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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

गुरु-पूर्णिमा

||गुरु-पूर्णिमा||

यों तो माता-पिता-गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किसी तिथि-वार-पर्व की ज़रूरत नहीं, पर 'गुरु पूर्णिमा' मेरे लिए बचपन से ही रोमांचकारी उत्सव रहा है. माता-पिता-गुरु ने कभी मुझे उपदेशा नहीं, पर माता-पिता ही अपने दैनंदिन जीवन के माध्यम से मेरे गुरु बन गए. जाने किस गुरु-पूर्णिमा पर पित्ताजी का 'गौरव' देखकर तय कर लिया कि किसी और को 'गुरु' नहीं कहना है. पिताजी को तुलसी का गुरु-वंदना प्रसंग अतिप्रिय था; मुझे भी है.  पर विचित्र बात यह है कि  जब-जब कबीर को पढता-पढाता हूँ तो हर दोहे में पितु-वचन की साखी का बोध होता है.
सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग | 
बरस्या बादल प्रेम का ,भीजि गया सब अंग || 
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