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रविवार, 27 सितंबर 2009

लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी देवोपम व्यक्तित्व के धनी थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी आकाशधर्मी आचार्य थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्येतिहास की दूसरी परंपरा के प्रवर्तक थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सांस्कृतिक इतिहास की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कालजयी उपन्यासकार थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी मनुष्य की जययात्रा में आस्थावान अनन्य ललित निबंधकार थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सम्मोहन डालने वाले प्रभावशाली वक्ता थे।

ऐसे और भी अनेक निष्कर्ष आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और उनके साहित्य के संबंध में हमें उपलब्ध हैं और उनके शताब्दी वर्ष में इनकी बार-बार पुष्टि भी हुई है। इन निष्कर्षों में हम एक और निष्कर्ष जोड़ सकते हैं कि पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी इतिहास, मनुष्य और लोक को केंद्र में रखकर भारत की भाषा समस्या पर मौलिक चिंतन करने वाले लोकवादी भाषा चिंतक और भाषा नियोजक भी थे। द्विवेदी जी का यह भाषा-चिंतक रूप उनके कतिपय भाषणों, निबंधों तथा पं. बनारसी दास चतुर्वेदी के नाम लिखे ढेर सारे पत्रों में उभर कर सामने आया है।

भाषा का मूलभूत प्रयोजन है संप्रेषण। द्विवेदी जी यहीं से भाषा की चर्चा आरंभ करते हैं कि एक मन के भाव को दूसरे तक संप्रेषित करना वस्तुतः भाषा का उद्देश्य है। उनकी दृष्टि में भाषा द्वारा दो प्रकार के संप्रेषण होते हैं : एक तो सूचनात्मक संप्रेषण है जिसमें हम श्रोता के चित्त में किसी बात की सूचना का संचार करते हैं और दूसरा रचनात्मक संप्रेषण होता है, जो श्रोता के चित्त में गाढ़ अनुभूति द्वारा जगाई गई संवेदनाओं को मूर्त और अनुभव योग्य बनाता है। उनकी दृढ़ मान्यता है कि वस्तुतः इस दूसरी श्रेणी के संप्रेषण को ही सही अर्थों में संप्रेषण कहा जाता है तथा जब हम साहित्य की संप्रेषणीयता पर विचार करते हैं तब हम इस दूसरी श्रेणी के संप्रेषण पर ही बल देते हैं। द्विवेदी जी आगे स्पष्ट करते हैं कि सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण। ऐसा क्यों होता है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए वे शब्द और अर्थ के संबंध तथा सामान्य भाषा और साहित्य भाषा के अंतर की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए बताते हैं कि ऐसा इसलिए होता है कि (सामान्य) भाषा साधारणतः शब्दों के सामान्य अर्थ का ही कारबार करती है। प्रत्येक शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त करता है, वह सामान्य अर्थ होता है। परंतु संवेदनशील रचनात्मक साहित्यकार, सामान्य अर्थों से संतुष्ट नहीं होता। वह सामान्य अर्थों को व्यक्त करने वाली भाषा के माध्यम से ही अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लोकचित्त में संप्रेषित करने के लिए व्याकुल रहता है।

इसी संदर्भ में भाषा व्यवस्था की समरूपता और भाषा व्यवहार की विषमरूपता पर भी उनके विचार द्रष्टव्य हैं। भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है।” (डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१)।

द्विवेदी जी मानते हैं कि हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी। वस्तुतः यहाँ आचार्य द्विवेदी ने भाषा व्यवस्थाऔर भाषा व्यवहारकी संकल्पनाओं के द्वैतवाद की व्याख्या की है और निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया है कि भाषा हमारी सामान्य अंतर्वैयक्तिक उपलब्धियों के गांभीर्य और प्रसार का पता बताती है। वे निरंतर परिवर्तनशील और परिवर्धमान इन उपलब्धियों के लिखित रूप को ही सामान्य रूप से साहित्यकहते हैं। अन्यत्र उन्होंने वाक्और अर्थकी पारस्परिकता तथा प्रतीक के रूप में शब्द चयन की यादृच्छिकताकी अत्यंत सरल ढंग से व्याख्या करते हुए कहा है कि शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। इसके लिए वे कागजी मुद्रा का दृष्टांत देते हुए बताते हैं कि रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।द्विवेदी जी द्वारा गढ़े गए रुपए के इस रूपक के संबंध में डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने बताया है किप्रमुख अर्थशास्त्री टाल्कट पार्सन्स (१९५४) के अनुसार कागजी नोट एक विशिष्ट भाषा रूप है,आर्थिक व्यापार एक विशेष प्रकार का वार्तालाप एवं संचार है, पैसे का वितरण विशिष्ट कोटि का संप्रेषण है और संपूर्ण अर्थतंत्र भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था के समरूप है। पार्सन्स यह मानते हैं कि रुपए के नोट तथा भाषा में समानता का आधार उसके व्यवहारकर्ता के अंतर्वैयक्तिक संबंधों की समानधर्मी प्रकृति है जिस तथ्य की ओर द्विवेदी जी बार-बार संकेत करते हैं।

यहाँ स्मरणीय है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य और भाषाविषयक चिंतन के कद्र में परंपरा और इतिहासबोध अवस्थित है। उन्होंने परंपरा और इतिहास-बोध की सहायता से समसामयिक भाषा-समस्या को भी सुलझाने के सूत्र अपने निबंधों में दिए हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी के सार्वदेशिक या अखिल भारतीय महत्व की व्याख्या करने के लिए हिंदी तथा अन्य भाषाएँशीर्षक निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विस्तार से उन सभी विषयों पर प्रकाश डाला है; जिन पर विचार करना भाषा-नियोजन की आधारभूत आवश्यकता है - यथा, १. हिंदी का संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं से संबंध, २. हिंदी का हिंदीतर प्रदेशों की आधुनिक भाषाओं के साथ संबंध, ३. हिंदी का उसकी जनपदीय बोलियों के साथ संबंध, ४. हिंदी का उर्दू के साथ संबंध और ५. हिंदी और अंग्रेजी का संबंध।

इसी प्रकार नई समस्याएँशीर्षक निबंध में भी संस्कृत और हिंदी भाषा के परस्पर संबंधों के सांस्कृतिक एवं जातीय आधार को विशेषतः रेखांकित किया गया है। साथ ही हिंदी और उसकी जनपदीय बोलियों के संबंध तथा हिंदी और उर्दू के संबंध के विविध पहलुओं की भी पड़ताल की गई है। द्विवेदी जी भाषा की जोड़ने के साथ-साथ तोड़ने की ताकत से भी भली प्रकार परिचित थे। इसीलिए भाषा नियोजकों को उन्होंने आगाह किया है कि इन समस्याओं पर अगर हमने तत्काल ध्यान नहीं दिया तो नाना प्रकार की जातियों-उपजातियों में विभक्त संप्रदायों और पन्थों में उद्भ्रांत और शतछिद्र हमारे देश के कलशको ये और भी क्षत-विक्षत कर देंगी। ..... और हम देख रहे हैं कि भाषा नीति विषयक अनिश्चय की परिणति आज भारतीय लोकतंत्र की अराजकता के विकराल रूप में हमारे सामने उपस्थित है और नए सिरे से भाषाई विद्वेष की चिंगारियाँ सुलगने लगी हैं!

