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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

दूरस्थ शिक्षा पर त्रिदिवसीय समारोह संपन्न



दूरस्थ शिक्षा पिछड़े, वंचितों व गृहिणियों तक सीमित नहीं - डॉ. भारत भूषण




धारवाड में ‘दूरस्थ शिक्षा के विविध आयाम’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला

दक्षिण भारत में दूरस्थ माध्यम की शिक्षा  पर हिंदी में विचार-विमर्श  का यह पहला मौका था। देशभर में उच्चशिक्षा  को सर्वसुलभ बनाने में इस माध्यम की धाक जम चुकी है। अंग्रेजी में दूरस्थ शिक्षा की बढ़ती चुनौतियों-दिशाओं और संभावनाओं पर बातें भी होती रही हैं पर हिंदी में इन पर धारदार चर्चा धारवाड में दो दिनों की इस संगोष्ठी में 21-22 जनवरी, 2011 को की गई।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए डेक (डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल ) के निदेशक डॉ. भारत भूषण ने गोष्ठी की इस खासियत पर खुशी  जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि दक्षिण भारत के इस सुदूर स्थान पर भारत भर के इतने विद्वान जुटेंगे और हिंदी तथा हिंदुस्तान के नज़रिए से दूरस्थ शिक्षा माध्यम की परख करेंगे। भारत भूषण जी की सराहना से अभिभूत होते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग के सम-कुलपति आर.एफ. नीरलकट्टी ने कहा कि ‘‘दक्षिण भारत में दूरस्थ शिक्षा माध्यम की शिक्षा  की नींव वास्तव में महात्मा गांधी ने रखी थी। गांधी जी ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण के चारों राज्यों में हिंदी शिक्षण  की ‘मुक्त परंपरा’ कायम की जिसमें धर्म, जाति, आयु और लिंग का कोई स्थान नहीं था।’’ वे यह कहने में भी नहीं हिचके कि अगर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा को प्रोत्साहन और सहयोग मिले तो वह दूरस्थ शिक्षा  को एक सार्थक विस्तार देने में पूरी तरह समर्थ है क्योंकि सभा के पास एक बहुत बड़ा और ‘वैलनिट’ मानव-संसाधन मौजूद है।




'दूरस्थ शिक्षा के विविध आयाम’ संगोष्ठी के आगाज़ से ही इन दोनों महानुभावों के वक्तव्यों ने उत्साह बढ़ाने वाले टॉनिक का काम किया। देश के कई हिस्सों से पधारे हिंदी विद्वानों की मौजूदगी से संगोष्ठी को आगे के सत्रों में ठोस ऊँचाई हासिल हुई। ये सभी विद्वान  कहीं-न-कहीं दूरस्थ शिक्षा के सरोकारों से जुड़े हुए हैं। इन्हें संबोधित करते हुए डॉ. भारत भूषण ने एक पते की बात और कही कि विश्वविद्यालयों  में अब दूरस्थ माध्यम शिक्षा को दूसरे दर्जे की अथवा नियमित शिक्षा से कमतर स्तर की शिक्षा समझने वाली धारणा में भारी बदलाव आया है।

स्वागत भाषण देते हुए संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने इस ओर भी इशारा  किया कि दूरस्थ शिक्षा एक प्रकार की सु-नियोजित शिक्षा है जिसमें सामग्री और तकनीक के इस्तेमाल से गुणवत्ता सिद्ध की जाती है। उन्होंने भारत में दूरस्थ शिक्षा के प्रसार में इग्नू की भूमिका की सराहना करते हुए आम जन में इसकी स्वीकार्यता और बढ़ती हुई लोकप्रियता को रेखांकित किया। डॉ. भारत भूषण की यह टिप्पणी दोनों दिन बहस का मुद्दा बनी रही कि - ‘दूरस्थ माध्यम की शिक्षा  सिर्फ़ पिछड़ों, वंचितों या घरेलू स्त्रियों तक सीमित नहीं है। आज इसने वह मुकाम हासिल कर लिया है कि देश भर के युवक और युवतियाँ इसे नियमित शिक्षा  का एक बढ़िया विकल्प मानकर बड़ी संख्या में पूरे विश्वास  के साथ अपना रहे हैं। इतना ही नहीं कौशल  तथा दक्षता युक्त यह शिक्षा  पूरी करने के बाद वे पूरे आत्मविश्वास  के साथ समाज में अपनी ख़ास जगह भी बनाने लगे हैं।






दीप-प्रज्वलन, प्रार्थना, स्वागत-सत्कार की औपचारिकता से शुरू उदघाटन  सत्र का संचालन प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने ख़ास अंदाज में किया। धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों की प्रगति और दक्षिण भारत के हिंदी प्रेमियों की मांग को देखते हुए यह विश्वास  के साथ कहा जा सकता है कि दक्षिण में  हिंदी भाषा तथा हिंदी माध्यम की उच्च शिक्षा  की सरपरस्ती आगे आनेवाले सालों में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास द्वारा ही की जाएगी।
21 जनवरी के दोनों सत्र दूरस्थ शिक्षा  माध्यम के मूलभूत आयामों पर केंद्रित थे। आज के युवा-भारत की ज़रूरतों, आकांक्षाओं और उनके सपनों को पूरा करने के लिए किन-किन दिशाओं में अपने को अग्रसर करें, कहाँ-कहाँ खुद को बदलें और किस विधि से सर्वजन सुलभ और संप्रेषणीय बनें - आदि इन दोनों सत्रों की मूल चिंताएँ थीं। भारत के कोने-कोने में दूरस्थ शिक्षा  की पहुँच हो गई हैं। ‘ड्राप आउट्स’ के लिए यह माध्यम एक वरदान है।

