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शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

हिंदी : जनभाषा, राष्ट्रभाषा, विश्वभाषा


हिंदी आज हमारी राष्ट्रभाषा, संवैधानिक राजभाषा और संपर्क भाषा है तथा हम इसके विश्वभाषा के दर्जे के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हिंदी की इस विकासयात्रा की एक बड़ी विशेषता है कि वह सदा जन-मन की ओर प्रवाहित होती रही है। यदि यह कहा जाए कि हिंदी की ताकत उसके निरंतर जनभाषा होने में है, राजभाषा होने में नहीं, तो शायद कोई अतिशयोक्ति न होगी। अपभ्रंश के अनेक क्षेत्रीय रूपों से जब दूसरी आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ रूपाकार ग्रहण कर रही थीं, उसी समय हिंदी ने भी अपने प्रारंभिक रूप की आहट दी। यह आहट सुनाई पड़ी अलग-अलग बोलियों और उपभाषाओं के रूप में।



हिंदी का एक आरंभिक रूप यदि सरहपाद जैसे सिद्ध और गुरु गोरखनाथ जैसे नाथपंथी कवियों की भाषा में प्रकट हो रहा था, जिसका पौरुषपूर्ण संस्करण आगे चलकर कबीरदास जैसे कवि की भाषा में मुखर होकर संध्याभाषा, सधुक्कड़ी और खिचड़ी कहलाया तो उसके कुछ अन्य रूप अमीर खुसरो की खड़ी बोली और ब्रजभाषा, चंदबरदायी की राजस्थानी, विद्यापति की मैथिली आदि में गठित हो रहे थे।

इस प्रकार राजस्थान से लेकर मिथिला तक, या कहें कि गुजरात से लगती सीमा से लेकर बंगाल से लगती सीमा तक व्याप्त विविध बोलियों के रूप में हिंदी भाषा ने अपनी आरंभिक उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद का अर्थात कबीरदास के समय से लेकर आज तक की हिंदी भाषा की यात्रा का पूरा इतिहास तो हमें मालूम है ही जिसमें अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा और खडीबोली के शिष्ट साहित्य के साथ सभी 17 बोलियों के लोक साहित्य की पुष्ट परंपरा विद्यमान है। इनमें से कई बोलियाँ/भाषाएँ अलग-अलग समय पर अलग-अलग राज्यों में राजकाज और प्रशासन की भाषा के रूप में भी व्यवह़ृत रही हैं। इस इतिहास को बार-बार दुहराने और समझने की आज के समय में सबसे ज्यादा जरूरत है साथ ही यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्राचीन काल और मध्य काल में भारत की विविध भाषा-भाषी जनता के परस्पर संपर्क और औपचारिक अवसरों पर प्रयोग की भाषा जिस प्रकार संस्कृत थी, उसी प्रकार आधुनिक काल में हिंदी अपना स्थान बनाए हुए है।

आज हिंदी ने अपने आपको साहित्य और संपर्क के परंपरागत प्रयोजन क्षेत्रों के साथ-साथ राजकाज, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, आधुनिक वाणिज्य-व्यवसाय तथा तकनीकी के लिए उपयुक्त भाषा के रूप में सब प्रकार सक्षम सिद्ध कर दिया है तथा बाजार में और कंप्यूटर पर व्यापक प्रयोग की अपनी संभावनाओं को प्रकट कर दिया है, दुनिया की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली शीर्ष भाषाओं में शामिल होकर संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने की दावेदारी प्रस्तुत कर चुकी है, भले ही अपनी राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी या गुलाम मानसिकता की हीनभावना के कारण हम इस सत्य को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने में हिचकते हों। ऐसे समय में हिंदी के बहुक्षेत्रीय और बहुबोलीय आधार की स्मृति बनाए रखना बेहद जरूरी है क्योंकि हिंदी केवल उतनी ही नहीं है, जितनी वह राजभाषा हिंदी या खड़ी बोली हिंदी या मानक हिंदी के रूप में दिखाई देती है।

आज इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि हिंदी परिवार की बोलियाँ/भाषाएँ परस्पर मूलत: नाभिनालबद्ध हैं। किसी तात्कालिक लाभ के लिए उनकी यह परस्पर एकता खंडित नहीं की जानी चाहिए। साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसी संस्थाओं से लेकर सरकारी योजनाओं तक के नियामकों को इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि इन समस्त बोलियों/भाषाओं से संबलित हिंदी भाषा समाज का विस्तार भौगोलिक और सांख्यिकीय दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। अत: जब अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी को रखा जाए तो उसके इस विस्तार के अनुरूप विविध योजनाओं में उचित अनुपात में भागीदारी प्रदान की जानी चाहिए। लोकतंत्र के इस साधारण से सिद्धांत की उपेक्षा का अर्थ है - हिंदी भाषा के व्यापक बोलीय आधार की उपेक्षा। इससे असंतोष पैदा होता है और अलग-अलग बोलियों के प्रयोक्ता समाज में तात्कालिक लाभों के लिए अलग से सूचीबद्ध किए जाने का मोह जागता है। यदि इस प्रवृत्ति पर रोक न लगी, तो सब बोलियाँ खिसक जाएँगी और हिंदी के समक्ष खुद अपनी पहचान का संकट खड़ा हो सकता है। हिंदी की सारी बोलियाँ मिलकर ही हिंदी भाषा रूपी रथ की संज्ञा प्राप्त करती हैं। यदि रथ के घोड़े, पहिए और आसन आदि को एक-एक कर अलग करते जाएँ तो रथ कहाँ बचेगा! अत: हिंदी की बोलियों की एकजुटता में ही हिंदी का अस्तित्व है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें हिंदी के रथ को बिखरने से बचाना होगा।