वर्तमान परिस्थितियों में, क्षेत्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं के विशेष संदर्भ में,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि आखिर इस गरीब देश में आप कितने विश्वविद्यालय और कितने हाइकोर्ट चलाएँगे? एक-एक जिले का दावा अलग-अलग हो सकता है।उन्होंने खासतौर से विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच चलने वाली राजनैतिक खींचतान के साथ-साथ हिंदी की सहयोगी आधारभूत बोलियों के संघर्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए व्यंग्यपूर्वक कहा है कि मैथिली मातृभाषियों की तरह वे भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकते हैं। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेर मतलब कबीर से है, आदि।इस प्रकार के तर्क प्रस्तुत करते समय हमारा ध्यान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन भाषणों की ओर जाना चाहिए जिनमें उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के संबंध में निर्णय लेते समय हमें संकीर्ण स्वार्थों से बचना होगा। पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी ध्यान दिलाते हैं कि यदि हमारे तर्कों और युक्तियों के मूल में कोई संकीर्ण स्वार्थ है या व्यक्तिगत रुचि-अरुचि का प्राबल्य है तो निष्कर्ष दोषयुक्त होगा।

द्विवेदी जी ने व्यापक दृष्टि से बहुभाषिकता के प्रश्न पर तटस्थ भाषावैज्ञानिक की तरह चिंतन करते हुए कहा है कि नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। इस मिथ का निराकरण करते हुए वे याद दिलाते हैं कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही रही है। द्विवेदी जी के इस मत से सहमत न होने का कोई कारण नहीं है कि यह भाषा संस्कृत थी। वे याद दिलाते हैं कि भारतवर्ष का जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ उत्तम है, जो कुछ रक्षणीय है, वह इस भाषा के भंडार में संचित किया गया है। फिर भी भाषा की समस्या इस देश में कभी उठी ही नहीं हो, सो बात नहीं है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने संस्कृत के एकाधिपत्य को अस्वीकार किया था, उन्होंने लोकभाषा को आश्रय करके अपने उपदेश प्रचार किए थे। इसकी व्याख्या द्विवेदी जी भाषा को जनपदसुखबोध्य बनाने के प्रयास के रूप में करते हैं क्योंकि भाषा का चरम उद्देश्य तो सहज संप्रेषण है, पांडित्य प्रदर्शन नहीं। उनकी यह उक्ति ध्यान देने योग्य है कि मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।

आगे चलकर भारतीय भाषाओं का सामना एकदम नई परिस्थिति से हुआ। इसे भाषा-त्रैत कहा जा सकता है, क्योंकि कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।द्विवेदी जी ने बलपूर्वक दुहराया है कि हृदय की भाषा बराबर किसी-न-किसी रूप में देशी भाषाएँ रही हैं। इस सूत्र को भारत के भाषा-नीति-निर्धारकों को ध्यान में रखना चाहिए। द्विवेदी जी यह भी याद दिलाते है कि सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।

द्विवेदी जी ने संपर्क भाषा/राजभाषा/राष्ट्रभाषा के वांछित गुणों की चर्चा करते हुए कहा है कि हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी। यहाँ जब द्विवेदी जी प्राचीन और नवीन की बात करते हैं तो प्रकारांतर से वे समाजभाषाविज्ञान की जीवंत भाषा की अवधारणा की पुष्ट करने के साथ-साथ हिंदी के आधुनिकीकरण, मानकीकरण और पारिभाषिक शब्दावली के स्थिरीकरण की आवश्यकता का भी समर्थन करते हैं। वे जब यह याद दिलाते हैं कि वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना हैतथा हमें ऐसी भाषा का सहारा लेना है जो इन बोलियों से समता रखती होतो सीधे सीधे उनका इशारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३५१ में प्रतिपादित हिंदी के विकास संबंधी निर्देशों की ओर है। निःसंदेहद्विवेदी जी एक सतर्क भाषा नियोजक थे। अतः उनका स्पष्ट निर्देश है कि केंद्रीय भाषा के रूप में हिंदी के प्रति श्रद्धा-भाव और अपनी-अपनी बोलियों के प्रति अनुराग दोनों बातें आवश्यक हैं। यह आवश्यक है कि केंद्रीय भाषा हिंदी इन बोलियों के नजदीक आए।डॉ.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने सप्रमाण यह दिखाया है कि भाषा-नियोजन के संबंध में द्विवेदी जी की दृष्टि अत्यंत व्यापक है। वेइतिहासऔर मनुष्यको सारे भाषा-नियोजन का आधार बनाना चाहते हैं। इस संबंध में उनकी दो स्पष्ट मान्यताएँ हैं :-

१. अपने देश की भाषा और साहित्य-विषयक नीति स्थिर करते समय हमें अपने देश के विशाल इतिहास को याद रखना होगा।

२. मनुष्य को चरम लक्ष्य मानकर तथा उसके सुख-दुःख का विचार करके हमें अपनी भाषा विषयक नीति स्थिर करनी चाहिए।

इसी प्रकार भाषा, साहित्य और देशतथा मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य हैमें व्याख्यायित हिंदी भाषा के संदर्भ में भी उनके दो मुख्य वक्तव्य सदा ध्यान में रखने योग्य हैं :-

१. हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।

२. हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।

द्विवेदी जी हिंदी को मनोवृत्ति प्रधान भाषा मानते हैं। उनके अनुसार इसी मनोवृत्ति के आधार पर सभी हिंदी भाषियों के अंतस में यह बात जमी हुई है कि हिंदी वह भाषा है जिसमें कबीर, तुलसी, मीरा आदि ने कविता लिखी थी। वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है,अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।

द्विवेदी जी मानते हैं कि प्रत्येक मातृभाषी को अपनी भाषा को विकसित करने का अधिकार है, पर इसके साथ हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि भाषा हमारे भावी महालक्ष्य की पूर्ति का साधन है। हमें ऐसी भाषा बनानी चाहिए जिसके द्वारा हम अधिक से अधिक व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षुधा निवृत्ति का संदेश दे सकें। स्मरण रहे किहिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।” (र ना श्री)। इसीलिए द्विवेदी जी जहाँ यह मानते हैं कि हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है;वहीं इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि समाज के नाना स्तरों के लिए अलग-अलग ढंग की भाषा होगी तथा नाना उद्देश्यों की सिद्धि के लिए नाना भाँति के प्रयत्न करने होंगे। इसका अर्थ है भाषा को प्रयोजनीयता से जोड़ना। अर्थात यहाँ द्विवेदी जी ने विविध ज्ञान क्षेत्रों और प्रयोजनों के अनुरूप हिंदी की विविध प्रयुक्तियों-उपप्रयुक्तियों के विकास की आवश्यकता का प्रतिपादन किया है।