दूरस्थ शिक्षा  की भूमिका पर बात करते हुए डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने यह भी चेताया कि जब लोगों का विश्वास  हमें मिलता है तब हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘मुक्त शिक्षा’ ने इस बात को समझा भी है और अमली जामा भी पहनाया है। वह निरंतर ‘इन्नोवेटिव’ बनी रही है। शिक्षक  और कक्षा की सीमा को इसने असीम साधनों से जोड़ कर नव्य बना दिया है। डॉ. विमल ने कहा कि जब हमारे यहाँ दूरस्थ शिक्षा  आंध्र प्रदेश, राजस्थान और इग्नू में शुरू हुई थी तो हम सोचते थे कि यह चल नहीं पाएगी; पर धीरे-धीरे हमारे जैसे लोग भी इसे उत्सुकता से देखने लगे। सच में इस शिक्षा पद्धति ने मीडिया, इन्टरनेट, कंप्यूटर, सेटेलाइट और न जाने कितने उपकरणों का उपयोग करके अपनी भूमिका को विस्तार दे दिया है। उन्होंने इस शिक्षा  की रोजगारपक प्रकृति तथा यंत्र-साधित शिक्षण  पद्धति की भूरि-भूरि सराहना करते हुए कहा कि भारतवर्ष की एक बड़ी आबादी को उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा  देने का काम करके दूरस्थ शिक्षा  ने यह उजागर कर दिया है कि उसकी भूमिकाएँ बहुमुखी हैं और जता दिया है कि यह ज्ञान प्रदान करने वाली निष्क्रिय शिक्षा  प्रणाली नहीं बल्कि बोध और कौशल  पैदा करने वाली सक्रिय शिक्षा पद्धति है।


'दूरस्थ शिक्षा : निर्बाध शिक्षा का अवसर' के नजरिए से डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने दूरस्थ शिक्षा  को ‘बाधा-विहीन शिक्षा' कहा क्योंकि इसे बिना किसी रुकावट के अपनाया जा सकता है - न कहीं आने-जाने की समस्या, न हाजिरी-क्लास का बंधन। खेती, मजदूरी, नौकरी, गृहस्थी के साथ यह शिक्षा जारी रखी जा सकती है। इसकी पाठ्य-सामग्री और सहायक-सामग्री अनेक तरह के शोध-संधान के बाद खास और वैज्ञानिक प्रक्रिया से इतनी संप्रेषणीय और बोधगम्य बनाई जाती है कि शिक्षार्थी की समझ भी निर्बाध गति से सही दिशा  में विकास पा सके। डॉ. शर्मा ने दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के आँकड़े देकर यह तथ्य सामने रखा कि इन पाठ्यक्रमों में गृहिणियों, ऑफिस कर्मचारियों, अध्यापकों की संख्या अनुपाततः कम नहीं है। उनके शब्दों में दूरस्थ शिक्षा स्वयं में निर्बाध होने के साथ-साथ किन्हीं कारणों से बाधित हो चुकी शिक्षा को जारी रख पाने का एक सुनहरा मौका भी है।

इसी क्रम में ‘हिंदी शिक्षण में दूरस्थ शिक्षा  की भूमिका' का मसला भी कम जरूरी नहीं था क्योंकि जिस संस्था के मंच पर यह विचार-मंथन आकार ले रहा था वह दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार-प्रसार करने वाली राष्ट्रीय महत्व की संस्था का मंच था। दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल प्रांत में हिंदी की उच्च शिक्षा  और शोध के जो गवाक्ष दूरस्थ शिक्षा  ने खोले हैं, उनका आकलन करते हुए प्रो. सुनीता मंजनबैल ने इस बात पर विशेष  बल दिया कि दक्षिण भारत के लिए तैयार हिंदी ‘सिम’(स्वाध्याय सामग्री) को अलग ढंग से तैयार किया जाय जैसा कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय ने किया है। उन्होंने यह भी बताया कि दूरस्थ माध्यम के प्रसार से दक्षिण भारत में हिंदी अध्येताओं की संख्या में आशातीत वृद्धि हुई है।


पहले सत्र के आखिरी पर्चे में बी.बी. खोत ने दूरस्थ शिक्षा  के माध्यम से 'कौशल विकास' की संभावनाओं और घटकों का परिचय दिया। उनके मत में दूरस्थ शिक्षा  ‘कौशलयुक्त शिक्षा’ का सार्थक उदाहरण है। कौशल  विकास में सहायक ‘सिम लेखन की विशेष  पद्धति’, ‘प्रश्न-पत्र निर्माण’, ‘बोध-विस्तार’ आदि के उदाहरणों द्वारा श्री खोत ने यह प्रतिपादित किया कि शिक्षार्थी में कौशल  दक्षता उत्पन्न और स्थापित करना ही दूरस्थ शिक्षा का पहला और आखिरी उद्देश्य है।

दूसरा सत्र सही मायने में व्यावहारिक था क्योंकि यह सत्र पहले सत्र की प्रतिपत्तियों की परख करने वाला था। अगर दूरस्थ शिक्षा की भूमिकाओं, उसके उत्तरदायित्वों और लक्ष्यों को सर्वस्वीकार्य आयाम देने हैं तो निश्चित ही सामग्री-निर्माण, प्रश्न -निर्माण, मूल्यांकन पद्धति और परीक्षा संबंधी छात्र सुविधाओं को त्रुटिहीन, आदर्श और गुणवत्ता पुष्ट बनाना अनिवार्य होगा। ये और ऐसे ही कई मुद्दे दोपहर बाद की इस चर्चा-विमर्श  में उठे।


