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सोमवार, 16 अगस्त 2010

तुलसी अनुकरणीय नहीं?

१.

प्रतिवर्ष की तरह इस पंद्रह अगस्त को भी मारवाड़ी प्रेस में कवि गोष्ठी जमी. और खूब जमी. ३० से ऊपर लोग थे. और सारे के सारे कवि. यों तो ढेरों कुकविता भी सुनने मिली, लेकिन शिकायत कोई नहीं क्योंकि अकेले भँवरलाल उपाध्याय की जीवंत गज़लें मेरे जैसे श्रोता के लिए काफी थीं. साकिब बनारसी की कोई खबर नहीं परंतु दुर्गा दत्त पांडेय अकेले पड़ने पर भी अपनी नैसर्गिक दुष्टता से बाज नहीं आए - भरे भौन तोंद स्पर्द्धा के साथ मेरी अगवानी की तो ठहाके गूँजने ही थे. भला आदमी मिला भी तो बरसों बाद था.

दो बार कवियों और संचालक की मीठी नोक झोंक हुई. मज़ा तब आया जब तांत्रिक धज वाले बिंदु जी महाराज साधू और धर्म/मज़हब पर व्यंग्य से बिदक गए और बकौल दिवाकर पांडे आसाराम बापू की तर्ज़ पर प्रवचन पर उतर आए. लेकिन पल भर में रवि श्रीवास्तव और वेणु गोपाल भट्टड़ की विनोदपूर्ण टिप्पणियों ने वातावरण खुशनुमा बना दिया.

सब उन सबके बारे में मेरा इंटरव्यू लेते रहे जो पहले आया करते थे पर इस बार नहीं आए.....

२.

और आज तुलसी जयंती मनाई गई. धन्य हैं अपने हरिहर जी!

मैंने तुलसी की जीवनी - जीवन संघर्ष - से सबक लेने की बात कही तो एक आचार्य जी ने रत्नावली प्रसंग का सहारा लेकर अस्थिचर्ममय देह को कचरा-कुंडी ही बना डाला . बस फिर क्या था - अपने डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने मेरे साथ साथ तुलसी का भी कचरा कर डाला. मैंने कहा था कि रामचरितमानस के राम का चरित उदात्त हो सका क्योंकि तुलसी का चरित उदात्त था, पर वह स्थापना तो उड़ गई . सिद्ध हुआ यह कि तुलसी अनुकरणीय नहीं हैं क्योंकि उन्होंने घरबार त्यागा. ....सुचरितानि सेवितानि नो इतराणि ! सदा की तरह डॉ. शुक्ल जी का संबोधन तर्कपूर्ण और सम्मोहक था.
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