जहाँ साहित्य भाषा के विषय में उनकी धारणा है कि रचनात्मक साहित्य लोकचित्त को नए संदर्भ में नई ग्राहिका शक्ति देता है, इसलिए वह सामान्य भाषा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली साधन होता है; वहीं वे रोजगारमूलक प्रयोजनपरक भाषा के बारे में भी सजग हैं। यथा, “भाषा को ही लीजिए। मनुष्य अपने आहार और निद्रा के साधनों को जुटाने के लिए जिस भाषा का व्यवहार करता है, वह उनकी अनायासलब्ध भाषा है; परंतु यदि उसे इस धरातल से ऊपर उठाना है तो उतने से काम नहीं चलेगा। सहज भाषा आवश्यक है। पर सहज भाषा का मतलब है सहज ही महान् बनाने वाली भाषा, रास्ते में बटोरकर संग्रह की हुई भाषा नहीं।कहना न होगा कि पारिभाषिक शब्दावली का निर्धारण करते समय उनके इस सूत्र पर ध्यान देना जरूरी है अन्यथा वह सचमुच ही रास्ते से बटोरकर संग्रह की हुई भाषा बनकर रह जाएगी जिसकी स्वीकार्यता प्रमाणित न हो पाने के कारण उसे अव्यावहारिक और अप्रयुक्त बनकर ही रहना पड़ सकता है। द्विवेदी जी ने यह भी ध्यान दिलाया है कि सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।वे हिंदी को सार्वदेशिक सहजता प्रदान करना चाहते हैं और उसके साहित्य को भी अखिल भारतीयता से मंडित देखना चाहते हैं, “एक साहित्य बनाइए। गलतफहमी दूर कीजिए। ऐसा कीजिए कि एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय को समझ सके। एक धर्मवाले दूसरे धर्मवालों की कदर कर सकें। एक प्रदेशवाले दूसरे प्रदेशवाले के अंतर में प्रवेश कर सकें। ऐसा कीजिए कि इस सामान्य माध्यम के द्वारा आप सारे देश में एक आशा, एक उमंग और एक उत्साह भर सकें। और फिर ऐसा कीजिए कि हम इस भाषा के जरिए इस देश की और अन्य देशों की, इस काल की और अन्य कालों की समूची ज्ञान-संपत्ति आपस में विनिमय कर सकें।

यहाँ आचार्य द्विवेदी जी की यह प्रसिद्ध उक्ति उद्धृत करना प्रासंगिक होगा कि मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।उन्होंने बार-बार ध्यान दिलाया है कि इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।

कहना न होगा कि आचार्य द्विवेदी ने भाषा को भी मनुष्य की दृष्टि से ही देखने पर बल दिया है। भाषा-संघर्ष का मूल इस दृष्टि की उपेक्षा में निहित है। तभी तो हिंदी और उर्दू की लड़ाई भाषा की लड़ाई कम और भाषाई अस्मिता की लड़ाई अधिक है। इसमें संदेह नहीं कि उर्दू का भाषाशास्त्रीय ढाँचा हिंदी के भाषाशास्त्रीय ढाँचे से अलग नहीं है। इतना ही नहीं, द्विवेदी जी तो यह भी स्वीकारते हैं कि जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।

द्विवेदी जी ने यह प्रश्न भी उठाया है कि यदि उर्दू, हिंदी की एक विशिष्ट शैली है, तो हिंदी साहित्य के इतिहास में तथा पाठ्यक्रम में उसे पूर्ण स्थान क्यों नहीं मिला? उनके अनुसार इसके दो कारण संभव हैं - (एक) उर्दू एक संपूर्ण साहित्य है, (दो) हिंदी के अब तक के स्वीकृत साहित्य के इतिहास से उसका कोई संबंध नहीं रहा है और दोनों अपने-अपने रास्ते बिना एक दूसरे को प्रभावित किए विकसित होते रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ने से ये दोनों धारणाएँ पुष्ट होती हैं। द्विवेदी जी की यह स्थापना भी द्रष्टव्य है कि हिंदी कोकदाचित केवल बाहरी रूप और बनाव सिंगार की प्रवृत्ति की प्रेरणा इस (उर्दू) भाषा से अवश्य मिली है, परंतु वह क्षणिक और अस्थाई ही बनी रही है।दूसरी ओर, “उर्दू अभी तक आत्मकेन्रिेवत भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।परंतु डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का यह कथन भी यहाँ विचारणीय है कि आचार्य द्विवेदी ने जिस उर्दू की बात उठाई है, उसका संबंध मुख्यतः मध्यकालीन काव्य परंपरा से रहा है, उस साहित्य से रहा है जिसे राजशक्ति का संबल मोहग्रस्त करता रहा है, उस काव्य चेतना से रहा है जो अपने प्रेरणा-स्रोत में जनमानस और बोलियों के संयोग को नकारता रहा है। अन्यथा आज लिखे जा रहे उर्दू साहित्य की भाषा-मनोवृत्ति उसे हिंदी के नजदीक ही ला रही है। इसी संभावना को देखते हुए उन्होंने उर्दू-हिंदी के सहज संयोग पर आधारित महाजाति की साहित्य चेतना का पक्ष लेते हुए यह भी कहा है कि उर्दू को हमें संपूर्ण रूप से स्वीकार करना ही होगा।डॉ. श्रीवास्तव ने उर्दू साहित्य की लोक तटस्थ धारा के पुरस्कर्ता सैयद अहमद देहलवी के फ़रंहगे असफ़ियामें व्यक्त इस संकल्प का हवाला दिया है कि हम अपनी जबान को मरहठीबाजों, लवनीबाजों की जबान,धोबियों के खंड, जाहिल ख्यालबंदों के ख़्याल, टेसू के राग यानी बेसरतोपा अल्फ़ाज का मज़बूआ बनाना कभी नहीं चाहते .....। परंतु आधुनिक उर्दू साहित्य की लोकधारा इस फ़तवे की परवाह नहीं करती। बल्कि, “आज वह आलमशाह खानद्वारा राजस्थान की बोलियों, ’राहीके अनुसार अवधी, मेहरुन्निसा परवेज और शानीद्वारा कन्नौजी तथा हबीब तनवीर द्वारा छत्तीसगढ़ी आदि से अपनी साहित्यिक शक्ति और शब्दावली लेने लगी है। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी और उर्दू को एक महाजाति के साहित्य में बाँधनेवाली अगर कोई शक्ति काम कर सकती है तो उसका आधार बनेगी - जनशक्ति, जनपदीय बोलियाँ और इस महाजाति की अपनी सह-अनुभूति। आचार्य द्विवेदी के शब्दों में हिंदी और उर्दू का प्रश्न बहुत दिनों से हमारे देशवासियों के लिए टेढ़ा प्रश्न रहा है। मैं नहीं मानता कि यह प्रश्न अब उतना टेढ़ा रह गया है। परंतु फिर भी कभी-कभी पुराने इतिहास का भूत डराता ही रहता है।