दूरस्थ शिक्षा  माध्यम के लिए सामग्री-निर्माण की प्रक्रिया की विशिष्टता और अधिगम संबंधी सूक्ष्मताओं की अनुकूलता पर प्रो. टी.वी. कट्टीमनी ने विचार किया। सामग्री परीक्षा और मूल्यांकन - इन तीनों के अंतस्संबंध को बनाए रखने को भी उन्होंने दूरस्थ शिक्षा प्रणाली की सफलता का मूलाधार बताया। बी.ए. और एम.ए. स्तर की हिंदी के ‘सिम’ निर्माण में समेटे जाने वाले सामयिक-विमर्शों  की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि नियमित पद्धति से दी जानेवाली हिंदी की उच्च शिक्षा  सामयिक संदर्भों, सभ्यता-विमर्श  तथा उत्तर आधुनिक चिंतन को स्थान देने में हिचकती है जबकि दूरस्थ शिक्षा की मुक्तता हिंदी पाठ्यक्रम को भी मुक्त और समीचीन बनाने का काम कर रही है।


अनुदेशन  सामग्री और ‘सिम’ के भेदोपभेदों को डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों धरातलों पर प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात की सराहना की कि दूरस्थ शिक्षा में खासकर इग्नू ने ‘सिम’ के लिखित पाठ को अन्य दृश्य-श्रव्य माध्यमों से सप्लीमेंट करने का अथवा फ़ेस-टु-फेस शिक्षण  को सहायक बना कर इस्तेमाल करने का जो काम किया है उसने कौशलपरक शिक्षा को एकदम नया और अनूठा आयाम प्रदान कर दिया है।

डॉ. माधव सोनटक्के ने नियमित हिंदी पाठ्यक्रमों की परंपरागत प्रश्न-निर्माण एवं मूल्यांकन पद्धति पर चुटकी लेते हुए कहा कि परीक्षा और मूल्यांकन की रूढ़िबद्धता को दूरस्थ शिक्षा  ने एक हद तक तोड़ा है। प्रश्न-पत्र निर्माण और मूल्यांकन को बोध और दक्षता के विकास में सहयोगी बनाने की अपील करते हुए उन्होंने कई उपयोगी मॉडल्स सामने रखे।

इस संदर्भ में दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विद्यार्थियों को परीक्षा संबंधी जो सुविधाएँ दी जाती हैं उनका पारदर्शी  विवेचन श्रीमती गीता वर्मा ने किया। उन्होंने बताया कि निदेशालय की ‘सिम’ के निर्माण में देशभर के विद्वान विशेषज्ञों की मदद ली गई है । इन सबने ‘सिम’ में ही सतत मूल्यांकन के बिंदु निर्धारित कर दिए हैं  जिनको दत्त कार्य तथा प्रश्नपत्र में भी सम्मिलित करके दृढ़ीकरण की माप की जाती है। प्रश्नों  के ‘विषयपरक’ और ‘बोधपरक’ प्रकारों की भी उन्होंने चर्चा की तथा निदेशालय  के बी.ए., एम.ए., डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के प्रश्नपत्रों से इनके उदाहरण दिए।


22 जनवरी को तीसरे सत्र में दूरस्थ शिक्षा  प्रणाली के सर्वथा नवीन आयामों पर बातचीत हुई। पहले दोनों सत्रों की अनुगूंज भी इस सत्र में सुनाई देती रही। प्रो. टी.मोहन सिंह ने कौशल  आधारित शिक्षा  के परिप्रेक्ष्य में दूरस्थ शिक्षा  का अवगाहन करते हुए ‘कौशल’ को शिक्षा और सही मायनों में शिक्षित  करने, होने का मानदंड माना। उन्होंने अर्जन, अधिगम और बोधन की अनुकूल प्राप्यता को ‘कौशल’ की कसौटी कहा तथा  आंध्र प्रदेश में हिंदी भाषा कौशल उत्पन्न करने के बीच आनेवाली समस्याओं पर विचार करते हुए इन्हें  समतल करने वाले  रास्तों की भी चर्चा की। व्यावहारिक हिंदी अर्जन पर उन्होंने हिंदी व्याकरण की जटिलता के मद्देनजर प्रकाश  डाला तथा हिंदी की शैलियों के अधिगम को ‘भाषा कौशल' के लिए जरूरी स्वीकार किया।

तकनीकी आधारित शिक्षा को दूरस्थ शिक्षा  की धुरी के रूप में व्याख्यायित करते हुए श्रीमती निधि सिंह ने तकनीकी साधित शिक्षण सामग्री निर्माण की प्रविधियों की चर्चा की। उन्होंने तकनीकी माध्यमों/उपकरणों की संभावनाओं और सीमाओं की पहचान को भी रेखांकित किया और कहा  कि इस पहचान के आलोक में ही दूरस्थ माध्यम शिक्षा के विद्यार्थियों को सहज-संप्रेषणीय शिक्षा  से जोड़ा जा सकता है। साहित्यिक एवं साहित्येतर पाठों को तकनीकीबद्ध करने की प्रचलित और अद्यतन पद्धतियों के इस्तेमाल को भी उन्होंने विविध तकनीकी उपकरणों के उपयोग से संबद्ध करके दिखाया।


