मवीर ही है. उन्होंने आनंदवर्धन के इस मत को स्वीकार नहीं किया कि रामायण करुण रस प्रधान काव्य है. इसके विपरीत वे मानते हैं कि राम के जीवन में शोक स्थायी भाव नहीं है केवल संचारी है; तथा इसमें धर्म का उत्साह स्थायी भाव है. उन्होंने यह भी कहा है कि लोकधर्म व्यक्‍तिधर्म से श्रेष्‍ठ है. शोक का उदय होने पर भी धर्म उस पर शासन करता है, इसलिए पूर्वरामायण की तरह उत्तररामायण में भी धर्मोत्साह ही स्थायी भाव है; अतः धर्मवीर अंगीरस है और करुण अंग है. 

जैसा कि डॉ.नगेंद्र ने कहा है, "कम से कम हिंदी के पास इतना मूल धन अवश्‍य विद्‍यमान है कि इसके आधार पर एक अच्छे काव्यशास्त्र का निर्माण किया जा सकता है." यह बात केवल हिंदी ही नहीं आज की ज्यादातर साहित्यिक भारतीय भाषाओं के संबंध में कही जा सकती है. विभिन्न भाषाओं के साहित्य समीक्षकों ने संस्कृत और पश्‍चिमी काव्यशास्त्र की प्रतिपत्तियों को अंतिम न मानते हुए उनमें नई स्थापनाएँ जोड़ी हैं. हिंदी आलोचकों के सिरमौर आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल ने आलोचना के लिए मूल स्रोत रसवाद को चुना है लेकिन वे संस्कृत रसवाद की पुनरावृत्ति भर नहीं करते. शकीला जी बताती है कि संस्कृत आचार्यों की मान्यता थी कि अनुभूति एक अलौकिक वस्तु है. शुक्ल जी इसके विपरीत रसानुभूति के स्वरूप पर विचार करते हुए कहते हैं कि रसानुभूति प्रत्यक्ष या वास्तविक अनुभूत से सर्वथा पृथक कोई अंतर्वृत्ति नहीं है बल्कि उसी का एक उदात्त और अवदात रूप है. शुक्ल जी के अनुसार कविता का कार्य मनुष्य के हृदय को स्वार्थमुक्‍त करना है. साधारणीकरण के पक्षपाती होने के कारण उन्होंने कविता में व्यक्‍तिवैचित्र्य को प्रमुखता देने वाले पश्‍चिमी काव्य सिद्धांत का विरोध किया. इसी प्रकार नंददुलारे वाजपेयी ने भी रस को काव्य की मानवतावादी सत्ता से जोड़ा तथा नगेंद्र ने रस सिद्धांत की परिधि का इतना विस्तार किया कि अभिजात्यवाद, स्वच्छंदतावाद, यथार्थवाद, अभिव्यंजनावाद, प्रभाववाद और प्रतीकवाद तक भी उसके घेरे में आ गए. डॉ.हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सांस्कृतिक चेतना के नैरंतर्य और मानवतावाद को आलोचना का मूलबिंदु बनाया. आगे भी वामपंथी आलोचकों ने मार्क्सवादी विचारधारा का भारतीयकरण करते हुए उसे नवीन आयाम प्रदान किए. डॉ.शकीला मानती हैं कि रामविलास शर्मा ने आलोचना के माध्यम से उसी सामंती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचंद और निराला ने.  इसी क्रम में उन्होंने समकालीन रचनाओं के सही संदर्भ की पहचान को डॉ.नामवर सिंह की सबसे बड़ी विशेषता माना है.