द्विवेदी जी के अनुसार हिंदी की असली शक्ति लोक की शक्ति है। उनका मत है कि हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी,तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।उन्हें विश्वास है कि उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।वे यह भी ध्यान दिलाते हैं कि शायद ही संसार में कोई ऐसी भाषा हो, जिसकी उन्नति में पद-पद पर इतनी बाधा पहुँचाई गई हों, फिर भी जो इस प्रकार अपार शक्ति संचय कर सकी हो। इस शक्ति का रहस्य यह सामाजिक यथार्थ है कि वह करोड़ों नर-नारियों की आशा और आकांक्षा, क्षुधा और पिपासा, धर्म और विज्ञान की भाषा है। इसीलिए द्विवेदी जी के अनुसार, हिंदी की सेवा करने का अर्थ हिंदी की प्रतिमा बनाकर पूजना नहीं बल्कि इस लाक्षणिक प्रयोग का अर्थ है - हिंदी के माध्यम द्वारा समझनेवाली विशाल जनता की सेवा। वे समझाते हैं कि हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।इतना ही नहीं, आचार्य द्विवेदी का यह दृढ़ मत है कि यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो हिंदी-हिंदीचिल्लाना व्यर्थ है।


‘क्षण के घेरे में घिरा नहीं‘ : त्रिलोचन का स्मरण

Swatantra Vaarttha _2/3/2008.

http://sahityakunj.net/LEKHAK/R/Rishabhdeo/kshan_ke_ghere_Trilochan_Pustak_Ch...

अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थलीमुख्य पृष्ठ
02.25.2008
क्षण के घेरे में घिरा नहीं : त्रिलोचन का स्मरण
प्रो.ऋषभदेव शर्मा

पुस्तक : क्षण के घेरे में घिरा नहीं

प्रधान संपादक : देवराज

संपादक : अमन

प्रकाशक : परिलेख प्रकाशन,

मातृ भवन, १७-सावित्री एन्क्लेव,

नजीबाबाद-२४६७६३ (उत्तर प्रदेश)

संस्करण : २००८

मूल्य : पचास रुपए

पृष्ठ संख्या : ६४

कविवर त्रिलोचन शास्त्री ९ दिसंबर, २००७ को ९० वर्ष की आयु में दिवंगत हुए। हिंदी साहित्य जगत की विशिष्ट परंपरा रही है कि यहाँ साहित्यकारों को या तो पुरस्कार-सम्मान आदि मिलने पर याद किया जाता है या दिवंगत होने पर! त्रिलोचन जी के संबंध में भी कैसे चूक हो सकती थी! देश भर की हिंदी पत्रिकाओं ने उन पर श्रद्धांजलि और स्मृति परक आलेख छापे और अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। लेकिन इस सब के बीच एक स्मृति सभा नजीबाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुई जो रस्मी-रवायती न थी। दरअसल त्रिलोचन १९९० में नजीबाबाद में संपन्न माता कुसुमकुमारी हिंदीतर भाषी हिंदी साधक सम्मान समारोह में आए थे और जनपद के साहित्य प्रेमियों के कंठहार बन गए थे। इसीलिए जब उनके निधन का समाचार सुना तो १० दिसंबर को ये तमाम लेखक और साहित्य प्रेमी नजीबाबाद में मध्यकालीन साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ. प्रेमचंद्र जैन के घर पर इकट्ठे हुए और अपने प्रिय कवि त्रिलोचन को टुकड़ों-टुकड़ों में याद किया। इस अवसर पर देश के विविध अंचलों से अलग-अलग साहित्यकारों के संदेश मोबाइल फोन पर संपर्क करके प्राप्त किए गए। तभी यह भी तय किया गया कि इन संदेशों को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा। काम शुरू हो गया और प्रस्तावित पुस्तक केवल संदेशों तक सीमित नहीं रह सकी बल्कि जिन्होंने मोबाइल-सभा में संदेश दिए थे, उन्होंने अच्छे खासे समीक्षात्मक आलेख उपलब्ध करा दिए इसलिए पुस्तक का स्वरूप भी बदल गया और इस तरह एक समीक्षा पुस्तक ही तैयार हो गई। शीर्षक है क्षण के घेरे में घिरा नहीं

क्षण के घेरे में घिरा नहीं‘ (२००८) के प्रधान संपादक हैं मणिपुर विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग के अधिष्ठाता डॉ देवराज और संपादक हैं नजीबाबाद के युवा पत्रकार अमन। पुस्तक विन्यासकी ओर से परिलेख प्रकाशन ने प्रकाशित की है जिसकी परामर्श समिति के संरक्षक डॉ. प्रेमचंद्र जैन है तथा संयोजक हैदराबाद स्थित संस्था विश्वम्भराकी महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी जो विशेष रूप से इस योजना की पूर्ति में सक्रिय रहीं।

पुस्तक में संपादक के पूर्व कथनके अतिरिक्त २६ छोटे-बड़े आलेख हैं, एक साक्षात्कार है, एक रिपोर्ट और पथ पर चलते रहो निरंतरशीर्षक से त्रिलोचन की बारह छोटी-छोटी कविताएँ। कुल मिलाकर त्रिलोचन को समझने-समझाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। पुस्तक की समीक्षात्मक दृष्टि को डा. देवराज के शब्दों के माध्यम से सहज ही पकड़ा जा सकता है। वे बताते हैं त्रिलोचन प्रगतिशील चिंतन की भारतीय परंपरा के प्रमुख लेखकों में से एक होते हुए भी अपने प्राप्य से अधिकतर वंचित रहे। हिंदी कविता में आलोचकों ने उन्हें कभी चर्चा के केंद्र में नहीं आने दिया। उन दिनों तो बिल्कुल नहीं, जब प्रगतिशील विचारधारा का आंदोलन ज्ञात-अज्ञात शक्तियों द्वारा हाशिए की ओर धकेला जा रहा था और उसे त्रिलोचन की ज़रूरत थी। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि हिंदी साहित्य का अध्येता त्रिलोचन की पहचान इस रूप में चिह्नित करता है कि वे हिंदी कविता में अंगरेज़ी छंद सॉनेट को स्थापित करने वाले हैं, कि उन्होंने इस विदेशी छंद को अपने कलात्मक-कौशल से साध कर हिंदी के अन्य जातीय छंदों के समान बना दिया, कि उनके सॉनेट अभिव्यक्ति की सादगी के उदाहरण हैं आदि। सॉनेट और उसकी सादगी के सामने कुछ तथ्यों की जानबूझ कर उपेक्षा की जाती है - जैसे, त्रिलोचन ने हिंदी में निराला की मुक्त छंद की परंपरा को सही रूप में सबके सामने रखा और कविता की मुक्ति तथा मनुष्य की मुक्ति के बीच विद्यमान वास्तविक संबंध को पुनर्प्रस्तुत किया, उन्होंने अपने लेखों में हिंदी आलोचना की कमज़ोरियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उनकी कहानियों में अपने देशकाल की ईमानदार अभिव्यक्ति है, उनके पत्रों में संबंधों को जीने की असाधारण ललक है, वे लोक और शास्त्र का अद्भुत संगम थे आदि। इस तरह त्रिलोचन का सॉनेट साहित्य भाव और भाषा की असाधारण सादगी की भेंट चढ़ जाता है, जिसकी चकाचौंध में सॉनेट के भीतर व्यक्त जीवन संघर्ष अप्रकाशित ही रह जाता है और उनके रचना संसार के शेष पक्ष यों ही परे सरका दिए जाते हैं।