इसी क्रम में डॉ. अर्जुन चव्हाण ने दूरस्थ शिक्षा  में संचार माध्यमों की उपयोगिता स्थापित की। भारत में शिक्षा संबंधी सुविधाओं के अभाव पर रोष प्रकट करते हुए प्रो. चव्हाण ने संचार माध्यमों के व्यावसायीकरण पर भी चिंता व्यक्त की। उच्च शिक्षा और संचार माध्यमों की उपादेयता की अनदेखी करनेवाली नियमित शिक्षा पद्धति को अधूरा मानते हुए उन्होंने दूरस्थ शिक्षा की इसलिए सराहना की कि यह प्रणाली संचार माध्यमों की शैक्षिक शक्ति को पहचानने वाली है और इसने ‘मीडिया’ को मनोरंजन की सीमा से निकाल कर शिक्षा-प्रसार के महत् उद्देश्य से ला जोड़ा है।


चौथा सत्र दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय  की ‘सिम’(स्वाध्याय सामग्री) के आकलन पर केंद्रित था। हिंदी की सामग्री का श्रीमती एन. लक्ष्मी, अंग्रेजी की सामग्री का श्रीमती गीता वर्मा तथा शिक्षाशास्त्र की सामग्री का आकलन प्रो. अरविंद पांडेय ने किया। इस सत्र में प्रस्तुत विवेचन भी अत्यंत पारदर्शी थे। इस सत्र में प्रस्तुत आकलन की सफलता डॉ. भारत भूषण की समापन-सत्र में दी गई इस टिप्पणी से पुष्ट हो जाती है कि ‘मुझे प्रसन्नता है कि निदेशालय  की सामग्री दूरस्थ शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बहुत सोच-समझकर और मेहनत से बनाई गई है। सामग्री के आकलन से यह भी पता चलता है कि आपका विज़न एकदम क्लियर है और आपकी मंशा स्टूडेंट फ्रेंडली।’

22 जनवरी की शाम। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. भारत भूषण ने की। संगोष्ठी की रपट प्रो. दिलीप सिंह ने प्रस्तुत की। टिप्पणीकार थे - डॉ. गंगा प्रसाद विमल, डॉ. टी.वी.कट्टीमनी, डॉ. टी. मोहन सिंह, डॉ. अर्जुन चव्हाण, डॉ.ऋषभ देव शर्मा और डॉ. हीरालाल बाछोतिया। सभी टिप्पणीकारों ने इस बात की सराहना की कि ‘दूरस्थ माध्यम शिक्षा ' पर हिंदी में और वह भी दक्षिण भारत में यह संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी की गंभीरता और सुगठन ने सभी को मुग्ध कर दिया था। प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि यह संगोष्ठी निदेशालय  के लिए मार्गदर्शक  का काम करेगी। और यह भी जोड़ा कि संगोष्ठी दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के कामकाज से संबद्ध उसके आंचलिक और क्षेत्रीय केंद्रों के उपस्थित कार्यकर्ताओं, अध्यापकों, संचालकों आदि के लिए एक किस्म का प्रषिक्षण भी सिद्ध हुई है। डॉ. भारत भूषण संगोष्ठी की सुचारु व्यवस्था से अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि यह गोष्ठी आपकी नहीं बल्कि दूरस्थ शिक्षा परिषद, नई दिल्ली की है। उन्होंने संगोष्ठी में पढ़े गए कई आलेखों की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा एकनिष्ठ और उत्साही कार्यकर्ताओं से भरी-पूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘भविष्य दूरस्थ शिक्षा का ही है। सभा ने सही समय पर इस शिक्षा  प्रणाली में प्रवेश  किया है। आपकी निष्ठा और समझ को देख कर मुझे कोई संदेह नहीं है कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा बहुत जल्द ही दूरस्थ शिक्षा की एक अग्रणी संस्था बन कर उभरेगी।' उल्लेखनीय है कि समारोह के आरंभ में सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा तैयार की गई स्वाध्याय सामग्री और दूरस्थ माध्यम से संपन्न एम.फिल. तथा पीएच. डी.के शोधप्रबंधों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी जिसका उद्घाटन डॉ. भारत भूषण ने रिबन काटकर किया.  














23 जनवरी को पुनश्चर्या पाठ्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया गया।दूरस्थ शिक्षा निदेशालय से संबंधित चारों प्रांतों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक) के लगभग पचास पदाधिकारी, अध्यापक एवं संगोष्ठी में देश भर से पधारे सभी विद्वान  कार्यशाला में उपस्थित थे। कार्यशाला  के मुख्यतः दो उद्देश्य  थे - एक यह कि निदेशालय के कार्यकलाप से जुड़े सभी लोग विचार-विमर्श द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढें, निदेशालय के स्तरीय संचालन के लिए रचनात्मक सुझाव दें तथा एक-दूसरे से बातचीत करके कुछ नया सीखें। दूसरा उद्देश्य यह था कि निदेशालय  द्वारा निर्मित हिंदी साहित्य की शिक्षण सामग्री का पुनरवलोकन करके आवश्यक  रिवीज़न का परामर्श  दिया जाय।


कार्यशाला  के उद्घाटन में सभी अतिथि विद्वानों ने अनौपचारिक टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। प्रारंभ में प्रो. दिलीप सिंह ने कार्यशाला  के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित जन का स्वागत किया।