आधुनिक तेलुगु आलोचना के सत्व का निरूपण करते हुए डॉ.शकीला ख़ानम ने परंपरा के साथ प्रयोग के समन्वय को प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में रेखांकित किया है और कहा है कि यह एक तरह से आंध्र-चरित्र की विशेषता है कि यहाँ परंपरा से पूर्णतया विच्छेद कभी स्वीकार नहीं किया गया. अपनी बात के समर्थन के लिए लेखिका ने भाव कवित्वम्‌ (छायावाद), अभ्युदय कवित्वमु (मार्क्सवाद), वचन कविता (गद्‍य कविता) और विप्‍लव कवित्वमु (जनवाद) द्वारा आलोचना के आधुनिक मानदंड़ों के विकास की चर्चा की है. वे यह बताती हैं कि इन सभी आंदोलनों से जुड़े आलोचकों ने प्रगति और परंपरा का सुंदर समन्वय किया है.  कोडवटिगंटि कुटुंबराव के 'साहित्य प्रयोजनम्‌' में उनके मार्क्सवादी और मानवतावादी विचारों का परिचय मिलता है. डॉ.सुप्रसन्न कृत 'साहित्य विवेचना' को तेलुगु के सर्वश्रेष्‍ठ समीक्षा ग्रंथों में माना गया है. गौरीपति वेंकटसुब्बय्या की पुस्तक 'चलम' और 'अक्षराभिषेकम्‌', डी.राजाराव की पुस्तक 'लाइफ आफ गोपीचंद' और एन.गुरुप्रसाद के 'आंध्र पत्रिका' के वार्षिक अंकों में प्रकाशित लेखों में प्रगतिशील आलोचना की प्रवृत्तियाँ दृष्‍टिगोचर होती हैं. 

लेखिका ने गद्‍य की विभिन्न विधाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रतिमानों के विकास को तेलुगु आलोचना के निजी व्यक्‍तित्व की पहचान माना है. इस दृष्‍टि से कल्लूरि वेंकटनारायण राव कृत  कवित्ववेदी, शिष्टा रामकृष्ण शास्त्री और आरुद्रा के तेलुगु साहित्य के इतिहास और डॉ.सी.नारायण रेड्डी तथा प्रो.जी.जे.सोमयाजी के तेलुगु भाषा के इतिहास के ग्रंथ उल्लेखनीय हैं. स्मरण रहे कि कॉडवेल ने तेलुगु को द्रविड परिवार की भाषा बताया था परंतु डॉ.सी.नारायण रेड्डी ने इसे संस्कृत और प्राकृत से जन्मी भाषा माना है. ऐसी अनेक जानकारियाँ और स्थापानाएँ डॉ.खानम के ग्रंथ 'आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास' को हिंदी पाठकों के लिए एक आवश्‍यक ग्रंथ बनाती हैं.


अपनी दूसरी पुस्तक 'काव्यानुवाद की समस्याएँ' में भी डॉ.शकीला ख़ानम ने हिंदी और तेलुगु कविता के तुलनात्मक संदर्भ को केंद्र में रखा है जिसके कारण वह भी एक संग्रहणीय पुस्तक बन गई है. अनुवाद की समस्याओं पर एकपक्षीय सैद्धांतिक चर्चाएँ तो बहुत होती रहती हैं लेकिन इन समस्याओं को अनुवाद-समीक्षा और अनुवाद-मूल्याकंन के साथ जोड़कर डॉ.शकीला ख़ानम ने वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है. जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी' के हिंदी से तेलुगु तथा सी.नारायण रेड्डी के महाकाव्य 'विश्‍वंभरा' के तेलुगु से हिंदी अनुवादों की समीक्षा पर केंद्रित यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें लेखिका ने व्यावहारिक संदर्भों के आधार पर काव्यानुवाद के संद्धांतों का निरूपण करने का भी सफल प्रयास किया है.