अपने आलेख में वाचस्पति (वाराणसी) ने बड़ी तल्खी से सवाल उठाया है कि पतनशील उच्च और मध्य वर्ग की बाजारवादी मानसिकता को खाद-पानी देने वाले, भ्रष्ट हिंदी और फूहड़ अंग्रेजी के वर्णसंकर दैनिकों में अपना वर्तमान और भविष्य तलाशने वाले बुद्धिबली,निधन के बाद बड़ी शिद्दत से त्रिलोचन जैसे बोली-बानी के अद्भुत संगतराश को आखिर क्यों याद कर रहे हैं? उन्होंने त्रिलोचन की विरासत का विस्तार करने में जनपदीय युवतर कवियों की भागीदारी के प्रति विश्वास भी प्रकट किया है।

नंदकिशोर नवल (पटना) ने त्रिलोचन को क्लासिकी गंभीरता का कवि सिद्ध किया है तो विजेंद्र (जयपुर) ने उन्हें संघर्षशील जनता से जुड़ी कविता रचने वाले जातीय कवि के रूप में देखा है। ऋषभदेव शर्मा ने उनकी विराटता और विलक्षणता का आधार साधारणता को माना है तो कविता वाचक्नवी (हैदराबाद) ने विचारधारा के आधार पर साहित्य और साहित्यकारों को बाँटने वालों की अच्छी खबर ली है और इसे सर्वनाश का द्योतक माना है। त्रिलोचन के पात्रों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने लोक संस्पृक्ति को उनकी कविता की ताकत माना है। ए.अरविंदाक्षन (कोच्चि) ने समन्वय करते हुए लिखा है कि यदि लोक त्रिलोचन का सहज यथार्थ है तो उनकी कविता का अन्वेषित यथार्थ क्लासिकी का है। इसीलिए उन्हें कालिदास से होते हुए त्रिलोचन तुलसी तक की कविता-यात्रा करते दिखाई देते हैं।

हरिपाल त्यागी (दिल्ली) ने त्रिलोचन को उदार भारतीय आत्मा और मानवीय प्रतिभा से संपन्न कवि बताया है जिनकी भाषा का जादू सिर चढ़कर बोलता था। इसी प्रकार बालशौरि रेड्डी (चेन्नई) ने उनकी कविता के प्रगतिशील तत्व को रेखांकित किया है। अर्जुन शतपथी (राउरकेला) के लिए त्रिलोचन क्रांति पुरुष थे तो एम.शेषन (चेन्नई) के लिए वे आधुनिक कविता को समसामयिक भावबोध से संयुक्त कर उसे ऊँचाई प्रदान करने वाले कलमकार थे। ई.विजयलक्ष्मी (इम्फाल) ने अपने आलेख में त्रिलोचन को अनुत्तरित चुनौती का कवि कहा है तो नित्यानंद मैठाणी (लखनऊ) ने उन्हें हिंदी का एक और कबीर माना है। विनोद कुमार मिश्र (ईटानगर) ने त्रिलोचन के व्यक्तित्व और कृतित्व में व्याप्त जिजीविषा की चर्चा की है तो महेश सांख्यधर (बिजनौर) ने अपने आलेख में कहा है कि यदि आप कवि हृदय नहीं हैं तथा आपकी आँख में पानी नहीं है तो आप न कवि त्रिलोचन को समझ सकते हैं न त्रिलोचन की कविता को।

इसी प्रकार गोपाल प्रधान (सिलचर), दिनकर कुमार (गुवाहाटी), शंकरलाल पुरोहित (भुवनेश्वर), नरेंद्र मारवाड़ी (बिजनौर), ऋचा जोशी (मेरठ), अरुणदेव, बलवीर सिह वीर, राजेंद्र त्यागी, पुनीत गोयल, चंचल और अमन (नजीबाबाद) ने भी अपने आलेखों में त्रिलोचन के साहित्य के अलग-अलग आयामों पर संक्षेप में प्रकाश डाला है।

जीवित व्यक्ति ही साहित्य देता हैशीर्षक से वाचस्पति द्वारा १९७० में लिया गया त्रिलोचन जी का साक्षात्कार इस समस्त चर्चा को परिपूर्णता प्रदान करता है। और अंत में हैं त्रिलोचन की कुछ कविताएँ। निस्संदेह समकालीन साहित्य के एक शलाका पुरुष को उसके चाहने वाले लेखकों और पाठकों की ओर से दी गई यह सारस्वत श्रद्धांजलि स्पृहणीय है।


मैं तुम्हारे पास एक तस्वीर छोड़ आया हूँ !

समन्वय पूर्वोत्तर: समीक्षा

शनिवार, 26 सितंबर 2009

आकाशधर्मी आचार्य पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी




आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी (१९०७) का आधुनिक हिन्दी साहित्य में अप्रतिम स्थान है। उन्होंने निबंध, उपन्यास, आलोचना, साहित्येतिहास और काव्य आदि विविध क्षेत्रों में प्रभूत साहित्य सृजन किया तथा साहित्य और संस्कृति चिंतक के रूप में पिछली शताब्दी के उत्तराद्‌र्ध में संपूर्ण हिंदी जगत को प्रभावित और आंदोलित किया। वे जीवन का मर्म समझने और समझाने वाले सूक्तिकार तथा व्याख्याता भी थे। इसके अलावा अध्यापक के रूप में भी उनकी ख्याति साहित्यकार के रूप में ख्याति से किसी भी प्रकार कम नहीं है। वे भव्य और दिव्य गुणों के जीवंत पुंज थे तथा अपने कर्तृत्व और कृतित्व द्वारा उन्होंने मानवीय जिजीविषा के उदात्त स्वरूप की साधना का उदाहरण प्रस्तुत किया।


गत दिनों उनके शताब्दी वर्ष के संदर्भ में देश भर में अनेक चर्चा परिचर्चा और संगोष्ठियाँ आयोजित की गईं। उन पर वृत्त चित्र भी बनाए गए। फिल्मांकन भी किया गया। ऐसी विविध योजनाओं के निकट से जुड़े रहे डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को जन्म शताब्दी वर्ष पर अपनी श्रद्धांजलि ’आकाशधर्मी आचार्य पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी’ शीर्षक पुस्तक के रूप में अर्पित की है। यह पुस्तक संक्षिप्त होते हुए भी द्विवेदी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के सभी आयामों को समेटे हुए है तथा शोधार्थियों से लेकर सामान्य पाठक तक की जिज्ञासा को तुष्ट करने में सक्षम है।।


छोटे-छोटे अध्यायों में लिखी गई यह पुस्तक जीवनी और इतिहास का भी रस देती है तथा आलोचना और मूल्यांकन का तोष भी प्रदान करती है। लेखक की सर्जनात्मकता ने आचार्य को मानो साकार कर दिया है –