 डॉ. भारत भूषण ने संकेत किया कि ज्ञान और चिंतन तथा भाषा और साहित्य के स्वरूप में आज इतनी तेजी से परिवर्तन आ रहे हैं कि मानविकी और साहित्य की निर्मित सामग्री को चार-पाँच साल में एक बार परिवर्धन-परिवर्तन की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि दूरस्थ  शिक्षा  कार्यक्रम चलाने की चुनौतियाँ अलग हैं और हम सब को इसका सामना करने के लिए हमेशा  तैयार रहना चाहिए। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि - ‘मैंने 21 की सुबह निदेशालय की ‘सिम’ की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए आपकी सामग्री देखी और कुछ सुझाव भी दिए थे। आपकी सामग्री काफी अच्छी है पर अच्छे को और-और बेहतर बनाने की ज़रूरत हमेशा रहती है। आपके पास प्रबुद्धजनों की अनुभवी टीम है। मुझे विश्वास  है कि इस चर्चा-परिचर्चा से हम सब कुछ-न-कुछ नया सीखेंगे और अपने विद्यार्थियों को भी नया और उपयोगी दे सकेंगे।’ और फिर टीम बनाकर आठ टीमों ने वरिष्ठ विद्वानों की देखरेख में पूरे दिन चर्चाएँ कीं, समाधान ढूँढ़े और सामग्री की बेहतरी के लिए लिखित सुझाव दिए जिन्हें अगली सामग्री-संशोधन  कार्यशालाओं में ध्यान में रखकर सामग्री की गुणवत्ता में वृद्धि की जाएगी।












23 जनवरी की शाम। दूरस्थ शिक्षा पर केंद्रित तीन दिन का यह समारोह जब संपन्नता को प्राप्त हुआ तो सभी प्रतिभागी अपने-आप को संपन्नतर महसूस कर रहे थे। सभी ने इस दूरदर्शितापूर्ण  और सामयिक आयोजन के लिए दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, उच्च शिक्षा  और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की सराहना करते हुए परस्पर विदा ली।



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- प्रो. दिलीप सिंह,
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई - 600 017 .




रविवार, 27 फ़रवरी 2011

डॉ.डी.विजय भास्कर के पाँच तेलुगु नाटक

भूमिका

डॉ. डी. विजय भास्कर (27 मई, 1959) तेलुगु के प्रतिष्ठित नाटककार हैं। उन्होंने 25 से अधिक मौलिक नाटकों की रचना की है, कई नाटकों का अनुवाद किया है। उनके अपने नाटकों का अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद और मंचन हो चुका है। उनके नाटकों को अखिल भारतीय स्तर पर सफलता और ख्यति प्राप्त है। यदि यह कहा जाए कि डॉ. डी. विजय भास्कर नाटक में जीते हैं तो अत्युक्ति न होगी। नाट्य साहित्य के प्रति गहरी अनुरक्ति के कारण उन्होंने नाट्य की भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं का गहन अध्ययन किया है। आर. शांता सुंदरी ने उनके पाँच चयित नाटकों का मनोयोगपूर्वक हिंदी अनुवाद किया है। उनका यह कार्य हिंदी और तेलुगु भाषासमाजों के मध्य साहित्यसेतु को सुदृढ़ करनेवाला तो है ही, भारतीय साहित्य की अवधारणा को भी पुष्ट करनेवाला है।

डॉ. डी.विजय भास्कर के नाटक उनकी गहन जीवनासक्ति के सूचक हैं। इन नाटकों में नाटककार ने जनसामान्य के हर्ष और विषाद को सघन संवेदनशीलता के साथ समाविष्ट किया है। वस्तुविन्यास, शीलनिरूपण और फलश्रुति के साथ साथ तकनीक की दृष्टि से भी नाटककार विजय भास्कर की नाट्यकृतियों को तेलुगु नाटक के इतिहास में नए उन्मेष का प्रतीक माना जाता है। इसके मूल में नाटक विधा के प्रति नाटककार के एकनिष्ठ समर्पण की विद्यमानता दिखाई देती है। नाट्यशास्त्र और रंगमंच की बारीकियों से परिचित विजय भास्कर पढ़े जाने के लिए नहीं, खेले जाने के लिए नाटक लिखते हैं। एक सफल संप्रेषक के रूप में वे सदा अपने प्रेक्षक को ध्यान में रखते हैं। नाटक के लिए नाटक नहीं, प्रेक्षक के लिए नाटक लिखनेवाले इस नाटककार ने मुख्यतः समकालीन समाज की समस्याओं और विडंबनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया है तथा समस्या चित्रण से आगे जाकर बहुत सहज भाव से समाधान प्रस्तुत करने का भी साहस किया है। 

अपनी उर्वर कल्पना शक्ति के बल पर डॉ. विजय भास्कर यथार्थ और स्वप्न का प्रायः इतना सुंदर जादुई घोल तैयार करते हैं कि दर्शक कुछ समय के लिए एक आभासी दुनिया में तैरने लगता है और जब वह वापस अपनी दुनिया में लौटता है तो नाट्य जगत के इस यथार्थ से कुछ न कुछ ऊर्जा और प्रेरणा लेकर ही लौटता है। ‘गांधी जयंती’ इस दृष्टि से अत्यंत सफल फैंटेसी नाटक है। इसमें आरंभ से अंत तक अविश्वसनीयता और नाटकीयता के बावजूद इतनी यथार्थपरकता है कि दर्शक को पूरी की पूरी फैंटेसी विश्वसनीय लगने लगती है - चाहे वह यमलोक हो या मर्त्य लोक। ‘मिनिस्टर’ में भी मृत्यु का साक्षात दिखाई देना, तीन महीने की अतिरिक्त अवधि प्रदान करना और अंततः हृदय परिवर्तन के बाद दीर्घायु देना भले ही किसी महास्वप्न जैसा हो लेकिन इस महास्वप्न में राजनीति का जो यथार्थ दिखाई देता है, रक्त संबंधों के प्रति जो मोहभंग घटित होता है और मानवीय संबंधों की जिस गहराई का बोध होता है, वह सब हमारे चारों ओर का ठोस सच है। ऐसा ठोस सच जिसे भारतीय लोकतंत्र में साधारण नागरिक क्षण क्षण झेल रहा है।