स्मरण रहे कि जब हम कहते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भाषा है और उसका प्रयोग देश भर में किया जाता है, तथा हिंदी बोलने/जानने वाले विश्वभर में हैं, तो इसका अर्थ है कि हिंदी का प्रयोग करने वाला भाषा-समाज अनेक भाषा-कोडों का प्रयोग करता है। ये भाषा-कोड एक ओर तो उसकी तमाम बोलियों से आए हैं, दूसरी ओर इनका विकास हिंदी की इन बोलियों के विविध भाषाओं के साथ संपर्क से हुआ है। हाँ, जहाँ यह संपर्क अत्यंत घनिष्ठ है, वहाँ हिंदी के विविध रूपों का संप्रेषण घनत्व भी अधिक है तथा जहाँ संपर्क में उतनी घनिष्ठता नहीं है,वहाँ संप्रेषण में भी उतना घनत्व नहीं है। इन स्थितियों में ही हिंदी के बंबइया, हैदराबादी, मद्रासी आदि संस्करण विकसित हुए हैं। इसी प्रकार भारतवंशियों द्वारा आबाद किए गए देशों में भी हिंदी का अपना-अपना रूप है। अंग्रेजी मिश्रण से विकसित संस्करण को भी नकारा नहीं जा सकता। हमें आज हिंदी के विकास की अनेक दिशाओं के रूप में इन सब संस्कारणों को स्वीकृत और सम्मानित करना होगा। तभी जनभाषा को विश्वभाषा की प्रतिष ्ठा प्राप्त होगी।


उल्लेखनीय है कि हिंदी जिस प्रकार बोलीगत विभेदों से भरी-पूरी संपूर्ण भाषा है, उसी प्रकार वह शैलीगत भेदों से भी परिपूरित है। हजार साल से ज्यादा की अपनी विकास यात्रा में हिंदी ने विभिन्न भाषाओं के संपर्क और ऐतिहासिक सामाजिक दबावों के परिणामस्वरूप अपने इन शैलीगत भेदों को निर्मित किया है। ध्यान में रखना होगा कि जिस प्रकार बोलीगत भेद एक दूसरे के सहयोगी हैं, उसी प्रकार हिंदी के शैलीगत भेद भी एक दूसरे के पूरक हैं। यहाँ हम खासकर दक्खिनी हिंदी और उर्दू के प्रदेय की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। इन दोनों शैलियों के बिना हिंदी का इतिहास अधूरा है। उसे भी हिंदी साहित्य के अंग के रूप में ग्रहण करना अपनी विरासत को पहचानने और उससे जुड़ने के लिए आवश्यक है।


14 सितंबर को जब-जब हम हिंदी दिवस मनाएँ तो भारत के संविधान के अनुच्छेद-343 से अनुच्छेद-351 तथा अनुसूची-8 के प्रावधानों का तो खयाल रखें ही, यह भी खयाल रखें कि राजभाषा की यह सारी व्यवस्था भारत की जातीय अस्मिता और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा विकसित करने के उद्देश्य से की गई है। इसे केवल सरकारी कामकाज की भाषा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। बल्कि सच तो यह है कि अनुच्छेद-351 के निर्देश के अनुरूप हिंदी का सामासिक स्वरूप राजभाषा की अपेक्षा व्यापक जनसंपर्क, साहित्य, मीडिया, वाणिज्य-व्यवसाय, ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी की भाषा के रूप में हिंदी के व्यापक व्यवहार से ही संभव है। यदि हम - हमारी सरकारें - सचमुच हिंदी को विश्वभाषा के पद पर आसीन देखना चाहती हैं तो उसका जो संवैधानिक अधिकार लंबे अरसे से लंबिंत या स्थगित पड़ा है, उसे तुरंत बहाल किया जाए। सभी भारतीय भाषाओं को इससे बल मिलेगा तथा परस्पर अनुवाद द्वारा उनके माध्यम से हिंदी भी बल प्राप्त करेगी। मौलिक लेखन के साथ-साथ व्यापक स्तर पर अनुवाद के सहारे ही हिंदी को समूचे भूमंडलीय ज्ञान की खिड़की बनाया जा सकता है, अत: इस दिशा में भी ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है। तभी हिंदी का वह सामासिक और वैश्विक स्वरूप उभर सकेगा जो भारत ही नहीं, दुनिया भर के किसी भी भाषा-भाषी को अपनी ओर बरबस खींच लेगा।
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