’ऊँचा-लंबा कद, गौर दिव्य वर्ण, उज्ज्वल-उन्नत भाल, दाएँ तिर्पक के साथ ऊपर की ओर मुड़े छोटे केश, बड़ी-बड़ी आँखें, उन पर काले फ्रेम का चश्मा, आजानबाहु, लंबी मूँछें, लम्बी नाक, खादी का धोती, कुर्ता और चादर, हाथ में छड़ी तथा सर्वोपरि पान से रंगे होंठों पर सदा खेलती मुस्कान। अपने सामने वाले को एक क्षण में आकृष्ट कर अपने चरणों पर झुकाने वाली भव्य-दिव्य मुद्रा। सभा-गोष्ठी में सबसे ऊँचा, आकर्षक और गौरव-मंडित शिखर व्यक्तित्व।’

लेखक ने अनेक संस्मरणों के सहारे पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवन संघर्ष और जीवनी शक्ति को भली प्रकार उभारा है। इसी संदर्भ में उनका फक्कड़पन भी भली प्रकार आलोकित हो सका है। वे ध्यान दिलाते हैं कि द्विवेदी जीने अपने संपूर्ण लेखन में इस फक्कड़पन को अंतराधारा की तरह निरंतर प्रवाहित रखा है। यही कारण है कि उनके कबीर सिर से पैर तक मस्त मौला है, तो बाणभट्ट घुमक्कड़ और मस्त जीव है। इसी प्रकार सीदी मौला भी फक्कड़ चरित्र है, इतना ही नहीं उनके सभी उपन्यासों के विशिष्ट चरित्रों में यह गुण पाया जाता है। इसका विस्तार संपूर्ण प्रकृति में है।

’यह फक्कड़ाना मस्ती द्विवेदी जी के लिए मानो एक कसौटी हो, जिस पर वे अपने चरित्रों को परख रहे हों। इतना ही नहीं, उनके फूलों और वृक्षों में भी फक्कड़ाना मस्ती है – चाहे वह आशोक हो या कुटज या देवदारु।’।

इसी प्रकार लोक और शास्त्र के संबंध में आचार्य द्विवेदी की दृष्टि की डॉ. बाछोतिया ने कई स्थलों पर अच्छी विवेचना की है और यह दर्शाया है कि उनके लिए लोक जीवन, लोक साहित्य और लोक चरित्र का साहित्य में केंद्रीय महत्व था और शास्त्र से बढ़कर उनके लिए लोक था। अपनी इस लोकचेतना के बल पर ही द्विवेदी जी भारतीय चिंताधारा की उस अविच्छन्न परंपरा को खोज सके। जिसके सहारे उन्होंने संप्रदायवादी और साम्राज्यवादी इतिहास दृष्टि का खंडन किया जो अनजाने ही देश की हिन्दू-मुस्लिम साधारण जनता को विभाजित करने के दुष्चक्र का अंग बन गई थी। पंडित जी ने प्रतिपादित किया है कि भारत में जनता के असंतोष को विद्रोह का रूप देने के लिए वैचारिक और भावनात्मक शक्ति की भूमिका लोकधर्म ने ही निभाई है। यह लोकधर्म उनके इतिहास और आलोचना संबंधी चिंतन से लेकर उपन्यासों और निबंधों तक में व्याप्त है। उनका लोक अत्यंत व्यापक है और मनुष्यता का पर्याय है। मनुष्य और मनुष्यता भी उनके लिए साहित्य का चरम लक्ष्य है। लेखक ने उनकी इस विश्व दृष्टि को भी भली प्रकार उकेरा है।


डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने द्विवेदी जी की विश्व दृष्टि के आधार पर उनकी भाषा विषयक मान्यताओं क भी सुन्दरव्याख्या की है। वे याद दिलाते हैं कि द्विवेदी जी के अनुसार सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है और यह अवस्था अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर महासहज को समर्पण करने में से प्राप्त होती है। उन्होंने द्विवेदी जी के इस प्रसिद्ध उदाहरण की भी चर्चा की है कि

’मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।’ यहाँ प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वह मनुष्य कौन है जिसे द्विवेदी जी साहित्य का केंद्र बनाना चाहते हैं। उत्तर साफ है। नगरों और गाँवों फैला हुआ, सैंकड़ों जातियों और संप्रदायों में विभक्त अशिक्षा और दारिद्र रोग से पीड़ित मानव समाज ही उनका संबोध्य है। वे मानते हैं कि भाषा और साहित्य की समस्या वस्तुतः इसी समाज कि समस्या है। इसलिए भाषा समस्या के समाधान के लिए हमें इसी की ओर देखना होगा- ’शताब्दियों की सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक गुलामी के भार से दबे हुए ये मनुष्य ही भाषा के प्रश्न हैं और संस्कृति तथा साहित्य की कसौटी हैं। जब कभी आप किसी विकट प्रश्न के समाधान का प्रयत्न कर रहे हों, तो इन्हें सीधे देखें। अमेरिका या जापान में ये समस्याएँ कैसे हल हुई हैं, यह कम सोचें; किंतु असल में ये हैं क्या और किस या किन कारणों से ये ऐसे हो गए हैं, इसी को अधिक सोचें।’

इस प्रकार इसमें संदेह नहीं हि लेखक ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व और चिंतन को अत्यंत सजगतापूर्वक सहज भाषा शैली में यथावश्यक उदाहरणों और खुलासों के साथ विवेचित किया है । अतः इस पुस्तक का हिंदी जगत में स्वागत होना स्वाभाविक है।अंत में द्विवेदी जी की प्रसिद्ध कविता ’रजनी-दिन नित्य चला ही किया’ के आरंभिक छंद को प्रस्तुत करते हुए हम अपनी बात पूरी करते हैं –


’रजनी-दिन नित्य चला ही कियामैं अनंत की गोद में खेला हुआ;

चिरकाल न वास कहीं भी कियाआँधी से नित्य धकेला हुआ;

न थका न रुका न हठा न झुका, किसी फक्कड़ बाबा का चेला हुआ:

मद चूता रहा, तन मस्त बना अलबेला मैं ऐसा अकेला हुआ।'

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समीक्षित कृति : आकाशधर्मी आचार्य पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी(व्यक्तित्व एवं कृतित्व)लेखक : डॉ. हीरालाल बाछोतियाप्रथम संस्करण : २००७मूल्य : १४५ रूपये साजिल्दप्रकाशक: किताबघर प्रकाशन,४८५५/२४, दरियागंज,नई दिल्ली-११०००२