उत्तर आधुनिक कलादृष्टि किसी भी कृति को पाठ के रूप में स्वीकार करती है और यह मानती है कि उसके एकाधिक उपपाठ या अंतर्पाठ हो सकते हैं। यह दृष्टि यह भी मानती है कि कृति का एक स्थगित पाठ भी होता है। ‘बादलों के चित्र’ ऐसा ही प्रयोगशील नाटक है। नाटककार एक सूत्रधार और नट-नटी के माध्यम से मंच पर मूकाभिनय प्रस्तुत करता है और अलग अलग दर्शक उसकी अलग अलग व्याख्याएँ उपपाठों की तरह प्रस्तुत करते हैं। स्त्री विमर्श पर केंद्रित यह नाटक दहेज की समस्या, संपत्ति में स्त्री के अधिकार की समस्या और संतति तथा नियोग से संबंधित समस्या को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। हर स्थिति में औरत को सताया और जलाया जाता है; और एक प्रेक्षक चीख उठता है - इस तरह औरतों को सताकर जला डालने के नाटक मत खेलो। इसे नाटक की सफलता मानते हुए सूत्रधार प्रसन्न होता है लेकिन नाटककार अब तक के एक स्थगित पाठ को यहाँ प्रस्तुत करता है - स्त्री के सशक्तीकरण का पाठ; पुरुष वर्चस्व ने आज तक जिसे अनुपस्थित रखा। यहाँ नाटककार मिथक का सहारा लेता है। औरत छटपटाकर काली का सा भयंकर रूप धारण कर लेती है और आगे जो कुछ होता है वह इस सूक्ति के माध्यम से फलागम को प्राप्त करता है - स्त्री जब तक बकरे की तरह सब कुछ सहती रहेगी, यह अत्याचार बंद नहीं होगा इसीलिए अपनी समस्या को सुलझाने के लिए, अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए स्त्री को साँप की तरह फुफकारना पड़ेगा, बाघ की तरह पंजा मारना पड़ेगा, जरूरत पड़ने पर काली का रूप लेना पड़ेगा।

अपने अभिप्राय को संप्रेषित करने के लिए नाटककार डी.विजय भास्कर कई तरह की संप्रेषण युक्तियों का सफल प्रयोग करते हैं। फैंटेसी, सूक्तिगठन और मिथक के अलावा उनकी सबसे प्रिय संप्रेषणयुक्ति प्रतीकवत्ता, ध्वन्यात्मकता, व्यंजनाशक्ति अथवा व्यंग्य के मारक प्रयोग में निहित है। मुहावरों, लोकोक्तियों और सूक्तियों की तर्ज पर नाटककार ने ऐसी अनेक व्यंग्योक्तियाँ गढ़ी हैं जिनका कटाक्ष त्रासद हँसी के रूप में प्रतिफलित होता हुआ दर्शक की चेतना को झकझोर डालता है। सभी नाटकों में किसी एक स्थल पर भाषण की प्रोक्ति का भी प्रयोग किया गया है, लेकिन उसके लिए ऐसे स्थल का चयन किया गया है कि घटनाओं के तनाव से उत्पन्न वातावरण में ये भाषण तनिक भी बोझिल प्रतीत नहीं होते और नाटककार सहजता से अपने अभिप्रेत को प्रेक्षक के मस्तिष्क में बोने में सफल हो जाता है। अन्य नाटकों की तरह ‘कुर्सी’ में भी इन सभी युक्तियों का अत्यंत सटीक निर्वाह हुआ है। दलित विमर्श पर केंद्रित इस नाटक में सामाजिक न्याय और मानव अधिकार हनन की भीषण स्थितियों का अंकन दिल दहला देने वाला है। वर्चस्व की इस लड़ाई में कुर्सी का प्रयोग प्रतीक की तरह किया गया है - नाटक के अंत में भीमैया का भाषण दलित आंदोलन की सही दिशा निर्धारित करता है। इस नाटक के अंत में पात्र परिचय की शैली भी ध्यान खींचती है। जनतंत्र के मंदिर में दलितों के अधिकारों का राज्याभिषेक लेखक की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का द्योतक है।

बोधकथा और फैंटेसी का अत्यंत रोचक इस्तेमाल इस संग्रह के अंतिम नाटक ‘जिंदगी का खेल’ में द्रष्टव्य है। बात शुरू तो होती है गधे, कुत्ते और बंदर के अपनी अपनी उम्र के बीस बीस साल मनुष्य को देने से; लेकिन आगे जब इसके परिणामों का खुलासा होता है तो नाटक वृद्धावस्था पर एक अत्यंत गंभीर विमर्श में बदल जाता है। हमारे समय की अत्यंत ज्वलंत समस्या है वृद्धों का पुनर्वास। भविष्य में इसके और जटिल होते जाने की संभावनाएँ हैं। लेखक ने इसका समाधान प्रकृति, समाज और व्यक्ति के सामंजस्य में खोजने का प्रयास किया है जो उच्च जीवन मूल्यों के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक है। मनुष्य के भीतर निहित देवत्व की संभावनाओं में नाटककार का विश्वास अन्य नाटकों में भी बार बार व्यंजित हुआ है जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी पराजित न होने वाली सदाशयता और जिजीविषा का चितेरा बनाने के लिए पर्याप्त है।