अनुवादक की व्यक्‍तिगत रुचि किस प्रकार अनूदित पाठ को प्रभावित करती है, इसका एक रोचक उदाहरण यह है कि 'कामायनी' के विभिन्न सर्गों के शीर्षकों का तेलुगु अनुवाद करते समय डॉ.आई.पांडुरंगराव ने 'अ' अक्षर के प्रति अतिरिक्‍त मोह के कारण सभी सर्गों का नामकरण 'अ/आ' से कर दिया है जिसके कारण काफी गड़बड़ी पैदा हो गई है. श्रद्धा और इड़ा केवल मनोवृत्तियाँ नहीं हैं बल्कि पात्र भी हैं परंतु इनका अनुवाद 'आह्‍लादम्‌' और 'असंतृप्‍ति' कर दिया गया है जो अपर्याप्‍त है. लेखिका ने इस ओर इशारा किया है तथा 'कामायनी' और 'विश्‍वंभरा' के अनूदित पाठों में मूल की तुलना में उपलब्ध परिवर्तनों का विवेचन आठ आधारों पर सोदाहरण किया है. ये आधार हैं - अर्थ संवृद्धि, अर्थ संकोच, अर्थ परिवर्तन, क्रम परिवर्तन, पुनरुक्‍ति, विशेषण, काल परिवर्तन तथा लोकोक्‍तियाँ और मुहावरे. कहना न होगा कि ये आधार इतने व्यापक  हैं कि किसी भी अनूदित पाठ का विश्‍लेषण करने के लिए इनका भली भाँति उपयोग किया जा सकता है. वस्तुविधान की भाँति ही रूपविधान के स्तर पर भी मूल और अनूदित पाठों की तुलना करके शकीला जी ने काव्यशास्त्र में अपनी पैठ को प्रमाणित किया है. इसके बाद उन्होंने दोनों विवेच्य काव्यों के उन शब्दों पर ध्यान केंद्रित किया है जो अनुवादक को इसलिए भ्रमित कर सकते हैं कि वे समानरूपी होते हुए भी भिन्नार्थी हैं. यह सामग्री सामान्य पाठक के लिए भी अत्यंत रोचक है क्योंकि हिंदी में यदि 'सारा' संपूर्ण या सम्स्त का द्‍योतक है तो तेलुगु में उसका अर्थ दारू या शराब हो जाता है. 'पाप' दुष्‍कृत्य तो है ही आँख की पुतली भी है. 'अनुमान' तेलुगु में 'अंदाजा' नहीं है 'शंका' और 'संदेह' है. 'काय' का अर्थ वहाँ 'फल' है और 'वासना' का प्रयोग 'कामना' की अपेक्षा 'खुशबू' के अर्थ में होता है. 'जड़' का अर्थ तेलुगु में 'वेणी' है और 'पग' दुश्मनी बन गया है. अभिप्राय यह है कि ऊपर से एक जैसे दिखने वाले शब्द भीतर से एक जैसे नहीं हैं - भिन्न अर्थ के द्‍योतक हैं, अतः अनुवादक से अतिरिक्‍त सतर्कता चाहते हैं.


आलोचना शास्त्र और अनुवाद चिंतन जैसे दुरूह विषयों पर अत्यंत रोचक शैली में लिखी गई ये दोनों ही पुस्तकें लेखिका के गहन अध्ययन और विषय पर अधिकार का तो पता देती ही हैं, सहज प्रतिपादन की शक्‍ति को भी इंगित करती हैं. इन विषयों के गंभीर अध्येताओं को ये दोनों ही कृतियाँ अवश्‍य पठनीय प्रतीत होंगी; और संग्रहणीय भी.

1. आधुनिक हिंदी और तेलुगु साहित्य में आलोचना सिद्धांतों का विकास/ डॉ.शकीला ख़ानम/ 2010 (प्रथम संस्करण)/ मिलिंद प्रकाशन, 4-3-178/2, कंदस्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद - 500 095 / 144 पृष्ठ / 200 रुपए.

2. काव्यानुवाद की समस्याएँ/ डॉ.शकीला ख़ानम/ 2010 (प्रथम संस्करण)/ मिलिंद प्रकाशन, 4-3-178/2, कंदस्वामी बाग, हनुमान व्यायामशाला की गली, सुल्तान बाज़ार, हैदराबाद - 500 095 / 114 पृष्ठ / 150 रुपए



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