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

स्वार्थी पुरुष इसीलिए नारी मुक्ति के विरुद्ध होते हैं


विचारधारा की सर्जनात्मक परिणति `युगनायिका´

हैदराबाद स्थित अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय [इफ्लु] के कुलपति प्रो.अभय मोर्य बहुभाषाविद साहित्यकार हैं। समकालीन भारत के साथ-साथ रूस के इतिहास को उन्होंने भली प्रकार आत्मसात किया है। उन्हें रूसी भाषा एवं साहित्य की अंतरराष्ट्रीय एसोसिएशन द्वारा 1986 में सर्वोच्च सम्मान अलेक्सांद्र पुश्किन मेडल से अलंकृत किया जा चुका है। रूसी साहित्य, तुलनात्मक साहित्य और साहित्य शास्त्र के विद्वान प्रोफेसर अभय मोर्य शिक्षाविद के साथ-साथ एक सहृदय कवि और सोद्देश्य कथाकार भी हैं। उनका अंग्रेजी उपन्यास `फाल ऑफ ए हीरो´ 1998 में प्रकाशित हुआ। `युगनायिका´ शीर्षक से इसकी समानांतर कृति 2004 में हिंदी में सामने आई जिसका दूसरा संस्करण वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ है। इस बीच 2006 में उनका दूसरा उपन्यास `मुक्तिपथ´ भी आ चुका है जो पर्याप्त चर्चित रहा।

`युगनायिका´ (2004, 2008) में लेखक ने मुख्यत: आपात्कालीन भारत की युगीन परिस्थितियों को केंद्र बनाया है। इसके आगे पीछे का समय भी उपन्यास में चित्रित है परंतु वह एक प्रकार से या तो आपात्काल की भूमिका है या उसकी परिणति। कहा जा सकता है कि जिस प्रकार आंचलिक उपन्यास में व्यक्ति के स्थान पर अंचल को नायकत्व प्रदान किया जाता है उसी प्रकार 'युगनायिका' में अभय मोर्य ने युग अथवा काल को नायकत्व प्रदान किया है। यह काल भारतीय लोकतंत्र के स्वप्न के पूरी तरह ध्वस्त होने का काल है। एक राजनैतिक व्यवस्था के क्षेत्र में उत्पन्न निर्वात को भरने के लिए ऐसे में सहज ही दूसरी राजनैतिक व्यवस्था की आवश्यकता प्रतीत होती है। लेखक ने अत्यंत योजनाबद्ध रूप में इस वैकल्पिक व्यवस्था के लिए साम्यवाद या समाजवाद के भारतीय मॉडल को प्रस्तुत किया है। प्रो. मोर्य मार्क्सवादी दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान हैं , इसलिए उनके द्वारा सुझाई गई व्यवस्था के सैद्धांतिक प्रारूप या आदर्श की परिपूर्णता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसके सभी पक्षों पर 'युगनायिका' में अनेक स्थलों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया है, बहस की है, निष्पत्तियाँ दी हैं। इस प्रकार वे मार्क्सवाद को भारतीय संदर्भ में एक आदर्श राजनैतिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह विचारधारा ही प्रकारांतर से नए युग की नायिका है। इसे आदर्श और युटोपियन स्वप्न कहकर नहीं नकारा जा सकता। पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और राजनैतिक मूल्यों के पतन के संदर्भ में यह स्वप्न और आदर्श बहुत प्रासंगिक प्रतीत होता है। परंतु पाठक की दृष्टि से 'युगनायिका' की मुख्य समस्या यह है कि प्रगतिशीलता की यह विचारधारा पूरे उपन्यास में इस तरह सतह से लेकर तल तक छाई हुई है कि अनेक स्थलों पर औपन्यासिकता की क्षति हो गई है । विचारधाराकेंद्रित कथालेखन की यह सबसे नाजुक सीमा है।

विचारधारा को सृजनात्मकता का बाना पहनाने के लिए लेखक ने अमित, सुमित, विवेक, कविता, राजू, कमला और सूर्य जैसे संघर्षशील पात्रों का सृजन किया है जो प्रगतिशील शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिगामी या प्रगतिविरोधी शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले चरित्रों के रूप में महेश , तिवारी, पांडे, नागपाल, साजना और मीनू जैसे पात्र सिरजे गए हैं। काले पात्र पूरी तरह कालिख में रंगे हैं जबकि श्वेत पात्र सफेदी और कालिख के द्वंद्व को झेलने के लिए अभिशप्त हैं। जिन पात्रों की मानसिकता परिपक्व है वे कबीर की तरह इतने जतन से अपनी सफेदी बरकरार रखते हैं कि चाहें तो सगर्व घोषणा कर सकते हैं - दास कबीर जतन करि ओढ़ी , जस की तस धर दीनि चदरिया। लेकिन जहाँ हल्की सी भी फिसलन की संभावना थी वहां लेखक ने दर्शा दिया कि यह चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,ओढ़ के मैली कीनि चदरिया। राजनीति, प्रशासन , न्यायपालिका, व्यापार और धर्म से जुड़ी काली ताकतों ने पिछले 50-60 वर्ष में भारतवर्ष में एक ऐसे अंधकारमय क्रूर तंत्र का निर्माण किया है जिसमें एक बार प्रवेश करने के बाद बेदाग निकल पाना मुश्किल है। इस काजल की कोठरी में सर्वत्र भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। न किसी को देश की परवाह है और न समाज की। न किसी को मूल्यों की आवश्यकता है, न आदर्शों की। पैसे और पद प्रतिष्ठा की अनंत भूख कालव्यापिनी है। ऐसे में प्रगतिशील शक्तियाँ यदि रणनीति के तौर पर यह तय कर लें कि इस तंत्र में भीतर घुसकर इसे खोखला बनाया जाना चाहिए, तो यह बात सुनने में तो बहुत अच्छी लगती है परंतु व्यवहार के स्तर पर ऐसा कर पाना किसी ऐसे ही व्यक्ति के लिए संभव है जिसके पास हनुमान जैसी सत्यनिष्ठा हो जो सुरसा के पेट में घुसकर जीवित वापस निकल आए। पर अमित तो हनुमान नहीं था। मित्रमंडली ने उसे जज बनने से रोका, व्यवस्था की सुरसा के मुँह में प्रवेश करने में रोका, पर वह नहीं रुका। उसके अपने तर्क थे, अपना जोश था, आत्मविश्वास था, पर ये सब तब ढहने लगे जब बेईमानों की दुनिया में ईमानदार आदमी ने अपने बच्चों को हीन भावना से ग्रस्त होते देखा और पांडे तथा नागपाल जैसे राजनीति और न्यायपालिका के धुरंधर खिलाडियों ने आदर्शवादी सिद्धांत को ही ऐसी पटखनी दी कि अमित चारों खाने चित हो गया। मगरमच्छों से छीन कर मछलियों में बाँटने का सिद्धांत अमित को लुभा गया। वैकल्पिक पथ के उसके साथी भी कुछ ननुनच के बाद उसके साथ हो गए। करोड़ों का हेरफेर होने लगा। पहली किस्त छोटी मछलियों के लिए चली गई - मजदूरों के भले के लिए, महिलाओं के भले के लिए। पर उसके बाद इस कीचड़ से निकलने की सदिच्छा के साथ अमित ने संपत्ति का अंबार लगाना शुरू कर दिया, जिसकी परिणति एक झूठ से चलकर अनेक झूठों के रूप में सामने आई। आर्थिक भ्रष्टाचार अपने साथ दूसरी तमाम बुराइयाँ लेकर आया। शराब और औरत ने वैकल्पिक पथ के खोजी को पूर्णत: पथभ्रष्ट कर दिया और इस तरह हुआ एक नायक या महानायक का पतन। कविता ने अमित को छोड़ दिया और वह और भी दलदल में फँसता चला गया। लेकिन लेखक की सहानुभूति कहीं-न-कहीं उसके साथ बनी रही। इसलिए लेखक ने उसके भीतर की सफेदी को पूरी तरह पराजित नहीं होने दिया। मरणांतक हृदयाघात ने अमित को बदल दिया। तनिक सी सफेदी प्रकाश का स्रोत बन गई। कविता भी वापस आ गई। सबने मिलकर पांडे और नागपाल के चक्रव्यूह को ध्वस्त कर दिया। महाभारत का अभिमन्यु अधिक विश्वसनीय लगता है क्योंकि वह चक्रव्यूह में मारा जाता है। 'युगनायिका' का अमित यहाँ आकर अविश्वसनीय सा लगने लगता है - लेकिन यदि लेखक ने उसे भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में शहीद कर दिया होता तो उस स्वप्न का क्या होता जो वैकल्पिक पथ के रूप में देखा गया है, इसीलिए एक करुण त्रासदी अंत में एक फिल्मी सुखांत कथा बन जाती है। उपन्यास का यह अंत प्रगतिशील शक्तियों की अंतिम विजय में लेखक के चरम विश्वास का प्रतीक है।