अनुवादक आर. शांता सुंदरी ने यथासंभव लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुरूप भाषांतरण में सफलता प्राप्त की है। इस हेतु वे विशेष साधुवाद की अधिकारी हैं। इसमें संदेह नहीं है कि डॉ. डी. विजय भास्कर की नाट्य कृतियों के इस अनुवाद से भारतीय साहित्य संपन्नतर हुआ है।

शुभकामनाओं सहित।

22 फरवरी, 2011 

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

ब्लागर -सर्वे : सहयोग का अनुरोध

कुमार लव द्वारा ब्लागरों के संबंध में एक सर्वेक्षण किया जा रहा है.
इस विषय में प्राप्त उनकी अपील सहयोग के अनुरोध के साथ यहाँ प्रकाशित की जा रही है.
सभी ब्लॉगर मित्र सहयोग करने की कृपा करें.
(ऋषभ)




Hi,

I am doing a study to understand what are the different skills that Indian bloggers have developed to participate in the new media revolution. Since no such study has been carried out so far, I hope this would help educators who are preparing students to enter into the world soon as well.

Also, it would let us appreciate the differences in a Hindi blogger and a blogger who blogs in English.

Please help us in the endeavor by filling the survey:


It will take about 10 minutes, and is completely anonymous.

Thanks a lot for your participation (in anticipation). I would share the results of this study with you before I publish it anywhere, by the end of April.

Regards
Luv 

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

'धरती का विलाप':पर्यावरण विमर्श



भूमिका
डॉ. पी. विजय लक्ष्मी पंडित तेलुगु की प्रतिष्ठित समकालीन कवयित्री हैं. उन्हें अपने सामाजिक सरोकारों के लिए ख़ास तौर पर जाना जाता है. 'धरती का विलाप' उनकी चर्चित लंबी कविता है. जो मनुष्य को पृथ्वी की ओर से संबोधन के रूप में लिखी गई है. इस कविता की उपलब्धि आधुनिक मनुष्य को उसके द्वारा प्रकृति के अविवेकपूर्ण दोहन के दुष्परिणामों के सम्बन्ध में चेतावनी देने में निहित है. इसके लिए कवयित्री ने पौराणिक ढंग की फैंटेसी की रचना की है. भारतीय यह मानते हैं कि जब पृथ्वी राक्षसों के अत्याचारों से त्रस्त हो जाती है तो वह गाय अथवा स्त्री का रूप धारण करके भगवान् विष्णु के समक्ष प्रार्थना करती है और तब भगवान् विष्णु अवतार धारण करके भू भार का हरण करते हैं. डॉ. विजय लक्ष्मी पंडित ने भी पृथ्वी का मानवीकरण किया है परन्तु उनकी पृथ्वी किसी भगवान् के समक्ष नहीं बल्कि अपनी संतान अर्थात मनुष्य के समक्ष उपस्थित होती है और उसके हाथों हुई अपनी दुर्दशा का बखान करती है. सही भी है यदि मनुष्य पृथ्वी और उसके परिवेश के साथ मनमाना आचरण करने से बाज़ नहीं आया तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व को संभव बनाने वाले सभी तत्व इस हद तक विकृत हो जायेंगे कि प्रलय को घटित होने से नहीं रोका जा सकेगा. परन्तु इस कविता की ख़ास बात यह है कि पौराणिक फैंटेसी रचते हुए भी कवयित्री ने अवतार और प्रलय जैसे रूपकों का प्रयोग नहीं किया बल्कि पृथ्वी की पीड़ा को सीधे सीधे वैज्ञानिक तथ्यों की सहायता से उजागर करने का प्रयास किया है. इससे कविता थोड़ी सपाट ज़रूर हो गई है लेकिन उसका विचार पक्ष सदृढ़ भी हुआ है.

कवयित्री ने यह दर्शाया है कि रसवंती, गंधवती और रत्नगर्भा पृथ्वी अब इतनी जीर्ण शीर्ण और जर्जर हो गई है कि उसका शरीर कोटर के समान प्रतीत होता है. ऐसा उसके पुत्र मनुष्य की प्रकृति पर अधिकार पाने की अबाध आकांक्षा के कारण हुआ है जिसने नैसर्गिक सहअस्तित्व की उपेक्षा करके प्रकृति के सभी तत्वों का अंधाधुंध शोषण किया है. पृथ्वी मनुष्य को याद दिलाती है कि उसने तथाकथित प्रगति चक्र को तीव्रता से दौडाने के निमित्त प्रकृति चक्र को खंडित करते हुए वनस्पति और जीवधारियों का नाश करके पूरे वातावरण को विष वायु से भर डाला है. धरती के पर्यावरण के गरम होते जाने को कवयित्री ने मनुष्य द्वारा प्रकृतिमाता, पृथ्वीमाता,वृक्षमाता और नदीमाता के प्रति अवज्ञा का परिणाम माना है. उन्होंने लाभ और लोभ के लिए प्रकृति-चक्र का अतिक्रमण करने वाली मनुष्य जाति को कसाई की संज्ञा दी है. जिसके कुकृत्यों के कारण अन्नपूर्णा दरिद्र हो गयी है, तालाबों का जल वाष्प बन गया है, आकाश गर्म हवाओं से भर उठा है तथा पृथ्वी की साड़ी जैसी ओज़ोन पर्त में छेद हो गए हैं. इसके अलावा कवयित्री ने विस्तार से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया,भूकंप,ज्वालामुखी तथा ध्वनि प्रदूषण के परिणामों से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य भी प्रस्तुत किये हैं और यह भी दर्शाया है कि अणुशक्ति के विस्फोट से उत्पन्न विकिरण किस प्रकार पर्यावरण को हानि पहुंचाता है.

कवयित्री ने 'धरती का विलाप' के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि पृथ्वी का इतिहास ही मनुष्य का इतिहास है. अतः पृथ्वी और उसके पर्यावरण को प्रदूषित करके मनुष्य स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित कर रहा है. यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले इन सारे खतरों के बारे में सूचना देते रहना या सावधान करते रहना भर ही क्या कविता का प्रयोजन है. कविता का प्रयोजन यदि इतना ही है तो यह काम तो मौसम विभाग करता ही रहता है. इसलिए मौसम की भविष्यवाणी करने और चेतावनी देने से आगे बढ़कर कवयित्री ने मनुष्य जाति के समक्ष उपस्थित संभावित प्रलय से बचने का मार्ग भी सुझाया है. यह मार्ग है प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने का मार्ग. दरअसल भौतिक उपलब्धियों की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के सौंदर्य को देखना ही बंद कर दिया है. पृथ्वी आज उससे इतना भर चाहती है कि वह खुली आँखों से और खुले मन से सृष्टि के सौंदर्य का आस्वादन करे, उसके साथ आत्मीयता का अनुभव करे, अस्तित्वगत रिश्ते को महसूस करे और चेतना के स्तर पर संपूर्ण सृष्टि की पारस्परिकता की अनुभूति उपलब्ध करे. बहते हुए झरने, खिलते हुए फूल, उड़ती हुई तितलियाँ, गुनगुनाते हुए भंवरे और सूर्य की परिक्रमा करती हुई धरती के सौंदर्य का संवेदनशीलता के साथ साक्षात्कार करके मनुष्य मिट्टी की अनंत उर्वरता और प्रकृति की विविध शक्तियों के रहस्य को समझ सकता है. यह समझ उसके भीतर इस बोध को जगाएगी कि केवल धर्म ही अपनी रक्षा करने वाले की रक्षा नहीं करता, पृथ्वी और प्रकृति भी अपने रक्षक की रक्षा करती हैं. यदि मनुष्य पृथ्वी और उसके पर्यावरण की रक्षा करेगा तो पृथ्वी भी उसकी रक्षा करेगी. इसलिए प्रकृति में जो वनस्पतियों और जीवधारियों की विविधता है उसके मूल में निहित अस्तित्व की परस्पर निर्भरता के रहस्य को समझकर इस विविधता की रक्षा करना ही आज के मनुष्य का धर्म है. अन्यथा केवल वन और वन्यप्राणी ही नष्ट नहीं होंगे, प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाने से मनुष्य भी नष्ट हो जाएगा . 

कवयित्री डॉ.विजय लक्ष्मी पंडित स्वयं वनस्पति विज्ञान की गंभीर अध्येता रही हैं. वे धरती और मनुष्य के बिगड़े हुए सम्बन्ध के प्रति चिंतित अवश्य हैं लेकिन निराश नहीं है. धरती के सपने के रूप में कवयित्री का अपना सपना इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है - 
"सपने देख रही हूँ मैं
कि मेरे वत्स सभी
संग्रामों से रहित जगत में
हाथों में हाथ डाले
खेलते-कूदते
दौड़ पड़ती नदियों से
हरे भरे जंगलों से
शोभायमान गाँवों से
गगनचुम्बी सगर्व
ऊंचे उठे नगरों से.
सबके दिल सदा
प्रेम, भ्रातृत्व, समरसता से भरे रहें
इस धरा की गोद में सभी
प्रसन्न मन से
शान्ति-गीत का आलाप करें.
ऐसे सुदिन कब आएँगे ?
- कहते कहते
भूमाता का कंठ
दुःख से गद्गद हो गया."
डॉ.पी विजयलक्ष्मी पंडित की यह कविता इस प्रकार पर्यावरण विमर्श की प्रतिनिधि समसामयिक तेलुगु कविता के रूप में सामने आती है. डॉ. एम. रंगय्या ने इसका अनुवाद भी अत्यंत मनोयोगपूर्वक किया है तथा मूल रचना के सन्देश को अविकृत रूप में हिंदी पाठक तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है. आशा है हिंदी काव्य जगत में पर्यावरण संरक्षण पर केन्द्रित इस प्रयोजनपरक कविता को यथेष्ट सम्मान प्राप्त होगा.

शुभकामनाओं सहित. 

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

राज्य बहुसंस्कृतिवाद की विफलता......

हैदराबाद, २० फ़रवरी २०१० :

'हिंदी भारत' चर्चा समूह के चिंतनशील वरिष्ठ सदस्य चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, अनूप भार्गव, अनिल जनविजय और सत्यनारायण शर्मा 'कमल' ने 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक  राधश्याम शुक्ल के आलेख  'राज्य बहुसंस्कृतिवाद की विफलता पर छिड़ी बहस' पर गत सप्ताह जो बहु-आयामी विचार-विमर्श किया, उसे 'स्वतंत्र वार्ता' ने आज सम्मानपूर्वक प्रकाशित किया है. वैसे विमर्श अभी चालू है; और स्वयं डॉ.राधेश्याम शुक्ल का एक और आलेख (पिछले आलेख की शृंखला  में) सामने आया है. उसे भी देखा जाएगा. लेकिन पहले इसे देखते चलें.........