`युगनायिका´ को विशेष बल प्राप्त होता है इसमें निहित स्त्री विमर्श और दलित विमर्श से। उपन्यासकार की दृढ़ मान्यता है कि भारतीय समाज में दलितों और स्त्रियों के शोषण का आधार मनुसंहिता और मनुवाद हैं। उनके विचार से जातिवाद हमारे समाज के शरीर और आत्मा में फैल रहा कैंसर जैसा रोग है। यह निश्चय ही चिंता का विषय है कि भारतीय हिंदू समाज में जातिवाद की बीमारी समाप्त होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। यह प्रश्न भी विचारणीय है कि यह समझ सही साबित क्यों नहीं हुई कि शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ जाति प्रथा अपने आप दम तोड़ देगी। यह तो मालूम नहीं कि मनु के तथाकथित वचनों का समाज में कभी पालन होता भी था या नहीं, लेकिन जो दृश्य भारतीय राजनीति का आज हमारे सामने है उसमें यह बात बहुत यथार्थ प्रतीत नहीं होती कि पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कम्युनिस्टों को छोड़कर मुख्यधारा की सभी पार्टियाँ जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर अपने-अपने उम्मीदवार खड़ा करती हैं। इसके विपरीत सच्चाई यही है कि कम्युनिस्ट भी किसी से कम कम्युनल साबित नहीं हुए। लेखक ने काली टोपी और खाकी निक्कर वालों की खूब लानत मलामत की है, जिसके औचित्य से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अन्य प्रकट और छद्म सांप्रदायिक ताकतों का भी मुखौटा उतारे जाने की जरूरत थी जिनसे लेखक ने कन्नी काट ली है।

स्त्री विमर्श की दृष्टि से यह उपन्यास स्त्री मुक्ति का पक्षधर है और स्त्री पुरुष संबंधों को अत्यंत खुलेपन से देखने के साथ-साथ स्त्री और पुरुष की परस्पर वफादारी पर जोर देता है। स्त्री की शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति मजबूत होने की आवश्यकता का लेखक ने बार-बार प्रतिपादन किया है। यह बात बड़ी महत्वपूर्ण है कि लेखक ने धर्म और प्रेम दोनों को व्यक्तिगत मामला माना है जिनमें समाज और व्यवस्था की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। यह बात विचारणीय है कि लड़के-लड़कियों के स्वच्छंद संबंधों के कारण पश्चिमी देश पिछड़ नहीं गए, वहाँ कोई सामाजिक विपदा नहीं आन पड़ी, पर हमारे समाज का अधिकांश भाग अभी भी घोर प्रतिक्रियावादी और दकियानूसी सामाजिक मूल्यों, प्रथाओं और अंधविश्वासों का शिकार है। पुरुष वर्चस्ववाद के भयावह रूप को लेखक ने जहाँ नागपाल और महेश जैसे खलनायकों के माध्यम से चरितार्थ किया है वहीं अमित को भी बख्शा नहीं है। कविता उसे फटकारते हुए ठीक ही कहती है कि असल में स्वार्थी पुरुष इसीलिए नारी मुक्ति के विरुद्ध होते हैं, उनके आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होने के खिलाफ होते हैं क्योंकि तब वे औरत के साथ अपने पाँव की जूती की तरह व्यवहार न कर सकेंगे, तब वे उसके साथ अपनी मनमानी न कर सकेंगे। उपन्यासकार ने इस तथ्य को भली प्रकार उभारा है कि भारतीय मध्यवर्गीय पुरुष कितना भी उदारवादी एवं जनतांत्रिक क्यों न हो, स्त्री यदि उसे छोड़कर चली जाए तो उसके अहं को बहुत ठेस लगती है। समाज भी ऐसे पुरुष को हीन दृष्टि से देखने लग जाता है, लोग सोचने लगते हैं कि जरूर पुरुष में नपुंसकता जैसा भयंकर दोष होगा, तभी तो नारी पुरुष को छोड़कर गई होगी, अन्यथा भारतीय स्त्री आदमी को नहीं त्यागती, उसे ठोकर मारकर नहीं जाती। यही कारण है कि कविता के जाते ही अमित पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है।

अंतत: इस तथ्य की ओर संकेत करना आवश्यक है कि इस उपन्यास में प्रोफेसर अभय मोर्य ने सटीक व्याख्या करते हुए भारत में आपात्काल और रूस में स्टालिन काल की जो तुलना की है वह किसी की भी आँख खोलने के लिए पर्याप्त है। इसमें संदेह नहीं कि ये दोनों ही कालखंड नृशंसता और दमन की क्रूर मिसालें हैं।

यों तो 'युगनायिका' ऐसा विशाल उपन्यास है जिसमें समकालीन युग की तमाम विकृतियों का खुलासा किया गया है लेकिन सामाजिक समानता, मानवाधिकार और सत्य की अंतिम विजय के प्रति लेखकीय विश्वास इसकी अपनी उपलब्धियाँ हैं। लेखक ने अनेक स्थलों पर प्रकृति और मनोभावों का बहुत प्रभावशाली बिंब प्रतिबिंब भाव से अंकन किया है। ऐसे स्थलों पर उपन्यास की भाषा काव्यात्मक हो उठी है जिससे उपन्यासकार की सौंदर्यचेतना के भी उतना ही प्रबल होने की सूचना मिलती है जितनी प्रबल उनकी प्रगतिशील चेतना है।

युगनायिका (उपन्यास)/ अभय मोर्य/ स्वराज प्रकाशन , 4697/3, 21 ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002/ द्वितीय संस्करण, 2008/ रु. 60/-(पेपर बैक)/ 328 पृष्ठ